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Monday, March 22, 2010

रहीम के दोहे

1. एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अगाय॥

भावार्थ :- प्रस्तुत दोहे में रहीम ने मनुष्य की ईश्वर के प्रति भक्ति भाव को अपने इस दोहे के माध्यम से अभिव्यक्त किया है कि यदि मनुष्य एक ही ईश्वर अर्थात परब्रह्म की उपासना करे तो उसके सभी मनोरथ पूरे हो सकते हैं। यदि वह अपने आप को और अपने मन को स्थिर न रखते हुए कभी किसी देवी-देवता तो कभी किसी देवी - देवता को पूजेगा तो उसकी मनोकामना कभी पूरी नहीं हो पाएगी और वह व्यर्थ ही दुखी रहेगा, इस तरह उसका कल्याण भी नही होगा।

यह सब उसी प्रकार है जैसे कोई माली पेड़ की जड़ को सीचता है तो वह पेड़ फलता - फूलता है । यदि माली पेड़ की जड़ के स्थान पर उसकी पत्तियों , डालियों, फूलों की पंखुड़ियों आदि को अलग-अलग सींचता रहेगा तो एक दिन वह पेड़ सूख जाएगा, नष्ट हो जाएगा । यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि हमें सदैव मूल को ही सींचना चाहिए तभी सही फल की प्राप्ति हो पाएगी।

2.रहिमन वे नर मर चुके, जे कछु माँगन जाहिं ।
उनते पहले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं।।

भावार्थ: - रहीम इस दोहे के माध्यम से हमें कह रहे हैं कि वे लोग जो किसी से कुछ माँगने जाते हैं , उन्हे रहीम मरे हुए के समान मानते हैं। लेकिन माँगने वाले व्यक्ति से पहले वे लोग मर चुके होते हैं जिनके मुख से याचक को देने के लिए कुछ नहीं निकलता । अर्थात माँगना तो बुरी बात है ही लेकिन उससे भी बुरी बात तो यह है कि कोई आपसे कुछ माँग रहा है और आप उसे दुत्कार कर भगा देते हो। वे लोग तो उस व्यक्ति से पहले ही मर चुके होते हैं जिनके मुख से ना निकलती है।

3.रहिमन पानी राखिए,बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे , मोती, मानुष , चून ।।


भावार्थ :- प्रस्तुत दोहे में रहीम ने पानी शब्द का तीन बार प्रयोग किया है । यहाँ पानी शब्द के तीन अलग-अलग अर्थ स्पष्ट होते हैं । पानी( जल का रूप), पानी (आभा, चमक),पानी (मान,इज्जत) ।
रहीम कहते हैं कि पानी संसार में प्रत्येक जीव के लिए अतिआवश्यक है। बिना पानी के संसार में जीवन ही नहीं होगा । इसलिए पानी का जीवन व प्रकृति के सभी पदार्थों के लिए वहुत महत्त्व है। मनुष्य को पानी रखना चाहिए अर्थात अपनी मान-मर्यादा,प्रतिष्ठा को सदैव बनाए रखना चाहिए। यदि उसकी कोई प्रतिष्ठा ही नही होगी तो उसका जीवन इस संसार में बेकार ही है। जैसे बिना चमक के मोती की कोई कीमत नही होती और ना ही ऐसे मोती अर्थात बिना चमक के मोती को कोई खरीदना चाहता है । ठीक उसी प्रकार बिना पानी के चून(आटा ) का कोई महत्त्व नही रह जाता क्योकि कोई भी व्यक्ति सूखा आटा नहीं खा सकता इसलिए बिना पानी के आटा भी किसी काम का नहीं रह जाता ।


4.जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो करै, बढ़े अँधेरो होय ।।

भावार्थ इस दोहे का माध्यम से रहीम हमें दीपक और सुपुत्रों की जानकारी दे रहे हैं। रहीम कहते है कि सुपुत्र और दीपक की स्थिति एक समान होती है। जब दीपक जलता है तो उसके जलने से चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश फैल जाता है और जब बुझ जाता है तो चारो तरफ अंधेरा छा जाता है। ठीक उसी प्रकार जिस घर में सुपुत्र होता है , उस घर की कीर्ती यश चारो फैलता है और जब सुपुत्र उस घर या कुल से चला जाता है तो वह घर सूना -सूना हो जाता है। दीपक और सुपुत्र अपने कार्यों से संसार में चारों तरफ अपनी कीर्ती स्थापित करते हैं।



5. तरुवर फल नहिं खात है,सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित ,संपति सँचहि सुजान।।


भावार्थ रहीम इस दोहे के माध्यम से हमें परोपकारी व्यक्तियों के बारे में बता रहे हैं। रहीम कहते हैं कि इस संसार में स्वार्थ के लिए तो लगभग सभी लोग जीवित रहते हैं । किन्तु जो लोग दूसरों के लिए जीते है वे ही महान हैं। जो लोग परोपकार के लिए जीवित रहते हैं उनसे बड़ा महान इस संसार में और कोई नहीं। मानव धर्म भी हमें यही सिखाता है कि हमें परोपकार करना चाहिए।

