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Tuesday, September 19, 2017

आज़ादी


कल देर रात तक काम करने के कारण  सचिन  की नींद देर से खुली, अधखुली आँखों से ही उसने पास में रखे अपने फोन को उठाकर टाइम चैक किया  ओह ! आठ बज गए कहकर झट से उठकर सीधे हॉल में चला गया। हॉल में आकर उसने फोन को देखा साहिल जो उसका सबसे घनिष्ठ मित्र है उसके सात  मिस कॉल थे। साहिल के कॉल देखकर उसने उसे कॉल किया। बात करने पर पता चला कि साहिल की माँ की तबीयत ज्यादा खराब होने के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया है।  थोड़ी देर में सचिन भी उस अस्पताल में पहुँच गया। यहाँ आकर पता चला कि बी. पी. अधिक बढ़ने के  कारण वे बेहोश होकर गिर गई थीं। डॉक्टर ने उन्हें कुछ दवाई और इंजेक्शन दे दिया था जिससे उन्हें होश तो आ गया था किन्तु गिरने के कारण हाथ  में गहरी चोट आ गई थी।  डॉक्टर ने माँ को एक – दो दिन अस्पताल में रखने की सलाह दी जिससे उनकी  सेहत का पूरा ध्यान रखा जा सके। दो– तीन दिन बाद माँ  घर वापस आ गई।
  साहिल गुड़गाँव में एक मल्टी नेशनल कंपनी में मैनेजर के पद पर काम कर रहा था, मैनेजर के पद पर होने के कारण आमदनी भी अच्छी थी। खुद का आलीशान घर  जिसमें उसका छोटा परिवार पत्नी, एक बेटा और एक बेटी रहते थे।  पिछले साल वह अपने बूढ़े माता-पिता को भी अपने साथ शहर ले आया था। वैसे भी गाँव में उनकी सेवा करनेवाला या उनकी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं था।  कहाँ गाँव का खुला वातावरण और कहाँ शहर का संकीर्ण वातावरण, कुछ महीने तो बूढ़े माता-पिता का शहरी वातावरण में मन ही नहीं लगा फिर जैसे –तैसे  उन्होने  अपने आप को उस वातावरण में ढालन शुरू कर दिया।  जब से बूढ़े माता –पिता इस घर में आए थे उसके कुछ समय बाद से ही घर का बातावरण गंभीर रहने लगा था। परिस्थिति तो यहाँ तक आ गई कि साहिल की पत्नी और बच्चों ने बूढ़े माता –पिता से बात करना तक बंद कर दिया।   घर के इस बदलते माहौल से साहिल और उसके बूढ़े माता –पिता काफी दुखी थे, अक्सर रह रहकर बूढ़े माता –पिता अपने आप को कोसते कि क्यों वे लोग यहाँ आए .... ? अगर न आते तो कम से कम उसके परिवार में मनमुटाव तो न पैदा होता।  बेटे के सुखी जीवन के लिए माँ ने कई बार उससे कहा कि वह उन्हें वापस गाँव छोड़ आए या गाँव जानेवाली बस में बैठा दे। वैसे भी उनका यहाँ मन नहीं लगता घर में बैठे –बैठे ।  
एक दिन घर में बने बगीचे मैं बैठा –बैठा  इसी विषय पर सोच रहा था कि किस तरह से अपने परिवार को जोड़कर रखे ? कैसे रिश्तों में बढ़ती दूरियों को मिटाए ? पत्नी है कि बूढ़े माता-पता से बात तक नहीं करना चाहती , बच्चों के पास उनके साथ बात करने या उनके साथ बैठने का टाइम ही नहीं है वह ऐसा क्या करे जिससे कि उसके घर का माहौल फिर से पहले जैसा हो जाए।  इन्हीं बातों को सोचते –सोचते  वह अपने अतीत की घटनाओं को याद करने लगा- कितना खुश रखते थे उसके माता पिता उसे।  बचपन से अब तक उसकी हर छोटी बड़ी  ख्वाइश का ध्यान रखते थे। आज भी उसे याद है किन विपरीत परिस्थितियों में उसके मात –पिता ने उसे  इस मुकाम तक पहुँचाया  है। उनके घर में बिजली तो थी नहीं, माँ किसी तरह घासलेट (कैरोसिन )  का  इंतजाम करती जिससे कि वह रात में पढ़ सके। रात में पढ़ाई  करते समय उसकी माँ भी उसके साथ –साथ जागती।  पिता  बेलदारी का काम  करते और माँ  दूरसों के घरों में काम करके घर का खर्चा और उसकी पढ़ाई का खर्चा चला रहे थे।  बचपन की भूली बिछड़ी यादों में उसे याद आया कि कभी भी उसके माता-पता ने उसे अकेला नहीं छोड़ा । अकेला छोड़ते भी कैसे चार संताने हो –होकर चल बसी थीं, यही उनकी आखरी उम्मीद था। जीवन की हर कठिन राह पर दोनों ने उसे सहारा दिया था। उनके कठिन परिश्रम और त्याग का ही परिणाम था  कि आज वह इस मुकाम तक पहुँच पाया है। माँ फटी साड़ी में काम पर जाती जब अधिक फट जाती तो उसे सिल लेती कहीं –कहीं उसमें थेगरी (दूसरा कपड़ा) लगाकर सिल लेती, ऐसा ही हाल पिता का भी था। तभी उसके नौकर ने आकर उसे  आवाज देते हुए चाय का कप रख दिया  ओह ! कहकर उसने  चाय का कप उठाया और कुछ सोचते हुए चाय की चुसकियाँ लेने लगा.....             
 
