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Thursday, December 8, 2011

आज के शिक्षक और शिक्षा के बदलते संदर्भ

       मानव जीवन में शिक्षा का विशेष महत्त्व है। शिक्षा ही तो है जो मानव को यथार्थ रुप में मानव बनाती है। शिक्षा के बिना मनुष्य जीवन पशु तुल्य ही होता । मानव और पशु में यही अंतर है कि मानव शिक्षा के द्वारा ही अपने को   उन्नति के शिखर पर ला सका है। मानव शिक्षा ग्रहण करके शिक्षा प्रचार-प्रसार करता है किन्तु पशु ऐसा नहीं कर सकते । मनुष्य जब से जन्म लेता है और जब तक जीता है कुछ न कुछ सीखता है और सिखाता है ।

       ज्ञान वो दीपक है जो मनुष्य को अंधकार रुपी संकट में सहारा देता है। मनुष्य का स्वभाव है कि ज्यों -ज्यों उसकी आयु बढ़ती जाती है ,त्यों -त्यों वह अनुकरण के द्वारा अनेक बातें सीखता जाता है । जब शिशु इस संसार   में आता है धीरे-धीरे चलना सीखता है ,बोलना सीखता है ,यद्यपि बच्चे को यह ज्ञान नहीं होता कि वह सीख रहा है फिर भी उस का सांसारिक ज्ञान बढ़ता चला   जाता है।    मनुष्य जीवन की सबसे अधिक मधुर तथा सुनहरी अवस्था विद्यार्थी जीवन ही होता है । विद्यार्थी जीवन ही सारे जीवन की नीव मानी जाती है । एक चतुर   कारीगर बहुत ही सावधान तथा प्रयत्नशील रहता है कि वह जिस मकान का निर्माण कर रहा है कहीं उस की नींव कमजोर न रह जाए । नीव दृड़ होने पर ही मकान की मजबूती नापी जा सकती है। जब नींव मजबूत होगी तब ही मकान धूप -छांव, आँधी पानी और भूकंप  के वेग को सह सकता है । इसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति
अपने जीवन की नींव को सुदृढ़ बनाने के लिए सावधानी से यत्न करता है।

       भलि प्रकार विद्या ग्रहण करना विद्यार्थी का प्रमुख कर्तव्य होना चाहिए। विद्यार्थी का कर्तव्य है कि वह अपने शरीर बुद्धि ,मस्तिष्क मन और आत्मा के विकास के लिए पूरा -पूरा यत्न करे । अनुशासन प्रियता, नियमितता समय पर काम करना, उदारता ,दूसरों की सहयता करना , सच्ची मित्रता ,पुरुषार्थ, सत्यवादिता,नीतिज्ञता ,देश भक्ति ,विनोद-प्रियता आदि गुणों से विद्यार्थी का जीवन सोने के समान निखर उठता है। उसी प्रकार उसकी कड़ी मेहनत से उस का भविष्य उज्जवल हो जाता है। जिस प्रकार सोने की सत्यता को पहचानने के लिए उसे आग में जलाया जाता है ,तब जाकर सोना अपने सच्चें आकार को पाता है। उसी प्रकार एक सच्चे विद्यार्थी को अपने जीवन के लक्ष्य को   प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम रूपी आग में जलना ही पड़ता है। किन्तु   जिस प्रकार हम उन्नती की ओर बढ़ रहे हैं , हमारी शिक्षा में भी नित नए-नए परिवर्तन आते जा रहे हैं। 
एक समय था कि विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए गुरु के आश्रम में जाना पड़ता था किन्तु आज की शिक्षा  पद्धति   में यह बात नहीं आज शिक्षा मात्र धन कमाने के केन्द्र बनते जा रहे हैं । आज जिस प्रकार शिक्षा को कठपुतली की तरह प्रयोग में लाया जा रहा है इसकी कल्पना शायद किसी ने न की होगी । यह बात सही है कि हमें शिक्षा में नए-नए परिवर्तन करते रहना चाहिए किन्तु हमें इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि हमें आधुनिक शिक्षा के प्रयोग के साथ - साथ अपनी सभ्यता और संस्कृति को नहीं भूलना चाहिए। यह सही है कि हमें ऐसी शिक्षा को ग्रहण करना चाहिए जिससे हमें भविष्य में उद्योग आसानी से उपलब्ध हो सकें। 

       आज बड़े दुर्भाग्य  से कहना पड़ता है कि विद्या एक व्यापर का बड़ा केन्द्र बन चुकी है। विद्यालय एक केन्द्र की इमारत की तरह हो गई है और अध्यापक एक व्यापारी के समान बनते जा रहे हैं । जिस प्रकार समाज दिन -प्रतिदिन उन्नति कर रहा है । आज एक बच्चे को विद्यालय में प्रवेश दिलाने के लिए माँ-बाप को कितनी ही समस्याओं का सामना करना पड़ता है, और यदि विद्यालय नामी है तब तो माँ-बाप को विद्यालय के दसो चक्कर काटने पड़ जाते हैं। आज बच्चे विद्यालय में पढ़ते तो हैं किन्तु उनकी पढ़ाई पूरी नहीं हो पाती क्यों  क्योंकि वहां के शिक्षक -शिक्षिकाएं  उन्हें    ट्यूशन  की शिक्षा देते हैं अर्थात विद्यालय में फीस जमा करो फिर ट्यूशन की फीस अदा करो । आज इसी ट्यूशन  की  लत ने अधिकांश  शिशकों -शिक्षिकाओं को व्यापरी बना कर रख दिया है । आज जब शिक्षक स्कूल या कॉलेज में किसी विषय की पूर्ण जानकारी विद्यार्थियों को न देकर कहता है कि आप  ट्यूशन  आ जाना वहीं पर सब परेशानी का हल कर देंगे । आज क्या होता जा रहा है हमारी सभ्यता को ? कहाँ थे हम   और कहाँ आ गये?
     लेकिन हमें सिक्के के एक ही पहलू को नहीं देखना चाहिए , सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है  । यदि शिक्षक किसी विद्यार्थी को ट्यूशन पढ़ाता है तो क्या गलत करता है ? क्या समाज के किसी भी वर्ग ने शिक्षक की आर्थिक स्थिति की ओर ध्यान दिया है ? नहीं … शिक्षक का भी परिवार होता है उसके भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने का अधिकार  है। यदि उसे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलानी है तो पैसों की जरुरत पड़ेगी   ही  वे पैसे   कहाँ से आएं ? शिक्षक अपने बच्चों को सम्मान के साथ शिक्षा दिला सके इसके लिए उसे ट्यूशन  का सहारा लेना पड़ता है । यह बात भी सही है कि कुछ लोग इस सम्मानजनक पद की गरिमा को अपमानित कर रहे है किन्तु एक के किए की सजा सब को देना यह तो सही बात नहीं है।  आज विद्यालयों के कर्तव्य और दायित्व के प्रति देशभर के अधिकांश लोगों की धारणाएं बदल रही हैं । इन बदलती धारणाओं का कारण है आज की शिक्षा पद्धति और अध्यापकों की कड़ी मेहनत जिसके कारण विद्यालय की यथार्थ तस्वीर समाज के सामने आ जाती है। आज की शिक्षा जहाँ एक तरफ छात्रों से कमरतोड़ मेहनत करवाती है वहीं उनमें नया जोश और उत्साह भी भरती है।  आज बदलती शिक्षा ने किशोरों मे एक नया जोश भर दिया है आज उनमें कुछ कर दिखाने का जोश पनप रहा है । उनमें देश के प्रति कुछ करने की लगन पनप रही है । यह सब तभी तक चल सकता है जब शिक्षको को उनकी योग्यता के अनुसार कार्य करने के अवसर प्राप्त होते रहेंगें और उन्हें
उनकी योग्यता के आधार पर ही वेतन मिलता रहेगा । जब शिक्षक को अपनी नौकरी के न खोने  और वेतन की चिंता नहीं रहेगी तभी वह अपने विद्यार्थियों को निÏश्चत होकर शिक्षा प्रदान कर सकेगा, तभी वह नवयुवको का सही मार्गदर्शन कर सकेगा। यदि समाज मे शिक्षक उन्नत रहेंगे तभी समाज उन्नत बन सकेगा और
समाज की उन्नती  देश की उन्नती होगी ।

