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Friday, July 26, 2024

मूक प्रेम

                                               
लँगड़ा भिखारी बैसाखी के सहारे चलता हुआ भीख माँग रहा था । भिखारी की उम्र होगी यही कोई पचास से पचपन  साल की । “बाबा बहुत भूख लगी है कुछ दे दे खाने को ।” कुछ दुकानदार एक-दो रुपए देकर उसे चलता करते । कुछ दुकानदार उसे दुत्कार देते । वह किसी से कोई गिला सिक्वा किए बिना आगे बढ़ जाता । अक्सर वह यही बुदबुदाता रहता- “जो दे उसका भला जो ना दे उसका भी भला।” इसी तरह वह एक -एक दुकान पर जाता और भीख माँगता। दोनों टाँगों से लाचार होने के कारण बैसाखियों के सहारे किसी न किसी प्रकार चलता जाता और भीख माँगता जाता। जो कोई भीख में कुछ दे देता उसे –‘भगवान आपको सुखी रखे का आशीष देते हुए आगे बढ़ जाता।’ जो कुछ नहीं देता वहाँ से  भी  आगे चलता बनता ।  भीख माँगते  हुए कुछ दूर ही गया था कि उसने  कुत्ते के भौकने की आवाज़ सुनी जैसी ही पीछे पलटकर देखा तो उसके चेहरे पर एक अजीब सी चमक आ गई । कुत्ते को देखते ही वह बोला –‘ कालू आ गया तू ।’ भिखारी की आवाज़ सुनकर कुत्ता उसके पास आकर बार -बार उछलकर उसके मुँह को चूमना चाह रहा था । “अरे यार रुक तो सही … हाँ-हाँ मुझे पता है तुझे बहुत भूख लगी है पर रुक तो सही....” अब भिखारी भीख माँगना छोड़कर कुत्ते के साथ  चायवाले की दुकान की तरफ चला गया । भिखारी ने चाय वाले से कुछ टोस्ट और ब्रेड खरीदे कुछ टोस्ट उसने कुत्ते को खिला दिए और जो कुछ बचे उसने  खा लिए। खाते -खाते वह कुत्ते से बाते करने लगता – ‘आज यार आने में थोड़ी देरी हो गई , तुझे पता है कल हमारे मोहल्ले के पास बड़ी दावत हुई थी । कल रात तो बहुत सारा खाना मिला था मैने तुझे बहुत जगह ढ़ूँढ़ा पर तेरा कही कोई पता ही नहीं था । कहाँ चला गया था कल रात .....। कुत्ता भी उसकी बातों को सुनता जाता और अपनी पूँछ हिलाते रहता । भिखारी कभी उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरता कभी उसके सिर को अपनी गोद में रखकर उसे सहलाता ।

एक दिन  भिखारी अपनी नित्य दिनचर्यानुसार भीख माँगने के लिए बाजार में गया । भीख माँगते माँगते उस स्थान  तक जा पहुँचा जहाँ रोज कालू कुत्ते  और उसकी मुलाकात होती थी । लेकिन आज उसे कालू कहीं नजर नहीं आ रहा था, उसे लगा थोड़ी बहुत देर में आ जाएगा । कालू का इंतजार करते करते सुबह से दोपहर हो गई लेकिन कालू का कोई अता-पता नहीं था। एक कालू ही तो था जिससे वह अपने दिल की बातें किया करता था । अब तो भिखारी से न रहा गया वह कालू को ढ़ूँढ़ने के लिए इधर-उधर चला गया । कालू को ढ़ूँढ़ते -ढ़ूँढ़ते उसे काफी देर हो गई थी लेकिन कालू का पता नहीं  चला वह थक हार कर एक दुकान के सामने जा बैठा । जिस दुकान के सामने वह बैठा था उसकी बगल में एक खाली प्लॉट था जिसमें लोगों से कूड़ा करकट फेंक रखा था । भिखारी निराश -हताश वहाँ बैठा हुआ था कि अचानक उसकी नजर खाली पड़े प्लॉट पर गई उसने देखा कि वहाँ पर कोई कुत्ता सोया हुआ है वह बैसाखियों के सहारे वहाँ तक गया वहाँ जाकर देखा कि कालू लहु-लुहान पड़ा है अभी उसकी साँसे चल रही है । उसने कालू को आवाज़ दी .. उसकी आवाज सुनकर कालू ने उठने की कोशिश की लेकिन उठ न सका किसी गाड़ी वाले ने उसकी आगे की दोनों टाँगें कुचल दी थी । सड़क पर चलनेवाले लोगों ने उसे सड़क से उठाकर इस खाली पड़े प्लॉट में फेंक दिया था। यह देखकर भिखारी की आँखों में आँसू भर आए उसने कालू को  धीरे -धीरे एक तरफ खिसकाया और अपने फटे हुए कपड़ों में से एक कपड़ा निकालकर उसके दोनों पैरों पर बाध दिया । कपड़ा बांधने के बाद पास ही एक नल लगा हुआ था वहाँ से पानी लाकर उसके मुँह पर डाला । मुँह पर पानी पड़ने से कालू को कुछ राहत महसूस हुई उसने अपनी बंद होती आँखें खोल ली। वह उसके पास बैठ गया उसके सिर पर हाथ फेरने लगा  पैरों की पट्टी को कसकर बाँधने के बाद वह बैसाखियों के सहारे धीरे- धीरे चलता हुआ एक किराने की दुकान पर गया वहाँ से  हल्दी ,फिटकरी और कुछ ब्रेड लेकर आया।  ब्रेड  कालू के सामने  रखते हुए बोला – ‘ये ले थोड़ा कुछ खा ले ।’ लेकिन आज कालू ने उन ब्रेडों को मुँह तक नहीं लगाया । आज सुबह से उसने भी न कुछ खाया  था न पानी की एक बूँद पी थी ।  फिटकरी को कूटकर पानी में  ड़ाल लिया और पास ही चायवाले की दुकान पर जाकर पानी को गरम करवा लाया । फिटकरी के पानी से उसने कालू की दोनों टाँगों को सेका । फिटकरी के पानी से सेकने के बाद कालू के घावों पर हल्दी डाल दी । हल्दी के पड़ते ही कालू दर्द से  तिलमिला  उठा .. …कराहने लगा . बेजुबान बेचारा अपना दर्द किसी से कह भी  नहीं सकता , कालू को इस प्रकार तड़पता  देखकर उसकी  आँखें भर आई…….। मन ही मन वह उस गाड़ीवाले को कोसने लगा जिसने कालू की यह हालत की है।

यह सब देखकर उसे लग रहा था कि कालू शायद अब ज्यादा दिन जीवित नहीं रहेगा । उसने कालू के पैरों की  पट्टी को कसकर बाँध दिया था । धीरे-धीरे शाम होने लगी । जैसे-जैसे शाम होने लगी भिखारी को कालू की चिंता ज्यादा सताने लगी कि अब वह क्या करे ? कालू को वह उठाकर अपने साथ झोपड़ी में भी नहीं ले जा सकता ।यही सोचते-सोचते रात का अँधेरा गहराने लगा बाज़ार में दुकानदार अपनी-अपनी दुकाने बंद करके अपने-अपने घर   जाने लगे थे। वह वही कालू के पास ही बैठा था। कालू को इस हालत में छोड़कर जाने के लिए उसका दिल कतई तैयार नहीं था । उसे डर था कि कही दूसरे कुत्ते आकर उसे मार न डालें ...। उसने कालू के पास रहने का फैसला किया और वही कालू के पास एक मैला सा कपड़ा बिछाकर लेट गया। सुबह होते ही उसने कालू को देखा अभी उसे थोड़ा आराम लग रहा था। यह देखकर उसके मन में एक आस जगी कि अब शायद कालू बच जाएगा। वह कई दिनों तक अपनी झोपड़ी में भी नहीं गया वहीं आस-पास के मोहल्लों से कुछ भीख माँग लाता और कालू के पास आकर बैठ जाता । जो कुछ खाने के लिए मिलता उसमें से आधा कालू के सामने रख देता और आधा स्वयं खा लेता।   वह रोज कालू के लिए फिटकरी का गरम पानी करवाकर लाता ,उसकी सिकाई करता, सिकाई करने के पश्चात हल्दी लगाता उसके और अपने खाने के लिए वही पर कुछ ले आता दोनों साथ  ही खाते ..। धीरे- धीरे कालू की स्थिति में सुधार होने लगा उसकी टाँगे पूरी तरह तो ठीक न हो सकी पर हाँ अब वह इस लायक हो चुका था कि थोड़ा बहुत खड़ा हो सके । लँगड़ाता -लँगड़ाता धीरे -धीरे  चलने फिरने भी लगा था। भिखारी उसे अपने साथ अपनी झोपड़ी में ले आया था। वह रोज सुबह उठता और अपना भीख माँगने चला जाता। अब कालू उसकी झोपड़ी के बाहर ही बैठा रहता है । जब भिखारी भीख माँगकर लौट आता है तब दोनों एक साथ खाना खाते हैं। एक दिन भिखारी ने कालू से कहा  – “अब तो हम दोनों एक जैसे हो गए  तू भी लँगड़ा मैं भी लँगड़ा , तेरा भी इस संसार में कोई नहीं और मेरा भी कोई नहीं ……. वाह रे ! विधाता तेरी माया ....कहते हुए उसकी आँखें भर आई ....”