 रात के आठ बजे थे सचिन अपने ऑफिस से घर  के लिए निकलने ही वाला था कि उसके मोबाइल पर एक कॉल आई, फोन साहिल की पत्नी जया  का था, जैसे ही उसने फोन उठाया वैसी ही उसे उधर से रोने की आवाज़ सुनाई दी .... रोने की आवाज़ सुनकर किसी अनहोनी की आशंका से उसका दिल बैठ गया ।
उसने किसी तरह उन्हें शांत किया और पूछा कि आखिर बात क्या है ... क्या हुआ ?
जया  – “ रोते हुए .... अभी आप कहाँ हैं ?
सचिन –“ मैं अभी ऑफिस से घर के लिए निकल रहा हूँ । आखिर हुआ क्या आप कुछ बताओगी भी ?
जया  – “आप किनती देर में यहाँ पहुँच सकते हैं ?
सचिन – “ भाभी जी आखिर बात क्या है ? कुछ बताइए तो .... सब खैरियत से तो है ?
जया  – “ बस आप जल्दी से घर आ जाइए”
सचिन –“ अच्छा ठीक है  मुझे वहाँ पहुँचने में लगभग एक –डेढ़ घंटा लग जाएगा। कहकर उसने फोन रख दिया। किसी अनहोनी की आशंका से उसका दिल बैठा जा रहा था। करीब एक घंटे की यात्रा के बाद घबराहट में वह साहिल के घर जा पहुँचा। घर में  प्रवेश करते ही उसे घर का वातावरण  बहुत गंभीर लगा, एक सोफ़े पर साहिल बुत्त की तरह बैठा था दूसरी तरफ उनकी पत्नी लगातार रोए जा रही थीं।  सचिन को देखकर वो और  ज़ोर- ज़ोर से रोने लगी। उसने घर के सभी सदस्यों  से जानने की कोशिश की लेकिन किसी ने कोई जवाब  नहीं दिया  सिर्फ इधर  जया  लगातार रोए जा रही थी।
किसी से कोई उत्तर न पाकर उसने साहिल से पूछने की कोशिश की “ आखिर क्या बात है ? भाभी जी क्यों रो रही हैं ? सब ठीक तो है ना …? साहिल किसी के सवाल का कोई जवाब नहीं दे रहा था।  सचिन कुछ समझ पाता तभी सुमन ने कुछ पेपर उसके सामने रखते हुए कहा “ ये देखिए “ सचिन ने उनके हाथ से वे पेपर ले लिए। पेपर पढ़कर उसकी आँखें  खुली की खुली रह गई “ये क्या तलाक ? पर क्यों ....?  ऐसा क्या हो गया? तभी उसने इधर - उधर अपनी नज़रें दौड़ाई घर के सभी लोग वहाँ मौजूद थे, यहाँ तक कि  घर के नौकर भी पर अंकल आंटी कहीं नज़र नहीं आ रहे थे ।
सचिन – “ अंकल आंटी कहाँ हैं ...?” सचिन का सवाल सुनकर घर में एक सन्नाटा सा छा गया, थोड़ी देर बाद साहिल का बेटा मोनू बोला कि “ दादा –दादी को तो लास्ट वीक ही ओल्डएज होम  में शिफ्ट कर दिया”
ओल्डएज होम  शिफ्ट कर दिया पर क्यों ...? सचिन के इस प्रश्न का जवाब किसी के पास नहीं था सब के सब मौन बने खड़े थे, इधर जया  का  रोना लगातार जारी था ,  रोते –रोते कहती जाती “ अब इस उम्र में तलाक देना चाहते हैं .... “
इसी बीच साहिल हॉल से उठकर बाहर बरामदे में पड़ी कुर्सी पर जाकर बैठ गया। एक तरफ जया  दूसरी तरफ साहिल  वह क्या करे? क्या कहे कि उसे वह बात पता चल सके जिसके कारण यह सब फसाद हुआ है। कुछ देर हॉल में बैठने के बाद वह बरामदे की तरफ चला गया जहाँ साहिल बैठा था, बरामदे में अंधेरा था, सचिन वहाँ की लाइट जलाते हुए साहिल के पास रखी कुर्सी पर जा बैठा। उसने देखा कि साहिल की आँखें लाल हो रखी थी, उसे देखकर लग रहा था जैसे वह काफी देर से रो रहा हो । इस बात का किसी को पता न चले इसीलिए वह अंधरे में आकर इस बरामदे में बैठ गया था।  परिस्थितियों को भाँपते हुए उसने बरामदे की लाइट बंद करते हुए घर के नौकर को दो कप कॉफी बनाकर लाने के लिए कहा और खुद  साहिल के पास बैठ गया।       
 सचिन – “ भाई आखिर बात क्या है .... ? कोई कुछ बताता क्यों नहीं है ?  साहिल ने उसकी बातें सुनी, वह कुछ कहता तभी घर का  नौकर  कॉफी मेज़ पर  रखकर चला गया। साहिल ने एक कप उठाकर साहिल की तरफ बढ़ाया किन्तु उसने कप नहीं लिया... इससे पहले कि सचिन कुछ कह पाता  वह  एक अबोध बालक की तरह फूट –फूटकर रोने लगा, रोते –रोते कहने लगा कि उसने पिछले चार –पाँच दिनों से कुछ नहीं खाया है ?
सचिन – “ पर क्यों ....?आखिर हुआ क्या है ? और अंकल आंटी को ओल्डएज  होम में क्यों छोड़ आए तुम?
साहिल –   “ अब क्या बताऊँ ..... सब किस्मत का खेल है यार” कहकर वह चुप हो गया।   
सचिन – “ यार आखिर बात क्या है साफ-साफ बताओ, उधर भाभी जी रोने से लगीं हैं ..... इधर तुम .... ?”
साहिल –“ जब से मम्मी –पापा यहाँ आए हैं तभी  से इस घर में न तो कोई उनसे सीधे मुँह बात करता ना  उनका ख्याल रखा जाता। उसी दिन से उनके लिए इस घर में रहना दूभर हो रखा था । पत्नी तो पत्नी मेरे बच्चे तक उनसे दूरी बनाकर रखते थे जैसे वे मेरे माता-पिता न होकर कोई छूत की बीमारी हों । मैं जब भी ऑफिस से घर आता अक्सर मैंने अपने बूढ़े माता– पिता को रोते देखा है, मुझे इस बात का पता न चले मेरे आते ही वे दोनों हंसने का नाटक करते थे। घर के नौकर तक उनसे सीधे मुँह बात नहीं करते। घर के बिगड़ते हालातों तो देखते हुए ही मम्मी –पापा ने लास्ट वीक मुझसे कहा था कि वह उन्हें किसी वृद्धाश्रम में भेज दे, या गाँव भेज दे। गाँव तो वे लोग जा नहीं सकते वहाँ जाकर रहेंगे भी तो  कहाँ ?  एक टूटा-फूटा घर था वह भी उन्होने उसकी एम. बी. ए.  की पढ़ाई के लिए बेच दिया था। मैंने अपने परिवार को समझाने की बहुत कोशिशें कीं लेकिन किसी के कानों पर जूं तक न रेंगी। आखिर मजबूर होकर मुझे  उन्हें वृद्धाश्रम में भेजना ही पड़ा।“ कहते-कहते  वह पुनः  फूट-फूटकर रोने लगा, सचिन ने उसे शांत करते  हुए कहा।
सचिन – यार इट्स सो सैड  बट डोन्टवरी सब ठीक हो जाएगा ...” कहते हुए वह भी भावुक हो गया पर अपने पर काबू रखते हुए उसने साहिल को शांत किया कुछ देर सन्नाटा पसरा रहा । कुछ देर बाद साहिल जैसे अपने आप से बातें करते हुए कहने लगा
साहिल –“  मैं ही जानता हूँ कि मेरे माँ – बाप ने कितनी कठिनाइयों को झेलते हुए मुझे इस मुकाम तक पहुँचाया है। मेरे  यूनीवर्सिटी में दाखिले के लिए जब कहीं से पैसों का जुगाड़ नहीं बन पाहया तो उन्होने  घर तक को बेच दिया ताकी मेरी पढ़ाई में कोई रुकावट न हो। आज जब उन्हें मेरे साथ की सबसे ज्यादा ज़रूरत है मैं उन्हें  ऐसे माहोल में, ऐसे लोगों के बीच छोड़कर आया हूँ जो उनके लिए एक दम अपरिचित हैं। ऐसी कामियाबी किस काम की जिससे मेरे माँ –बाप ही दूर हो जाए। कहते हुए पुनः उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली..... जब मैं ऐसे माँ-बाप के लिए कुछ नहीं कर पाया तो भला औरों के लिए क्या कर सकता हूँ ?  आज सब को आज़ादी चाहिए, बिना किसी रोक टोक के जीवन जीना है तो जीए ....  मैं सब  को पूरी तरह आज़ादी देना चाहता हूँ । जब मेरे बूढ़े  माता –पिता किसी अंजान माहौल में अंजान लोगों के साथ जी सकते हैं तो ये लोग भी जी लेंगे .... इसीलिए मैं इन्हें हर बंधन से आज़ाद करता हूँ। रही बात घर की, मेरी दौलत की सो  मैंने अपनी सारी जायदाद इन लोगों के नाम लिख दी है” । सचिन ने उसे बीच में ही रोकते हुए कहा
सचिन –“ये क्या पागलपन है .... और तुम कहाँ रहोगे “
साहिल – “मेरे बूढ़े माँ-बाप अंजान लोगों के साथ रह सकते हैं तो मैं भी  वहीं जाकर उनके साथ रहूँगा  मैं उसी  वृद्धाश्रम में अपने बूढ़े माँ-बाप के साथ रहूँगा, कम से कम बूढ़े माँ-बाप के साथ सुकून से तो रह सकूँगा। जब इतना सब कुछ करने के बाद भी मेरे माँ-बाप वृद्धाश्रम में रह सकते हैं तो मैं क्यों नहीं ? वैसे भी माँ-बाप के साथ रहते हुए मुझे भी आदत हो जाएगी ... आखिर एक दिन जाना तो वहीं होगा ... उनकी तरह तकलीफ तो नहीं होगी। वह जितना कहता जाता उतना ही रोते जा रहा था .... सब को आज़ादी चाहिए तो लो आज़ादी सब आज़ाद रहो ..... कहते –कहते एक मौन में डूब गया .... चारो तरफ सन्नाटा छा गया।   
              