Monday, September 13, 2010

तितली रानी

       तितली रानी तितली रानी
       सुंदर -सुंदर पंख तुम्हारे
       इतने सुंदर पंख लाई कहाँ से ,


जब तुम फूलों पर मंडराती हो 
फूलों का रस ले जाती हो

       चुपके से तुम मेरी बगीया के फूलों का रस ले जाती हो
       फूलों के रस का क्या तुम अपने घर पर  शहद बनती हो,

होते पंख अगर मुझको भी
मैं भी फूलों पर संग तुम्हारे मंडराता
                                     लेकर फूलों से सुन्दर -सुंदर रंग
                                    मैं भी अपने सपनों को खूब सजाता

तितली रानी तितली रानी
फूल -फूल पर तुम मंडराती हो ,

Thursday, September 9, 2010

मोर


     
देखो मोर नाच रहा है
पंखों को खोल रहा है
        नाच इसका सबको भाता
       जब यह पंखों की छतरी  फैलाता

   

          काले -काले बदल इसको भाते
          देख इन्हे यह पिहू -पिहू का गीत सुनाता



सुनकर इसके गीतों को
  बरखा रानी आती मस्ती में

Monday, September 6, 2010

मैं बड़ा हो गया हूँ

मैं तुम्हें याद आता हूँ ,
जब हम साथ नहीं होते.
मैं बड़ा हो रहा हूँ इतनी जल्दी
देखो तो ज़रा मैं कितना बड़ा हो गया हूँ .
       पकड़कर  हाथ तुम्हारा चलना सीखा
      लो आज मैं दौड़ रहा हूँ
      जबसे मैने चलना सीखा ,
      अब तक बहुत बदल गया हूँ .
साल महीने गुजर  गए
देखो मैं बड़ा हो गया
देखोगे जब तुम मुझको
सोचोगे  यह कब हुआ .
     दीवार पर टंगी मेरी तस्वीर है
     एक नज़र उसे देख लेना
    देखकर  तस्वीर तुम्हे याद मेरी आएगी
    जब मैं छोटा था , तुम्हारी गोदी मैं सोता था .

Monday, March 22, 2010

रहीम के दोहे

1. एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अगाय॥

भावार्थ :- प्रस्तुत दोहे में रहीम ने मनुष्य की ईश्वर के प्रति भक्ति भाव को अपने इस दोहे के माध्यम से अभिव्यक्त किया है कि यदि मनुष्य एक ही ईश्वर अर्थात परब्रह्म की उपासना करे तो उसके सभी मनोरथ पूरे हो सकते हैं। यदि वह अपने आप को और अपने मन को स्थिर न रखते हुए कभी किसी देवी-देवता तो कभी किसी देवी - देवता को पूजेगा तो उसकी मनोकामना कभी पूरी नहीं हो पाएगी और वह व्यर्थ ही दुखी रहेगा, इस तरह उसका कल्याण भी नही होगा।

यह सब उसी प्रकार है जैसे कोई माली पेड़ की जड़ को सीचता है तो वह पेड़ फलता - फूलता है । यदि माली पेड़ की जड़ के स्थान पर उसकी पत्तियों , डालियों, फूलों की पंखुड़ियों आदि को अलग-अलग सींचता रहेगा तो एक दिन वह पेड़ सूख जाएगा, नष्ट हो जाएगा । यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि हमें सदैव मूल को ही सींचना चाहिए तभी सही फल की प्राप्ति हो पाएगी।

2.रहिमन वे नर मर चुके, जे कछु माँगन जाहिं ।
उनते पहले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं।।

भावार्थ: - रहीम इस दोहे के माध्यम से हमें कह रहे हैं कि वे लोग जो किसी से कुछ माँगने जाते हैं , उन्हे रहीम मरे हुए के समान मानते हैं। लेकिन माँगने वाले व्यक्ति से पहले वे लोग मर चुके होते हैं जिनके मुख से याचक को देने के लिए कुछ नहीं निकलता । अर्थात माँगना तो बुरी बात है ही लेकिन उससे भी बुरी बात तो यह है कि कोई आपसे कुछ माँग रहा है और आप उसे दुत्कार कर भगा देते हो। वे लोग तो उस व्यक्ति से पहले ही मर चुके होते हैं जिनके मुख से ना निकलती है।

3.रहिमन पानी राखिए,बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे , मोती, मानुष , चून ।।


भावार्थ :- प्रस्तुत दोहे में रहीम ने पानी शब्द का तीन बार प्रयोग किया है । यहाँ पानी शब्द के तीन अलग-अलग अर्थ स्पष्ट होते हैं । पानी( जल का रूप), पानी (आभा, चमक),पानी (मान,इज्जत) ।
रहीम कहते हैं कि पानी संसार में प्रत्येक जीव के लिए अतिआवश्यक है। बिना पानी के संसार में जीवन ही नहीं होगा । इसलिए पानी का जीवन व प्रकृति के सभी पदार्थों के लिए वहुत महत्त्व है। मनुष्य को पानी रखना चाहिए अर्थात अपनी मान-मर्यादा,प्रतिष्ठा को सदैव बनाए रखना चाहिए। यदि उसकी कोई प्रतिष्ठा ही नही होगी तो उसका जीवन इस संसार में बेकार ही है। जैसे बिना चमक के मोती की कोई कीमत नही होती और ना ही ऐसे मोती अर्थात बिना चमक के मोती को कोई खरीदना चाहता है । ठीक उसी प्रकार बिना पानी के चून(आटा ) का कोई महत्त्व नही रह जाता क्योकि कोई भी व्यक्ति सूखा आटा नहीं खा सकता इसलिए बिना पानी के आटा भी किसी काम का नहीं रह जाता ।


4.जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो करै, बढ़े अँधेरो होय ।।

भावार्थ इस दोहे का माध्यम से रहीम हमें दीपक और सुपुत्रों की जानकारी दे रहे हैं। रहीम कहते है कि सुपुत्र और दीपक की स्थिति एक समान होती है। जब दीपक जलता है तो उसके जलने से चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश फैल जाता है और जब बुझ जाता है तो चारो तरफ अंधेरा छा जाता है। ठीक उसी प्रकार जिस घर में सुपुत्र होता है , उस घर की कीर्ती यश चारो फैलता है और जब सुपुत्र उस घर या कुल से चला जाता है तो वह घर सूना -सूना हो जाता है। दीपक और सुपुत्र अपने कार्यों से संसार में चारों तरफ अपनी कीर्ती स्थापित करते हैं।



5. तरुवर फल नहिं खात है,सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित ,संपति सँचहि सुजान।।


भावार्थ रहीम इस दोहे के माध्यम से हमें परोपकारी व्यक्तियों के बारे में बता रहे हैं। रहीम कहते हैं कि इस संसार में स्वार्थ के लिए तो लगभग सभी लोग जीवित रहते हैं । किन्तु जो लोग दूसरों के लिए जीते है वे ही महान हैं। जो लोग परोपकार के लिए जीवित रहते हैं उनसे बड़ा महान इस संसार में और कोई नहीं। मानव धर्म भी हमें यही सिखाता है कि हमें परोपकार करना चाहिए।

रहीम हमें बताते हैं कि सज्जन मानव ही इस संसार में परोपकार के लिए जीवित रहते हैं। इस परोपकार के लिए उन्होंने हमे बताया है कि जिस प्रकार पेड़ कभी भी अपना स्वयं का फल नहीं खाता और सरोवर कभी अपना स्वयं का जल नहीं पीता । ये तो सदैव दूसरो के हित के लिए ही कार्य करते हैं यही है निस्वार्थ परोपकार ये सदैव परोपकार के लिए ही जीवित रहते हैं और सदैव परोपकार के लिए ही संपदा को इकट्ठा करते हैं। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति अपनी ही स्वार्थसिद्धि के लिए आय का थोड़ा - बहुत अंश दान देता है इसमें कोन सी बड़ाई की बात है । बड़ाई की बात तो वह है जो निस्वार्थ परोपकार के लिए ही जीवित रहता हो।