रहीम हमें बताते हैं कि सज्जन मानव ही इस संसार में परोपकार के लिए जीवित रहते हैं। इस परोपकार के लिए उन्होंने हमे बताया है कि जिस प्रकार पेड़ कभी भी अपना स्वयं का फल नहीं खाता और सरोवर कभी अपना स्वयं का जल नहीं पीता । ये तो सदैव दूसरो के हित के लिए ही कार्य करते हैं यही है निस्वार्थ परोपकार ये सदैव परोपकार के लिए ही जीवित रहते हैं और सदैव परोपकार के लिए ही संपदा को इकट्ठा करते हैं। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति अपनी ही स्वार्थसिद्धि के लिए आय का थोड़ा - बहुत अंश दान देता है इसमें कोन सी बड़ाई की बात है । बड़ाई की बात तो वह है जो निस्वार्थ परोपकार के लिए ही जीवित रहता हो।


6. टूटे सुजन मनाइए , जो टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि-फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार।।


भावार्थ:- रहीम इस दोहे के माध्यम से हमें प्रियजनों के महत्त्व को बता रहे हैं। रहीम कहते हैं कि जब भी कोई हमारा अपना प्रियजन हमसे रूठ जाए तो उसे मना लेना चाहिए, भले ही हमें उसे सौ बार ही क्यों ना मनाना पड़े ,प्रियजन को अवश्य ही मना लेना चाहिए। रहीम जी प्रियजनो का उदाहरण मोतियों से देते हुए बताते हैं कि जिस प्रकार टूटे हुए मोतियों की माला के बार-बार टूटने पर भी हर बार मोतियों को पिरोकर हार (माला) बना लिया जाता है। यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति की शोभा उसके प्रियजनों से ही होती है। जिस प्रकार हार गले में पहनने के बाद ही शुशोभित लगता है।


7. जे गरीब सों हित करें ,ते रहीम बड़ लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग।।


भावार्थ :- रहीम ने इस दोहे के माध्यम से हमें बड़े व महान लोगों के विषय में बताने का प्रयास किया है। रहीम कहते हैं कि जो व्यक्ति गरीवों के हितों का ख्याल करता है या उनकी हर संभव सहायता करता है वही महान या बड़ा होता है , जो व्यक्ति केवल अपना ही स्वार्थ ( भला) सोचते हैं ऐसे लोग स्वार्थी होते हैं। ऐसे लोग कभी भी किसी का भला नहीं कर सकते वे तो सदैव अपने स्वार्थों की सिद्धीके लिए ही सोचते रहते हैं वे कभी किसी की भलाई के बारे में सोचते ही नहीं ।

यहाँ पर रहीम जी ने कृष्ण और सुदामा का उदाहरण देते हुए बताया है कि सुदामा एक गरीब ब्रााहृण था । उसके पास धन-दौलत नहीं थी । जबकि श्रीकृष्ण द्वारिका के राजा थे वे तो सदा से ही वैभवशाली थे। दोनो की मित्रता विद्यार्थी जीवन गुरु सांदीपन के यहां हुई थी दोनो ने साथ-साथ शिक्षा ग्रहण की थी । दोनों में घनिष्ट मित्रता थी , श्रीकृष्ण ने अपने मित्र सुदामा की सहायता कर उसे भी ऐश्वर्य प्रादान कर अपने जैसा बना लिया था। इसीलिए तो वे आज भी महान व पूजनीय हैं। दोनों की मित्रता के गुणगान आज भी बड़े आदर के साथ किए जाते हैं।



8. रहिमन ओछे नरन ते, भलो बैर ना प्रीति।
काटे-चाटे स्वान के, दुहूँ भाँति बिपरीति।।


भावार्थ :- इस दोहे में रहीम ने दुष्टजनों के बारे में बताने का प्रयास किया है । रहीम जी कहते हैं कि दुष्टजनों किसी भी प्रकार का व्यवहार उचित नहीं होता चाहे वह मित्रता हो या शत्रुता। इसके लिए उन्होंने कुत्ते( श्वान) का उदाहरण देते हुए कहा कि कुत्ता चाहे क्रोध से काटे या फिर प्रेम से हमारे तलवे चाटे , उसकी ये दोनों ही क्रियाएं हमारे लिए कष्टप्रद होती हैं। इसीलिए वे कहते हैं कि हमें इस प्रकार के लोगों से सदैव दूरी बनाए रखनी चाहिए। इस प्रकार की दूरी से दोनो का ही भला होगा ।

9. जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष ब्यापत नहीं , लिपटे रहत भुजंग।।