            

    


Wednesday, August 30, 2017

यतीम


आज मिस्टर मेहता का घर रोशनी से सराबोर था, हो भी क्यों ना उनके इकलौते बेटे विवेक  का विवाह जो है। सारा घर खुशियों से महक रहा था। विवेक अपना प्रेम विवाह जो कर रहा है।  पहले उसकी माँ सरला  इस बात के लिए राजी नहीं थी। उसे कतई पसंद नहीं था कि कोई और बिरादरी की लड़की उसकी बहू बनकर आए, लेकिन इकलौते  बेटे की खुशी के लिए  उसने  अपनी हामी भर दी। बेटे का ब्याह खूब  धूम धाम से किया। घर में बहू के आने से रौनक और बढ़ गई, बहू के आने से सरला को एक उम्मीद लगी कि अब वह अपनी सांसारिक जिम्मेदारियों को बहू को सोंपकर ईश्वर की भक्ति में लीन हो सकती है। बहू पढ़ी-लिखी थी शादी के कुछ समय बाद  से ही उसने नौकरी पर  जाना शुरू कर दिया।  वैसे तो घर में पैसों की कोई कमी नहीं थी, पिछले साल ही मिस्टर मेहता सरकारी नौकरी से रिटायर  हुए थे, रिटायरमेंट के समय काफी मोटी रकम मिली थी उन्हें। उन पैसों में से कुछ अपनी पत्नी के नाम जमा करवा दिये और बाकी के बेटे के अकाउंट में। रहने के लिए अपना घर, घर में किसी बात की कमी नहीं फिर भी बहू पैसे कमाने के लिए नौकरी पर जाये यह बात सरला को अच्छी नहीं लगती। इस बात का जिक्र उसने कई बार  मेहता जी से किया था लेकिन मेहता जी उसे हर बार समझाते हुए कह देते–“ देखो भाग्यवान अब हमारे तुम्हारे जैसा जमाना तो है नहीं कि पत्नी घर में आई और उसे सिर्फ घर गृहस्थी के चूल्हा- चौकों में झोंक दिया। अब जमाना बादल गया है, तुम भी अपनी सोच को बदलो”। पति की बातें सुनकर उसे भी लगता कि हाँ वे जो कुछ कह रहे हैं सही तो है।   
समय की गति के साथ चलते –चलते  आज बेटे की शादी को हुए पाँच साल गुजर चुके थे। इन बीते पाँच सालों में सरला पत्नी से सास बनी, सास से दादी। पिछले महीने  ही उसके घर में नन्हें कान्हा ने जन्म लिया था। कान्हा को पाकर दोनों पति पत्नी फूले नहीं समा रहे थे। अक्सर दादा दादी में कान्हा को लेकर बहस शुरू हो जाती कभी दादा कहते “इसके नाक नक्श बिलकुल विवेक जैसे हैं ....क्यों है ना? है ना ये  विवेक का दूसरा रूप “ इस पर दादी उन्हें चिढ़ाने के लिए कह देती –“अजी कहाँ हमारा  विवेक कहाँ यह कालू सा,  हमारा विवेक तो एकदम गोरा चिट्टा, गोल मटोल था और इसे देखो.....कहकर वो हंस देती। सरला की हंसी देखकर वे समझ जाते कि वो उन्हें चिढ़ाने के लिए यह सब बातें कह रही है। उनके परिवार को देखकर लगता था कि कितना सुखी परिवार है, छोटा परिवार सुखी परिवार।    
सरला की कमर अब झुक चुकी थी, पहले के समान अब उससे काम नहीं हो पाता। जीवन की इस अवस्था तक आते- आते हाथों की हथेलियाँ भी सख्त हो चुकी थीं।  जोड़ों के दर्द की तकलीफ तो वर्षों से लगी हुई है। आँखों पर मोटे–मोटे चश्में लग चुके थे, दो बार एक आँख के मोतियाबिंद  का  ऑपरेशन भी करवा चुकी थी। आज भले ही उसमें काम करने की वो फुर्ती नहीं जो वर्षों पहले हुआ करती थी किन्तु आज भी वह अपने बनाए नियम कानूनों का उसी तरह से पालन करती है। भले ही कितनी भी रात हो जाये जब तक वह स्वयं किचन में जाकर इस बात की तसल्ली न कर लेती कि  सिंक में कोई झूठा बर्तन तो शेष नहीं है तब तक चैन से नहीं बैठती। ऐसा नहीं था कि घर में काम करने के लिए नौकर नहीं लगा रखे थे । घर में हर काम के लिए एक नौकर लगा रखा था, कपड़े धोने से लेकर किचन में बर्तन साफ करने के लिए अलग नौकर आते थे। नौकर तो शाम तक के  बर्तन साफ करके चला जाता था। रात के खाने के बाद जो झूठे बर्तन बचते बहू उन्हें ऐसे ही छोड़कर अपने कमरे में सोने चली जाती। एक दो दिन तो उन्होने देखा, झूठे बर्तनों के विषय में  बहू से भी बात की  लेकिन हुआ कुछ नहीं।            
रातभर किचन की सिंक झूठे बर्तनों से भरी रहे  यह बात उन्हें  बहुत कचोटती थी। इसीलिए वह खुद ही इन बर्तनों को देर रात तक साफ करने में लगी रहती।  घर से बर्तनों की आवाज़ देर रात तक आती रहती। रसोई का नल भी चलता रहता। भले तारीख बदल जाए, उन्हें  किचन का सिंक साफ चाहिए।  इसके लिए भले ही कितनी भी देर तक काम क्यों न करना पड़े? बहू तो रात का खाना खाकर, किचन की कुछ औपचारिताएं निभाकर अपने कमरे में सोने चली जाती।  सरला को पता है उसके बेटे विवेक को बचपन से ताजा दही पसंद है। आज भी इन काँपते हाथों से गरम दूध  का पतीला उठा लेती है और उसे ठंडा भी करती है।  इस काम में उसकी उँगलियाँ नहीं जलती... दूध के ठंडे होने तक वह वहीं बैठती...उसे ठंडा होने पर उसमें जामन डालकर ही चैन की साँस लेती....अजी चैन की साँस कहाँ उसके नसीब में घड़ी सुइयां भी थक जाती होंगी लेकिन माँ थकती नहीं....थके भी कैसे वह माँ जो है। अपने परिवार की खुशियों का उसे सबसे ज्यादा ख्याल जो है।  देर रात तक बर्तनों की खटखटाहट से बहू –बेटे ही नींद खारब होती है।  बहू बेटे से कहती है.... “ तुम्हारी माँ को न खुद नींद आती है ना हमें चैन से सोने देती है, इन्हें तो रात मैं भी चैन नहीं पड़ता, प्लीज़ जाकर ये रोज़ –रोज़ के ढोंग बंद करवाओ कि  रात को सिंक खाली ही रहना चाहिए “।  पत्नी की बातें सुनकर बेटा माँ को समझाता है, पर माँ तो माँ है, बेटे की बातें सुनकर  मुस्कुरा देती है और झुकी कमर के सहारे अपने कमरे में सोने के लिए चली जाती है।  
