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Wednesday, September 30, 2009

वक्त

कहते हैं हर मर्ज की दवा कर देता है वक्त
एक बार गए लोगों को भुला देता है वक्त ।
जब दोस्ती की कोई भूली दास्तान सुनाएगा वक्त
हमें भी कोई अपना शक्श याद आएगा उस वक्त
जीवन के हर गम को हम भूल जाएंगे
जब दिल को याद तुम्हारी आएगी
वक्त से हाल तुम्हारा जान लेंगे।
दिल की यादों में तुम्हें बसाकर रखा है
जब -जब याद तुम्हारी आएगी
छूकर तुम्हें आई हवा से हाल तुम्हारा जान लेंगे
पाकर स्पर्श उस हवा का
तुम्हारे पास हेने को महसूस करेंगे।
जब साथ गुजारे पल जब याद आएं
तो आँखे अपनी बंद कर याद मुझे कर लेना
हर सांस बनकर साथ तुम्हारे हो लुंगा
अगर इतना भी न कर सको तो
अपने होठों पर एक मुस्कान ला देना ।
तुम्हारी एक मुस्कराहट बनकर साथ तुम्हारे हो लुँगा।
मत सोचो कि साथ है कितने दिन का
साथ नहीं जीवन भर का ,न सही
जीवन साथ न गुजार सके तो क्या
इस पल को तो तुम्हारे साथ जी लेने दो।
अगर दे सकूं कोई मुस्कराहट तुम्हें जीवन में
जीवन का क्या भरोसा , आज यहाँ तो कल कहाँ
कल की बात को तुम कल में ही रहने दो
आज के वक्त को तो साथ जी लेने दो
कल न जाने ये वक्त कहाँ ले जाए
आज तो हँसकर जी लेने दो।

Tuesday, September 29, 2009

"एक माँ ऐसी भी"