Thursday, November 29, 2018

ओल्ड मैन इन द सिटी


 

घर में टंगी संयुक्त परिवार की तस्वीर को देखते हुए हरिया की आँखों से अक्सर आँसुओं  की धार  निकल जाती। अब यह आँसुओं  की धार खुसी की है या दुख के आज तक कोई समझ नहीं पाया। एक बेटा दो बेटी सुखी परिवार सब कुछ तो था उसके पास। हाँ सब कुछ तो था पर सब थे दूर –दूर बेटियों की शादी कर दी वे दोनों अपने-अपने घरों में सुखी जीवन जी रही हैं। बेटा पढ़-लिखकर  दिल्ली में सरकारी अफ़सर बन गया। वह भी अच्छा खासा कमा खा रहा है। अपने परिवार के साथ वहाँ सुखी जीवन बिता  रहा है। साल में तीज –त्योहार पर अपने परिवार के साथ बूढ़े माँ-बाप  से मिलने  चला आता। हरिया ने अपना पूरा जीवन सरकारी स्कूल में चपरासी की नौकरी करने में बिता दिया था।  दो साल पहले ही वह अपने उस पद से सेवानिवृत्त हुआ था। जीवनभर स्वाभिमान से कमाया उसी स्वाभीमान के साथ जीवन के साठ साल बिता दिये। बाप –दादा अपने पीछे पाँच बीघे ज़मीन छोड़ गए थे घर के राशन और अन्य छोटे-मोटे खर्चे उसी से चल जाते थे। आधुनिक जीवन की चकाचौंध से दूर सादा जीवन उच्च विचारों के आदर्श पर चला और यही शिक्षा अपनी संता को भी दी। तीनों बच्चों को अपने- अपने  घर परिवार में सुखी देखकर उसे अपार आत्मसंतोष का अनुभव होता।  एक समय था जब बच्चों की शरारतों से पूरे घर में कोतूहल का माहौल बना रहता था। एक आज का दिन है जहां कोई चिड़िया भी आने से डरती है। कितने अरमानों से पुश्तैनी घर तुड़वाकर बच्चों के हिसाब से बनवाया था यह घर। बदलते समय में उसके बच्चे कब उससे आगे निकल  गए पता ही नहीं चला।
वर्षों पहले बेटा तारा नौकरी के लिए दिल्ली आया था और यहीं पर बस गया। नौकरी और परिवार की जिम्मेदारियों के मकड़जाल में धीरे-धीरे ऐसा फसा कि अब बूढ़े माँ –बाप  के लिए बमुश्किल समय निकाल पाता। उसने कई बार  बूढ़े माँ–बाप  को दिल्ली आकर परिवार के साथ रहने के लिए कहा लेकिन हरिया हर बार उसकी बातों को टाल जाता। उसने अपने पूरे जीवन में कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया, और न कभी  फैलाने की ज़रूरत  पड़ी।  जब तक कमाया तब तक तनख्वाह मिलती रही रिटायर होने के बाद घर के खर्चे के लिए उतनी पेंशन मिल ही जाती है और फिर पाँच बीघे खेत भी तो है।  उम्र के अंतिम पड़ाव में वह बहू –बेटे पर बोझ नहीं बनना चाहता था। यही कारण था कि वह बेटे के पास नहीं जाना चाहता था। जब बेटे  के साथ - साथ उसकी पत्नी राधा  ने भी बेटे के यहाँ जाकर रहने की ज़िद की तब वह उसे मना न कर सका,  और एक दिन ना चाहते हुए भी अनमने मन से दिल्ली के लिए रवाना हो गया।  वह आगे चलने की बहुत कोशिश कर रहा था लेकिन उसके कदम है कि आगे  बढ़ने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बार –बार मुड़कर घर और गाँव की गलियों को ऐसे निहार रहा था जैसे वह इन गलियों को आखिरी बार देख रहा हो।  जैसे –तैसे वह पत्नी संग रेलवे स्टेशन पहुँचा। ट्रेन अपने निर्धारित समय से उस स्टेशन से चली। बाईस घंटे की यात्रा के बाद दूसरे दिन दोनों पति –पत्नी  दिल्ली जा पहुँचे। 
जीवन में पहली बार वह अपने गाँव से बाहर निकला था। अब तक उसने दिल्ली का बस नाम सुना था लेकिन आज साक्षात देख भी लिया। जैसे –जैसे ट्रेन प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ रही थी उसके दिल की धड़कने भी तेज होती जा रही थी। वह बैठा –बैठा यही सोच रहा था कि अगर उसका बेटा सही समय पर उन्हें लेने नहीं आया तो?  प्लेटफार्म पर ट्रेन के लगते ही लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा।  यह देखकर तो उसके हाथ पाँव फूल गए। कैसे उतरेगा इस डिब्बे से? उतर कर कहाँ जाएगा ? कुछ भी तो नहीं पता उसे? धीरे-धीरे जब उस डिब्बे से सारी सवारी उतर गई तब वह हिम्मत कर पत्नी संग ट्रेन से उतर बाहर आकर खड़ा हो गया। चारो तरफ गाड़ियों का शोर लोगों की भाग-दौड़ को देखकर अचंभित सा खड़ा देख मन ही मन बोला “ का ई  दिल्ली है ? हमरा तारा ई जंगल में रहत है का ? हे! भगवान तू कहाँ ले आया हमें? हम दोनों अच्छे खासे ज़िंदगी गुजार रहे थे गाम में।“  खैर थोड़ी देर बाद ही उसका बेटा उन्हें  लेने स्टेशन आ पहुँचा। बेटे को देखकर दोनों की जान में जान आई। बेटे के साथ स्टेशन से निकले ही थे कि सड़क पर एक लंबे जाम में फस गए। चारो तरफ वाहनों  का शोर, ऊँची –ऊँची इमारतों को देखकर हरिया और राधा का सिर चकरा गया। स्टेशन से घंटों  सफर के  बाद आखिर घर पहुँच ही गए। तारा ने एक ऐसी बहुमंजिला इमारत के नीची लाकर कार रोककर उतर गया। अपने उतरने के बाद उसने अपने –माता-पिता को भी कार से नीचे उतारा। कार से उतरते ही हरिया और उसकी पत्नी राधा ने  गगनचुंभी इमारतों को अचरजभरी निगाहों से देखते रह गए। “ हे ! राम  तू इन डिब्बो में रहता है ?” हरिया ने बेटे से पूछा। पिता की  बात सुनकर बेटे ने मुस्कुराते हुए कहा –“ बापू तुम्हें पता है इन डिब्बों की क्या कीमत होगी? करोड़ों में है इनकी कीमत ?”  का कह रहे हो लल्ला – हरिया ने कहा । हरिया की बात खत्म भी नहीं हुई थी कि राधा बोल उठी “ हे !राम  ई लो इन  डिब्बों की कीमत करोड़न में है ?का जमाना आ गया है?”
तारा माता –पिता की बातें सुनकर  मुसकुराता हुआ उन्हें लिफ्ट से बिल्डिंग की बरहवी मंज़िल पर बने फ्लैट में जा पहुँचा। घर पहुँचे ही सब लोग उन्हें देखकर खुशी से झूम उठे। तारा के दो बच्चे थे बड़ा बेटा और छोटी बेटी बेटा  रोहन कक्षा सात में पढ़ता और बेटी साक्षी  कक्षा तीन में। दोनों बच्चे पिता की तरह ही होनहार थे। दोनों बच्चे अपने दादा –दादी का आदर सत्कार कर कुछ देर उनसे बातें कर अपने –अपने कमरे में चले गए। हरिया और राधा के चेहरे पर यात्रा  की थकान साफ –साफ देखी जा सकती थी। कुछ समय आराम करने के बाद सब लोगों ने एक साथ खाना खाया और अपने –अपने कमरे में सोने चले गए।  बेटे के घर और उसके रुतबे को देखकर माँ तो खुशी से फूली नहीं समा रही थी। अब तक उसने ऐसे मकान फिल्मों में देखे थे। कमरे में रखी बैड पर स्प्रिंग के गद्दे पड़े थे। उन गद्दों पर हरिया आधी रात तक करवटें बदलते रहा नींद है की आने का नाम ही नहीं ले रही थी। जब उससे रहा नहीं गया तो उसने चादर फर्श पर बिछाई और वहाँ जाकर लेट गया  तब जाकर उसे नींद आई। 