 देर रात तक खड़े रहने के कारण उसकी कमर और घुटनों में दर्द होने लगता है।  इन सब कामों से निबटकर जब सोने अपने कमरे में जाती है तब उसे याद आता है कि  आज की दवाई तो ली ही नहीं .... फिर अपने माथे पर हाथ मारकर तकिये के नीचे रखी दवाई की शीशी से दवाई निकालती है और अपने मुँह में रखकर गटककर  पानी पी लेती है। पास ही मिस्टर मेहता जो कि अब तक एक पूरी नींद ले चुके होते हैं कहते हैं – “आ गई “
अपने दुबले –पतले पैरों को सहलाते, दबाते  हुए सरला जवाब देती है – “ हाँ, आज वैसे भी किचन में कोई ज्यादा काम तो था नहीं ।“       
मिस्टर मेहता को भी पता था कि किचन में काम था कि नहीं । वे भी सरला का उत्तर सुनकर करवट बदलकर फिर से अपने सपनों की दुनियाँ में लौट जाते हैं। उनके करवट बदलकर सो जाने के बाद सरला पलंग पर बैठी –बैठी अपने पैरों की, घुटनों की  तेल से मालिश करने में लग जाती है।  जो इतनी  देर खड़े रहने के कारण थककर चूर– चूर हो चुके थे। कुछ देर पैरों की मालिश करने के बाद बिस्तर पर लेट जाती है। लेटे –लेटे उसे कल सुबह की चिंता होने लगती है।  बेटे को क्या पसंद है ...क्या नहीं वह बखूबी जानती  है।  बेटे और परिवार की खुशियों का ध्यान रखते- रखते ही  जीवन व्यतीत हो गया।
चार साल बाद –
मिस्टर मेहता एक साल पहले इस संसार को छोड़कर बिदा हो चुके थे। अब सरला इस संसार में अकेली रह गई थी। मिस्टर मेहता के जाने के बाद से ही  घर की परिस्थितियाँ भी बदल चुकी थी। सरला के हाथों से घर की सत्ता उसकी बहू के हाथों में जा चुकी थी। सरला अपनी आँखों के सामने अपने बनाए नियम कानूनों  को टूटते नहीं देख पाती जिसके कारण आए दिन घर में सास बहू का गृह युद्ध होने लगा। सास बहू के इस युद्ध से विवेक भी तंग आ चुका था। उसने अपनी माँ को कई बार समझाया कि अब वो घर गृस्थी के कामों में अपनी टाँग  न अड़ाए। बेटे की बातें सुनकर उसका मन और आहत हो जाता। घर के झगड़ों  का असर उसके पूरे परिवार पर पड़ने लगा। आखिर एक दिन उसने इस समस्या का समाधान खोज ही लिया। क्यों न माँ को वृद्धाश्रम भेज दिया जाए? विवेक का उपाय उसकी पत्नी को भी पसंद आया। अगले ही दिन सरला को वृद्धाश्रम छोड़ने के लिए विवेक उसे लेकर वहाँ पहुँच गया। सरला वृद्धाश्रम देखकर समझ गई कि उसका लाल उसे इस आश्रम में छोड़ने आया है।  वह पढ़ीलिखी तो थी नहीं पर वहाँ के माहौल को देखकर ही समझ गई, उसे वह जगह भी कुछ जानी पहचानी सी  लगी। उसने तब भी विवेक से कुछ नहीं कहा जब वह उसे छोड़कर जाने लगा जाते समय बस उसने इतना ही कहा कि “अपना और बच्चों का ख्याल रखना” कहकर आश्रम के अंदर चली गई।              
विवेक बूढ़ी माँ  को वृद्धाश्रम  में छोड़कर वापस अपने घर खुशी खुशी लौट रहा था कि तभी उसकी पत्नी का फ़ोन आया  उसने कहा “अपनी माँ को ये भी कह दो कि त्योहारों पर भी घर आने की ज़रूरत नहीं । अब वे वहीं सुकून से रहें और हमें यहाँ सुकून से जीने दें”। 
पत्नी की बातें सुनकर विवेक  वापस मुड़ा और उस वृद्धाश्रम  में गया जहाँ अभी- अभी अपनी बूढ़ी माँ को छोड़कर वह खुशी–खुशी लौटा था। यहाँ आकर उसने देखा कि उसकी माँ वृद्धाश्रम के मैनेजर के साथ खुशी–खुशी बातें करने में व्यस्थ थी। वे दोनों ऐसे बैठे बातें कर रहे थे जैसे वर्षों से एक दूसरे को जानते हों।  यह देखकर बेटे ने मैनेजर से पूछा “सर  क्या आप इन्हें जानते हैं ?”।
मैनेजर ने उसकी तरफ एक नज़र देखा और एक ठंडी  साँस के साथ –“हाँ” कहकर वह चुप हो गया ।
हाँ सुनकर बेटे ने फिर एक और सवाल दाग दिया– “आप इन्हें जानते हैं ? पर आप इन्हें किस तरह और कब से जानते हैं” ?
इस बार मैनेजर के चेहरे पर एक अजीब से मुस्कुराहट थी।  उसने जवाब दिया जिसे सुनकर बेटे के पैरों तले की ज़मीन खिसक गई। मैनेजर ने मुस्कुराते हुए  कहा -“ आज से तीस साल पहले इस जगह पर ये वृद्धाश्रम नहीं, एक यतीमखाना हुआ करता था।  तभी मेरी मुलाकात इनसे और इनके पति से हुई थी”। 
यतीमख़ाने का नाम सुनकर विवेक चौक गया – “ यतीमखाना और यहाँ ”?
मैनेजर –“ हाँ ! यहाँ पहले यतीमखाना ही  हुआ करता था। मुझे आज भी वो दिन अच्छी तरह से याद  है  जिस दिन ये अपने पति के साथ  यहाँ से एक यतीम  बच्चे  को गोद लेकर गयी थीं। उस यतीम के सिर पर अपनी ममता का आँचल रखकर उसकी बदकिस्मती दूर की थी, उसे एक नाम और पहचान दी”। इतना कहकर मैनेजर वहाँ से चला गया। इससे पहले कि वह माँ से इस विषय में  कुछ कहता या पूछता माँ भी वहाँ से जा चुकी थी। इस समय उसके दिलो दिमाग में एक ही शब्द गूँज रहा था यतीम....यतीम...। वर्षों पहले जिस दाग को उसकी माँ ने अपने आँचल से पोंछकर साफ कर दिया था, आज उसी माँ को अपने निजी स्वार्थ के कारण  वृद्धाश्रम में छोड़कर  खुद को पुनः यतीम कर लिया ..... 