भावार्थ : - इस दोहे में रहीम ने सज्जन लोगों की प्रबल इच्छा शक्ति व सज्जनता के महत्त्व को बताने का प्रयास किया है, साथ ही दुष्टों के व्यवहार को भी अभिव्यक्त किया है । रहीम कहते हैं कि सज्जन व्यक्ति को कभी भी अपनी सज्जनता नहीं छोड़नी चाहिए । उन्होने सर्प और चंदन के वृक्ष के माध्यम से हमें यह बात स्पष्ट करते हुए बताया है कि चंदन के वृक्ष पर विषैले सर्प लिपटे हुए रहते हैं । सर्प चंदन के वृक्ष पर अपना विष छोड़ते हैं किन्तु चंदन के वृक्ष पर उस विष का कोई प्रभाव नहीं पड़ता । वह तो अपने गुणों अर्थात सुगंध व शीतलता का कभी त्याग नहीं करता । परंतु सर्प चंदन वृक्ष का साथ पाकर भी अपना स्वभान नहीं छोड़ता । अर्थात दुष्ट व्यक्ति सज्जन व्यक्ति के साथ कितने भी दिन क्यों न रह ले वह कभी भी अपने दुष्टता के स्वभाव को नहीं बदल सकता।




10. रहिमन जिह्वा बाबरी, कह गई सरग -पताल।
आपु तु कहि भीतर गई, जूती खात कपाल।।


भावार्थ - इस दोहे में रहीम सोच-समझकर बोलने के महत्त्व को बता रहे हैं। रहीम कहते हैं कि व्यक्ति को सदैव सोच-समझकर ही बोलना चाहिए । उलटा -सीधा या कड़वा नहीं बोलना चाहिए ,कड़वा बोलने का परिणाम सदैव दुखद ही होता है। इस बात को स्पष्ट रूप के बताते हुए कहते है जीभ तो बावली है, कुछ भी उलटा-साधा, अंट-शंट बोलकर मुख के अंदर जाकर छिप जाती है । लेकिन उसके कटु वचनों का परिणाम सिर को भुगतना पड़ता है। लोग सिर पर ही जूतियाँ बरसाते हैं। जीभ का कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ पाते । इसलिए व्यक्ति को सदैव संयमित वाणी से ही बोलना चाहिए। सदैव सोच-समझकर ही बोलना चाहिए ।

12 comments:

  1. बहुत बहुत आभारी हैं आपके, एक पोस्ट पर रहीम के रतन व्याख्या सहित सजा दिये।
    शिवकुमार जी, रहीम जी का एक किस्सा है जिसमें उन्होंने कहा था कि ’देनदार कोई और है, देत रहत दिन रैन,
    लोग भरम मोपे करें ताते नीचे नैन’ ये जवाब था और प्रश्न क्या था अगर ये बता सकें तो फ़िर से आभारी हो जायेंगे आपके:)
    मुझे एक पंकित ध्यान आती है, ’ज्यूँ ज्यूं कर ऊंचो उठे, त्यूँ त्यूँ नीचे नैन’

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  2. बहुत सुन्दर ब्याख्या...
    रहीम के दोहे मुझे बचपन से पसंद है..गूढ़ से गूढ़ जीवन दर्शन सरल शब्दों में
    आभार

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  3. बहुत बहुत आभार आपका .....रहीम के दोहे को इतना सरल शब्दों में भावार्थ करने को....

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  4. This comment has been removed by the author.

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  5. Replies
    1. shiva g, aapne raheem ke ek mahatvpoorn dohe me kapoot shabd ka arth kapoot kis aadhaar par kiya hai. kripya batayen?

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  6. shiva g, aap baare aur badhe shabd se bhramit huye hain isi kaaran yh vyakhya galat ho gai hai aur aapne kapoot ko sapoot ke arth me le liya hai. raheem ke shabd to moti kee tarah ekdm spasht hain, unme is prakaar ke arth bhrm kee gujaaish bilkul nahi hai.

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  7. aapne 5 no. ke dohe ki poori vyakhya nahi kee hai. isi prakaar sujan shabd ka arth aapne priyjan kar diya hai. is se to dohon ke arth hi badal gaye hain. 9 no. ke dohe kee vyakhaya ko bhi punh dekhne kee zaroorat hai kyounki is dohe me raheem uttam prakriti ke logon ko salaah nahi de rahe hain blki unki prakrti ke vishay me bata rahe hain. sujan chahe jis sthiti me rahen unke mn me fark paida nahi hota. ve to chandan ke vriksh ke samaan hote hain. jinki sugandh se vishdar bhi prabhaavit hota hai kintu ve uske vish se aprbhaavit rahte hain.
    yahan uttam prakriti ke longon ko sthit pragya ke arth me raheem ne liya hai.

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  8. This comment has been removed by the author.

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  9. kya fayada ese gyaN KA JISKA UPYOG VIDYALAYA K CHHATR CHHATRAYE APNI PRESENTATION K LIYE UPAYOG NAHI KAR PAYE DON'T COPY WHAT THE HELL YOU ALSO COPIED FROM ORIGINAL ONE HUUUUUUUUUUUUURRRRRRRRRRRR

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  10. mujhe kuch dosti par dohe chahiye mujhe email kare dhandanmol@gmail.com thank you

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