 सुबह छह बजे  बहू  मालती और दोनों बच्चे उठ गए।  दोनों बच्चे अपने स्कूल की तैयारी में लग गए। मालती सभी के लिए सुबह का नाश्ता बनाने में लगी थी। तारा अभी तक सो रहा था। बच्चे अपने समय पर तैयार होकर करीब आठ बजे घर से स्कूल के लिए निकल गए।  हरिया और राधा भी सुबह छह बजे ही जाग गए थे। सुबह दोनों ने अपने समयानुसार नहाकर नाश्ता किया। सुबह के नौ बजते –बजते बेटा भी जाग गया। उसके जागते ही मालती उसके लिए एक गरमागरम चाय का कप ले आई। चाय का कप लेकर माँ के पास सोफे पर जा  बैठा। “और माँ कल रात को कैसी नींद आई।“ तारा ने पूछा । राधा कुछ कहती उससे पहले ही हरिया बोल उठा – का लल्ला कैसे सोत हौ  इन गद्दन पर तुम लोग ,ससुरी रात भर हमें तो नींद ही ना आई तुम्हारी माई तो आराम से.....। हरिया की बात सुनकर माँ -बेटे दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा और ज़ोर से हंस दिये। तभी तारा की नज़र हॉल में टंगी घड़ी पर गई  दस बज चुके थे। वह वहाँ से उठा और नहाने के लिए चला गया। नहाकर नाश्ता करके सीधे ऑफिस के  लिए  निकल गया।   तारा के जाते ही घर में काम करने वाली बाई आ गई वह भी कुछ ही देर में कपड़े, बर्तन और घर में झाड़ू पोंछा लगाकर चली गई। बहू  ने भी थोड़ी बहुत देर उनसे बातें की और अपने कमरे में जाकर आराम करने लगी। उसके कमरे में अलग टी. वी. लगा था  वह अपने मनपसंद के कार्यक्रम अपने कमरे में जाकर देखने लगी।             
सारा दिन हरिया घर में इधर से उधर घूमता  रहा। कभी ऐसे बंद घरों में रहा नहीं ना । कभी सोने के कमरे में तो कभी बालकोनी में जाकर बैठ जाता। यहाँ न कोई बोलने वाला न कहीं खुला आसमान जहां वह अपनी खाट डालकर सो सके, अपने संगी साथियों से गपशप कर सके। घर भी तो कहाँ लिया है …. बारहवीं मंज़िल पर । नीचे झाँककर देखा  तो सिर चकरा गया । आदमी भी चिड़ियों  के समान दिखाई दे रहे थे। इधर  राधा मजे से कमरे में  सोने से लगी थी। वैसे उसे भी उन गद्दों में ज्यादा देर नींद नहीं आई और वह भी कमरे ने निकलकर हॉल में आ गई। हरिया को इधर –उधर टहलते देखा तो पूछ बैठी–
 “ ए जी का हुआ तबीयत तो ठीक है ना ?.... ऐसे काहे चक्कर काट  रहे हैं?” हरिया ने उसकी बात सुनी उसकी तरफ देखा पर कहा कुछ नहीं। तभी घर की घंटी बजी तो बहू अपने कमरे से निकलकर आई तो देखा बच्चे स्कूल से आए थे। बच्चों को देखकर दादा –दादी बहुत खुश हुए। सुबह से हरिया बच्चों के आने का इंतज़ार कर रहा था।  स्कूल से थके हारे बच्चे सीधे अपने –अपने कमरे में चले गए। थोड़ी देर बाद दोनों अपने कमरों से बाहर आए तब तक मालती उनके लिए शाम का नाश्ता लेकर आ गई थी । दोनों ने बड़े  चाव से खाना खाया और फिर अपने स्कूल का काम करने में लग गए । स्कूल का काम करते -करते शाम के पाँच बज चुके थे। अपनी पढ़ाई का काम खत्म करते ही दोनों टी.वी. देखने में लग गए। बच्चों के साथ –साथ हरिया और राधा भी टी.वी. देखने लगे।  थोड़ी बहुत देर टी. वी. देखकर उसने टाइम पास किया। दोनों बच्चों को घर आए लगभग तीन घंटे बीत चुके थे। पिछले तीन घंटों में वे दोनों अपनी ही दुनिया में मस्त थे। कभी टी. वी. कभी सेलफोने, कभी टबलेट या फिर वीडियो गेम।
रात के करीब दस बजे तारा भी अपने ऑफिस से थका हारा घर लौटा। हरिया और राधा अभी तक सोये नहीं थे उसी के इंतज़ार में बैठे थे की वह आएगा तो सभी लोग एक साथ मिलकर खाना खाएँगे । हाँ अगर अपने गाँव में होते तो अब तक तो उनकी एक नींद पूरी हो चुकी होती थी। उसके आने के बाद ही सब लोगों ने एक साथ खाना खाया।  सभी लोग खाने के लिए बैठे ही थे कि तभी तारा के ऑफिस से फोन आ गया। तारा खाना खाते –खाते फोन पर बातें करता रहा। खाना  खत्म हो गया लेकिन उसकी बातें अभी पूरी नहीं हुई थी। खाना खाते ही वह वहाँ से उठकर सीधा अपने कमरे में चला गया। बहू और बच्चों ने भी अपना खाना  खत्म किया और दादा-दादी से  कुछ औचारिक बातें कर अपने –अपने अपने कमरे में चले गए। सुबह से जिन का वे लोग इंतज़ार कर रहे थे वे लोग आए भी ओर नहीं भी .... ?
दिल्ली आए  बीस  दिन  गुजर चुके थे। ये बीस  दिन हरिया और राधा के लिए  महीनों के समान बीते थे।  बीते बीस दिनों में तारा ने उन्हें लाल किला, कुतुबमिनार जैसी कई ऐतिहासिक इमारतों की सैर कारवाई थी। यह सब तो ठीक था लेकिन जैसे ही वे लोग घर में आते यहाँ आते ही उनका उस घर में दम सा घुटता। वे लोग ऐसे घरों में रहने के आदि जो नहीं थे। खैर जैसे –तैसे करके हरिया ने दो महीनों का समय समय वहाँ पर गुजरा। यहाँ पर न कोई काम न कोई बोलने चालने वाला ना को संगी साथी। कहने को तो परिवार में सभी लोग हैं लेकिन सब अपने –अपने कामों में इतने व्यस्त कि किसी को किसी के लिए समय ही नहीं । दिनभर हरिया कभी अखबार पढ़ता, कभी टी. वी.  देखता और करे भी तो क्या?  कैसे समय गुजारे?  कोई आदमी कितना टी. वी. देखा सकता था। ऐसा नहीं था कि सिर्फ हरिया ही यहाँ आकर असहज महसूस कर रहा था राधा का भी यही हाल था। स्कूल से बच्चे थके हारे आते तो आते ही टी. वी.  पर अपने मनपसंद चैनलों को देखने लग जाते। सुबह से शाम तक दादा-दादी बच्चों के आने का इंतज़ार करते कि बच्चे आएंगे तो उसे कुछ बातें करेंगे। उनसे कुछ अपनी कहेंगे कुछ उनकी सुनेगे। बच्चे तो आते ही अपनी कुछ औपचारितयाएँ निभाकर अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाते। कभी टी. वी. तो कभी आई पैड तो कभी मोबाइल फोन पर व्यस्त हो जाते। हरिया उन बच्चों को देखते देखते सोचने लगा कैसा शहर है ये ना कोई किसी का पड़ोसी है। सब बंद दरवाजों के भीतर ही अपनी दुनिया को समेटकर जीने के आदि हो चुके हैं। इससे अच्छा तो हमारा गाँव ही है कम से कम वहाँ आस –पास लोग तो होते हैं। हम सब एक दूसरे की कुशलक्षेम तो पूछ लेते हैं। एक दूसरे के सुख दुख में शामिल तो हो लेते हैं, यहाँ तो यही नहीं पता कि पास वाले घर में कौन रहता है उसका नाम क्या है? रही बच्चों की बात...उन बेचारों का क्या कसूर? ये मासूम भी क्या करें ? कहाँ खेलने जाएँ ना कोई मैदान ना खुला कोई खुली जगह .... ये दिल्ली है …. दिल्ली  हुंह ....         
जिसके कहने पर वे लोग अपना घर अपना गाँव छोड़कर आए थे उसे भी उनके पास बैठकर दो  बातें करने की फुरसत नहीं। सुबह ऑफिस के लिए निकलता और देर रात थका हारा घर पहुँचता। आता खाना खाकर कुछ औपचारिक वार्तालाप कर सोने चला जाता। सोने क्या चला जाता घर आने की देर नहीं होती कि ऑफिस से फोन पर फोन आने लग जाते। कभी फोन कभी लैपटॉप पर लगा रहता थक हारकर सोने चला जाता। घर में बैठे –बैठे वे लोग ऊब चुके थे क्या करें क्या ना करें उनकी समझ में नहीं आ रहा था। यहाँ रहेंगे तो इसतरह तो वे लोग ज्यादा दिन जी नहीं पाएंगे।अपने मन की शांति और बच्चों के सुखी जीवन को देखते हुए हरिया ने अपने गाँव, अपने घर जाना ही उचित समझा।  कुछ दिनों बाद  वे अपने उस खुले आसमान के नीचे जा पहुँचे जिसके नीचे वे लोग हँस सकते थे एक दूसरे से बोल सकते थे। यहाँ उनके संगी साथी थे और सबसे अच्छी बात यहाँ के घरों में इंसान रहते थे मशीनें नहीं। यहाँ इन्सानों को अहमियत दी जाती थी न कि मशीनों को। खैर छोड़िए यह सब ....  हाँ हरिया और राधा अपने घर अपने गाँव में आकर अब बहुत खुश हैं।  यहाँ कम से कम कोई हालचाल पूछने वाला तो है। आसमान की खुली छत तो है। एक रात खाना खाकर जब दोनों पति-पत्नी खले आसमान के नीचे अपनी –अपनी खाटों पर लेते थे तभी राधा ने बोल उठी – “कुछ भी तो तारा के बापू अपना घर और अपना गाँव आखिर अपना ही होता है। “ हरिया ने राधा की तरफ देखा और मंद मंद मुस्कुराने लगा मुंह से कहा कुछ नहीं पर उसकी मुस्कुराहट  ने  बहुत कुछ कह दिया। देर रात  तक दोनों बातें  करते-करते कब सो गए पता ही नहीं चला .....  