माँ शब्द सुनते ही हमारे सामने एक ममतामयी मूर्ति का रुप उभरकर सामने आ जाता है । ईश्वर ने सृष्टि की रचना की थी तब उसे अहसास हुआ कि मैं अपनी सृष्टि के प्रत्येक प्राणी के पास नहीं जा सकता , उसकी सहायता नहीं कर सकता इसीलिए उसने माँ को बनाया । जो कार्य ईश्वर नहीं कर पाया उसे माँ करती है । माँ गीले में सोकर अपने बच्चों को सूखे में सुलाती है । स्वयं भूखी रहकर बच्चों का पेट भरती है । माँ की ममता का कर्ज मनुष्य जीवन भर नहीं चुका सकता । माँ को कितने भी बच्चे क्यों न हों वह कभी अपने बच्चों में कोई भेद - भाव नहीं करती । उसके लिए तो सभी बच्चे समान होते हैं। शायद इसीलिए कहा जाता है कि “पूत कपूत हो सकते हैं लेकिन माता कभी कुमाता नहीं हो सकती लेकिन .......।”
मैं घर में बैठा था कि फोन की घंटी बजी। मैंने फोन उठाया –‘हैलो’
‘हैलो -भैया’
‘हाँ , सुमन,कैसी है?
‘हाँ ठीक हूँ’। ‘घर में सब ठीक हैं?’ ये शब्द सुनकर सुमन का गला भर आया । भरे गले से बोली ‘हाँ ,सब ठीक है।
मुझे उसकी आवाज में किसी दुख की दस्तक सुनाई दे रही थी । मैंने उससे फिर पूछा -
‘सुमन, क्या बात है?
‘कुछ नहीं। बस, ऐसे ही आप लोगों से बात करने का मन कर रहा था इसलिए फोन कर लिया।’
उसकी आवाज उसके शब्दों का साथ नहीं दे रही थी । लग रहा था कि अवश्य कोई घटना घटित हुई है जिसे वह बता नहीं रही है।
मैंने फिर पूछा, ‘सुमन आखिर बात क्या है तुम उदास सी क्यों लग रही हो?’
‘नहीं, भैया। ऐसी कोई बात नहीं है।’
‘अरे! ऐसी नहीं तो कैसी बात है ? आखिर बात क्या है ? बात तो बता । सुनकर सुमन रो पड़ी ।
मैंने कहा – ‘अरे पगली बात क्या है तू रो क्यों रही है ?’
‘क्या बताऊँ भैया ? बात ही कुछ ऐसी है।’
‘इधर -उधर की बातें क्यों कर रही है ? साफ-साफ बता आखिर बात क्या है ?’
‘आज शाम दिनेश के पापा (सुमन का पति) और उनके भाईयों में आपस में झगड़ा हो गया ।’
‘किस बात पर ?’ मैंने पूछा
‘बात क्या ! एक तो हमारी चीज़ ले जाते हैं और वापिस लाकर भी नहीं रखते । उनसे माँगो कि भाई फलाँ चीज़ कहाँ है तो कोइ सीधे मुँह जवाब ही नहीं देता ,सीधे लड़ने को आते हैं। कल शाम की ही बात है दिनेश के पापा खेत जोतने जाने वाले थे । ट्रैक्टर की साहिल की कड़ी दिखाई नहीं दे रही थी , उन्होंने अपने भाईयों से पूछा तो उन्होंने उलटा -सीधा जवाब दिया । इसी बीच उनके बीच कहा- सुनी हो गई। कहा-सुनी तक तो ठीक था , लेकिन बात कहा -सुनी से लड़ाई तक आ गई । वे तो तीनो-चारो भाई एक हो गए और हम अकेले । आपस में खूब लड़ाई हुई ,तीनों- चारोंे भाईयों ने मिलकर इन्हें खूब मारा है। सिर में चोट लग गई है । खूब खून बहा है ।’
‘आखिर जरा सी बात के लिए लड़ने की क्या ज़रूरत थी ?’
‘अब क्या बताऊँ भैया जब से हमारा बुड्ढा (ससुर) मरा है ,तब से लेकर अब तक ये लोग सारे खेतों को जोतते - बोते आ रहे हैं । जो खेत हमारे हिस्से में आने थे, उन्हे भी ये ही लोग जोतते -बोते आ रहे हैं । हमारे हिस्से के खेतों को भी हमें नहीं दे रहे हैं । बुड्ढे ने अपने जीते जी जो कुछ सामान था इन सब में बांट दिया था ,हमारे हिस्से में ट्रैक्टर और उसकी मशीनरी हमारे (दिनेश के पापा ) के नाम की थी । जब तक बुड़ढा जिन्दा था सबने इस ट्रैक्टर की खूब ऐसी - तैसी की , बुड्ढेे के मरने के बाद जब ट्रैक्टर खराब हो गया तो सब ने उसे खटारा कहकर बेचने की बात शुरू कर दी दिनेश के पापा ने जब यह सुना तो साफ मना कर दिया ‘मैं ट्रैक्टर नहीं बेचने दूँगा ।’ इस पर उनके भाई कहते हैं – ‘बेचेगा नहीं तो इसे बनाने के लिए तेरे पास पैसे हैं क्या ? आया बड़ा नहीं बेचने वाला । इस खटारा को बेचकर दूसरा नया ट्रैक्टर लेंगे।’ ‘नहीं, मैं इसे नहीं बेचने दूँगा । भले ही आज मेरे पास पैसे हो या न हों ,भले ही यह खटारा बनकर ही क्यों न खड़ा रहे , मैं इसे नहीं बेचने दूँगा ।’
तेरी सास कुछ नहीं कहती ? वह नहीं समझाती उन सब को ? मैंने पूछा।
‘हूं ! सास ? सास ही तो इन सब फसादों की जड़ है। यह सब उसी का किया -कराया तो है । वही तो नहीं चाहती कि हम शांति से जीएं।’
‘क्या बात कर रही हो ?’
‘हाँ भैया ! मैं सच कह रही हूँ । आज - कल वह मझले बेटे के पास रह रही है । उसी ने उसके कान भर रखे हैं । एक तो वे लोग और दूसरी सास ये ही तो नहीं चाहते कि हम सुख-शांति से जीएँ । आजकल सभी हमारे खिलाफ हो रखे हैं ।
‘ये सब तुम लोगों के खिलाफ क्यों हो रखे हैं ?’ मैने पूछा
हम उनके सामने हाथ नहीं फैलाते । उनके सामने छोटी- छोटी चीज़ के लिए नहीं जाते । उन्हें इस बात का ज्यादा मलाल है कि हमने ट्रैक्टर बेचने नहीं दिया। उन्हें दिन-रात इसी की जलन रहती । एक दिन तो खुद मेरी सास ही कह रही थी कि इस ट्रैक्टर को बेच कर दूसरा कोई नया ट्रैक्टर ले लो । दिनेश के पापा ने साफ मना कर दिया कि मैं इसे नहीं बेच रहा । अक्सर इसी ट्रैक्टर के पीछे चारोंे - पांचों भाईयों मे कुछ न कुछ कहा सुनी होती रहती है ।
उस शाम इसी ट्रैक्टर के लिए चारो-पांचों भाइयों में कहा सुनी हो गई , दिनेश के ताऊ कहा सुनी से गाली - गलोज पर उतर आए – “अरे कुत्ते तू तो हमारे खानदान में एक धब्बा है, धब्बा । तू तो किसी अनसूचित जाती का बीज है ।” नालायक को जरा भी शरम हया नहीं है।
‘यह सब सुनकर तेरी सास ने कुछ नहीं कहा ?’ - मैने पूछा
‘नहीं , भैया उस बेशरम को अगर थोड़ी बहुत भी शरम होती तो वह तभी अपने बेटे को रोककर कहती कि आखिर तू कह क्या रहा है, गाली किसे दे रहा है, अपने भाई को या मुझे,मेरे चरित्र को ?’
‘यह तो बड़ी शरम की बात है कि तेरी सास यह सब चुपचाप बैठी सुन रही थी । उसे जरा भी अहसास नहीं हुआ कि आखिर ये कह क्या रहा है।’ इससे बड़ी शरम की बात और क्या होगी कि उसी का बेटा, उसी के बेटे को अप्रत्यक्ष रूप से नाजायज ठहरा रहा है और वह बैठी - बैठी चुपचाप सुन रही है- मैने कहा
‘उसे तो दिनेश के पापा से तनिक भी लगाव नहीं है । जब से मैं इस घर में ब्याह कर आई हूँ तब से तो मैं यही देखती आ रही हूँ। मेरी सास को अपने अन्य बेटों से अधिक लगाव है ,वह सदैव उन्हीं का साथ देती है, भले वे गलत ही क्यों न हों । जब से ससुर मरे हैं सब ने अपने - अपने हिस्से के खेत बांट लिए है लेकिन जो हमारे हिस्से में आने वाले हैं वे भी हमें नहीं मिले है, उन्हें भी वे ही लोग जोतते -बोतेे हैं , हमारे हिस्से के खेतों को भी हमें नहीं दे रहे हैं । इतना सब कुछ होने पर भी हमने कभी भी उन लोगों से जाकर अपना हिस्सा नहीं माँगा , कहने को तो इतना बड़ा घर है लेकिन हम एक छोटे से कमरे में अपने बच्चों को लेकर रह रहे हैं । हमने उन लोगों से कभी कोई शिकायत नहीं की ,यही सोचकर संतोश कर लेते हैं कि आप लोग जिस में खुश रहें वैसा ही ठीक है। हम दिन -रात कमर तोड़ मेहनत करके एक -एक पैसा कमाते हैं , वह भी उनकी नजरों में खटकता है। दूसरों की कमाई हजारो - लाखों की है वह किसी को दिखाई नहीं देती । दिखता तो केवल हमारा कमाना है.............. । हमारे भी बच्चे हैं । हमें भी अपने बच्चों के भविष्य को बनाना है उन्हे अच्छी शिक्षा दिलवानी है , उसके लिए हम लोग दिन- रात मेहनत करते हैं । यह सब उनकी आँखों में खटकता है कि इसके बच्चे अच्छे स्कूल में क्यों जा रहे हैं ? क्यों ये लोग हमारे सामने भीख नहीं माँगते ? क्यों नहीं आते हर चीज़ माँगने के लिए ? आखिर इन लोगों के पास इतना पैसा कहाँ से आ रहा है जो ये लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम स्कूल में पढने भेज रहे हैं ।’
“तो ,उन्हें इन सब बातों से क्या करना ?” मैने पूछा
“करना - करना क्यों नहीं है ? वे चाहते हैं कि हम सदा उनकी जूतियों के नीचे दबे रहें । वे लोग जो कहे, जैसा कहें यदि हम वैसा करते हैं तब तो सब कुछ ठीक है । नहीं तो हम नालायक है , कुत्ते हैं , किसी अनसुचित का बीज हैं ।”
