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Thursday, October 29, 2009

बूढ़ी हड्डियाँ

सरदी का मौसम था। सरदी भी कैसी ; जिससे हमारी आपकी हड्डियाँ भी जम जाएँ। इसी कड़कड़ाती सरदी में मैं अपने कमरे में गरमागरम  कॉफी  का आनंद ले रहा था कि मेरी नज़र खिड़की के बाहर पड़ी। सड़क पर एक वृद्ध चला जा रहा था। सबेरे के साढे़ सात बजे थे। मुझे याद आया, आज स्कूल की बस आठ बजे आने वाली है और मेरा ध्यान उस वृद्ध से हटकर अपने आपको तैयार करने में चला गया। जल्दी-जल्दी उठा और नहा-धोकर स्कूल जाने के लिए निकल पड़ा। सात-पचपन हो चुके थे। मैं जल्दी-जल्दी बस स्टॉप की तरफ लपका। मगर मेरे, बस स्टॉप तक पहुँचते-पहुँचते स्कूल-बस वहाँ से निकल चुकी थी। मैं हताष सा खड़ा रह गया। तभी मेरी नज़र पुनः उस वृद्ध पर पड़ी जो कुछ देर पहले मेरी खिड़की के सामने से आया था। उस वृद्ध को देखकर न जाने क्यों मेरे मन में उसके बारे में जानने की इच्छा हुई। मैं धीरे-धीरे उसके समीप गया ही था कि बस आ गई और वह उस बस में चढ़ गया। वह बस मेरे स्कूल की दिशा में जाने वाली थी, यो मैं भी उसी में चढ़ गया।
बस के भीतर का नज़ारा किसी भी संवेदनशील प्राणी को भौंचक करने के लिए पर्याप्त था। वैसे तो आजकल सरकार भी वृद्धों को बहुत सी सुविधाएँ प्रदान कर रही है, जैसे रेलगाड़ियों के टिकट पर नियायत, बस में अलग से सीट। और भी बहुत सारी बातें हैं जिनके बारे में अभी यहाँ चर्चा करना आवश्यक नहीं है। हाँ तो, हम बस की बात कर रहे थे। वे वृद्ध सज्जन बस में चढ़े और उस भीड़ में अपने लिए सीट खोजने लगे। बस में वैसे तो साफ-साफ बड़े अक्षरों में लिखा ही रहता है कि अमुक सीट महिलाओं के लिए है, अमुक सीट विकलांगों के लिए है, अमुक सीट वृद्धों के लिए है, लेकिन भीड़ उस सबको पढ़कर भी अनपढ़ बनी रहती है। आज की पीढ़ी अपने आपको सुशिक्षित कहती है, मानती है किंतु उस शिक्षा को मात्र किताबों तक ही सीमित रखती है। इस बस में भी एक सीट पर साफ अक्षरों में लिखा था ‘‘वृद्धों के लिए’’। वृद्ध सज्जन ने देखा और मैंने भी देखा कि उस सीट पर दो नवयुवक बैठे आपस में गपशप  कर रहे हैं। एक ने वृद्ध को देख खड़ा होकर सीट देनी चाही किंतु उसके मित्र ने उसे ऐसा करने से रोकते हुए कहा, ‘‘अरे यार, इस बुड्ढ़े को क्या जरूरत थी इतनी सरदी में घर से बाहर आकर बस चढ़ने की? हम तो ऑफिस  जा रहे हैं। इसे इतनी जल्दी कहाँ जाना है जो सुबह-सुबह बस चढ़कर सीट पाने आ गया? अपनी जवानी में यह बहुत सीटों पर बैठ चुका; अब इसे खड़ा ही रहने दो।’’
पहले वाले की सदाशयता इस तर्कपूर्ण उपदेश से पलभर में जाती रही। मुझे यह स्थिति खल रही थी इसलिए मैंने उन युवकों के एक सीट खाली करने को कहा तो वृद्ध ने मुझे टोकते हुए कहा, ‘‘नहीं, रहने दो, बेटा। मैं खड़ा रहकर भी जा सकता हूँ। अभी इन बूढ़ी हड्डियों में बहुत जान है। इतनी जल्दी नहीं टूटेंगी ।’’
कहते हुए वृद्ध की आवाज नम हो आई थी। मैं विचलित हो गया और उन्हें अपनी सीट पर बिठाते हुए कहा, ‘‘बाबा, आप यहाँ बैठ जाइए।’’
पहले तो उन्होंने मना किया - ‘‘रहने दो, बेटा! यों ही ठीक हूँ।’’ जब मैंने उनसे बार-बार कहा और स्वयं उठकर खड़ा हो गया, तब उन्होंने बैठना स्वीकार किया। सीट पाकर उन्होंने एक चैन की सांस ली और बैठकर अपनी टाँगों को अपने हाथों से दबाना शुरू कर दिया जो अब तक खड़े रहने के कारण शायद दुःख रही थीं।
बस अपनी गति से चलती जा रही थी। हर स्टॉप पर नए लोग चढ़ते, कुछ पुराने उतर जाते। इसी भागादौड़ी में मेरा भी स्टॉप आ गया। मैंने देखा कि मेरे पीछे वे वृद्ध सज्जन उसी स्टॉप पर उतर गए।