      

Saturday, February 20, 2016

मनहूस


कल देर रात तक चली पार्टी के बाद अमन को घर पहुँचते-पहुँचते रात के दो बज गए थे। घर आकर वह उसी हाल में सो गया जिस हाल में पार्टी से घर आया था। सारा दिन ऑफिस में भागा दौड़ी फिर पार्टी ने उसे पूरी तरह थका दिया था। जैसे ही वह बिस्तर पर लेटा उसे नींद आ गई। सुबह-सुबह पड़ौसी के फ्लैट से छोटे बच्चे के तेज़ चीख-चीखकर रोने के कारण उसकी नींद टूट गई। बिस्तर में लेटे लेटे ही उसने अपनी अलसाई पलकें खोलकर दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा, सवा नौ बजे थे। फिर उसे याद आया कि आज उसका मित्र हैदराबाद से आनेवाला है। पर वो तो दोपहर एक बजे आनेवाला है। उसने पैर फैला लिए। सर्दी के दिन थे उसने अपनी रज़ाई अपनी सिर की तरफ खींच ली रज़ाई का नरम स्पर्श महसूस करते हुए पड़ा रहा। नींद की मीठी खुमारी अब भी उस पर छाई हुई थी। कमरे की अधखुली खिड़की से चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ आ रही थी, अब तक वह पूरी तरह से जाग चुका था लेकिन अभी भी रज़ाई में ही लेटा रहा।  चाह रहा था कि फिर से नींद आ जाए लेकिन उस बच्चे के लगातार रोने की आवाज़ ने उसे उठने पर विवश कर दिया। उठकर वह ब्रश करने के लिए गया ही था कि दरवाज़े पर किसी की दस्तक सुनकर वह दरवाजा खोलने के लिए चला गया। दरवाजा खोला तो सामने शांता बाई को देखा। शांता उसके घर में पिछले चार साल से काम करने आती है। साड़े नौ बजे का उसका फिक्स टाइम है। भले सूरज दिखे ना दिखे पर साड़े नौ बजे शांता बाई दिख जाती, लेकिन आज उसे आने में देरी हो गई। शांता उम्र के अंतिम पड़ाव पर है पर उसके आगे जवान से जवान स्त्री भी काम के मामले में हार जाती है। शांता घर में आकर अपने काम में लग गई और अमन अपने ब्रश करने में लग गया। ब्रश करके वह अपने कमरे में टीवी देखने चला गया, थोड़े देर में शांता ने उसे गरमागरम चाय लाकर दे दी। सर्दी के के दिन में अगर गरमागरम चाय मिल जाये तो क्या कहना। उसने चाय ली और चाय की चुस्की लेते –लेते टीवी देखने लगा। टी वी देखेते हुए उसने शांता से आज देरी से आने के कारण पूछा। 
अमन – “आंटी आज आप देरी से आई... क्या बात है सब ठीक तो है”?
शांता – “ भैया आज हमारे गाम में एक बच्चा पैदा हुओ ....वा के पैदा होने के कुछई घंटों में वा की दादी खतम है गई .....घर वालेनने ऊ लड़का मनहूस कहकर पानी में डुबाकर मार दियो। इस की पूरे गाम में चर्चा है रही है कि कैसो मनहूस हो जो आते ही अपनी दादीए खा गयो”......कहकर वह वहाँ से चली गई और अपने झाड़ू –पोछा करने में लग गई।  कुछ देर बाद वह अपना काम खत्म करे चली गई। लेकिन उसकी कही बातें उसके मन में घर कर गई। बार बार उसे एक ही शब्द याद आ रहा था मनहूस ....मनहूस ...यह बात उसे तीर की तरह चुभ रही थी। आज उसे कुछ धुँधला धुँधला सा नजर आने लगा था। इन्हीं शब्दों  को सोचते सोचते उसकी आँखों से आँसू बहने लगे.... अपना सिर बैड के सिरहाने रखी तकिया में गाढ़कर रोने लगा……। कुछ देर रोने के बाद शांत हुआ, फिर न जाने किन ख़यालों में खो गया।
उन शब्दों को सुनकर उसे कुछ को सोचते सोचते उसे नींद आ गई। कुछ देर बाद उसने अपने आप को एक शादी में पाया, यह उसके चाचा के बड़े लड़के की शादी थी। घर मेहमानों से खचाखच भरा हुआ था। माँ के लाख माना करने के बाद भी वह इस शादी में आया था। यहाँ आकार वह अंजान सा एक कोने में बैठा था। तभी उसका  चचेरा भाई उसे घर में अंदर ले जाने के लिए आया। वह उसके साथ चला गया।  घर में जब लोगों को पता चला कि वह अमन है। लोगों ने उससे बात तक न की उसे किसी भी काम से हाथ नहीं लगाने दिया। वहाँ के लोगों के उसके साथ जो व्यवहार किया उससे वह हातात हुआ। वहाँ से वह सीधा अपने घर गया । घर जाकर उसने अपनी माँ से इस विषय में बात की ...उसने इस प्रकार के व्यवहार के बारे में अपनी माँ से पूछा। पहले तो माँ उसे टालती रही। अंत में उसकी ज़िद के आगे उसने उसे वह राज़ बता दिया जिसे उसने पिछले बीस सालों से अपने सीने में दबाकर रखा था। क्यों वह उसे वहाँ या और किसी भी रिश्तेदार के यहाँ जाने से रोकती थी? क्यों आज तक उसने उसका उसका जन्मदिन नहीं मनाया? माँ के उसे बताया –
माँ –“तू जानना चाहता है कि ये सब लोग तुझसे क्यों बात नहीं करते? उन लोगों की नज़रों में तू          मनहूस है ...मनहूस
अमन – मनहूस.....और मैं...पर क्यों मैंने ऐसा क्या कर दिया.....मैं तो कल पहली बार उन लोगों  
       से मिला ?
माँ – पर तू वहाँ गया क्यों ? मैंने तुझे  माना किया था ना .....? तू जानना चाहता है ना कि इस उन लोगों ने तुझसे बात  क्यों नहीं की और क्यों मैंने तुझे अपने से बीस साल दूर रखा....? बीस साल पहले जब तू पैदा हुआ तेरे पैदा होने की खबर सुनकर तेरे पापा बहुत खुश थे।खुश क्यों न होते उनके मन की मुराद जो पूरी हो गई थी और वैसे भी तीन बेटियों के बाद तुझे पाया था। तुझे पाकर वे फूले नहीं समा रहे थे। तेरे पैदा होने की खुशखबरी उन्होने अपने सभी दोस्तों रिश्तेदारों में बता दी थी। उस दिन तेरे पापा और तेरी दादी मेरे साथ अस्पताल में ही थे। डिलेवरी के बाद जब डॉक्टर ने मुझे कमरे में शिफ्ट कर दिया तब तेरे पापा घर से तेरे लिए कपड़े लेने के लिए गए थे। वे गए तो कपड़े लेने के लिए थे लेकिन वापस नहीं लौटे, घर जाते समय एक कार के ब्रेक फेल हो गए थे उसी कार की चपेट में तेरे पापा आ गए उनकी मौके पर ही......कहकर उसकी माँ की आँखों से आंसुओं की धार बहने लगी....माँ रोती जाती और कहती जाती। तेरे पैदा होने के चार-पाँच घंटों के बाद ही तेरे सिर से तेरे बाप का साया छिन गया। तेरे पापा की मौत का कारण तुझे ही समझा, कि तेरे पैदा होते ही उनके घर का चिराग बुझ गया। घरवालों ने तुझे मनहूस समझकर मारने की कोशिश की लेकिन मैंने ऐसा न होने दिया.... पति को तो खो चुकी थी मैं.....लेकिन तुझे पाकर नहीं खोना चाहती थी। मैंने तुझे उन लोगों से कैसे बचाया ये तो मैं ही जानती हूँ .....अगर तेरे सुरेश चाचा न होते तो शायद आज तू मेरे सामने न खड़ा होता”
अमन – “सुरेश चाचा.....”?
माँ – हाँ उस दिन उन्होने ही मेरा साथ दिया। पूरा घर एक तरफ और मैं और तेरे चाचा एक तरफ। मुझ में तो इतनी ताकत भी न थी कि तुझे लेकर बाहर भी जा सकूँ। मैं तो अस्पताल में बिस्तर पर पड़ी थी। तुझे बचाने के लिए मैंने तुझे सुरेश को सौप दिया। वे ही तुझे अपने साथ लेकर यहाँ आए। जब मैं चलने –फिरने की हालत में हुई तो मैं अपनी बच्चियों को लेकर उस घर को छोड़कर यहाँ आ गई”।
माँ की बातें सुनकर अमन के पैरों तले की ज़मीन खिसक गई ......उसे लगा जैसे वही मनहूस है जो अपने पैदा होते ही अपने बाप को खा गया। उसे अपने आप पर गुस्सा आ रहा था।  इसी गुस्से में उसने इतनी बुरी तरह से बाल नौच डाले कि सिर से खून बहने लगा.... जैसे तैसे माँ उसे अस्पताल लेकर गई और उसका इलाज़ करवाया। वह माँ से कुछ कहना चाहता था ..... कि उसके सेल फोन की घंटी बजने लगी। घंटी की आवाज सुनकर उसकी आँखें  खुल गई। अपने आप को बिस्तर पर देखकर वह हक्का – बक्का रह रह गया ....ओह ये सपना था”। उसने फोन उठाकर देखा तो उसके दोस्त का कॉल था जो हैदराबाद से आने वाला था। 
अमन – “हैलो भाई ....हाँ भाई ...कहाँ पहुंचा”
मित्र –“अबे...मैं स्टेशन पर हूँ....कब से तेरा फोन लगा रहा हूँ.....तू है कि फोन उठा ही                           नहीं रहा ....कहाँ है तू....”?
अमन – “ क्या ...तू पहुँच गया...?” कहकर उसने दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा ... घड़ी में     एक बजकर बीस मिनट हो चुके थे। 
मित्र – “ हाँ ....पहले तू ये बता तू है कहाँ....? तू आ रहा है ना मुझे लेने के लिए”?
अमन – “ओह. आइ एम सौरी, भाई....बस आधे घंटे में मैं पहुंचता हूँ ....वेट देयर”। कहकर उसने फोने काट दिया।
अमन बिस्तर से उठकर  सीधा गुसलखाने (बाथरूम ) में गया। नींद पूरी न हो पाने के कारण उसकी आँखें जल रही थीं। ठंडे पानी से मुँह धोया और पास ही टंगी तौलिये से मुँह पोंछते हुए गुसलखाने से बाहर निकल आया। बाहर आकर आईने में अपने आप को देखता रहा, कुछ देर  अपने आपको देखते हुए उसने एक लंबी सांस ली…….. और  तैयार होकर अपने मित्र को लेने रेलवे स्टेशन चला गया .....     