“यह तो कोई बात नहीं हुई कि वे जैसा कहें तुम वैसा ही करो, यह तुम लोगों की निजी ज़िन्दगी है, तुम जैसा चाहो वैसे रहो ,उन्हें तुम लोगों की निजी जिन्दगी में दखल देने का क्या अधिकार ? तुमने कभी अपनी सास से इस बारे में बात नहीं की कि माँ ये लोग हमारे साथ क्यों इस तरह का व्यवहार करते हैं । हम भी तो आप ही के बच्चे हैं । जैसे वे आपके हैं । आप क्यों यह अन्याय होते हुए देख रही हैं?” मैने कहा
“भैया उनसे मैंने कई बार बात की, उन्हें सदा हमारी ही गलती नज़र आती है, वही नहीं चाहती कि हम सुख-शांति से जिएं । बात-बात पर ताने मारती है । हमेशा जली - कटी सुनाती रहती है। उसे न तो हमसे कोई लगाव है न ही हमारे बच्चों से । वह तो हमारे बच्चों तक को कोसती रहती है। हमारे बच्चे तो उसे फूटी आँख नहीं सुहाते । दूसरों के बच्चों को तो दिन-रात लाड़ लड़ाती रहती है और हमारे बच्चों को......................?”
“यह तो बड़ी अजीब बात है कि कोई माँ अपने बच्चों में इतना फर्क कर सकती है। अब तक तो सुना था कि माँ अपने बच्चों में कोई फर्क नहीं करती । भले ही वह किसी बच्चे को ज्यादा लाड़ लड़ाती है लेकिन यदि कोई उसके बच्चों को मारे -पीटे तो वह शेरनी के समान उसका मुकाबला करने लग जाती है । लेकिन तुम्हारे घर की तो अजब कहानी है। ठीक है भाई-भाई में नहीं बनती ; यह कोई नई बात तो है नही यह तो सदा से ही होता आया है । लेकिन एक माँ को ऐसा करना कदापि शोभा नहीं देता ।”
“जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं लेकिन उसकी अकड़ इतनी कि नाक पर मक्खी तक नहीं बैठने देती । रस्सी जल गई पर बल नहीं गए । आज भी उसकी अकड़ वैसी ही है । जिस उम्र में उसे ईश्वर का भजन -ध्यान करना चाहिए , उस उम्र में वह ज़मीन जायदाद का हिसाब लगाने में लगी हुई है..... दिनेश के ताऊओं ने उसे उलटी सीधी पट्टी पढा रखी है , वे लोग ही हमारे खिलाफ उसके कान भरते रहते हैं । वे लोग चाहते हैं कि किसी न किसी तरह इसके हिस्से की ज़मीन जायदाद भी हमें ही मिल जाए। पता नहीं यह दुनिया और कितने इम्तहान लेगी । सुख का एक निवाला मिलता नहीं कि दुख पहले से ही तैयार खड़ा रहता है । मैं यहाँ किस तरह दिन काट रही हूँ यह मुझे ही पता है, दिन -रात यही कलेस लगा रहता है, एक तो हम अपनी परेशानी से परेशान रहते है ऊपर से ये लोग हमें चैन से जीने भी नहीं देते । पिछली महीने जब इन चारों - पाँचों भाईयों में लड़ाई हुई थी , उस लड़ाई में दिनेश के पापा के सिर में गहरी चोट लगी थी , खूब खून बहा था । जब हम पुलिस में शिकायत करने गए तो पहले तो पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की जब हम लोगों ने कुछ कठोरता दिखाई तब जाकर पुलिस आई और उन्हें गिरफ्तार करके तो ले गई । दूसरे दिन वे लोग वहाँ से छूटकर लौट आए । तभी से वे लोग इस का बदला लेने के मौके की तलाश में बैठे है कि कब मौका मिले और हम अपने अपमान का बदला लें । वे लोग अपनी चीज का इस्तमाल तो करते नहीं हैं, हमारी चीजों के पीछे पड़े हैं उन्हें तोड़ते रहते हैं । इसके लिए उनसे कुछ कहो तो हमें ही उलटी सीधी सुनाने लगते हैं , और हम कुछ कह दे तो फिर वही खून खराब हो ।” हम तो......
“यह तो बड़ी शर्म की बात है कि भाई - भाई के मुँह का निवाला छीनने को तैयार बैठा है। यह सब देखकर तेरी सास ने कुछ नहीं जब दिनेश के पापा के सिर में चोट लगी थी , उसने उन लोगों को ऐसा करने रोका नहीं ।” मैने कहा
मेरी सास ? हुम वह तो आराम से खाट पर बैठी यह सब तमाशा देख रही थी । उसकी बला से ! हम कल की बजाय आज ही मर जाएँ । उसे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता । हम मरे या हमारे बच्चे मरे उसे इस सब से कोई फर्क नहीं पड़ता । उसे हमसे या हमारे बच्चों से कोई मोह नहीं । उसके लिए तो हम मरे समान ही हैं।
यह सुनकर मेरे मन में उस माँ के प्रति घृणा का भाव भर गया । मैं थोड़ी देर सोचने लगा कि इन्सान कितना स्वार्थी है । इससे तो जानवर भी अच्छे हैं । कम से कम वे अपनी संतानों में फर्क तो नहीं करते । तभी दूसरी तरफ से आवाज आई “हैलो - भैया , क्या हुआ ? क्या सोचने लगे?”
“कुछ नहीं , बस तेरी सास के बारे में सोच रहा था कि क्या कोई माँ ऐसी भी हो सकती है ।”
“भैया उसे कुछ फर्क नहीं पड़ता, फर्क उन्हें पड़ता है जिन्हें अपने बच्चों से मोह होता है, जब उसे हमसे कोई मोह ही नहीं है तब उसे हमारे जीने या मरने से क्या फर्क पड़ता है। अच्छा अब मैं फोन रखती हूँ ।”
अच्छा ठीक है ।
फोन रखने के बाद मैं बार-बार यही सोच रहा था कि क्या माँ ऐसी भी हो सकती है। हाँ भाई भाई के बारे में तो अक्सर सुना था लेकिन माँ अपने बच्चों में इतना फर्क कर सकती है, यह बात मेरे लिए चौकानेवाली थी । मैं सारी रात यही सोचता रहा......................?
एक सप्ताह के बाद फिर फोन की घंटी बजी। इत्फाक से फोन मैंने ही उठाया ।
“हैला”े “हैलो”
“कौन ? सुमन; कैसी है ? सब कैसे हैं ?”
“भैया .............................?”
“क्या हुआ ? रोने की आवाज सुनाई देने लगी ?
“सुमन क्या हुआ ? तू रो क्यों रही है ?”
“बात क्या है ? तू रो क्यों रही है ?”
“भैया मेरी सास ने ..........”
“अब क्या हुआ तेरी सास को ?”
“मेरी सास ने हमें अपनी जायदाद से बेदखल कर दिया है।”
क्या …? क्या कहा?
“हाँ भैया ।”
कल अखबार में दिया था कि “मैं अपने पुत्र रमेश को उसके व्यवहार और चाल-चलन ठीक न होने के कारण अपनी जमीन जायदाद से बेदखल करती हूँँ।”
“ऐसा कैसे कर सकती है वह ?” मैने कहा
“कर नहीं सकती , उसने कर दिया है । यह सब किया कराया उसका नहीं बल्कि उसके बड़े बेटों का है ,भला बुढिया पढ़ नहीं सकती , लिख नहीं सकती उसे इस बात की क्या जानकारी कि अखबार में किस प्रकार इश्तहार दिया जाता है। उन कमीनों ने ही यह सब करवाया है ,उन्होंने ही हमारे पेट पर लात मारी है, वे लोग यही तो चाहते थे कि हमारे हिस्से की जमीन जायदाद उन्हे मिल जाए ।”
यह कहते -कहते वह रोने लगी ।
“अरे पगली, तू रोती क्यों है ? अभी तेरा भाई,तेरे पापा जीवित हैं । हमारे रहते तुझे चिंता करने की कोई जरूरत नहीं । ज़मीन जायदाद से ही बेदखल किया है? तुम्हारी किस्मत से तो नहीं इंसान को कभी भी जीवन में निराश नहीं होना चाहिए। तू चिंता मत कर । तू रो मत। तू क्यों चिंता कर रही है जरा सोच जिन लोगों के पास जमीन नहीं होती क्या वे लोग नहीं जीते । तू अपने आप पर भरोसा रख । जो लोग दूसरों को दुख देकर अपने आप को सुखी बनाने की सोचते हैं , वे कभी सफल नहीं हो पाते । उन्हें अपने कीए का फल इसी संसार में मिल जाता है । तू भगवान पर भरोसा रख । दूसरों की बददुआ लेकर वे कभी सुखी नहीं रह सकते ।” मैने कहा
“भैया इन्होंने तो हमें कहीं का नहीं छोड़ा । कहकर वह फफक-फफकर रोने लगी ।”
“अरे पगली तू रोती क्यों है ? तू चिंता मत कर हम हैं न ? जब हम तेरी तरफ से मुँह मोड़ ले , तब तुझे चिंता करने की जरूरत है । बस अब तू चुप हो जा । सब ठीक हो जाएगा ।”
मैं उसे देर तक समझाता रहा , दिलासा देता रहा अंत में कहा “अच्छा ठीक है ....अब फोन रख । देख ..रोना नहीं तू तो मेरी बहादुर बहन है ना । जीवन में सुख - दुख तो आते ही रहते हैं । जीवन में कभी भी हार नहीं माननी चाहिए।.........और फिर हम हैं न...ठीक है ।”
“अच्छा ठीक है ....मगर .............?”
“मगर - वगर कुछ नहीं ? खाना बना लिया या नहीं ?”
“नहीं , अभी नहीं बनाया ?”
“तो क्या बच्चे अभी तक भूखे हैं ?”
“नहीं बस अभी बना लेती हूँ ।”
“अच्छा चल पहले खाना पका और बच्चों को खिला । तुम लोग भी खा लो । ठीक है । चिंता नहीं करना .... सब ठीक हो जाएगा ।”
यह कहकर मैंने फोन रख दिया । बार-बार मेरे मन में एक ही सवाल उठ रहा था कि क्या माँ ऐसी भी होती है ?.....और सारी रात यही सोचता रहा , आखिर उसने ऐसा क्यों किया केवल जायदाद के लिए या फिर किसी और .... पता नहीं बार-बार दिल में यही सवाल उठता है कि यह कलियुग है, और इस कलियुग में शायद यह सब संभव हो सकता है। जो माँ अपने बेटे का खून देखकर भी विचलित न हो , उसे क्या कहेंगे ? यही मेरी समझ में नहीं आ रहा । इसे मैं माँ की बेटे के प्रति घृणा कहूँ या कुछ और ............?