Tuesday, September 19, 2017

आज़ादी


कल देर रात तक काम करने के कारण  सचिन  की नींद देर से खुली, अधखुली आँखों से ही उसने पास में रखे अपने फोन को उठाकर टाइम चैक किया  ओह ! आठ बज गए कहकर झट से उठकर सीधे हॉल में चला गया। हॉल में आकर उसने फोन को देखा साहिल जो उसका सबसे घनिष्ठ मित्र है उसके सात  मिस कॉल थे। साहिल के कॉल देखकर उसने उसे कॉल किया। बात करने पर पता चला कि साहिल की माँ की तबीयत ज्यादा खराब होने के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया है।  थोड़ी देर में सचिन भी उस अस्पताल में पहुँच गया। यहाँ आकर पता चला कि बी. पी. अधिक बढ़ने के  कारण वे बेहोश होकर गिर गई थीं। डॉक्टर ने उन्हें कुछ दवाई और इंजेक्शन दे दिया था जिससे उन्हें होश तो आ गया था किन्तु गिरने के कारण हाथ  में गहरी चोट आ गई थी।  डॉक्टर ने माँ को एक – दो दिन अस्पताल में रखने की सलाह दी जिससे उनकी  सेहत का पूरा ध्यान रखा जा सके। दो– तीन दिन बाद माँ  घर वापस आ गई।
  साहिल गुड़गाँव में एक मल्टी नेशनल कंपनी में मैनेजर के पद पर काम कर रहा था, मैनेजर के पद पर होने के कारण आमदनी भी अच्छी थी। खुद का आलीशान घर  जिसमें उसका छोटा परिवार पत्नी, एक बेटा और एक बेटी रहते थे।  पिछले साल वह अपने बूढ़े माता-पिता को भी अपने साथ शहर ले आया था। वैसे भी गाँव में उनकी सेवा करनेवाला या उनकी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं था।  कहाँ गाँव का खुला वातावरण और कहाँ शहर का संकीर्ण वातावरण, कुछ महीने तो बूढ़े माता-पिता का शहरी वातावरण में मन ही नहीं लगा फिर जैसे –तैसे  उन्होने  अपने आप को उस वातावरण में ढालन शुरू कर दिया।  जब से बूढ़े माता –पिता इस घर में आए थे उसके कुछ समय बाद से ही घर का बातावरण गंभीर रहने लगा था। परिस्थिति तो यहाँ तक आ गई कि साहिल की पत्नी और बच्चों ने बूढ़े माता –पिता से बात करना तक बंद कर दिया।   घर के इस बदलते माहौल से साहिल और उसके बूढ़े माता –पिता काफी दुखी थे, अक्सर रह रहकर बूढ़े माता –पिता अपने आप को कोसते कि क्यों वे लोग यहाँ आए .... ? अगर न आते तो कम से कम उसके परिवार में मनमुटाव तो न पैदा होता।  बेटे के सुखी जीवन के लिए माँ ने कई बार उससे कहा कि वह उन्हें वापस गाँव छोड़ आए या गाँव जानेवाली बस में बैठा दे। वैसे भी उनका यहाँ मन नहीं लगता घर में बैठे –बैठे ।  
एक दिन घर में बने बगीचे मैं बैठा –बैठा  इसी विषय पर सोच रहा था कि किस तरह से अपने परिवार को जोड़कर रखे ? कैसे रिश्तों में बढ़ती दूरियों को मिटाए ? पत्नी है कि बूढ़े माता-पता से बात तक नहीं करना चाहती , बच्चों के पास उनके साथ बात करने या उनके साथ बैठने का टाइम ही नहीं है वह ऐसा क्या करे जिससे कि उसके घर का माहौल फिर से पहले जैसा हो जाए।  इन्हीं बातों को सोचते –सोचते  वह अपने अतीत की घटनाओं को याद करने लगा- कितना खुश रखते थे उसके माता पिता उसे।  बचपन से अब तक उसकी हर छोटी बड़ी  ख्वाइश का ध्यान रखते थे। आज भी उसे याद है किन विपरीत परिस्थितियों में उसके मात –पिता ने उसे  इस मुकाम तक पहुँचाया  है। उनके घर में बिजली तो थी नहीं, माँ किसी तरह घासलेट (कैरोसिन )  का  इंतजाम करती जिससे कि वह रात में पढ़ सके। रात में पढ़ाई  करते समय उसकी माँ भी उसके साथ –साथ जागती।  पिता  बेलदारी का काम  करते और माँ  दूरसों के घरों में काम करके घर का खर्चा और उसकी पढ़ाई का खर्चा चला रहे थे।  बचपन की भूली बिछड़ी यादों में उसे याद आया कि कभी भी उसके माता-पता ने उसे अकेला नहीं छोड़ा । अकेला छोड़ते भी कैसे चार संताने हो –होकर चल बसी थीं, यही उनकी आखरी उम्मीद था। जीवन की हर कठिन राह पर दोनों ने उसे सहारा दिया था। उनके कठिन परिश्रम और त्याग का ही परिणाम था  कि आज वह इस मुकाम तक पहुँच पाया है। माँ फटी साड़ी में काम पर जाती जब अधिक फट जाती तो उसे सिल लेती कहीं –कहीं उसमें थेगरी (दूसरा कपड़ा) लगाकर सिल लेती, ऐसा ही हाल पिता का भी था। तभी उसके नौकर ने आकर उसे  आवाज देते हुए चाय का कप रख दिया  ओह ! कहकर उसने  चाय का कप उठाया और कुछ सोचते हुए चाय की चुसकियाँ लेने लगा.....             
 