6. टूटे सुजन मनाइए , जो टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि-फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार।।


भावार्थ:- रहीम इस दोहे के माध्यम से हमें प्रियजनों के महत्त्व को बता रहे हैं। रहीम कहते हैं कि जब भी कोई हमारा अपना प्रियजन हमसे रूठ जाए तो उसे मना लेना चाहिए, भले ही हमें उसे सौ बार ही क्यों ना मनाना पड़े ,प्रियजन को अवश्य ही मना लेना चाहिए। रहीम जी प्रियजनो का उदाहरण मोतियों से देते हुए बताते हैं कि जिस प्रकार टूटे हुए मोतियों की माला के बार-बार टूटने पर भी हर बार मोतियों को पिरोकर हार (माला) बना लिया जाता है। यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति की शोभा उसके प्रियजनों से ही होती है। जिस प्रकार हार गले में पहनने के बाद ही शुशोभित लगता है।


7. जे गरीब सों हित करें ,ते रहीम बड़ लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग।।


भावार्थ :- रहीम ने इस दोहे के माध्यम से हमें बड़े व महान लोगों के विषय में बताने का प्रयास किया है। रहीम कहते हैं कि जो व्यक्ति गरीवों के हितों का ख्याल करता है या उनकी हर संभव सहायता करता है वही महान या बड़ा होता है , जो व्यक्ति केवल अपना ही स्वार्थ ( भला) सोचते हैं ऐसे लोग स्वार्थी होते हैं। ऐसे लोग कभी भी किसी का भला नहीं कर सकते वे तो सदैव अपने स्वार्थों की सिद्धीके लिए ही सोचते रहते हैं वे कभी किसी की भलाई के बारे में सोचते ही नहीं ।

यहाँ पर रहीम जी ने कृष्ण और सुदामा का उदाहरण देते हुए बताया है कि सुदामा एक गरीब ब्रााहृण था । उसके पास धन-दौलत नहीं थी । जबकि श्रीकृष्ण द्वारिका के राजा थे वे तो सदा से ही वैभवशाली थे। दोनो की मित्रता विद्यार्थी जीवन गुरु सांदीपन के यहां हुई थी दोनो ने साथ-साथ शिक्षा ग्रहण की थी । दोनों में घनिष्ट मित्रता थी , श्रीकृष्ण ने अपने मित्र सुदामा की सहायता कर उसे भी ऐश्वर्य प्रादान कर अपने जैसा बना लिया था। इसीलिए तो वे आज भी महान व पूजनीय हैं। दोनों की मित्रता के गुणगान आज भी बड़े आदर के साथ किए जाते हैं।



8. रहिमन ओछे नरन ते, भलो बैर ना प्रीति।
काटे-चाटे स्वान के, दुहूँ भाँति बिपरीति।।


भावार्थ :- इस दोहे में रहीम ने दुष्टजनों के बारे में बताने का प्रयास किया है । रहीम जी कहते हैं कि दुष्टजनों किसी भी प्रकार का व्यवहार उचित नहीं होता चाहे वह मित्रता हो या शत्रुता। इसके लिए उन्होंने कुत्ते( श्वान) का उदाहरण देते हुए कहा कि कुत्ता चाहे क्रोध से काटे या फिर प्रेम से हमारे तलवे चाटे , उसकी ये दोनों ही क्रियाएं हमारे लिए कष्टप्रद होती हैं। इसीलिए वे कहते हैं कि हमें इस प्रकार के लोगों से सदैव दूरी बनाए रखनी चाहिए। इस प्रकार की दूरी से दोनो का ही भला होगा ।

9. जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष ब्यापत नहीं , लिपटे रहत भुजंग।।


भावार्थ : - इस दोहे में रहीम ने सज्जन लोगों की प्रबल इच्छा शक्ति व सज्जनता के महत्त्व को बताने का प्रयास किया है, साथ ही दुष्टों के व्यवहार को भी अभिव्यक्त किया है । रहीम कहते हैं कि सज्जन व्यक्ति को कभी भी अपनी सज्जनता नहीं छोड़नी चाहिए । उन्होने सर्प और चंदन के वृक्ष के माध्यम से हमें यह बात स्पष्ट करते हुए बताया है कि चंदन के वृक्ष पर विषैले सर्प लिपटे हुए रहते हैं । सर्प चंदन के वृक्ष पर अपना विष छोड़ते हैं किन्तु चंदन के वृक्ष पर उस विष का कोई प्रभाव नहीं पड़ता । वह तो अपने गुणों अर्थात सुगंध व शीतलता का कभी त्याग नहीं करता । परंतु सर्प चंदन वृक्ष का साथ पाकर भी अपना स्वभान नहीं छोड़ता । अर्थात दुष्ट व्यक्ति सज्जन व्यक्ति के साथ कितने भी दिन क्यों न रह ले वह कभी भी अपने दुष्टता के स्वभाव को नहीं बदल सकता।




10. रहिमन जिह्वा बाबरी, कह गई सरग -पताल।
आपु तु कहि भीतर गई, जूती खात कपाल।।


भावार्थ - इस दोहे में रहीम सोच-समझकर बोलने के महत्त्व को बता रहे हैं। रहीम कहते हैं कि व्यक्ति को सदैव सोच-समझकर ही बोलना चाहिए । उलटा -सीधा या कड़वा नहीं बोलना चाहिए ,कड़वा बोलने का परिणाम सदैव दुखद ही होता है। इस बात को स्पष्ट रूप के बताते हुए कहते है जीभ तो बावली है, कुछ भी उलटा-साधा, अंट-शंट बोलकर मुख के अंदर जाकर छिप जाती है । लेकिन उसके कटु वचनों का परिणाम सिर को भुगतना पड़ता है। लोग सिर पर ही जूतियाँ बरसाते हैं। जीभ का कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ पाते । इसलिए व्यक्ति को सदैव संयमित वाणी से ही बोलना चाहिए। सदैव सोच-समझकर ही बोलना चाहिए ।

Saturday, March 6, 2010

पर्यावरण प्रदूषण

पर्यावरण प्रदूषण



उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में विश्व स्तर पर हुई ``औद्योगिक क्रान्ति'' के बाद से तो `पर्यावरण प्रदूषण' की समस्या दिन व दिन गम्भीर ही होती जा रही है। वायुमण्डल में सभी गैसें एक निश्चित मात्रा में होती हैं परन्तु वायुमण्डल में कार्बन डाईआक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड, सल्फर डाईआक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड व क्लोरोफ्लोरो कार्बन की मात्रा में अत्यधिक वृद्धि हो जाने के कारण इन गैसों का संतुलन बिगड़ रहा है जिसके फलस्वरुप हरितगृह प्रभाव के कारण उत्पन्न ग्लोबल वार्मिंग एवं ओजोन परत का क्षरण जैसी समस्याऐं उभरी हैं। इन समस्याओं से निबटने के लिए सम्पूर्ण विश्व के मानव समुदाय को एकीकृत रुप से प्रयास करना होगा।


पर्यावरण हमारे चारों ओर के जैविक और अजैविक कारकों का सम्मिश्रण है। समस्त पेड़- पौधे और जीव जन्तु जैविक कारक के अन्तर्गत आते हैं जबकि वायु, जल तथा भूमि अजैविक कारकों में आते हैं। जैविक व अजैविक कारक जब तक प्रकृति में साम्यावस्था में रहते हैं तब तक ``पर्यावरण सन्तुलन'' बना रहता है, परन्तु जब दोनों कारकों में से किसी भी कारक में प्राकृतिक या अप्राकृतिक रुप से कमी या वृद्धि हो जाती है तो साम्यावस्था विचलित हो जाती है। इसी `साम्यावस्था के विचलन' को ही `पर्यावरण-असन्तुलन' तथा पर्यावरण के विभिन्न घटकों में किसी प्रकार की विकृति को `पर्यावरण-प्रदूषण' कहते हैं।