कहानी को ध्यानपूर्वक पढकर

निम्नलिखित कहानी को ध्यानपूर्वक पढकर नीचे लिखे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए ।

एक बार देवता सैर को निकले थे। उन्हें देखकर तीन पहाड़ों की चोटियों ने उन्हें प्रणाम किया। देवता उन पर प्रसन्न हुए और तीनों से एक-एक वर माँगने के लिए कहा। तीनों प्रसन्न हो गए। उनमें से पहले ने अपनी इच्छा प्रगट करते हुए कहा - हे भगवन, मेरी ऊँचाई सबसे अधिक हो जाए जिससे मैं सभी को दूर ले दिखाई दूँ। सभी मेरी प्रशंसा करें और मैं सबसे बड़ा कहलाऊँ। दूसरे ने कहा - मुझ पर इतनी हरियाली छा जाए कि जिससे कोई आकर मुझे नष्ट न कर सके। मैं सभी को सुन्दर भी लगूँ। तीसरे ने अपनी माँग में पूछा - मुझे तो आप भूमि जैसा समतल बना दीजिए। जिससे दूसरों को उपयोग हो, दूसरों की भलाई हो। मुझ पर खेती करके अनाज की अच्छी पैदावार की जाए। देवताओं ने तथास्तु कह दिया अर्थात् तुम सभी की इच्छा पूर्ण हो ऐसा आशीर्वाद देकर देवता लोग चले गए। तीनों पहाड़ अपनी-अपनी इच्छा पूरी होने की बात को लेकर खुश हुए। बहुत दिनों बाद देवता पुनः उसी मार्ग से गुजर रहे थे। उन्होंने देखा कि सबसे ऊँचा पहाड़ बड़े पहाड़ के नाम से प्रसिद्ध हो गया था। देखनेवाले उसकी अवश्य प्रशंसा करते थे। इन सबसे अलग बात यह थी कि सबसे ऊँचा होने के कारण वह सबसे अधिक सर्दी सह रहा था।

प्रश्न 1. जब देवता सैर को निकले तो उन्हें किसने प्रणाम किया ?



प्रश्न 2 अपनी ऊँचाई सबसे अधिक हो जाने का वर किसने माँगा ?




प्रश्न 3 अपने ऊपर सबसे अधिक हरियाली हो जाने का वर किसने माँगा ?


प्रश्न 4 तीसरे पहाड़ ने देवताओं से क्या वर माँगा ?


प्रश्न 5 जब देवता पुनः उसी मार्ग से गुजर रहे थे तो उन्होंने क्या देखा ?

तेरे आने की खबर से

तेरे आने की खबर से दिल मेरा यूँ खिल जाए
जैसे सूनी पड़ी बगिया में बहार आ जाए।
दिल ने जिसे चाहा वो यार तुम हो
दिल की हर धड़कन में जो बसे वो तुम हो।
बीच मजधार में साथ छोड़ न देना ,
कभी तन्हा छोड़ न जाना।
तन्हा राहों पर मुँह मोड़ न लेना
बहार बनकर न रह सको न सही
पर तन्हा छोड़ न जाना।
साथ तेरा पाने को लड़ जाएं दुनिया से
तेरे प्यार के लिए काँटों पर चल जाएंगे।
तेरे प्यार के लिए दुनिया में जी लेंगे,
तेरी खुशी के लिए ए यार हम जुदाई का गम भी हँस कर पी लेंगे।
तेरी खुशी के लिए हम दुआ करेंगे
तू सदा खुश रहे ,तेरी खुशी को देखकर हम जी लेंगे।

दोस्ती

दोस्ती का दम भरने वालों सुनो ज़रा,
होती है क्या दोस्ती मुझे बताओ ज़रा।
सुना है दोस्त दोस्ती में जान दे देते हैं
दोस्ती वह नहीं जो दोस्तों की जान ले ले,
दोस्ती तो एक अहसास है जिसे देखकर महसूस किया जाता है।
दोस्ती वह भी नहीं जो मुस्कान देती है
मुस्कान का क्या ,वह तो बेवफा है,
एक पल होंटों पर आकर चली जाती है।
दोस्ती तो एक अरमान है
जो दिल से दिल मिलने की आस लगाए रहती है
अगर पाना है दोस्ती का गुलदस्ता
तो पहले अपने मन में प्यार का एक फूल खिलाकर तो देखो
दोस्ती होती है एक दूसरे का साथ पाने के लिए।

मुझसे मिलने कब तुम आते हो प्यारे

मुझसे मिलने कब तुम आते हो प्यारे
कहाँ छिपाकर रखें तुमको प्यारे।
कितने युग बीत गए एक इंतजार में तुम्हारे,
तुम्हारे चरणों की ध्वनि सुनकर हम आए।
चुपके से क्यों मेरे हृदय में आ गए
मन की इस पीड़ा को क्यों तुम जगा गए।
आने वाले ए अजनबी मेरे मन के कौने- कौने में बस जा,
बस कर मेरे मन की गहराई में मुझ में तू समाजा
तेरे जाने की खबर से मन मेरा थर-थर है कांपे।
मुझसे मिलने कब तुम आते हो प्यारे
कहाँ छिपाकर रखें तुमको प्यारे।
मानो आज हुआ है उसका अहसास
जो था अब ख्वाबों मे अब हुआ उसका अहसास
तुम्हारे मृदु तन की शोभा से विकसित हो गया मेरा अहसास
आने से तुम्हारे मन के फूलों का हो गया विकास।
मुझसे मिलने कब तुम आते हो प्यारे
कहाँ छिपाकर रखें तुमको प्यारे।

" खडूस "