 रात के आठ बजे थे सचिन अपने ऑफिस से घर  के लिए निकलने ही वाला था कि उसके मोबाइल पर एक कॉल आई, फोन साहिल की पत्नी जया  का था, जैसे ही उसने फोन उठाया वैसी ही उसे उधर से रोने की आवाज़ सुनाई दी .... रोने की आवाज़ सुनकर किसी अनहोनी की आशंका से उसका दिल बैठ गया ।
उसने किसी तरह उन्हें शांत किया और पूछा कि आखिर बात क्या है ... क्या हुआ ?
जया  – “ रोते हुए .... अभी आप कहाँ हैं ?
सचिन –“ मैं अभी ऑफिस से घर के लिए निकल रहा हूँ । आखिर हुआ क्या आप कुछ बताओगी भी ?
जया  – “आप किनती देर में यहाँ पहुँच सकते हैं ?
सचिन – “ भाभी जी आखिर बात क्या है ? कुछ बताइए तो .... सब खैरियत से तो है ?
जया  – “ बस आप जल्दी से घर आ जाइए”
सचिन –“ अच्छा ठीक है  मुझे वहाँ पहुँचने में लगभग एक –डेढ़ घंटा लग जाएगा। कहकर उसने फोन रख दिया। किसी अनहोनी की आशंका से उसका दिल बैठा जा रहा था। करीब एक घंटे की यात्रा के बाद घबराहट में वह साहिल के घर जा पहुँचा। घर में  प्रवेश करते ही उसे घर का वातावरण  बहुत गंभीर लगा, एक सोफ़े पर साहिल बुत्त की तरह बैठा था दूसरी तरफ उनकी पत्नी लगातार रोए जा रही थीं।  सचिन को देखकर वो और  ज़ोर- ज़ोर से रोने लगी। उसने घर के सभी सदस्यों  से जानने की कोशिश की लेकिन किसी ने कोई जवाब  नहीं दिया  सिर्फ इधर  जया  लगातार रोए जा रही थी।
किसी से कोई उत्तर न पाकर उसने साहिल से पूछने की कोशिश की “ आखिर क्या बात है ? भाभी जी क्यों रो रही हैं ? सब ठीक तो है ना …? साहिल किसी के सवाल का कोई जवाब नहीं दे रहा था।  सचिन कुछ समझ पाता तभी सुमन ने कुछ पेपर उसके सामने रखते हुए कहा “ ये देखिए “ सचिन ने उनके हाथ से वे पेपर ले लिए। पेपर पढ़कर उसकी आँखें  खुली की खुली रह गई “ये क्या तलाक ? पर क्यों ....?  ऐसा क्या हो गया? तभी उसने इधर - उधर अपनी नज़रें दौड़ाई घर के सभी लोग वहाँ मौजूद थे, यहाँ तक कि  घर के नौकर भी पर अंकल आंटी कहीं नज़र नहीं आ रहे थे ।
सचिन – “ अंकल आंटी कहाँ हैं ...?” सचिन का सवाल सुनकर घर में एक सन्नाटा सा छा गया, थोड़ी देर बाद साहिल का बेटा मोनू बोला कि “ दादा –दादी को तो लास्ट वीक ही ओल्डएज होम  में शिफ्ट कर दिया”
ओल्डएज होम  शिफ्ट कर दिया पर क्यों ...? सचिन के इस प्रश्न का जवाब किसी के पास नहीं था सब के सब मौन बने खड़े थे, इधर जया  का  रोना लगातार जारी था ,  रोते –रोते कहती जाती “ अब इस उम्र में तलाक देना चाहते हैं .... “
इसी बीच साहिल हॉल से उठकर बाहर बरामदे में पड़ी कुर्सी पर जाकर बैठ गया। एक तरफ जया  दूसरी तरफ साहिल  वह क्या करे? क्या कहे कि उसे वह बात पता चल सके जिसके कारण यह सब फसाद हुआ है। कुछ देर हॉल में बैठने के बाद वह बरामदे की तरफ चला गया जहाँ साहिल बैठा था, बरामदे में अंधेरा था, सचिन वहाँ की लाइट जलाते हुए साहिल के पास रखी कुर्सी पर जा बैठा। उसने देखा कि साहिल की आँखें लाल हो रखी थी, उसे देखकर लग रहा था जैसे वह काफी देर से रो रहा हो । इस बात का किसी को पता न चले इसीलिए वह अंधरे में आकर इस बरामदे में बैठ गया था।  परिस्थितियों को भाँपते हुए उसने बरामदे की लाइट बंद करते हुए घर के नौकर को दो कप कॉफी बनाकर लाने के लिए कहा और खुद  साहिल के पास बैठ गया।       
 सचिन – “ भाई आखिर बात क्या है .... ? कोई कुछ बताता क्यों नहीं है ?  साहिल ने उसकी बातें सुनी, वह कुछ कहता तभी घर का  नौकर  कॉफी मेज़ पर  रखकर चला गया। साहिल ने एक कप उठाकर साहिल की तरफ बढ़ाया किन्तु उसने कप नहीं लिया... इससे पहले कि सचिन कुछ कह पाता  वह  एक अबोध बालक की तरह फूट –फूटकर रोने लगा, रोते –रोते कहने लगा कि उसने पिछले चार –पाँच दिनों से कुछ नहीं खाया है ?
सचिन – “ पर क्यों ....?आखिर हुआ क्या है ? और अंकल आंटी को ओल्डएज  होम में क्यों छोड़ आए तुम?
साहिल –   “ अब क्या बताऊँ ..... सब किस्मत का खेल है यार” कहकर वह चुप हो गया।   
सचिन – “ यार आखिर बात क्या है साफ-साफ बताओ, उधर भाभी जी रोने से लगीं हैं ..... इधर तुम .... ?”
साहिल –“ जब से मम्मी –पापा यहाँ आए हैं तभी  से इस घर में न तो कोई उनसे सीधे मुँह बात करता ना  उनका ख्याल रखा जाता। उसी दिन से उनके लिए इस घर में रहना दूभर हो रखा था । पत्नी तो पत्नी मेरे बच्चे तक उनसे दूरी बनाकर रखते थे जैसे वे मेरे माता-पिता न होकर कोई छूत की बीमारी हों । मैं जब भी ऑफिस से घर आता अक्सर मैंने अपने बूढ़े माता– पिता को रोते देखा है, मुझे इस बात का पता न चले मेरे आते ही वे दोनों हंसने का नाटक करते थे। घर के नौकर तक उनसे सीधे मुँह बात नहीं करते। घर के बिगड़ते हालातों तो देखते हुए ही मम्मी –पापा ने लास्ट वीक मुझसे कहा था कि वह उन्हें किसी वृद्धाश्रम में भेज दे, या गाँव भेज दे। गाँव तो वे लोग जा नहीं सकते वहाँ जाकर रहेंगे भी तो  कहाँ ?  एक टूटा-फूटा घर था वह भी उन्होने उसकी एम. बी. ए.  की पढ़ाई के लिए बेच दिया था। मैंने अपने परिवार को समझाने की बहुत कोशिशें कीं लेकिन किसी के कानों पर जूं तक न रेंगी। आखिर मजबूर होकर मुझे  उन्हें वृद्धाश्रम में भेजना ही पड़ा।“ कहते-कहते  वह पुनः  फूट-फूटकर रोने लगा, सचिन ने उसे शांत करते  हुए कहा।
सचिन – यार इट्स सो सैड  बट डोन्टवरी सब ठीक हो जाएगा ...” कहते हुए वह भी भावुक हो गया पर अपने पर काबू रखते हुए उसने साहिल को शांत किया कुछ देर सन्नाटा पसरा रहा । कुछ देर बाद साहिल जैसे अपने आप से बातें करते हुए कहने लगा
साहिल –“  मैं ही जानता हूँ कि मेरे माँ – बाप ने कितनी कठिनाइयों को झेलते हुए मुझे इस मुकाम तक पहुँचाया है। मेरे  यूनीवर्सिटी में दाखिले के लिए जब कहीं से पैसों का जुगाड़ नहीं बन पाहया तो उन्होने  घर तक को बेच दिया ताकी मेरी पढ़ाई में कोई रुकावट न हो। आज जब उन्हें मेरे साथ की सबसे ज्यादा ज़रूरत है मैं उन्हें  ऐसे माहोल में, ऐसे लोगों के बीच छोड़कर आया हूँ जो उनके लिए एक दम अपरिचित हैं। ऐसी कामियाबी किस काम की जिससे मेरे माँ –बाप ही दूर हो जाए। कहते हुए पुनः उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली..... जब मैं ऐसे माँ-बाप के लिए कुछ नहीं कर पाया तो भला औरों के लिए क्या कर सकता हूँ ?  आज सब को आज़ादी चाहिए, बिना किसी रोक टोक के जीवन जीना है तो जीए ....  मैं सब  को पूरी तरह आज़ादी देना चाहता हूँ । जब मेरे बूढ़े  माता –पिता किसी अंजान माहौल में अंजान लोगों के साथ जी सकते हैं तो ये लोग भी जी लेंगे .... इसीलिए मैं इन्हें हर बंधन से आज़ाद करता हूँ। रही बात घर की, मेरी दौलत की सो  मैंने अपनी सारी जायदाद इन लोगों के नाम लिख दी है” । सचिन ने उसे बीच में ही रोकते हुए कहा
सचिन –“ये क्या पागलपन है .... और तुम कहाँ रहोगे “
साहिल – “मेरे बूढ़े माँ-बाप अंजान लोगों के साथ रह सकते हैं तो मैं भी  वहीं जाकर उनके साथ रहूँगा  मैं उसी  वृद्धाश्रम में अपने बूढ़े माँ-बाप के साथ रहूँगा, कम से कम बूढ़े माँ-बाप के साथ सुकून से तो रह सकूँगा। जब इतना सब कुछ करने के बाद भी मेरे माँ-बाप वृद्धाश्रम में रह सकते हैं तो मैं क्यों नहीं ? वैसे भी माँ-बाप के साथ रहते हुए मुझे भी आदत हो जाएगी ... आखिर एक दिन जाना तो वहीं होगा ... उनकी तरह तकलीफ तो नहीं होगी। वह जितना कहता जाता उतना ही रोते जा रहा था .... सब को आज़ादी चाहिए तो लो आज़ादी सब आज़ाद रहो ..... कहते –कहते एक मौन में डूब गया .... चारो तरफ सन्नाटा छा गया।   
              