अति ठंडे प्रदेशों व ऊँचे पर्वतों पर जहां तापमान काफी कम होता है, सब्जियों व फलों आदि की खेती के लिए शीशे के घरों का निर्माण किया जाता है जिन्हें हरित गृह भी कहते हैं। ये हरित गृह पौधों के लिए आवश्यक ऊष्मा सूर्य से प्राप्त करते हैं। सूर्य से आने वाला ``लघु तरंगीय विकिरण'' शीशे की दीवारों को पार करके हरित गृह के अन्दर पहुँच जाते हैं परन्तु जब इनकी वापसी होती है तो वह दीर्घ तरंगों के रुप में होती है। अत: ये शीशे की दीवारों को पार नहीं कर पाती हैं और सूर्य विकिरण की ऊर्जा हरित गृह के अन्दर ही एकत्रित होकर पौधों की वृद्धि में सहायता करती हैं। इसी प्रकार वायुमण्डल में उपस्थित कार्बन डाईआक्साइड, मीथेन व नाइट्रस आक्साइड गैसें विकिरणों को पृथ्वी से अंतरिक्ष में जाने के मार्ग में बाधा डालती हैं जिससे ये विकिरण अंतरिक्ष में नहीं पहुँच पाते हैं क्योंकि ये विकिरण उपर्युक्त गैसों द्वारा शोषित कर लिये जाते हैं। कार्बन डाईआक्साइड, मीथेन व नाइट्रस ऑक्साइड को ताप अवशोषक गैस या ग्रीन हाउस गैसें भी कहते हैं। इन गैसों की मात्रा में निरन्तर वृद्धि हो रही है जिससे पृथ्वी के तापमान में भी ०.१ डिग्री सेल्सियस प्रति दशक के हिसाब से वृद्धि होती जा रही है। जीवाश्म ईधनों के दहन में निरन्तर वृद्धि होने से कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा में भी वृद्धि होती जा रही है। इस वृद्धि के लिए मुख्य रुप से संसार के सबसे बड़े प्रदूषक देश अमेरिका, यूरोपीय संघ व जापान ही उत्तरदायी हैं। IGPCC (Inter Governmental Panel on Climate Change) का कहना है कि संसार को खतरनाक जलवायु परिवर्तन से बचाने के लिए इसमें तुरन्त ६० प्रतिशत कमी की जरुरत है।
१ दिसम्बर १९९७ में क्योटा (जापान) में सम्पन्न जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में हरित गृह गैसों के उत्सर्जन में विकसित देश वर्ष १९९० के स्तर से ५.२ प्रतिशत औसतन कटौती पर सहमति हुई जबकि यूरोपीय संघ ने १५ प्रतिशत कटौती का प्रस्ताव रखा था। इस सम्मेलन में जिन छ: हरित गृह गैसों की पहचान की गयी है वे हैं - कार्बन डाईआक्साइड, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, ओजोन एवं जलवाष्प। गैस उत्सर्जन को रोकने हेतु ``स्वच्छ विकास कोष'' के गठन पर भी सहमति हुई। विश्व भर में कुल हरित गृह गैसों के उत्सर्जन में भारत का योगदान ०.९० प्रतिशत है जबकि अमेरिका का योगदान २५.३७ प्रतिशत है।

जापान की टोयोटा कम्पनी ने `प्रियस' नाम की कार बनाई है जिसमें बिजली तथा गैसोलीन दोनों का ही इस्तेमाल होता है। यह एक परिस्कृत कार है। परम्परागत इंजनों से आधी CO२ इस कार से निकलती है। इस प्रकार के और अधिक प्रयोगों के अतिरिक्त CO२ की मात्रा में वृद्धि को नियन्त्रित करने का एक मात्र व सरल उपाय वृक्षारोपण ही है। बढ़ते नगरीकरण के कारण जहां वृक्षों की कटाई की जा रही है वहीं दूसरी ओर इन्हें जलाने से दोहरी हानि हो रही है। ग्लोबल वार्मिंग से ध्रुवों के हिम के पिघलने का खतरा भी बढ़ गया है जिसके फलस्वरुप सागरतल में वृद्धि और फिर कुछ द्वीपों जैसे मारीशस, लक्षद्वीप आदि के जलमग्न होने की सम्भावनाएँ प्रबल हो रही हैं। जापानी पर्यावरण एजेन्सी ने अनुमान लगाया है कि जब वाहन रास्ते में पेट्रोल बचाने के लिए इंजन को बन्द कर देते हैं तो उस समय सबसे ज्यादा कार्बन डाईआक्साइड गैस निकलती है। उनके अनुसार यदि हर वाहन एक दिन में रास्ते में केवल एक मिनट ही इंजन बन्द न करें तो कार्बन डाईआक्साइड गैस का उत्सर्जन २ लाख २५ हजार २०० टन कम हो जायेगा।

वायुमण्डल में ओजोन परत जो कि समताप मण्डल में स्थित है, के क्षय से ऑस्ट्रेलिया, उत्तरी यूरोप आदि में पराबैगनी किरणों से होने वाले चर्म कैंसर की घटनाऐं बढ़ रही हैं। ओजोन एक नीले रंग की अस्थिर गैस है जिसके एक अणु में ऑक्सीजन के तीन परमाणु होते हैं। ८० से १०० कि०मी० की ऊँचाई पर ऑक्सीजन के अणु सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों द्वारा विघटित होकर स्वतन्त्र ऑक्सीजन परमाणु नवजात ऑक्साइड बनाती हैं। ये ऑक्सीजन परमाणु (O) आपस में मिलकर ऑक्सीजन O२ तथा ऑक्सीजन अणु से मिलकर ओजोन बनाते हैं। इस प्रकार ओजोन परत बन जाती है जो कि सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेती हैं। इस प्रकार ये ओजोन परत पृथ्वी पर जीवन को सुरक्षित रखने के लिए रक्षा कवच की तरह कार्य करती हैं।
इस प्रकार से निर्मित ओजोन परत का विघटन भी पराबैंगनी किरणों से होता है जिसके फलस्वरूप ऑक्सीजन का एक अणु व एक परमाणु बनता है। ये ऑक्सीजन परमाणु पुन: ऑक्सीजन अणु से मिलकर ओजोन बना लेते हैं। इसी ओजोन के निर्माण व विखंडन की क्रिया में सूर्य की पराबैंगनी किरणों की ऊर्जा की खपत हो जाती है और वे पृथ्वी के धरातल तक नहीं पहुँच पातीं हैं। परन्तु वायुमण्डल में क्लोरोफ्लोरो कार्बन व नाइट्रोजन ऑक्साइड की वृद्धि के कारण ओजोन परत का निरन्तर क्षय होता जा रहा है। सुपरसोनिक जैट विमानों की तीव्र गति भी ओजोन को ऑक्सीजन में परिवर्तित कर देती है। एयरकंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, फोम, प्लास्टिक, अग्निशामक, प्रसाधन सामग्रियाँ उत्सर्जित होती हैं और हल्का होने के कारण ये वायुमण्डल में ऊपर उठ जाती हैं। ओजोन परत के क्षय के भावी परिणामों का पूर्वानुमान करके पर्यावरणविदों ने विश्वस्तर पर क्लोरोफ्लोरो कार्बन के प्रयोग व उत्पादन मे कमी लाने तथा साथ ही साथ वैकल्पिक पदार्थों की आवश्यकता पर बल दिया है जिससे ओजोन परत के क्षय को रोका जा सके। विकसित देशों द्वारा यदि इस दिशा में अब भी ढील दी जाती रही तो पर्यावरण प्रदूषण के कारण मानव के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लग जायेगा। अत: यह मानव समुदाय के लिए परम आवश्यक है कि वह प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए निम्न बिन्दुओं पर सार्थक कदम उठावें -

• वृक्षारोपण करना।

• वाहनों में कैटालिटिक कन्डक्टर लगाकर सीसा की मात्रा को नियंत्रित करना।

• साइक्लान कलेक्टर,इलेक्ट्रोस्टेटिक प्रेसिपिटेटर,हाई एनर्जी स्क्रबर तथा फैब्रिक फिल्टर के द्वारा भी
अत्यंत छोटे आकार के कणों को वायुमण्डल में जाने से रोकना।

• उद्योग में धुऐं की चिमनियों में बैग फिल्टर का प्रयोग करके कणिकीय पदार्थों को वायुमण्डल में जाने
से रोकना।