काफी देर से खिड़की के पास खड़ा रात के अँधेरे में कुछ खोज रहा था । उस दृश्य को बार - बार याद कर रहा था जिसका भयावह चेहरा अभी भी मेरे मन पर छाया था । एक ऐसी घटना जिसने मेरे मन को झकझोर कर रख दिया। यह घटना मेरे ही गाँव की है । गाँव में सभी लोग किसान हैं ,सभी किसानों के पास अपनी जमीन है किसी के पास दस बीघे ,किसी के पास बीस बीघे तो किसी के पास पचास -साठ बीघे जमीन। यहाँ की ज़मीन सोना उगलने वाली मानी जाती है । यहाँ पर सभी प्रकार की फसलें होती हैं । सिंचाई के पर्याप्त साधन होने के कारण बारह मासों खोतों में फसलें लहराती रहती हैं। लहराती फसलों के कारण ही किसानों के मुख पर खुशी की लालीमा झलकती रहती है।सुबह का समय था मैं अपने घर की छत पर बैठा चाय पी रहा था । एक दूसरी छत पर मोर नाच रहा था मैं चाय पीते-पीते मोर के नाच का आनंद ले रहा था तभी किसी स्त्री के रोने की आवाज सुनाई दी मैं जल्दी से उस तरफ बढा जिस तरफ से स्त्री के रोने की आवाज आ रही थी । जो दृश्य मैने देखा वह बड़ा ही भयावह था उस दृश्य की साक्षी तो मेरी आँखे ही हैं । एक वृद्ध महाशय जिनकी उम्र लगभग सत्तर से पचहत्तर वर्ष की होगी एक स्त्री को पीटने से लगे हुए हैं जिस स्त्री को वे महाशय पीट रहे थे उस की उम्र लगभग पैतीस से चालीस बीच की होगी । वृद्ध उस स्त्री को बड़ी बेरहमी से अपनी चमड़े की जूतियों से मार रहे थे । वह बेचारी छत पर पड़ी बचाओ - बचाओ की गुहार लगा रही थी । यह देखकर मैं तुरंत वहाँ जाने के लिए छत से जल्दी -जल्दी उतरा मेरे वहाँ पहुँचने से पहले ही पड़ौस का एक लड़का वहाँ पहुँच गया उसने वहाँ पहुँचकर उस वृद्ध को वहाँ से अलग हटाया तब तक वहाँ और भी आस-पड़ौस के लोग इकट्ठा हो चुके थे वहाँ पर आई कुछ स्त्रियों ने उस स्त्री को छत से नीचे पहुँचाया मार के कारण वह स्त्री बेहोश हो चुकी थी ।वहाँ पहुँचने पर पता चला कि जिस स्त्री को वृद्ध जूतियों से पीट रहे थे वह और कोई नहीं उनकी पुत्र वधु थी । यह सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ , आश्चर्य इस बात का कि अब तक सुना था देखा था कि पति पत्नियों में आपस में झगड़ा होता है । कभी-कभी पति गुस्से में पत्नी की पिटाई कर देता है किन्तु यह पहली घटना थी जिसमें एक पिता समान ससुर अपनी पुत्रीवत पुत्रवधु को लातों से पीट रहा था । धीरे-धीरे उस घर के आंगन में गाँव वालों की संख्या बढ़ती जा रही थी ।वह स्त्री अभी तक बेहोश थी उस का पति गाँव के पास ही खेत में हल चला रहा था । घर में भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। भीड़ में से एक व्यक्ति ने उस स्त्री के पति के पास खबर भिजवाई ।घटना की सूचना पाकर स्त्री का पति तुरंत दौड़-दौड़ा घर आया घर में बेहोश पड़ी अपनी पत्नी को देखकर उसका भी सिर चकरा गया उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह सब कैसे हो गया ।हद तो तब हो गई जब सारा मोहल्ला उस स्त्री की दशा पर शोक व्यक्त कर रहा वहीं दूसरी तरफ वृद्ध महाशय जिन्होंने उस स्त्री की यह दशा की थी उनके चेहरे पर एक भी पश्चाताप की झलक तक नहीं थी , उन्हें नहीं लगता कि जो उन्होंने किया है वह गलत है । वह तो आराम से चिलम भरकर लाया और खाट पर बैठकर हुक्का पीने में लग गया । लोगो ने गाँव के डॉक्टर को बुलाने के लिए एक आदमी को भेज दिया था । थोड़ी देर में ड़ॉक्टक आ गया उसने उस स्त्री को देखकर कुछ दवाइयाँ दी और एक इन्जेक्शन लगाया । वहाँ पर खड़े सभी लोगों को उस स्त्री के साथ पूरी सहानुभूति थी । वहीं दूसरी तरफ हुक्का पीते -पीते वृद्ध महाशय उस स्त्री को उल्टी-सीधी गालियाँ देने लग गए। अरे! “हरामजादी को जरा भी शरम हया नहीं है , अरे! मेरी हड्डियाँ तोड़ दी इस हरामजादी ने आय......अरे इस बूढ़े को डंडे से मारा है अच्छा होता कि आज तेरा काम तमाम हो जाता ।”यह सारी बातें सुनकर मुझसे नहीं रहा गया “अरे ताऊ क्यों झूठ बोल रहे हो कुछ तो अपने इन सफेद बालो की शरम करो क्यों इस बुढ़ापे में झूठ बोल रहे हो तुम खुद ही तो इस बेचारी को लात घूंसों से मार रहे थे वह बेचारी तो छत पर पड़ी बचाओ-बचाओ चिल्ला रही थी तुम्हें ऐसा करते हुए जरी भी शरम नही आई ऊपर से उसी पर झूठा आरोप लगा रहे हो । क्यों इस उम्र में अपनी मिट्टी पलीत करते हो ? कम से कम अपने इन सफेद बालों की तो कुछ शरम करो।”मेरी बात बात खत्म भी हुई थी कि वहाँ पर खड़े कुछ लोगों ने मेरी बात का समर्थन करते हुए कहा कि “तुम्हें शरम आनी चाहिए इस प्रकार का काम करते हुए भला कोइ बहु बेटियों पर हाथ उठाता है ?” वहाँ पर खड़ी एक महिला बोल उठी शायद वो दिन तुम भूल गए हो जब तुम्हारे सिर में चोट लगने के कारण तुम अपनी सुध-बुध खो बैठे थे ,तीन-चार महीने खाट में पड़े रहे थे तब इसी ने तुम्हारी सेवा की थी । इसी की सेवा के कारण आज तुम यहाँ बैठे -बैठे भाषण झाड़ रहे हो। ये बिचारे तुम्हारे इलाज के लिए तुम्हें कहाँ - कहाँ नहीं भटके बड़े से बड़े अस्पताल में तुम्हारा इलाज करवाया कौन करता आज के जमाने में इतना सब कुछ ?तुम्हें इतना होश तक नहीं था तुम कहाँ हो किस हाल में हो तुम कहाँ पर पड़े हो क्या पहना है ? पहना भी है या नहीं ,कहां पेशाब कर रहे हो कहाँ.......? कर रहे हो तुम तो उस समय अपने कपड़ों में ही ...... ? कर देते थे । यह वही है जोे तुम्हारे गंदे कपड़े धोती थी भला करता है कोई इतना । इस बेचारी ने अपने पिता की तरह तुम्हारी सेवा की थी और एक तुम हो कि उसे ही मार रहे हो । अगर कोई और औरत होती तो तुम्हारी तरफ फटकती तक नहीं तुम्हारी सेवा तो दूर एक गिलास पानी तक लाकर नहीं देती और तुम उसी बेचारी को जानवरों की तरह मार रहे हो । इसे मारने का अधिकार तुम्हें किसने दिया तुम्हें पता अगर इसने पोलिस के जाकर तुम्हारे खिलाफ रपट लिखवा दी तो तुम्हारा सारा बुढ़ापा जेल की चक्की पीसते -पीसते गुजरेगा समझ में आई कुछ।