            

    


Wednesday, August 30, 2017

यतीम


आज मिस्टर मेहता का घर रोशनी से सराबोर था, हो भी क्यों ना उनके इकलौते बेटे विवेक  का विवाह जो है। सारा घर खुशियों से महक रहा था। विवेक अपना प्रेम विवाह जो कर रहा है।  पहले उसकी माँ सरला  इस बात के लिए राजी नहीं थी। उसे कतई पसंद नहीं था कि कोई और बिरादरी की लड़की उसकी बहू बनकर आए, लेकिन इकलौते  बेटे की खुशी के लिए  उसने  अपनी हामी भर दी। बेटे का ब्याह खूब  धूम धाम से किया। घर में बहू के आने से रौनक और बढ़ गई, बहू के आने से सरला को एक उम्मीद लगी कि अब वह अपनी सांसारिक जिम्मेदारियों को बहू को सोंपकर ईश्वर की भक्ति में लीन हो सकती है। बहू पढ़ी-लिखी थी शादी के कुछ समय बाद  से ही उसने नौकरी पर  जाना शुरू कर दिया।  वैसे तो घर में पैसों की कोई कमी नहीं थी, पिछले साल ही मिस्टर मेहता सरकारी नौकरी से रिटायर  हुए थे, रिटायरमेंट के समय काफी मोटी रकम मिली थी उन्हें। उन पैसों में से कुछ अपनी पत्नी के नाम जमा करवा दिये और बाकी के बेटे के अकाउंट में। रहने के लिए अपना घर, घर में किसी बात की कमी नहीं फिर भी बहू पैसे कमाने के लिए नौकरी पर जाये यह बात सरला को अच्छी नहीं लगती। इस बात का जिक्र उसने कई बार  मेहता जी से किया था लेकिन मेहता जी उसे हर बार समझाते हुए कह देते–“ देखो भाग्यवान अब हमारे तुम्हारे जैसा जमाना तो है नहीं कि पत्नी घर में आई और उसे सिर्फ घर गृहस्थी के चूल्हा- चौकों में झोंक दिया। अब जमाना बादल गया है, तुम भी अपनी सोच को बदलो”। पति की बातें सुनकर उसे भी लगता कि हाँ वे जो कुछ कह रहे हैं सही तो है।   
समय की गति के साथ चलते –चलते  आज बेटे की शादी को हुए पाँच साल गुजर चुके थे। इन बीते पाँच सालों में सरला पत्नी से सास बनी, सास से दादी। पिछले महीने  ही उसके घर में नन्हें कान्हा ने जन्म लिया था। कान्हा को पाकर दोनों पति पत्नी फूले नहीं समा रहे थे। अक्सर दादा दादी में कान्हा को लेकर बहस शुरू हो जाती कभी दादा कहते “इसके नाक नक्श बिलकुल विवेक जैसे हैं ....क्यों है ना? है ना ये  विवेक का दूसरा रूप “ इस पर दादी उन्हें चिढ़ाने के लिए कह देती –“अजी कहाँ हमारा  विवेक कहाँ यह कालू सा,  हमारा विवेक तो एकदम गोरा चिट्टा, गोल मटोल था और इसे देखो.....कहकर वो हंस देती। सरला की हंसी देखकर वे समझ जाते कि वो उन्हें चिढ़ाने के लिए यह सब बातें कह रही है। उनके परिवार को देखकर लगता था कि कितना सुखी परिवार है, छोटा परिवार सुखी परिवार।    
सरला की कमर अब झुक चुकी थी, पहले के समान अब उससे काम नहीं हो पाता। जीवन की इस अवस्था तक आते- आते हाथों की हथेलियाँ भी सख्त हो चुकी थीं।  जोड़ों के दर्द की तकलीफ तो वर्षों से लगी हुई है। आँखों पर मोटे–मोटे चश्में लग चुके थे, दो बार एक आँख के मोतियाबिंद  का  ऑपरेशन भी करवा चुकी थी। आज भले ही उसमें काम करने की वो फुर्ती नहीं जो वर्षों पहले हुआ करती थी किन्तु आज भी वह अपने बनाए नियम कानूनों का उसी तरह से पालन करती है। भले ही कितनी भी रात हो जाये जब तक वह स्वयं किचन में जाकर इस बात की तसल्ली न कर लेती कि  सिंक में कोई झूठा बर्तन तो शेष नहीं है तब तक चैन से नहीं बैठती। ऐसा नहीं था कि घर में काम करने के लिए नौकर नहीं लगा रखे थे । घर में हर काम के लिए एक नौकर लगा रखा था, कपड़े धोने से लेकर किचन में बर्तन साफ करने के लिए अलग नौकर आते थे। नौकर तो शाम तक के  बर्तन साफ करके चला जाता था। रात के खाने के बाद जो झूठे बर्तन बचते बहू उन्हें ऐसे ही छोड़कर अपने कमरे में सोने चली जाती। एक दो दिन तो उन्होने देखा, झूठे बर्तनों के विषय में  बहू से भी बात की  लेकिन हुआ कुछ नहीं।            
रातभर किचन की सिंक झूठे बर्तनों से भरी रहे  यह बात उन्हें  बहुत कचोटती थी। इसीलिए वह खुद ही इन बर्तनों को देर रात तक साफ करने में लगी रहती।  घर से बर्तनों की आवाज़ देर रात तक आती रहती। रसोई का नल भी चलता रहता। भले तारीख बदल जाए, उन्हें  किचन का सिंक साफ चाहिए।  इसके लिए भले ही कितनी भी देर तक काम क्यों न करना पड़े? बहू तो रात का खाना खाकर, किचन की कुछ औपचारिताएं निभाकर अपने कमरे में सोने चली जाती।  सरला को पता है उसके बेटे विवेक को बचपन से ताजा दही पसंद है। आज भी इन काँपते हाथों से गरम दूध  का पतीला उठा लेती है और उसे ठंडा भी करती है।  इस काम में उसकी उँगलियाँ नहीं जलती... दूध के ठंडे होने तक वह वहीं बैठती...उसे ठंडा होने पर उसमें जामन डालकर ही चैन की साँस लेती....अजी चैन की साँस कहाँ उसके नसीब में घड़ी सुइयां भी थक जाती होंगी लेकिन माँ थकती नहीं....थके भी कैसे वह माँ जो है। अपने परिवार की खुशियों का उसे सबसे ज्यादा ख्याल जो है।  देर रात तक बर्तनों की खटखटाहट से बहू –बेटे ही नींद खारब होती है।  बहू बेटे से कहती है.... “ तुम्हारी माँ को न खुद नींद आती है ना हमें चैन से सोने देती है, इन्हें तो रात मैं भी चैन नहीं पड़ता, प्लीज़ जाकर ये रोज़ –रोज़ के ढोंग बंद करवाओ कि  रात को सिंक खाली ही रहना चाहिए “।  पत्नी की बातें सुनकर बेटा माँ को समझाता है, पर माँ तो माँ है, बेटे की बातें सुनकर  मुस्कुरा देती है और झुकी कमर के सहारे अपने कमरे में सोने के लिए चली जाती है।  