Wednesday, July 16, 2014

अतीत



 वर्षों पहले जीवन में हुए हादसे ने सुनंदा के बसे-बसाए घर को तहस-नहस कर दिया था| हादसों की चोट ने हँसती-मुस्कुराती सुनंदा के चेहरे पर ना मिटनेवाली उदासी भर दी थी|  एक सड़क हादसे में उसके पति रोहन की मृत्यु हो गई थी| उस सड़क हादसे में सुनंदा और उसकी तीन साल की बेटी सीमा बाल-बाल बच गए, लेकिन रोहन की मृत्यु घटना स्थल पर ही हो गई|  रोहन और सुनंदा ने अपने घरवालों की मर्जी के खिलाफ घर से भागकर शादी की थी| दोनों के घरवाले उनकी इस हरकत से नाराज़ थे| उसकी मौत की खबर पाकर भी कोई उसकी अर्थी को काँधा देने नहीं आया| रोहन के दो-चार मित्रों को छोड़कर न परिवार का कोई सदस्य आया और ना ही कोई रिश्तेदार| एक ओर सड़क हादसे में पति की मौत दूसरी ओर घर –परिवारिश्तेदारों की बेरुखी ने उसे पूरी तरह तोड़कर रख दिया| क्या करे ...? किससे सहायत मांगे, इस अनजान शहर में दो –चार लोगों को छोड़कर कोई भी तो अपना नहीं है| इस मुसीबत की घड़ी में सुनंदा की सहेली सुमन ने उसे सँभाला| सुमन उसके साथ उसके साये की तरह थी| अगर सुमन उस मुसीबत की घड़ी में उसके साथ न होती तो न जाने क्या होता ...?