उस बुढ़िया की बातें सुनकर बुड्ढे के तन बदन में और आग लगने लगी, बुढ़िया की बातें सुनकर वे झुंझलाकर चिल्ला उठे अरी बकवास बंद कर हाँ बहुत देखे जेल भिजवाने वाले देखे । बहुत देर से भाषण झाड़ रही है आज अगर ये छोरा नहीं आता तो आज इस कंबखत का काम तमाम कर देता था । बुड्ढे की अकड़ भरी बातें सुनकर वहाँ पर खड़ी मोहल्ले की और औरते बोल उठी अरे! “इस बूढ़े को कुछ शरमोहया तो है नहीं भला कोई बहु बेटियों पर हाथ उठाता है । वहीं दूसरी तरफ उस स्त्री जिसे बूढ़े ने लातों से मार-मार कर बेहोश कर दिया था के बच्चे माँ के पास आकर रो रहे थे मम्मी ..मम्मी कहकर बच्चे वहाँ पर खड़ी औरतो से पूछने लगे क्या हुआ मम्मी को ? मम्मी बोल क्यों नहीं रही क्या हुया मम्मी को ? वहाँ पर खड़ी औरते उन बच्चों को चुप करा रही थी , चुप हो जाओ बच्चों तुम्हारी मम्मी को कुछ नहीं हुआ वह जल्दी ठीक हो जाएगी , चिंता मत करो । अरे ! यह आदमी है या कसाई कोई किसी को इस तरह मारता है, कसाई ने जानवरों की तरह मारा है ।घर के अंदर बहुत सी औरते इकट्ठी हो चुकी थी सभी बड्ढे द्वारा किए गए कार्य से गुस्से में थी । उन सबका बस चलता तो वे सभी उस बुड्ढे को उसके किए का मजा चखा देती । उस भीड़ में खड़ी एक औरत बोल उठी कि ये बेचारी जब ब्याह कर इस घर में आई थी तब कैसी थी ? और अब देखो बेचारी सूखकर कांटा हो रही है । दिन रात खूब काम करती है । फिर भी बेचारी सुख का एक निवाला तक नहीं खा सकती और इस बूढ़े को अंघाई नहीं झिल रही इसे घर बैठे-बैठे खाना हज़म नहीं हो रहा । इसे समय पर खाने के लिए बराबर मिल जाता है इसीलिए इसे बुढ़ापे में भी जवानी का नशा चढ़ रहा है।वहाँ पर खड़ी औरतों में से एक बूढ़ी औरत बोली “इस बुड्ढे का तो यही हाल देखते आ रहे हैं पहले भी इसकी अकड़ वैसी ही थी और आज बुढ़ापे में भी यही हाल रस्सी जल गई लेकिन उसके बल नहीं गए । एक समय था जब दूर दराज गाँव के लोगों में भी इसका बड़ा सम्मान था । इसने अपने इन कारनामों से अपनी मिट्टी खुद ही पलीत कर ली । वो सब तो ठीक है कि जवानी में क्या किया या क्या नहीं किया ठीक है जवानी में इसकी धाक थी किन्तु अब बुढ़ापे में तो इसे ऐसा नहीं करना चाहिए था। मार पिटाई करना कोई नई बात तो है नहीं ? यह तो सदा से ही ऐसा करता आया है। पहले घर परिवार और ज़मीन की एक -एक क्यारियों के लिए लड़ते रहे हैं । इनका तो सदा से यही हाल रहा है, कभी घर से जंगल को खाना ले जाने में थोड़ी बहुत देर हो जाती थी तो वहीं पर हंगामा शुरु हो जाता था । पता नहीं कब सुधरेगा?”घर पर इकट्ठी हुई भीड़ के सभी लोग उस स्त्री के पक्ष में ही बोल रहे थे यह सब उन वृद्ध महोदय से सहा नहीं गया वह तिलमिला उठे और क्रोध से आग बबूला होकर बोले “अजी ! सब को उसी की पड़ी है सब उस की सी ही कह रहे हैं । कोई यह नहीं देख रहा ,यह कोई भी नहीं पूछ रहा कि चाचा क्या बात हो गई ? आपको तो कहीं चोट नहीं लगी। उस हरामजादी को तो सारा मोहल्ला देखने चला आ रहा है जैसे कि वह मर गई हो। अरे !कोई इस हरामजादी से यह नहीं कह रहा कि क्यों री तूने बूढ़े आदमी पर हाथ क्यों उठाया ? बूढ़े को लाठियों से क्यों मारा ? सब यहाँ आ आकर उसकी सी कह रहे हैं मेरे बारे में किसी को कोई ख्याल ही नहीं है। अरे! तामाम बदन तोड़ डाला आह...... ।” बूढ़े की बातें सुनकर वहाँ खड़ा एक व्यक्ति बोल उठा “अरे ! ताऊ क्यों बुढ़ापे में झूठ पर झूठ बोले जा रहे हो वह बेचारी आप पर कैसे हाथ उठा सकती है। तुम ही तो उसे लातों से पीट रहे थे । इस उम्र में झूठ बोलते हुए तुम्हें शर्म आनी चाहिए।”उस व्यक्ति की बातें सुनकर वृद्ध महोदय और तिलमिला उठे । “अरे ! अभी तक वह औरत भाषण झाड़ रही थी कह रही थी कि जब तुम्हारे सिर में चोट लग गई थी तो मेरी याद्दाश्त चली गई थी मुझे कुछ याद नहीं था तो इन्होंने ही मेरी सेवा की थी । अजी! सेवा की थी तो क्या मुफ्त में की । मेरे पूरे बीस बीघे ज़मीन को जोत बो रहे हैं जो कुछ खेत में पैदावार होती है ये ही लोग तो ले रहे हैं मुझे तो कुछ दे नहीं रहे हैं। साल में दो बार फसल बेचते हैं जो कुछ मिलता है सब को अपनी जेब में भरकर बैठे है। और मैं क्या इनसे कहने गया था कि तुम लोग मेरी सेवा करो न करते मर तो मैं ही रहा था ये सुसरे तो नहीं मर रहे थे । आज कल सभी अपनी मरजी से चल रहे हैं । सभी अपनी मरजी के मालिक हो रहे हैं और तुम लोग जिसको बेचारी -बेचारी करके घर को सर पर उठा रहे हो वह राणी भी कुछ कम नहीं है अजी घोड़ी हो रही है एक जगह तलवा टिकता ही नहीं है ऊपर से जवान लड़ाती है.........”घर के बाहर वृद्ध महोदय अपनी जवान के साथ -साथ अपनी चिलम भी उसी प्रकार चढ़ाते जा रहे थे । तभी उस वृद्ध का लड़का बाहर आया जिसकी पत्नी को वृद्ध ने मारा था । वह सीधा वृद्ध के पास गया और हुक्का और चिलम दोनो उठाकर बारह फेंकते हुए कहा- “आप को जरा सी भी शरम नहीं है एक तो उस बेचारी को इतनी बेरहमी से मारा है और ऊपर से उसे ही भला बुरा कह रहे हो। अगर आप को उससे कोई परेशानी है तो आप मुझसे कह देते क्यों रोज-रोज का घर में कलह करते रहते हो क्यों मोहल्ले वालों के सामने तमाशा खड़ा कर रहे हो? आप को तो इस तरह के तमाशे करने की आदत हो गई है ।”क्यों मोहल्ले वालों को हँसने का मौका देते हो । हम तो अपनी शरम के लिए मरे जा रहे हैं और आप हो कि हमें चैन से जीने ही नहीं देते हो, एक तो दिन रात काम की परेशानी दूसरा आप का रोज-रोज का घर में कलह इससे हम परेशान हो चुके हैं । आखिर आप चाहते क्या हैं? आपको समय पर खाना मिलता है जिस चीज की आप फरमाइश करते हो सब पूरी की जाती है भले हम चटनी से रोटी खा ले लेकिन आपके लिए सब्जी बनती है फिर भी आप हो कि हमें चैंन से जीने भी नहीं देते बुड्ढ़ा अपनी गलती मानने को तैयार ही नहीं। उन्हें लगता है कि उन्होंने जो किया है वह बिल्कुल सही है। लड़के की बातें सुनकर उन्हें कुछ शांत होना चाहिए था किन्तु वे तो उस लड़के को ही भला बुरा कहने में लग गए । ज्यादा बकवास न कर मैं तेरी फालतु की बकवास सुनने के लिए नहीं बैठा हूँ।बुड्ढे की बातें सुनकर लड़का बोला यह तो यहाँ पर खड़े सभी लोगो को पता है कि आप यहाँ पर मेरी फालतुु की बकवास सुनने के लिए नहीं बैठे हो आप तो यहाँ पर हमारी बरबादी के लिए ही बैठे हो और कुछ नहीं । आप के कलेजे को तो तभी ठंडक पड़ेगी जब हम सब बरबाद हो जाएंगे .