अनुच्छेद

निम्नलिखित अनुच्छेद को पढकर अंको के स्थान पर शब्दों का प्रयोग करके अनुच्छेद पुन: लिखिए ।
10हरे का दिन था। बर 7 हो रही थी। 2लतराम का पुत्र 100रभ 4पाई पर बैठा ही था कि उसका 2स्त 1राम आ गया ।वह अपने 2स्तके 7 चल पडा।2नों 2स्त गंगा नदी के किनारे पहुँचे ही थे कि बादल छा गए। थोडी देर में बर7 होने लगी। 100रभ ने कहा 1- 13 -7 है तो डरने की क्या बात है। पर बर7 जोरों से होने लगी । 2नों 2स्त वहाँ से 9-2-11 हो गए नहीं तो भीगने की 9बत आ जाती ।जैसे ही वे 2नो घर पहुँचे बिजली चली गई। 100रभ ने कहा डरना नहीं,100रभ की बात सुनकर 1राम ने कहा मैं डरता नही हूँ। थोड़ी देर के बाद बिजली आ गई , बिजली आने के बाद 100रभ ने कहा अच्छा अब मैं चलता हूँ । 1राम ने कहा चलो मैं भी तुम्हारे 7चलता हूँ। मुझे भी 2कान से कुछ सामान लाना है।पर बाजार तो बहुत दूर है । चलो अब हम 7-7 चलते हैं । 7-7 चलने से दूरी का पता नहीं चलेगा। हम 2नो बातें करते करते चले जाएंगे।जैसे ही 100रभ 4पाई से उठा ,गिरते -गिरते बचा । तभी 100रभ के पिताजी 2लत राम जी भी वहाँ आ गए । 2लत राम को देखकर 1राम ने उन्हें नमस्कार करते हुए कहा कि हम लोग बाजार जा रहे हैं। 2लत राम ने 100रभ से कहा कि अगर तुम बाजार जा ही रहे हो तो मेरे लिए मि8ई की 2कान से 1 किलो मि8ई लेते आना।अब 2नो 2स्त घर से बाजार जाने के लिए निकल पड़े । रास्ते में उन्हें स30 मिला उन्होंने स30 से कहा चलो हमारे साथ 2कान तक चलो कुछ सामान लाना है ठीक है कहकर स30 भी उनके साथ चल दिया 3नो 2स्त मिलकर बाजार जा पहुँचे ।

Wednesday, November 4, 2009

बुराई पर भलाई की जीत

एक गाँव में भोला सिंह नाम का किसान रहता था । वह बड़ा ही घमंड़ी और झगड़ालू था । उसके इसी स्वभान के कारण गाँव के सभी लोग उससे दूर ही रहते थे । भोला सिंह अपने आप को गाँव का सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति मानता था । वह अपनी झूठी अकड़ के किसी की एक न सुनता , इसी कारण गाँव के लोग उससे कन्नी काटते रहते थे , झगड़ालु स्वभाव के कारण ही वह पुरे गाँव में बदनाम था । गाँव का कोई भी व्यक्ति न तो उसकी सहायता करना चाहता था और ना ही उससे किसी भी प्रकार की सहयता की आस करता था । गाँव के सभी लोग एक दूसरे के सुख -दुख के शामिल होते , एक दूसरे के कामों में मदद करते किन्तु भोला सिंह इन सब से बिल्कुल अलग वह अपनी मस्ती में ही रहता । कुछ समय बाद उस गाँव में मोहन सिंह नाम का एक किसान आकर बस गया । मोहन सिंह स्वभाव से हँसमुख, दरियादिल और मिलनसार इन्सान था । वह सभी से हँस प्रेम से बाते करता और वक्त आने पर सब की सहायता के लिए हमेशा तैयार रहता था । कुछ ही दिनों में वह गाँव का चहेता बन गया , अपने सद्व्यवहार से उसने गाँववालों के दिलों में अपने लिए खास जगह बना ली थी । गाँववाले भी मोहन सिंह की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहते थे । एक दिन गाँव वालों ने मोहन सिंह को भोला सिंह के स्वभाव के बारे में बताया और उसे भोला सिंह से बचकर रहने की सलाह देते हुए कहा –“ कि मोहन तुम भोला सिंह से हो सके तो दूर ही रहना । वह अच्छा इन्सान नहीं है, बड़ा ही घमंडी और झगड़ालू किस्म का इन्सान है।”

गाँववालों की बातें सुनकर मोहन सिंह मुस्कराते हुए बोला – “भोला सिंह मुझसे भला क्यों झगड़ा करेगा मैने उसका क्या बिगाड़ा है, जो वह आकर मुझसे लड़ेगा। अगर वह मुझसे झगड़ता भी है तो मैं उसे सही पाठ पढ़ा दुँगा फिर वह कभी भी किसी से झगड़ा नहीं करेगा।” गाँववालों को मोहन की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था कहा एक सीधा साधा इन्सान और कहाँ वह सर फिरा इन्सान पता नहीं मोहन किस प्रकार भोला सिंह का मुकाबला कर सकेगा। जब भोला सिंह को इस बात की जानकारी मिली कि मोहन सिंह मुझसे मुकाबला करके मुझे पाठ पढ़ाएगा तो वह क्रोध से लाल-पीला हो गया । अब तो भोला सिंह मोहन सिंह से मुकाबला करने के लिए आतुर हो उठा । एक दिन उसने मोहन के खेतों में अपने बैल छोड़ दिए । बैलों ने मोहन के खेतों की फसल को काफी नुकसान पहुँचाया किन्तु मोहन ने भोला सिंह से कुछ न कहते हुए दोनों बैलों को खेत से बाहर निकाल दिया । अपना वार खाली जाते हुए देखकर भोला सिंह और क्रोधित हो उठा । वह बार -बार मोहन सिंह से झगड़ने के उपाय करता किन्तु मोहन सिंह उसके वारों का हँसकर मुकाबला करके उसके वार को नाकाम कर देता । मोहन हमेशा अपना समय दूसरो का सम्मान करने और दूसरों की मदद करने में व्यतीत करता किन्तु भोला सिंह हमेशा अपना संमय दूसरों को अपमानित करने लड़ने झगड़ने में ही बिताता था ।

एक दिन मोहन के एक मित्र ने उसके परिवार के लिए ढेर सारे मीठे रसीले आम भेजे थे। मोहन सिंह ने सभी गाँववालों के घर थोड़े -थोड़े आम भेजे । उसने कुछ आम भोला सिंह के घर भी भिजवाए थे किन्तु भोला सिंह ने आमों को यह कहकर वापस लौटा दिया कि वह कोई भिखमंगा नहीं है जो ऐरे गैरे के घर से आए हुए सामान को स्वीकार कर ले । इस पर मोहन सिंह ने भोला सिंह को कुछ नही कहा और बात आई और गई हो गई । धीरे -धीरे मौसम में बदलाव होने लगा गरमी का मौसम समाप्त हो चुका था बरसात का मौसम शुरु हो चुका था । बरसात के मौसम में एक दिन भोला सिंह अपनी बैलगाड़ी में अनाज भरकर पास ही शहर की मंडी में बेचने जा रहा था । गाँव के कुछ ही दूरी पर एक नाला बहता था। जब भोला सिंह गाँव के उस नाले को अनाज से भरी गाड़ी से पार कर रहा था , उसकी बैलगाड़ी नाले में फँस गयी । भोला ने बैलगाड़ी को बाहर निकालने की जी तोड़ मेहनत की लेकिन वह गाड़ी निकालने में नाकाम रहा । थक हार कर वह नाले के एक किनारे पर जाकर बैठ गया । गाँववालों को इस बात का पता चल चुका था कि भोला सिंकी की अनाज के भरी बैलगाड़ी नाले में फँसी हुई है किन्तु किसी ने भी भोला की मदद के लिए जाना जरूरी नहीं समझा । जब मोहन को इस बात का पता चला तो वह तुरंत अपने दोनों बैलों को लेकर नाले पर भोला की मदद करने चला गया । मोहन सिंह को देखकर पहले तो भोला सिंह सकपका गया और फिर उसने मोहन से कहा – "मुझे तुम्हारी सहायता की आवश्यकता नहीं है । तुम जैसे आए हो वैसे ही वापस गाँव लौट जाओ ।" भोला सिंह की कटु बातें सुनकर मोहन सिंह पहले तो मुस्कुरा दिया और मुस्काते हुए बोला – “तुम्हें जितना क्रोध करना है करों ,पर मैं तुम्हें रात में यहाँ अकेला नहीं छोड़ सकता । गुस्सा करना तुम्हारा काम दूसरो की मदद करना मेरा काम” कहते हुए मोहन ने अपने दोनो बैल गाड़ी में जोत दिये। उसके ताकतवर बैलों ने थोड़ी ही देर में अनाज से भरी गाड़ी को बाहर निकाल कर खड़ा कर दिया । मोहन सिंह के सद्व्यवहार को देखकर भोला सिंह को अपने आप पर लज्जा आने लगी । उसका झूठा घमंड चूर -चूर हो चुका था । भोला ने मोहन से अपने दुर्व्यवहार के लिए क्षमा माँगी और वादा किया कि अब वह कभी भी किसी से न तो लड़ेगा और न ही किसी को सताएगा। किसी ने सच ही कहा है जो लोग झूठा घमंड करते है उन्हें सदैव नीचा देखना पड़ता है । घमंड़ी व्यक्ति कभी भी किसी का प्रिय नहीं हो सकता । घमंड ( अहंकार ) व्यक्ति के सोचने समझने की शक्ति को नष्ट कर देता है । अब भोला सिंह पूरी तरह बदल चुका है । वह गाँववालों के साथ मिलजुलकर रहने लगा है । एक इन्सान ने उसके जीवन को पूरी तरह बदल दिया । उसकी भलाई ने भोला की बुराई को जला दिया और उसे एक अच्छा इन्सान बना दिया । इस लिए हमें कभी भी घमंड़ नहीं करना चाहिए हमें दूसरों का सम्मान करना चाहिए और उनकी सहायता करनी चाहिए।