जानेवाला चला गया पीछे रह गई पत्नी और दो साल की मासूम बेटी सीमा| बेटी  जिसने अभी बाप के प्यार को सिर्फ महसूस ही किया था| रोहन एक कम्पनी में उच्च पद पर कार्यरत था| रोहन की आकस्मिक मृत्यु के कारण धीरे-धीरे घर की जमा पूंजी समाप्त होने लगी| परिवार के समक्ष आर्थिक संकट बढ़ रहा था....| सीमा अभी छोटी थी, उसकी पढ़ाई-लिखाई और उसके भविष्य के लिए उन लोगों ने जो सपने  देखे थे सब टूटते नजर आ रहे थे| सुनंदा ने इस संकट की घड़ी में धैर्य का साथ नहीं छोड़ा| वह पढ़ी-लिखी थी| घर के खर्च को चलाने के लिए उसने नौकरी करने का फैसला किया| रोहन के दोस्तों की सहायता से उसे एक कम्पनी में नौकरी मिल भी गई| कम्पनी में नौकरी तो मिल गई लेकिन सामने एक और समस्या मुँह उठाए खड़ी थी वह थी सीमा की देख-रेख| ऑफिस जाते समय वह सीमा को डे केयर बेबी सेंटर में छोड़ जाती| उसका सारा दिन ऑफिस में ही बीतता| वह सीमा को अधिक समय नहीं दे पाती थी| एक साल बाद सुनंदा ने सीमा का एडमिशन एक नामी स्कूल में करवा दिया था| उसका एक ही लक्ष्य था कि बेटी को सफल और आत्म निर्भर बनाना| घर पर वह उसे अधिक समय नहीं दे पाती थी| नौकरी करना उसकी मजबूरी थी| अगर वह नौकरी नहीं करेगी तो सीमा के भविष्य का क्या होगा?

बेटी का स्कूल में दाखिला तो करवा दिया लेकिन उसकी समस्याएं खत्म नहीं हुई थीं| अब  एक समस्या और थी कि स्कूल के बाद सीमा की देखभाल कौन करेगा? कौन उसे स्कूल की बस से लाएगा? कौन उसके खाने-पीने का प्रबंध करेगा? इस विषय के बारे में जब उसने सुमन से बात की तब सुमन ने सीमा के स्कूल के बाद की जिम्मेदारी ले ली| अब सुमन ही सीमा को स्कूल की बस से लेकर आती उसे उसका होमवर्क करवाती| उसकी देखभाल की सारी ज़िम्मेदारी वही निभा रही थी| जब से सुमन ने सीमा की स्कूल के बाद की ज़िम्मेदारी ली थी तब जाकर सुनंदा की चिंता खत्म हुई|
 समय अपनी तीव्र गति से चलता चला गया और मासूम सी दिखनेवाली नन्ही सीमा अब अपने जीवन के छब्बीस वर्षों को पूरा करने जा रही थी| इन छब्बीस वर्षों में सीमा ने अपनी कॉलेज की पढ़ाई खत्म कर ली थी| जवान होती बेटी को देखकर सुनंदा को उसके विवाह की चिंता भी सताने लगी| कैसे बेटी के हाथ पीले होंगे......? बेटी जब अपनी ससुराल चली जायेगी उसका क्या होगा? जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुकी सुनंदा अकसर इन्हीं ख़यालों में खोई रहती| इधर अपनी पढ़ाई खत्म कर चुकी सीमा नौकरी की तलाश में लगी हुई थी| कुछ समय बाद उसे एक आई. टी. कम्पनी में नौकरी मिल गई| बेटी की नौकरी की खबर सुनकर वह फूली नहीं  समा रही थी| खुशखबरी सुनकर उसकी आँखें छलक आईं|    
वृद्धा हो चुकी सुनंदा दो महीनों में कम्पनी से रिटायर्ड होने वाली थी| देखते-देखते वह दिन भी आ गया| जिस दिन कंपनी में उसका आखिरी दिन था| उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि आज उसका कम्पनी में आख़री दिन है| इन बीते तीस वर्षों में सब कुछ बदल चुका था| आज वह भी उस कम्पनी का अतीत बनने जा रही थी| शाम को सुनंदा के सहकर्मियों ने उसकी विदाई का कार्यक्रम रखा था| कार्यक्रम के बाद वह भारी मन से घर लौटी| एक तरफ बेटी की नौकरी की खुशी थी वहीं दूसरी तरफ अपने रिटायर्ड होने का दुःख| बार-बार यही सोचती कि घर में खाली बैठे-बैठे उसका समय कैसे कटेगा ...? साथ ही उसे इस बात की तसल्ली भी है कि उसकी इस मेहनत से उसकी बेटी अपने पैरों पर खड़ी हो सकी है| उसने अपने जीवन में जो संकल्प किया था वह काफी हद तक पूरा हो चुका था|

आई.टी. कम्पनी में नौकरी ज्वाइन करने के पश्चात से सीमा के रहन सहन के तरीकों में धीरे धीरे बदलाव आता जा रहा था| इस बदलाव को सुनंदा भी महसूस कर रही थी| पिछले दो वर्षों सदा जीवन उच्च विचार रखने वाली भोली-भाली सीमा आधुनिक सुख सुविधाओं की चकाचौंध में धीरे-धीरे गायब होती जा रही थी|     
आज हमारे समाज की नौजवान पीढ़ी जिस प्रकार आधुनिक सुख- सुविधाओं की ओर लालायित हो रही है| आज की पीढ़ी आधुनिक भोग विलासिता की चीजों में ही अपना सुख खोजने लगी है| उसे अपनी खुशी और अपने सुख में घर-परिवार के लोगों का सीमित स्थान मात्र रह गया है|   खैर यह सब छोड़ो हम बात कर रहे थे सीमा  की तो हाँ आज की इन भोग विलासिता की चीजों से भला सीमा कैसे दूर रह पाती| सीमा ने भी अपने सहकर्मियों के साथ डिस्कों पार्टियों में जाना  
सिगरेट पीना, शराब पीना शुरू कर दिया था| समय रहते उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने अपने आप को इस प्रकार की चीजों से धीरे-धीरे दूर करने लगी| ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो समय रहते संभल पाते हैं|    
  
उसकी मुलाकात कंपनी में काम करने वाले अजीत से हुई| अजीत भी उसी टीम में काम करता था| अजीत की चुटकुले सी हँसोड़ बातें, उसके बात करने का तरीका  उसे भाने लगा। अजीत का व्यक्तित्व उसे बहुत आकर्षक लगा। ऊपर से वह बातूना और मज़ाकिया लगता पर अंदर से जैसे कोई बहुत बड़ा दार्शनिक,विद्वान हो। देखने में भी सुन्दर, गठीले बदन का नौजवान था|  कुछ महीने  उसके साथ काम करने के बाद उसने पाया कि धीरे-धीरे अजीत उसके दिलो दिमाग पर छाता जा रहा है| ऐसा नहीं था की केवल सीमा ही अजीत के प्रति यह लगाव महसूस कर रही थी| अजीत का भी यही हाल था| सीमा के मन में अपने होनेवाले पति के विषय में जो  कल्पना थी उसे अजीत में वह सब खूबियाँ दिखाई देती थीं| आखिर एक दिन दोनों ने अपने प्रेम का इज़हार एक दूसरे से कर ही दिया| अब हाल ये हो गया कि जब-तक दोनों मिलकर घंटों बातें नहीं कर लेते तब तक उन्हें चैन ही नहीं पड़ता। उन्हें ऐसा लगता कि दोनों एक-दूसरे को  जन्म-जन्मांतर से जानते हों। दोनों एक दूसरे के बिना एक पल भी नहीं रह सकते थे| दोनों एक दूसरे के इतने करीब आ चुके थे कि उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया|