हम लोग साथ-साथ चल रहे थे। जिज्ञासावश  मैंने  उनसे पूछ ही लिया, ‘‘बाबा, आप इस उम्र में, इतनी सरदी में कहाँ जा रहे हैं?’’
उन्होंने मेरी तरफ स्नेह से देखा और कहा ‘‘बेटा, पेट की आग को शांत करने के लिए कमाने जा रहा हूँ।’’
सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि लगभग पैंसठ वर्ष की आयु पार कर चुके वृद्ध को भी कमाने जाना पड़ रहा है। मैंने उनसे फिर पूछा ‘‘बाबा, आपके परिवार में कितने लोग हैं।’’ उन्होंने बड़ी भाव-भीनी मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया, ‘‘मैं और मेरी पत्नी दो प्राणी हैं।’’
‘‘और आपके बच्चे ?’’
बच्चों का नाम सुनते, वह भावभीनी मुस्कान एक अनजाने दुःख की दास्तान के पीछे छिप सी गई - ‘‘बच्चे? बच्चे हैं न! मेरे दो बेटे हैं। बड़ा विदेश  में  एक सॉफ्टवेर  कंपनी में मैनेजर है और छोटा बैंक में एकाउंटेंट। बड़ा बेटा और उसका परिवार अमेरिका में रहता है, छोटा बेटा इसी शहर में है।’’
‘‘क्या, बाबा, बेटा आपकी देखभाल नहीं करता? बड़ा बेटा आपकी जरूरतों के लिए पैसे नहीं भेजता?’’
ये प्रश्न सुनकर वृद्ध कुछ चुप से हो गए और शांत भाव में चलने लगे। मैंने भी चलते-चलते उनसे पूछ ही लिया, ‘‘छोटे बेटे के बीबी-बच्चे आपकी देखभाल नहीं करते क्या?’’
सुनकर न जाने क्यों उनकी बूढ़ी आँखों से आँसू छलक आए। यह देख मुझसे रहा न गया। आखिर मैंने पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है, बाबा? आपकी आँखों में आँसू?’’
‘‘क्या बताऊँ, बेटा! यह तो जीवन की कहानी है। जिन्हें हम पाल पोसकर बड़ा करते हैं, जिनके सुख-दुःख का दिन-रात ख्याल रखते हैं ; वे ही बुढ़ापे में छोड़कर चले जाते हैं। बेटा! मैंने अपनी जवानी में खूब धन कमाया और बच्चों को उच्च शिक्षा  दिलाई, उनका जीवन स्तर ऊँचा उठाया। बच्चों को सदैव खुश रखने का प्रयास करता था उनकी हर इच्छा पूरी किया करता था। बड़े बेटे को विदेश भेजने के लिए मुझे अपनी सारी जमा पूँजी लगानी पड़ी। फिर भी यह सोचकर संतोश होता था कि इन पैसों से कम से कम मेरे बेटे का सपना तो पूरा हो गया। बुढ़ापे की चिंता नहीं थी। सोचता था, आखिर बेटा जो भी कमाएगा, उसमें से हमारे लिए कुछ-न-कुछ तो भेजेगा ही। और हुआ भी कुछ ऐसा ही। पर जब बड़ा बेटा वहाँ से कुछ पैसे भेजता तो उन पैसों को मैं अपने छोटे बेटे के भविष्य के निर्माण में लगा देता। बड़े बेटे ने कुछ एक या डेढ़ साल पैसे भेजे होंगे, उसके बाद से आज तक एक फूटी कौड़ी तक नहीं आई।‘‘ क्षण भर रुककर धीमी आवाज में बोले, ‘‘उसने वहीं पर शादी भी कर ली और अपना पारिवारिक जीवन ख़ुशी -ख़ुशी  व्यतीत कर रहा है ... और मैं यहाँ ....!’’
        कुछ क्षण फिर चुप्पी रही। फिर जैसे अपने आपसे बात कर रहे हों, इस तरह उन्होंने कहना शुरू किया, ‘‘मेरा तो सब ठीक है किंतु उसकी वृद्धा माँ दिन रात उसे याद करती है। मरने से पहले एक बार उसे देखना चाहती है। मैं उसकी ममता को कैसे समझाऊँ कि जिस लाल का वह दिन रात इंतजार करती है, अब वह नहीं आएगा। अब वह हमारा लाल नहीं, किसी और का पति और किसी का पिता है। अब उसे हमारे साथ की नहीं, अपने आनेवाले कल के साथ की जरूरत है। .... अब वह एक कंपनी का मैनेजर है। उसको अपने भविष्य की चिंता है। उसके लिए जो बीत गया है वह जरूरी नहीं ; और हम दोनों अब उसका बीता हुआ कल हैं। ‘तुम व्यर्थ ही चिंता करती हो? वह ठीक है।’ मैं अक्सर उसे यही कहकर सांत्वना देता रहता हूँ। इन बूढ़ी हड्डियों का क्या भरोसा कब साथ छोड़ दें ? वह बेचारी तो इसी आस पर जी रही है कि उसका बेटा एक-न-एक दिन उसके पास जरूर आएगा।’’
‘‘बाबा, आपके तो दो बेटे हैं न ?’’
‘‘हाँ, बेटा। बेटे तो भगवान ने दो दिए हैं।’’