Monday, November 2, 2009

सहायक रमेश

दिल्ली में रहने वाला रमेश एक होनहार लड़का है । रमेश जब बहुत छोटा था तभी ईश्वर ने उसके माँ-बाप का साया उसके सिर से छीन लिया उसका अब इस संसार में कोई सहारा नहीं था , कहते है न कि जिसका कोई सहारा नहीं उसकी रक्षा ईश्वर करता है । बचपन से ही अनाथ होने के कारण उसने अपने सभी कार्यों और विचारों में बुद्धिमत्ता विकसित कर ली थी । वैसे तो वह था अनाथ किन्तु उसने कभी भी अपने आप को अनाथों की तरह असहाय नही माना । वह सदैव अपने बल पर , अपनी बुद्धि के बल पर अपने कार्यों को करता था । जैसे - जैसे वह बड़ा होने लगा वैसे -वैसे वह दूसरे बेसहारा और अनाथ लोगों की सहायता करने लगा उसने अपने जीवन का एक लक्ष्य बना लिया था कि जितना उससे हो सकेगा वह गरीब अनाथ और बेसहाराओं की मदद करेगा। धीरे -धीरे समय बीतता गया और रमेश बड़ा होने लगा अब वह एक कुशल टेलर है। रमेश जब भी किसी अनाथ को देखता तो वह उस अनाथ की मदद अवश्य करता था । अब उसकी उम्र विवाह योग्य हो चुकी थी एक दिन उसका विवाह भी हो गया । लड़की के माता-पिता ने रमेश की दूसरों के प्रति सद्व्यवहा और एक एक मेहनती इन्सान को देखकर ही उन्होंने अपनी लड़की का विवाह उसके साथ कर दिया था । रमेश की पत्नी भी काफी समझदार थी उसकी पत्नी भी उसके सभी कार्यों में बराबर सहयोग करती करती थी । रमेश की पत्नी भी सिलाई का कार्य जानती थी वह घर पर ही रहकर औरतों के कपड़ो की सिलाई किया करती थी और रमेश अपनी दुकान पर । वे दोनों अपना जीवन खुशी-खुशी से व्यतीत कर रहे थे। उन दोनो की जितनी भी कमाई होती थी उसमें से अपने खाने -खर्चों को निकालकर वे दोनों बाकी के पैसों को गरीब, बेसहारा अनाथ लोगों की सेवा में लगा देते थे।

एक दिन की बात है जब रमेश अपनी दुकान से घर जा रहा था रास्ते में उसने देखा कि एक बेसहारा बूढा को देखा जो चलने में असमर्थ था उसे चलने में बहुत परेशाना हो रही थी । वैसे तो वहाँ पर बहुत लोग थे किन्तु किसी को इतनी फुरसती ही नहीं कि कोई उस बूढ़ो आदमी की मदद कर दे । जैसे ही रमेश ने देखा कि वह वृद्ध परेशान है वह उनके पास गया और उन्हें सहारा देते हुए उन के घर तक छोड़कर आया । वृद्ध ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा बेटा सदा खुश रहो अगर हर व्यक्ति तुम्हारी तरह दूसरों की सहायता करे तो इस दुनिया से दुखों का ही अंत हो जाएगा लेकिन आजकल तुम्हारे जैसे लोग बहुत कम ही मिलते है जो दूसरो के दुख को अपना समझकर उसे उस दुख से बाहर आने में मदद करते हैं । वृद्ध महोदय को घर छोड़ने के कारण संजय को घर आने में थोड़ी देरी हो चुकी थी जब पत्नी ने इसका कारण पूछा तो संजय ने सारी घटना अपनी पत्नी को बता दी । रमेश के इस कार्य से उसकी पत्नी ने भी उसकी सराहना की और उसे मुँह-हाथ धोकर आने के लिए कहकर खाना बनाने के लिए चली गई । कुछ समय बाद रमेश मुँह- हाथ धोकर आया तब तक उसकी पत्नी ने खाना लगा दिया था । दोनों खाने के लिए बैठे ही थे कि दरवाजे के बाहर से किसी भिखारी की आवाज सुनाइ दी रमेश ने अपनी थाली में से दो रोटी और कुछ चावल ले जाकर उस भिखारी को दे दिए और आकर उसने स्वंय भोजन किया । एक भूखे को भोजन कराकर एक असहय की सहायता करके उसे जो आत्मसंतुष्टि हो रही थी उसे वह व्यक्त नहीं कर सकता था । रमेश की पत्नी भी सदैव उसके कार्यों में उसकी बराबर सहायता करती थी । इस प्रकार संजय और उसकी पत्नी सदैव गरीब ,असहाय बेसहारा लोगों की सहायता करते हुए अपना जीवन व्यतीत करने लगे। जीवन का सच्चा सुख तो सदैव दूसरों की सहायता करने में ही मिलता है। जो दूसरों की सहायता करते हैं ईश्वर भी उनकी सहायता करते हैं । मनुष्य को अपने जीवन में कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए क्योंकि जो व्यक्ति अहंकार करता है वह कभी भी सफल नहीं हो सकता । जो दूसरों के सुख-दुख बांटते हैं ईश्वर भी उनके सुख-दुख का ख्याल रखता है । इसीलिए तो कहा गया है कि मानव सेवा ही माधव सेवा है ।जो व्यक्ति मानवों का तिरस्कार करके ईश्वर को प्रशन्न करने का प्रयास करते है ईश्वर ऐसे लोगों से कभी प्रशन्न नहीं होता और न ही ईश्वर ऐसे लोगो को पसंद करता है।