सीमा ने कई बार अजीत से उसके माता-पिता, घर-परिवार के बारे में बात करनी चाही लेकिन वह हर बार इस बात को टाल जाता| सीमा ने अपने इस प्रेम-प्रसंग के विषय में अपनी माँ को कई बार बताने की कोशिश की पर एक अनजान डर के कारण कह न सकी| अगर माँ ने इस शादी के लिए अनुमति नहीं दी तो.......? इधर इन सब बातों से अंजान सुनंदा बेटी के सुनहरे भविष्य और एक योग्य वर की चिंता में रहती| जान-पहचान के लोगों से बेटी के लिए एक अच्छे लड़के की तलाश की बात करती| कुछ लोगों ने एक-दो लड़के बताए भी थे, उनमें से एक लड़का उसे सीमा के लिए पसंद भी आया| उनकी दहेज की मांग  इतनी थी जिसे वह पूरा नहीं कर सकती थी|

सीमा चाहती थी कि वे दोनों जल्दी ही कहीं डेट पर जाएं। पर इतनी अधीरता के बावजूद भी अजीत का दिल डेट के लिए तैयार नहीं था। सीमा को यह बात अजीब लगती। वह अजीत को बार-बार समझाती कि वे दोनों शादी करनेवाले हैं फिर डेट पर जाने से उसे इनकार क्यों है? अजीत उसे समझाता कि ‘वह अपनी माँ की अकेली संतान है उसे पहले अपनी माँ की सहमती लेनी चाहिए| उसकी शादी के लिए माँ को बहुत चाव होगा|’ अजीत की बातों के आगे सीमा को हार माननी पड़ती, ‘ठीक है बाबा, अब तुम जैसा कहोगे, मैं वैसा ही करुँगी। पर डर लगता है कि कहीं माँ ने हमारी शादी के लिए मना कर दिया तो...?

एक दिन सीमा ने हिम्मत करके अपने और अजीत के विषय में अपनी माँ से बात की और बताया की वह उसके शादी करना चाहती है| सीमा की बात सुनकर माँ को बुरा लगा पर फिर बेटी के खुशी के लिए उसने अपनी अनुमति दे दी| दूसरे दिन अजीत सीमा के घर उसकी माँ से मिलने पहुँच गया| घर पर सीमा की माँ ने खुल कर अजीत का साक्षात्कार लिया। वह अजीत की बौद्धिक प्रतिभा और अपनेपन से बहुत प्रभावित हुई। उन्हें अजीत होशियार, दूरदर्शी, आधुनिक मान्यताओं के साथ परिवार को अहमियत देने वाला सर्वगुण सम्पन्न युवक लगा। जब बात उसके माता-पिता के विषय में आई तो वह चुप हो गया| इस बात को वह टालना चाहता था लेकिन टाल न सका| बार-बार पूछे जाने पर उसने बताया कि ‘उसके माँ-बाप नहीं है| वह एक अनाथ है और उसकी परवरिश एक अनाथाश्रम में हुई है| उसने बताया कि जब से उसने होश संभाला है उसने अपने आप को अनाथाश्रम में पाया कहते-कहते उसकी आँखों से आंसू बह निकले|’ इतना कहकर वह वहाँ से चला गया| अजीत के अनाथ होने की बात सुनकर सुनंदा के दिल को एक धक्का लगा| अजीत और अनाथ ......

सीमा ने अजीत को रुकने के लिए आवाज़ दी लेकिन वह उसे अनसुना करके घर से बाहर निकल गया| यह सब देखकर सीमा की साँसे मानो रुक गई, उसके बदन का रेशा-रेशा थर्रा उठा। उसकी आँखें नम और गला घुटने लगा। खुद को संभालते हुए सीमा ने माँ से उनकी राय जाननी चाही| उसने माँ को बताया कि अजीत अनाथ अवश्य है पर वह एक खुद्दार और सच्चा इंसान है|   वह......वह उससे बहुत....बहुत प्यार करती है। अगर वह उसे नहीं मिला तो......कहकर वह अपने कमरे में चली गई| सुनंदा की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि वह उसे क्या उत्तर दे| एक अनाथ को अपनी बेटी कैसे सौंप दे…. ना उसके माँ-बाप का पता ना खानदान का.....| काफी समय अपने मन में उठे द्वंद्व पर मंथन करते हुए खुद को संतुलित करते हुए एक गहरी साँस खींचते हुए उठी| सीमा के पास उसके कमरे में जाकर अजीत से साथ विवाह करने की अनुमति दे दी| वह नहीं चाहती कि उसकी बेटी भी वही कदम उठाए जो वर्षों पहले उसने उठाया था| माँ से अनुमति मिलने से वह फूली न समा रही थी| ऐसा लग रहा था कि अभी उड़कर अजीत के पास जाए और उसे यह खुशखबरी सुनाए|

दूसरे दिन जब अजीत को पता चला कि माँ ने दोनों के विवाह की अनुमति दे दी है| यह सुनकर उसकी आँखें छलक आई|  शाम को दोनों ने बाहर किसी पार्क में मिलने का प्रोग्राम  बनाया| शाम को दोनों पार्क में मिले सीमा सम्मोहित सी, समर्पित भाव से डूबते सूरज की रोशनी में उसे देखते हुए, उसके हर स्पर्श को, हर पल को, हर शब्द को अपने अंदर की गहराइयों में संजोती जा रही थी क्या सचमुच यह, वही अजीत है जिसे वह पिछले कई महीनो से देख रही थी... आज वह अपने असीम प्रेम और लगाव को किस कुशलता और खूबसूरती से अभिव्यक्त कर रहा है। आज अजीत को सीमा का,  उसके प्यार में मदहोश हो जाना अच्छा लग रहा था। यही तो वह चाहता था। सही मायनों में आज से सीमा उसकी है| वह सीमा की हर एक साँस में समा चुका है। सीमा के प्यार में डूब जाना ही आज उसका मुख्य लक्ष्य है। ढलते सूरज के साथ-साथ अँधेरा बढ़ता जा रहा था तभी अजीत ने कहा ‘अब हमें घर चलना चाहिए, कल ऑफिस भी जाना है!सीमा ने अपनी घड़ी देखी फिर मन ही मन  सोचने लगी। यह तो हमारी पहली डेट है। अभी-अभी तो हम लोग आए हैं जल्दी क्या है....? कुछ समय बाद दोनों वहां से घर को निकले|
घर आकर नींद से बोझिल आँखों में अजीत  के सपने लिए सीमा बिस्तर पर ढह गई। सुबह जब आँख खुली तो नौ बज चुके थे।


कुछ महीनों बाद सुनंदा ने शुभ मुहुर्त दिखवाकर दोनों की शादी करवा दी| बेटी अपने घर चली गई| बेटी ने उसे अपने साथ अपने नए फ्लैट में साथ रहें के लिए कहा लेकिन वह उसके साथ गई नहीं| जिस घर में वह रह रही है उस घर से उसके अतीत की खट्टी मीठी यादें जुडी हैं| यह घर उसके पति की आख़िरी निशानी है| अपने जीते जी वह इस घर को नहीं छोड़ना चाहती| उसकी इच्छा है कि उसकी अंतिम सांस इसी घर में हो ...... 

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