“बरबाद हो या मरो इससे मुझे कोई फरक नही पड़ता ।”वृद्ध की बातें सुनकर लड़के को और गुस्सा आ गया । आखिर आप चाहते क्या हैं ?आप हमें चैन से क्यों नहीं जीने देते ? आखिर आपको घमंड किस बात का हैं ? खेती का ? या इस घर का ? आपका जो यह झूठा घमंड है ना कि मेरा घर मेरे खेत -ज़मीन । पहले तो आपको यह बता दूँ कि आप जिस खेत-ज़मीन को अपना -अपना करते रहते हो वह सब आपने अपनी कमाई से नहीं खरीदा यह सब ज़मीन जायदाद आपके पिताजी अर्थात हमारे दादा जी ने खरीदा था जिसे वे आपको सौंपकर चले गए । जब तक दादा जी जीवित थे इस ज़मीन -जायदाद पर उनका अधिकार था । उनके गुजर जाने के पश्चात इस ज़मीन -जायदाद का अधिकार आप को मिल गया। वैसे तो यह सब ज़मीन -जायदाद हमारी खानदानी है जिसपर हमारा भी समान अधिकार है। रही बात इस घर की सो वह भी दादा जी का ही है । इस घर को रहने योग्य घर हमलोगों ने अपनी खून पसीने की कमाई से बनाया है ।लड़के की बातें सुनकर वृद्ध का खून खौल उठा , अच्छा तो मेरा कुछ नहीं है न घर न खेती क्यारी । सुसर इस भूल में मत रहना कि मेरा कुछ नहीं है घर की एक -एक ईंट मेरी है । अब देखता हूँ कि सारे तू मेरे खेत में कदम भी रख जाए । सारे जब भूखे मरोगे तब पता चलेगी सारे भूखे न मरो तो मेरा नाम भी नही। मैं देखता हूँ कैसे तुम ज़मीन वाले बनते हो अगर एक -एक दाने के लिए मोहताज न कर दिया तो देखो , ले मेरा कुछ नहीं ....हद कर दी......अब तक वहाँ पर काफी भीड़ जमा हो चुकी थी इस भीड़ में वृद्ध महोदय के कुछ वृद्ध साथी भी खड़े थे जब उन्हें इस सारी घटना की जानकारी मिली तो वे लोग भी वृद्ध को समझाने लगे । उन वृद्धों में कुछ तो उनके बचपन के साथी थे । एक वृद्ध ने उन्हें समझाते हुए कहा देखे भाई जो कुछ तुमने किया है वह सरासर गलत है तुम्हें बहु पर हाथ नहीं उठाना चाहिए था । ऐसा करते हुए तुम्हें तनिक की लाज नहीं आई। अरे अब तो सुधर जाओ कम से कम अपने बुढ़ापे को देखो। आज तो तुम्हारे हाथ-पाँव काम कर रहें हैं कल जब यही हाथ - पाँव जवाब दे देंगे तब क्या करोगे। जब तुम पूरी तरह टिक जाओगे तब ये बहु -बेटा ही तुम्हरे काम आएँगे कोई गैर आकर तुम्हारी सेवा नहीं करेंगा । बुरे वक्त में अपने ही काम आते हैं । भले -बुरे जैसे भी हैं हैं तो तुम्हारी संतान ही न । बुढ़ापे में बहु-बेटियों पर हाथ उठाकर क्यों अपने बुढ़ापे पर कलंक लगाते हो । और फिर तुम तो सुखी जीवन बिता रहे हो क्या कमी है तुम्हें जिस चीज के लिए कहते हो कहने के साथ ही हाजिर हो जाती है । मेरी हालत तो तुम देख ही रहे हो दिन-रात काम करता हूँ फिर भी दो वक्त की रोटी मुश्किल से मिल पाती है । आज के जमाने में ऐसे बहु-बेटे मिलना मुश्किल है । हमारी दशा को देखने के बाद भी तुम ............। जरा देखो तो इन बेचारों को कैसे सूख कर कांटा हो रहे हैं । जब तक घर में सुख- शांति नहीं रहेगी तब तक भला कोई कैसे सुख का निवाला खा सकता है।वृद्ध महोदय पर लोगों की किसी बात का कोई असर नहीं हो रहा था वे तो बस एक ही बात सोचकर बैठे थे कि जो उन्होंने किया है वह बिल्कुस सही है । एक तरफ वृद्ध क्रोधित स्वर में अंदर बेहोश पड़ी अपनी बहु को भलि-बुरी गाली पर गाली दिए जा रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ तीन छोटे बच्चे कमरे के एक कौने में अपने दादा के रौद्र रुप से भयभीत हुए खड़े माँ-माँ कहकर रोए जा रहे थे । अब तक वह स्त्री जिसे वृद्ध ने पीटा था अब उले धीरे-धीरे होश आने लगा था । होश में आने के बाद जैसे ही उसकी नजर बच्चों पर गइ उन्हें देखकर वह फफक-फफककर रोने लगी ।बाहर बैठे वृद्ध जोर-जोर से गाली पर गाली दिए जा रहे थे यह सुनकर वह और रोने लगी ।रोती रोती कहने लगी कि अगर मुझे मेरे बच्चों की मोह न होता तो कब की मैं इस जिन्दगी को खत्म कर चुकी होती । रोज-रोज के डर कर जीने से अच्छा होता कि मैं खुद को ही खतम कर देती । मैं यहाँ किस प्रकार जी रही हूँ यह मैं ही जानती हूँ।उस स्त्री के रोने की आवाज बाहर तक आ रही थी । रोने -रोते वह जो बोल रही थी वह भी बाहर तक साफ सुनाई दे रहा था । स्त्री की आवाज सुनकर वृद्ध महोदय और जोर से चिल्लाकर कहने लगे अरे देखो, सुनो तो इस बेहया को कैसी जवान चला रही है । अरी मरने की धमकी किसे दे रही है कल मरने की जगह तू आज ही मर जा उपर से वो मर जाए जो तुझे ब्याहकर लाया है । मैं इन मगरमच्छ के आँसुओं से डरने वाला नहीं ।बुड्ढ़े की इन अकड़ भरी बातों को सुनकर वहाँ पर खड़े सभी लोग सन्न रह गए । सब लोग उस बुड्ढे की तरफ आश्चर्य भरी नजरों से देखते हुए आपस में यही कहने लगे कि इस बुड्ढे का दिमाग खराब हो गया है जो इस प्रकार बहकी-बहकी बातें कर रहा है। भला को माँ-बाप अपनी औलाद की मरने की दुआ करते है। देखो तो किस प्रकार अपनी औलाद के लिए बददुआ दे रहा है । ये तो बेचारे सरीफ है अगर होता न को टेड़ा सा इन्सान तो इन्हें अभी घर से धक्के मार कर बाहर निकाल देता । यह तो इन लोगो की सराफत है कि इतना सब कुछ होने पर भी चुप - चाप बैठे हैं......... नही तो इन्हे पता चल जाता कि बहु बेटियों को मारने का क्या अंजाम होता है...........।अब तक देखा था, पढ़ा था कि आज की नौजवान पीढ़ी अपने बुजुर्गों की सही देखभाल नहीं करती । किन्तु इस घर की कहानी तो बिल्कुल अलग ही निकली। वृद्ध के मुँह से यह सुनकर कि तुम मरो या तुम्हारे बालक मरो इससे मुझे कोई फरक नहीं पड़ता । आज पहली बार एक पिता को यह कहते सुना कि भले उस का जवान बेटा मर जाए उसे कोई फरक नहीं पड़ता। जवानी की रस्सी जल गई पर बल नहीं, बल आज भी उसकी अकड़ में है। वृद्धावस्था में जहाँ लोग भगवान के भजन ध्यान में मन लगाते हैं वहीं ये वृद्ध महोदय अपनी जमीन जायदाद के मोह में फसकर दूसरो को परेशान करने में लगे हुए हैं। अक्सर देखा गया है कि संतान अपने बूढ़े माँ-बाप को बोझ समझकर घर से बाहर निकाल देती है किन्तु ये वृद्ध तो अपनी उस संतान को ही बाहर निकालने पर तुले हैं जो इनकी सेवा करती है इनकी हर जरुरत को पूरा करते है ......। इस दृश्य को देखकर मैं बार-बार यही सोचने लगता कि क्या एक बाप इतना निरदयी भी हो सकता है । जो अपने अहंम के लिए , अपनी झूठी शान के लिए बच्चों की मृत्यु की कामना कर सकता है।