 देर रात तक खड़े रहने के कारण उसकी कमर और घुटनों में दर्द होने लगता है।  इन सब कामों से निबटकर जब सोने अपने कमरे में जाती है तब उसे याद आता है कि  आज की दवाई तो ली ही नहीं .... फिर अपने माथे पर हाथ मारकर तकिये के नीचे रखी दवाई की शीशी से दवाई निकालती है और अपने मुँह में रखकर गटककर  पानी पी लेती है। पास ही मिस्टर मेहता जो कि अब तक एक पूरी नींद ले चुके होते हैं कहते हैं – “आ गई “
अपने दुबले –पतले पैरों को सहलाते, दबाते  हुए सरला जवाब देती है – “ हाँ, आज वैसे भी किचन में कोई ज्यादा काम तो था नहीं ।“       
मिस्टर मेहता को भी पता था कि किचन में काम था कि नहीं । वे भी सरला का उत्तर सुनकर करवट बदलकर फिर से अपने सपनों की दुनियाँ में लौट जाते हैं। उनके करवट बदलकर सो जाने के बाद सरला पलंग पर बैठी –बैठी अपने पैरों की, घुटनों की  तेल से मालिश करने में लग जाती है।  जो इतनी  देर खड़े रहने के कारण थककर चूर– चूर हो चुके थे। कुछ देर पैरों की मालिश करने के बाद बिस्तर पर लेट जाती है। लेटे –लेटे उसे कल सुबह की चिंता होने लगती है।  बेटे को क्या पसंद है ...क्या नहीं वह बखूबी जानती  है।  बेटे और परिवार की खुशियों का ध्यान रखते- रखते ही  जीवन व्यतीत हो गया।
चार साल बाद –
मिस्टर मेहता एक साल पहले इस संसार को छोड़कर बिदा हो चुके थे। अब सरला इस संसार में अकेली रह गई थी। मिस्टर मेहता के जाने के बाद से ही  घर की परिस्थितियाँ भी बदल चुकी थी। सरला के हाथों से घर की सत्ता उसकी बहू के हाथों में जा चुकी थी। सरला अपनी आँखों के सामने अपने बनाए नियम कानूनों  को टूटते नहीं देख पाती जिसके कारण आए दिन घर में सास बहू का गृह युद्ध होने लगा। सास बहू के इस युद्ध से विवेक भी तंग आ चुका था। उसने अपनी माँ को कई बार समझाया कि अब वो घर गृस्थी के कामों में अपनी टाँग  न अड़ाए। बेटे की बातें सुनकर उसका मन और आहत हो जाता। घर के झगड़ों  का असर उसके पूरे परिवार पर पड़ने लगा। आखिर एक दिन उसने इस समस्या का समाधान खोज ही लिया। क्यों न माँ को वृद्धाश्रम भेज दिया जाए? विवेक का उपाय उसकी पत्नी को भी पसंद आया। अगले ही दिन सरला को वृद्धाश्रम छोड़ने के लिए विवेक उसे लेकर वहाँ पहुँच गया। सरला वृद्धाश्रम देखकर समझ गई कि उसका लाल उसे इस आश्रम में छोड़ने आया है।  वह पढ़ीलिखी तो थी नहीं पर वहाँ के माहौल को देखकर ही समझ गई, उसे वह जगह भी कुछ जानी पहचानी सी  लगी। उसने तब भी विवेक से कुछ नहीं कहा जब वह उसे छोड़कर जाने लगा जाते समय बस उसने इतना ही कहा कि “अपना और बच्चों का ख्याल रखना” कहकर आश्रम के अंदर चली गई।              
विवेक बूढ़ी माँ  को वृद्धाश्रम  में छोड़कर वापस अपने घर खुशी खुशी लौट रहा था कि तभी उसकी पत्नी का फ़ोन आया  उसने कहा “अपनी माँ को ये भी कह दो कि त्योहारों पर भी घर आने की ज़रूरत नहीं । अब वे वहीं सुकून से रहें और हमें यहाँ सुकून से जीने दें”। 
पत्नी की बातें सुनकर विवेक  वापस मुड़ा और उस वृद्धाश्रम  में गया जहाँ अभी- अभी अपनी बूढ़ी माँ को छोड़कर वह खुशी–खुशी लौटा था। यहाँ आकर उसने देखा कि उसकी माँ वृद्धाश्रम के मैनेजर के साथ खुशी–खुशी बातें करने में व्यस्थ थी। वे दोनों ऐसे बैठे बातें कर रहे थे जैसे वर्षों से एक दूसरे को जानते हों।  यह देखकर बेटे ने मैनेजर से पूछा “सर  क्या आप इन्हें जानते हैं ?”।
मैनेजर ने उसकी तरफ एक नज़र देखा और एक ठंडी  साँस के साथ –“हाँ” कहकर वह चुप हो गया ।
हाँ सुनकर बेटे ने फिर एक और सवाल दाग दिया– “आप इन्हें जानते हैं ? पर आप इन्हें किस तरह और कब से जानते हैं” ?
इस बार मैनेजर के चेहरे पर एक अजीब से मुस्कुराहट थी।  उसने जवाब दिया जिसे सुनकर बेटे के पैरों तले की ज़मीन खिसक गई। मैनेजर ने मुस्कुराते हुए  कहा -“ आज से तीस साल पहले इस जगह पर ये वृद्धाश्रम नहीं, एक यतीमखाना हुआ करता था।  तभी मेरी मुलाकात इनसे और इनके पति से हुई थी”। 
यतीमख़ाने का नाम सुनकर विवेक चौक गया – “ यतीमखाना और यहाँ ”?
मैनेजर –“ हाँ ! यहाँ पहले यतीमखाना ही  हुआ करता था। मुझे आज भी वो दिन अच्छी तरह से याद  है  जिस दिन ये अपने पति के साथ  यहाँ से एक यतीम  बच्चे  को गोद लेकर गयी थीं। उस यतीम के सिर पर अपनी ममता का आँचल रखकर उसकी बदकिस्मती दूर की थी, उसे एक नाम और पहचान दी”। इतना कहकर मैनेजर वहाँ से चला गया। इससे पहले कि वह माँ से इस विषय में  कुछ कहता या पूछता माँ भी वहाँ से जा चुकी थी। इस समय उसके दिलो दिमाग में एक ही शब्द गूँज रहा था यतीम....यतीम...। वर्षों पहले जिस दाग को उसकी माँ ने अपने आँचल से पोंछकर साफ कर दिया था, आज उसी माँ को अपने निजी स्वार्थ के कारण  वृद्धाश्रम में छोड़कर  खुद को पुनः यतीम कर लिया ..... 