Tuesday, October 27, 2009

आत्मविश्वास ही सफलता की प्रथम सीढी है

 आत्मविश्वास ही सफलता की प्रथम सीढी है ।यह इस आधार पर कहा जा सकता है कि जिस व्यक्ति का आत्मविश्वास कमजोर होता है वह अपने जीवन में कभी भी सफलता प्राप्त नहीं कर पाता । सफलता एवं उन्नती के शिखर पर केवल वहीं पहुँच सकता है जिसका मनोबल , आत्मविश्वास सुदृढ़ होगा। आत्मविश्वास का जन्म मन में होता है । मनुष्य का मन समस्त इन्द्रियों का स्वामी और गतिविधियों का केन्द्र माना जाता है । मन के संकेत पर ही एवं उसकी प्रेरणा से ही शरीर का संचालन सुचारु रुप से होता है । यदि मन न होता तो मनुष्य शरीर अपने आप में बड़ा लाचार होता , क्योकि मनुष्य का मन जो कहता है वह वही करता है किन्तु मनुष्य की कुछ सीमाएं भी हैं उन्हें वह पार नहीं कर सकता । मनुष्य का शरीर आग में जल जाता है , पानी में गल जाता है ,वायु-धूप में वह सूख जाता है , शीत धाम वर्षा सभी इसे विचलित कर देती हैं । यह तन थक जाता है , टूट जाता है और हिम्मत हार बैठता है । इस बेचारे शरीर से मनुष्य वह सब कुछ नहीं कर सकता था जो आज उसने कर दिखाया है मात्र शरीर से यह सब संभव नही हो सकता उसके लिए उसे अपने आप को आत्मविश्वासी बनाना होगा तभी वह अपने आप को ऊँचाइयों के शिखर पर पहुँचा सकता है।

    आज वैज्ञानिक,सास्कृतिक और कलात्मक उपलब्धियाँ मनुष्य के शरीर के कारण नहीं अपितु उसके आत्मविश्वास के कारण ही प्राप्त हो सकी हैं । आत्मविश्वास वह है जिसे न तो कोई तोड़ सकता है , न उसे हिला सकता है यदि वह आत्मविश्वास द्रढ़ है तो । मनुष्य का मन भी उस की सफलता में कहीं न कहीं भागीदार अवश्य होता है क्योंकि मन के अंदर ही किसी कार्य को करने की इच्छा का जन्म होता है । मन शरीर का एक ऐसा यंत्र है जिससे शरीर का संचालन सुचारु रुप से होता है। इस लिए हम कह सकते हैं कि जो व्यक्ति अपने मन से हार मान बैठता है उसे संसार की को भी ताकत नहीं जिता सकती और जो व्यक्ति अपने मन से नही हारा है उसे संसार की कोई भी ताकत हरा नहीं सकती । जो व्यक्ति अपने मन मे दृढ संकल्प के साथ कार्य आरंभ करता है वह कभी भी जीवन में हारता नहीं । मन न हारने का अर्थ है हिम्मत न हारना , अपना हौसला बनाए रखना । जब तक मनुष्य में यह हौसला बना रहता है वह शांत नहीं बैठता वह कोई न कोई नए कार्य को करने में निरंतर लगा ही रहता है । जिस व्यक्ति का आत्मविश्वास दृढ है वह बार-बार  असफल होकर भी सफलता की राह पर सदा गतिशील रहता है । सफलता भी उसी के कदम चूमती है जो अपने आप को सफलता पर ले जाना चाहता है । जीवन एक संघर्ष है और जो इस संघर्ष में सफल होता है वही सही अर्थों में मनुष्य है और जो इस संघर्ष से घबराकर विचलित हो जाते हैं उनका जीवन व्यर्थ है । जीना है तो सदैव आत्मविश्वास के साथ ।आत्मविश्वासी व्यक्ति तो  पहाड़ों को भी काटकर नदियाँ बना सकता है, बस जरुरता है दृढ़ संकल्प की  । जीवन एक संघर्ष है इसके लिए अंग्रेजी में एक कहावत है कि - "किसी भी लड़ाई में तब तक हार नहीं माननी चाहिए जब तक कि जीत न ली जाए।" वास्तव में कोई भी संघर्ष या लड़ाई मनुष्य  अपने आत्मबल  ( आत्मविश्वास ) के भरोसे पर ही जीत सकता है। मनुष्य शरीर तो एक साधन मात्र रहता है।
    हमें इतिहास में अनेक ऐसे व्यक्तियो के  उदाहरण मिल जाएंगे जिन्होंने अपने आत्मबल के भरोसे से दुनिया को झुका दिया असंभव को भी संभव कर दिखाया । हमें हमारे इतिहास में अनेक व्यक्तियों के जीवन चरित्र पढ़ने को मिलते हैं जो आजीवन कठिनाइयाँ झेलते रहे किन्तु अन्त में सफल हुए। आज उन व्यक्तियों को असाधारण महापुरुषों की श्रेणी में रखते हैं । इसका क्या कारण है?  इसका कारण यही है कि इन लोगों ने विषम परिस्थितियों के आगे अपने घुटने नहीं टेके और उसका डटकर मुकाबला किया और उन विषम परिस्थितियों पर विजय प्राप्त की इसी कारण आज हम उन्हें असाधारण मनुष्य मानते हैं । जैसा  कि हम उदाहरण  राष्ट्रपिता महात्मागाँधी जी का ले सकते हैं जिन्होने अपने जीवन में अपने आत्मविश्वास के बल पर ब्रिटिश साम्राज्य की नीव हिला कर रख दी थी । ब्रिटिश सरकार उन्हें तोड़ न सकी क्यों ? क्योंकि उनका आत्मविश्वास सुदृढ़ था । यदि उनका मनोबल कमजोर पड़ जाता तो शायद आज हम आजादी की हवा में सांस न ले रहे होते बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के शासकों के अत्याचारों का शिकार हो रहे होते । इस लिए हम कह सकते हैं कि  जिस व्यक्ति का आत्मविश्वास दृढ़ होता है उसे बड़ी से बड़ी बाधा भी नही हरा सकती । यह बात जरूर है कि जो व्यक्ति सच्चाई की राह पर चलता है उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है किन्तु सफलता भी उसी व्यक्ति के कदम चूमती है जो सच्चाई और आत्मविश्वास के साथ अपने लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयास करता है ।
 दूसरा उदाहरण हम स्वामी विवेकानंद का ले सकते हैं जिन्होंने अपनी विदेश यात्रा के दौरान जब अमेरिका में भाषणों के दौरान उन्हें भाषण देने की अनुमति न मिलने  पर वे निराश नहीं हुए ,बल्कि उन्होंने किसी न किसी तरह भाषण देने की अनुमति प्राप्त कर ही ली  उन्होंने अपना आत्मविश्वास नहीं खोया उन्हें केवल कुछ समय की ही अनुमति मिली थी किन्तु जैसे ही उन्होंने अपना भाषण आरंभ किया वहाँ पर बैठे सभी लोग उनके भाषण सुनकर मंत्र मुग्ध हो गए और उन्होंने पाँच मिनट के स्थान पर बीस मिनट का भाषण दिया और अपने देश का नाम उज्ज्वल किया । यह सब कार्य उन्होंने अपने आत्मविश्वास के बल पर ही किया । उन्होंने आशा का दामन नहीं छोड़ा और आज एक महान पुरुष के रुप में याद किए जाते हैं । जो व्यक्ति आत्मविश्वास के साथ अपना कार्य करता उसे सफलता अवश्य मिलती है।

Wednesday, October 7, 2009

IB Profiles (रूपरेखा) For IB Students and Teachers

                                Profiles/रूपरेखा

1. जिज्ञासु :( Inquirer) विद्यार्थी में अज्ञात विषय जानने ,समझने तथा पढ़ने की उत्कंठा का
होना आवश्यक है। जिन विद्यार्थियों मे अज्ञात विषय को जानने की
लालसा होती है वे ही उस विषय को सीख पाते हैं।

2. सुविज्ञ :(Knowledgeable)  विद्यार्थी में भाषा सीखने और उसे अपने व्यवहार में लाने की उत्सुकता
का होना अतिआवश्यक है।सीखे हुए ज्ञान को अपने व्यवहारिक जीवन में
लाने से ही विषय का ज्ञान बढ़ता है।


3. विचारक :(Thinkers) विद्यार्थी को यदि भाषा सीखनी है तो उसे दूसरों पर निर्भर न रहकर
स्वयं को स्वावलंबी बनाना होगा। स्वावलंबी विद्यार्थी ही भाषा की
बारीकियों को सीख सकता है।

4. संचारक: (Communicators) भाषा शिक्षण में विचारों के आदान-प्रदान हेतु संप्रेषण कौशल का होना
अनिवार्य है।