‘‘तो क्या छोटा बेटा भी आपकी देखभाल नहीं करता? और आपको इस उम्र में कमाने की क्या जरूरत ? आपकी पेंशन  भी तो आती होगी ?’’
‘‘हाँ, बेटा।पेंशन  तो आती है। वह सब घर के खाने-खर्चे में ही लग जाते हैं। घर का किराया और हमारी दवाइयों का खर्च कहाँ से चले ? उसके लिए मुझे कुछ न कुछ तो करना ही होगा। इस उम्र में दो ही रास्ते हैं। या तो खुद कमाऊँ या फिर दूसरों के आगे भीख मांगूँ। भीख मैं माँग नहीं सकता। सारा जीवन स्वाभिमान के साथ जिया है तो अब क्या किसी के सामने हाथ फैलाऊँ ? अब तो भगवान से एक ही प्रार्थना है कि कभी भी किसी के सामने हाथ फैलाने की नौबत न आने दे।’’
‘‘आपने जवानी में इतना कमाया तो क्या आपके पास आपका मकान नहीं है कि किराए पर मकान लेकर रह रहे हैं ?’’
‘‘अरे, बेटा! तुम एक मकान की बात करते हो, कभी मेरे पास दो-दो मंजिले दो मकान हुआ करते थे। पर आज मेरे पास अपना कहने के लिए कुछ नहीं।’’
‘‘तो क्या आपने अपने मकान बेच दिए ?’’
‘‘एक मकान तो बड़े बेटे को विदेश  भिजवाने के लिए बेचना पड़ा ....।’’
‘‘और दूसरा ?’’
‘‘दूसरे मकान में छोटा बेटा रहता है।’’
‘‘तो आप उसके पास क्यों नहीं रहते ? क्या वह आपको नहीं रखना चाहता ? या आप खुद उससे अलग रहना चाहते हैं ?’’
‘‘अरे, बेटा! कौन कम्बख्त ऐसा होगा जो अपने भरे-पूरे परिवार को छोड़कर अकेला रहना चाहे। जब तक छोटे बेटे का ब्याह नहीं हुआ था तब तक सब ठीक चल रहा था। बस जैसे ही बेटे का ब्याह हुआ, कुछ ही सालों में घर में कलह शुरू हो गई। रोज़-रोज़ की चिख-चिख से तंग आकर मैंने अपने आपको अलग करने का फैसला कर ही लिया। रोज़-रोज़ बहू का यह कहकर ताने देना कि मैं किसी काम का नहीं हूँ, घर पर बैठा-बैठा रोटी तोड़ता रहता हूँ - मुझसे सहा नहीं गया।’’ एक बार फिर उनकी आँखें और आवाज नम हो आई थीं।
‘‘बेटे ने आपको रोका नहीं ?’’
‘‘बेटा तो चाहता था कि हम उसके साथ रहें किंतु.... ?’’
मुझे लगा जैसे वे अपने छोटे बेटे का बचाव कर रहे थे, ‘‘बेटा, घर में बच्चे खुश  रहें, इसी में हमारी खुशी  है। जब जवानी हँस कर काटी है तो बुढ़ापे के लिए क्या रोना। एक न एक दिन बुढ़ापा सभी को आना है। जबसे मैं रिटायर हुआ हूँ और जबसे ये सब परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई हैं, तबसे तो मैं भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि मुझे इस जहान से उठाले तो अच्छा हो। जब तक हाथ पैर चल रहे हैं, तब तक ठीक है। बस घिसट-घिसट कर न जीना पड़े। अब तक शान से जिया हूँ, चाहता हूँ शान से ही मरूँ।’’
वृद्ध की बातें सुनकर मेरा मन उन युवकों के प्रति घृणा से भर गया जो बुढ़ापे में माँ-बाप को बोझ समझते हैं। बातें करते-करते मेरा स्कूल भी आ गया। वे आगे चले गए और मैं स्कूल में उस दिन कक्षाओं में मन नहीं लगा। वृद्ध की कहानी मेरे दिमाग में चलती रही और मन बार-बार पूछता रहा , क्या इसी दिन के लिए माँ-बाप संतान चाहते हैं .............।

3 comments:

  1. budapa sab par aana hain yah jaante hue bhi log pata nahi aese kyu ho jaate hain
    jyotishkishore.blogspot.com

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  2. आपने तो सोचने में मजबूर कर दिया
    कहा जाता है की माँ से बड़कर इस दुनिया में कोइ नहीं होते
    क्या माँ अपने बच्चों में फर्क कर सकती है ?

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  3. bahut hi bhavuk hai sir. ye sanghat sare parivar me kam ke kam hote rahte hai. bache bade hone se apne maa baap ka dekhbal nahi karte hai. sirf apne aap ke bare me hi sochte hai. ye bahut vishad baat hai sir.
    ravali

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