      

Saturday, February 20, 2016

मनहूस


कल देर रात तक चली पार्टी के बाद अमन को घर पहुँचते-पहुँचते रात के दो बज गए थे। घर आकर वह उसी हाल में सो गया जिस हाल में पार्टी से घर आया था। सारा दिन ऑफिस में भागा दौड़ी फिर पार्टी ने उसे पूरी तरह थका दिया था। जैसे ही वह बिस्तर पर लेटा उसे नींद आ गई। सुबह-सुबह पड़ौसी के फ्लैट से छोटे बच्चे के तेज़ चीख-चीखकर रोने के कारण उसकी नींद टूट गई। बिस्तर में लेटे लेटे ही उसने अपनी अलसाई पलकें खोलकर दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा, सवा नौ बजे थे। फिर उसे याद आया कि आज उसका मित्र हैदराबाद से आनेवाला है। पर वो तो दोपहर एक बजे आनेवाला है। उसने पैर फैला लिए। सर्दी के दिन थे उसने अपनी रज़ाई अपनी सिर की तरफ खींच ली रज़ाई का नरम स्पर्श महसूस करते हुए पड़ा रहा। नींद की मीठी खुमारी अब भी उस पर छाई हुई थी। कमरे की अधखुली खिड़की से चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ आ रही थी, अब तक वह पूरी तरह से जाग चुका था लेकिन अभी भी रज़ाई में ही लेटा रहा।  चाह रहा था कि फिर से नींद आ जाए लेकिन उस बच्चे के लगातार रोने की आवाज़ ने उसे उठने पर विवश कर दिया। उठकर वह ब्रश करने के लिए गया ही था कि दरवाज़े पर किसी की दस्तक सुनकर वह दरवाजा खोलने के लिए चला गया। दरवाजा खोला तो सामने शांता बाई को देखा। शांता उसके घर में पिछले चार साल से काम करने आती है। साड़े नौ बजे का उसका फिक्स टाइम है। भले सूरज दिखे ना दिखे पर साड़े नौ बजे शांता बाई दिख जाती, लेकिन आज उसे आने में देरी हो गई। शांता उम्र के अंतिम पड़ाव पर है पर उसके आगे जवान से जवान स्त्री भी काम के मामले में हार जाती है। शांता घर में आकर अपने काम में लग गई और अमन अपने ब्रश करने में लग गया। ब्रश करके वह अपने कमरे में टीवी देखने चला गया, थोड़े देर में शांता ने उसे गरमागरम चाय लाकर दे दी। सर्दी के के दिन में अगर गरमागरम चाय मिल जाये तो क्या कहना। उसने चाय ली और चाय की चुस्की लेते –लेते टीवी देखने लगा। टी वी देखेते हुए उसने शांता से आज देरी से आने के कारण पूछा। 
अमन – “आंटी आज आप देरी से आई... क्या बात है सब ठीक तो है”?
शांता – “ भैया आज हमारे गाम में एक बच्चा पैदा हुओ ....वा के पैदा होने के कुछई घंटों में वा की दादी खतम है गई .....घर वालेनने ऊ लड़का मनहूस कहकर पानी में डुबाकर मार दियो। इस की पूरे गाम में चर्चा है रही है कि कैसो मनहूस हो जो आते ही अपनी दादीए खा गयो”......कहकर वह वहाँ से चली गई और अपने झाड़ू –पोछा करने में लग गई।  कुछ देर बाद वह अपना काम खत्म करे चली गई। लेकिन उसकी कही बातें उसके मन में घर कर गई। बार बार उसे एक ही शब्द याद आ रहा था मनहूस ....मनहूस ...यह बात उसे तीर की तरह चुभ रही थी। आज उसे कुछ धुँधला धुँधला सा नजर आने लगा था। इन्हीं शब्दों  को सोचते सोचते उसकी आँखों से आँसू बहने लगे.... अपना सिर बैड के सिरहाने रखी तकिया में गाढ़कर रोने लगा……। कुछ देर रोने के बाद शांत हुआ, फिर न जाने किन ख़यालों में खो गया।
उन शब्दों को सुनकर उसे कुछ को सोचते सोचते उसे नींद आ गई। कुछ देर बाद उसने अपने आप को एक शादी में पाया, यह उसके चाचा के बड़े लड़के की शादी थी। घर मेहमानों से खचाखच भरा हुआ था। माँ के लाख माना करने के बाद भी वह इस शादी में आया था। यहाँ आकार वह अंजान सा एक कोने में बैठा था। तभी उसका  चचेरा भाई उसे घर में अंदर ले जाने के लिए आया। वह उसके साथ चला गया।  घर में जब लोगों को पता चला कि वह अमन है। लोगों ने उससे बात तक न की उसे किसी भी काम से हाथ नहीं लगाने दिया। वहाँ के लोगों के उसके साथ जो व्यवहार किया उससे वह हातात हुआ। वहाँ से वह सीधा अपने घर गया । घर जाकर उसने अपनी माँ से इस विषय में बात की ...उसने इस प्रकार के व्यवहार के बारे में अपनी माँ से पूछा। पहले तो माँ उसे टालती रही। अंत में उसकी ज़िद के आगे उसने उसे वह राज़ बता दिया जिसे उसने पिछले बीस सालों से अपने सीने में दबाकर रखा था। क्यों वह उसे वहाँ या और किसी भी रिश्तेदार के यहाँ जाने से रोकती थी? क्यों आज तक उसने उसका उसका जन्मदिन नहीं मनाया? माँ के उसे बताया –
माँ –“तू जानना चाहता है कि ये सब लोग तुझसे क्यों बात नहीं करते? उन लोगों की नज़रों में तू          मनहूस है ...मनहूस
अमन – मनहूस.....और मैं...पर क्यों मैंने ऐसा क्या कर दिया.....मैं तो कल पहली बार उन लोगों  
       से मिला ?
माँ – पर तू वहाँ गया क्यों ? मैंने तुझे  माना किया था ना .....? तू जानना चाहता है ना कि इस उन लोगों ने तुझसे बात  क्यों नहीं की और क्यों मैंने तुझे अपने से बीस साल दूर रखा....? बीस साल पहले जब तू पैदा हुआ तेरे पैदा होने की खबर सुनकर तेरे पापा बहुत खुश थे।खुश क्यों न होते उनके मन की मुराद जो पूरी हो गई थी और वैसे भी तीन बेटियों के बाद तुझे पाया था। तुझे पाकर वे फूले नहीं समा रहे थे। तेरे पैदा होने की खुशखबरी उन्होने अपने सभी दोस्तों रिश्तेदारों में बता दी थी। उस दिन तेरे पापा और तेरी दादी मेरे साथ अस्पताल में ही थे। डिलेवरी के बाद जब डॉक्टर ने मुझे कमरे में शिफ्ट कर दिया तब तेरे पापा घर से तेरे लिए कपड़े लेने के लिए गए थे। वे गए तो कपड़े लेने के लिए थे लेकिन वापस नहीं लौटे, घर जाते समय एक कार के ब्रेक फेल हो गए थे उसी कार की चपेट में तेरे पापा आ गए उनकी मौके पर ही......कहकर उसकी माँ की आँखों से आंसुओं की धार बहने लगी....माँ रोती जाती और कहती जाती। तेरे पैदा होने के चार-पाँच घंटों के बाद ही तेरे सिर से तेरे बाप का साया छिन गया। तेरे पापा की मौत का कारण तुझे ही समझा, कि तेरे पैदा होते ही उनके घर का चिराग बुझ गया। घरवालों ने तुझे मनहूस समझकर मारने की कोशिश की लेकिन मैंने ऐसा न होने दिया.... पति को तो खो चुकी थी मैं.....लेकिन तुझे पाकर नहीं खोना चाहती थी। मैंने तुझे उन लोगों से कैसे बचाया ये तो मैं ही जानती हूँ .....अगर तेरे सुरेश चाचा न होते तो शायद आज तू मेरे सामने न खड़ा होता”
अमन – “सुरेश चाचा.....”?
माँ – हाँ उस दिन उन्होने ही मेरा साथ दिया। पूरा घर एक तरफ और मैं और तेरे चाचा एक तरफ। मुझ में तो इतनी ताकत भी न थी कि तुझे लेकर बाहर भी जा सकूँ। मैं तो अस्पताल में बिस्तर पर पड़ी थी। तुझे बचाने के लिए मैंने तुझे सुरेश को सौप दिया। वे ही तुझे अपने साथ लेकर यहाँ आए। जब मैं चलने –फिरने की हालत में हुई तो मैं अपनी बच्चियों को लेकर उस घर को छोड़कर यहाँ आ गई”।
माँ की बातें सुनकर अमन के पैरों तले की ज़मीन खिसक गई ......उसे लगा जैसे वही मनहूस है जो अपने पैदा होते ही अपने बाप को खा गया। उसे अपने आप पर गुस्सा आ रहा था।  इसी गुस्से में उसने इतनी बुरी तरह से बाल नौच डाले कि सिर से खून बहने लगा.... जैसे तैसे माँ उसे अस्पताल लेकर गई और उसका इलाज़ करवाया। वह माँ से कुछ कहना चाहता था ..... कि उसके सेल फोन की घंटी बजने लगी। घंटी की आवाज सुनकर उसकी आँखें  खुल गई। अपने आप को बिस्तर पर देखकर वह हक्का – बक्का रह रह गया ....ओह ये सपना था”। उसने फोन उठाकर देखा तो उसके दोस्त का कॉल था जो हैदराबाद से आने वाला था। 
अमन – “हैलो भाई ....हाँ भाई ...कहाँ पहुंचा”
मित्र –“अबे...मैं स्टेशन पर हूँ....कब से तेरा फोन लगा रहा हूँ.....तू है कि फोन उठा ही                           नहीं रहा ....कहाँ है तू....”?
अमन – “ क्या ...तू पहुँच गया...?” कहकर उसने दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा ... घड़ी में     एक बजकर बीस मिनट हो चुके थे। 
मित्र – “ हाँ ....पहले तू ये बता तू है कहाँ....? तू आ रहा है ना मुझे लेने के लिए”?
अमन – “ओह. आइ एम सौरी, भाई....बस आधे घंटे में मैं पहुंचता हूँ ....वेट देयर”। कहकर उसने फोने काट दिया।
अमन बिस्तर से उठकर  सीधा गुसलखाने (बाथरूम ) में गया। नींद पूरी न हो पाने के कारण उसकी आँखें जल रही थीं। ठंडे पानी से मुँह धोया और पास ही टंगी तौलिये से मुँह पोंछते हुए गुसलखाने से बाहर निकल आया। बाहर आकर आईने में अपने आप को देखता रहा, कुछ देर  अपने आपको देखते हुए उसने एक लंबी सांस ली…….. और  तैयार होकर अपने मित्र को लेने रेलवे स्टेशन चला गया .....