5. सिद्धान्तवादी :( Principled) विद्यार्थियों को यदि भाषा सीखनी है तो उन्हें भाषा - शिक्षण
सिद्धान्तों का पालन करना होगा। भाषा शिक्षण के सिद्धान्तों के पालन
से भाषा शिक्षण और निखरता है।

6. उदार ह्रदयी बनें : (Open minded)विद्यार्थियों को यदि भाषा सीखना है तो उन्हें समय -समय पर
एक दूसरे के साथ बिना किसी संकोच के एक दूसरे के साथ
विचार विमर्श करते रहना चाहिए ।


7. स्नेह्रदयी बनें :( Caring)  भाषा सीखने वालों को सदा प्रोत्साहित करें उन की त्रुटियों पर व्यंग
न करें बल्कि उन्हें सुधारने का प्रयास करते रहें । स्नेह और
प्रोत्साहन से कोई भी कठिन से कठिन भाषा भी सीखी जा सकती
है।

8. संकट -संघर्ष : (Risk -Taker)विद्यार्थी को भाषा अध्ययन में आए संकटों का सामना करने पर ही
भाषा का उचित ज्ञान प्राप्त होगा।

9. सुसंतुलित : ( Balanced )विद्यार्थी को भाषा शिक्षण में समस्त कौशलों का संतुलन बनाए रखना
अत्यावश्यक है। सभी प्रकार के कौशलों के प्रयोग से भाषा शिक्षण
निखरता है।

10. आत्मनिरीक्षण : ( Reflective )विद्यार्थियों को समय-समय पर स्वयं ही निष्पक्ष रूप से अपने
ज्ञान का निरीक्षण करते रहना चाहिए। स्वयं निरीक्षण से विद्यार्थी
अपना भाषा कौशल सुधार सकते हैं।

Monday, October 5, 2009

IB Students Attitudes विद्यार्थी रवैया / (For IB Students and Teachers)

                                                     Attidudes   रवैया


1. आत्मविश्वास: ( Confidence) विद्यार्थियों को सदैव अपने कार्य के प्रति आत्मविश्वासी होना चाहिए। आत्मविश्वास ही सफलता की पहचान है। आत्मविश्वासी विद्यार्थी ही जीवन में अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाता है।



2. सहायक :( Cooperative) विद्यार्थियों को सदैव बिना किसी भेद-भाव के एक दूसरे का सहायक होना चाहिए। एक दूसरे की सहायता से विद्यार्थी कठिन से कठिन कार्य को भी सरल बना सकते हैं ।



3. सम्मान :(Respect)  विद्यार्थियों को सदैव दूसरों का सम्मान करते हुए ज्ञानार्जन करना चाहिए। जो विद्यार्थी सदैव दूसरों का सम्मान करते हैं ,दूसरे भी उनका उतना ही सम्मान करते हैं।



4. सहनशीलता :(Tolerance) विद्यार्थियों को सदैव अपने अंदर सहनशीलता का विकास करना चाहिए। कठिन परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए। किसी भी प्रकार की असफलता से निराश न होते हुए अपने आपको मजबूत और सहनशील बनाना चाहिए।



5. स्वतंत्र :(Independence) विद्यार्थियों को सदैव अपने ज्ञान का आदान प्रदान स्वतंत्र रूप से एक -दूसरे के साथ करते रहना चाहिए। स्वतंत्र रूप से ज्ञान के आदान-प्रदान से ज्ञान में वृद्धि होती है।



6. ईमानदारी :(Integrity) एक आदर्श विद्यार्थी को सदैव ईमानदारी के साथ अपना कार्य करना चाहिए। एक ईमानदार विद्यार्थी ही अपने ज्ञान का सही उपयोग कर सकता है। विद्यार्थियों को सदैव अपने और अपने ज्ञान के प्रति ईमानदार होना चाहिए। जीवन में सदैव सत्यता के मार्ग पर चलते हुए ज्ञानार्जन करना चाहिए।



7. सहानुभूति :(Empathy) विद्यार्थियों में सहानुभूति का गुण होना बहुत ही आवश्यक है, क्योंकि सहानुभूतिपूर्ण विद्यार्थी सदैव अपनी समस्याओं का समाधान एक -दूसरे के सहयोग से पा लेता है।



8. उत्सुकता :(Enthusiasm) विद्यार्थियों में सदैव नए विषय को जानने की उत्सुकता होनी चाहिए। उत्साही विद्यार्थी ही अपने ज्ञान में वृद्धि करता है।



9. रचनात्मकता : (Creativity)विद्यार्थियों को ज्ञान प्राप्ति के लिए नए-नए रचनात्मक तरीकों को निरंतर अपनाते रहना चाहिए और इस प्राप्त ज्ञान कोे रचनात्मकता के आधार पर दूसरों के सम्मुख प्रस्तुत करना चाहिए।



10. जिज्ञासा :(Curiosity) विद्यार्थियों में सदैव अज्ञात विषय को जानने की जिज्ञासा होनी चाहिए। अज्ञात विषय को ज्ञात करने से ही ज्ञान में वृद्धि होती है। विद्यार्थी को सदैव जिज्ञासु बने रहना चाहिए।





11. सराहना : (Appreciation)विद्यार्थियों को सदैव एक - दूसरे के कार्यों को समय -समय पर सराहते रहना चाहिए। सराहना से ही विद्यार्थियों में कार्य करने की क्षमता का विकास होता है, और उनके मनोबल में भी वृद्धि होती है।



12. वचनबद्धता :( Commitment) विद्यार्थियों को सदैव अपने कार्य एवं जिम्मेदारियों के प्रति वचनबद्ध रहना चाहिए। वचनबद्ध विद्यार्थी सदैव अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है।

Tuesday, September 29, 2009

कहानी को ध्यानपूर्वक पढकर

निम्नलिखित कहानी को ध्यानपूर्वक पढकर नीचे लिखे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए ।

एक बार देवता सैर को निकले थे। उन्हें देखकर तीन पहाड़ों की चोटियों ने उन्हें प्रणाम किया। देवता उन पर प्रसन्न हुए और तीनों से एक-एक वर माँगने के लिए कहा। तीनों प्रसन्न हो गए। उनमें से पहले ने अपनी इच्छा प्रगट करते हुए कहा - हे भगवन, मेरी ऊँचाई सबसे अधिक हो जाए जिससे मैं सभी को दूर ले दिखाई दूँ। सभी मेरी प्रशंसा करें और मैं सबसे बड़ा कहलाऊँ। दूसरे ने कहा - मुझ पर इतनी हरियाली छा जाए कि जिससे कोई आकर मुझे नष्ट न कर सके। मैं सभी को सुन्दर भी लगूँ। तीसरे ने अपनी माँग में पूछा - मुझे तो आप भूमि जैसा समतल बना दीजिए। जिससे दूसरों को उपयोग हो, दूसरों की भलाई हो। मुझ पर खेती करके अनाज की अच्छी पैदावार की जाए। देवताओं ने तथास्तु कह दिया अर्थात् तुम सभी की इच्छा पूर्ण हो ऐसा आशीर्वाद देकर देवता लोग चले गए। तीनों पहाड़ अपनी-अपनी इच्छा पूरी होने की बात को लेकर खुश हुए। बहुत दिनों बाद देवता पुनः उसी मार्ग से गुजर रहे थे। उन्होंने देखा कि सबसे ऊँचा पहाड़ बड़े पहाड़ के नाम से प्रसिद्ध हो गया था। देखनेवाले उसकी अवश्य प्रशंसा करते थे। इन सबसे अलग बात यह थी कि सबसे ऊँचा होने के कारण वह सबसे अधिक सर्दी सह रहा था।

प्रश्न 1. जब देवता सैर को निकले तो उन्हें किसने प्रणाम किया ?



प्रश्न 2 अपनी ऊँचाई सबसे अधिक हो जाने का वर किसने माँगा ?




प्रश्न 3 अपने ऊपर सबसे अधिक हरियाली हो जाने का वर किसने माँगा ?


प्रश्न 4 तीसरे पहाड़ ने देवताओं से क्या वर माँगा ?


प्रश्न 5 जब देवता पुनः उसी मार्ग से गुजर रहे थे तो उन्होंने क्या देखा ?