Saturday, September 26, 2009

कहानी "बास "


गरमी की छुट्टियों में हर साल की तरह इस साल भी मैं अपने पूरे परिवार के साथ अपने गाँव गया । इस साल की गरमी ने तो कमाल कर रखा है, गरमी से बड़ा बुरा हाल है,इस साल की गरमी ने तो पिछली कई सालों के रिकार्ड तोड़ दिए । एक तो इतनी गरमी ऊपर से न तो बिजली न पीने का पानी। इन सुविधाओं के अभाव में भी वहाँ मन लगता है। पूरे एक साल के बाद हमारा पूरा परिवार इकट्ठा हुआ था, सभी लोगोंे के आने से घर पूरा हरा -भरा लगने लगता है। गाँव में आए हुए तीन-चार दिन हो गए हैंै, गाँव का वातावरण सचमुच कितना शांत और प्रदूषण रहित होता है। जब गाँव जाता हूँ तो अपनी ननिहाल भी अवश्य जाता हूँ, यदि नानी से मिले बिना वापस आ जाउं और नानी को पता चले कि मैं गाँव आया था और उनसे नहीं मिला तो उन्हें बहुत बुरा लगेगा , सोचकर नानी से मिलने के लिए दूसरे दिन जाने का प्रोगराम बनाया। दूसरे दिन नानी से मिलने के लिए घर से निकला ही था कि फोन की घंटी बजी फोन में देखा कि मामाजी का फोन है।

“हैलो मामा जी नमस्ते ।”
“नमस्ते ,नमस्ते कैसे हो”?
“ जी, मैं ठीक हूँ। आप कैसे हो?”
“हाँ हम भी ठीक है। कब आए?”
“ जी कल आया था ।”
“घर नहीं आया । क्यों ?”
“जी, असल में ट्रेन पलवल स्टेशन पर थोड़ी देर रुकी थी, सो मैं वहीं उतर गया ।”
“अच्छा! वापस कब जा रहे हो ?”
“अगले सप्ताह । मामा जी घर में सब लोग कैसे हैं?”
“सब ठीक हैं।”
“ नानी जी कहां है ? नानी से बात करवाइए ।”
“माँ तो गाँव में है।”
“गाँव में …..?”
“हाँ ! माँ तो पिछले दो तीन महिनोंेें से गाँव में ही रह रही हैं।”
“मगर गाँव में किसके पास ? वहाँ तो कोई रहता ही नही?”
“अरे पगले! गाँव मतलब हमारे गाँव के पास जो दूसरा गाँव है ,जहाँ हमारी मौसी रहती है वहाँ।”
“मगर आप की मौसी जी तो अब जीवित है नहीं ।”
“हाँ मगर उनके बच्चे तो हैं, माँ उन्ही के पास रह रही हैं ।”
“मगर नानी जी दिल्ली छोड़कर वहाँ गाँव में क्यों चली गर्इं ।”
“अब क्या बताऊँ ? माँ का यहाँ मन नहीं लगता । कहती हैं कि मेरा तो यहाँ दम घुटता है। इसलिए एक दिन जिद्द करके गाँव चली गई।”
“अच्छा …..”
“अच्छा वापस जाते समय घर होकर जरूर जाना , ठीक है ।”
“जी अच्छा ।”यह कहकर मैंने फोन रख दिया । नानी का दिल्ली में न रहकर गाँव में रहने की बात ने मेरे मन में खलबली सी मचा दी , नानी अपने बच्चों के पास न रहकर अपनी बहन के बच्चों के पास रह रहीं हैं क्यों? कोई भला अपने भरे -पूरे परिवार को छोड़कर किसी दूसरे के घर में क्यों रहे ? आखिर बात क्या है ? मैं चलता जा रहा था और नानी के बारे में सोचता जा रहा था कि आखिर बात क्या हो सकती है, कही ऐसा तो नही कि मामाजी नानी को अपने पास रखना ही नहीं चाहते ,मुझे कुछ और ही कहानी तो नहीं सुना रहे हैं । वैसे तो मामाजी के पास किसी चीज की कमी है नहीं अच्छा खासा कमाते हैं दिल्ली शहर में दो - दो मकान है , दो - दो दुकाने चल रही है,और छोटे मामा जी भी कुछ ज्यादा ना सही पर कुछ न कुछ कमाते है ही । आखिर नानी वहाँ की सुख -सुविधाओंे को छोड़कर गाँव में क्यों रह रही हैं ? कहां तो नानी अपने पोते -पोतियोंे के बिना एक पल भी नही रह पाती थी और अब तो उन्हें तीन-चार महिने हो गए है। नानी के बारे में सोचता-सोचता बस स्टॉप तक जा पहुँचा । कुछ देर मैं बस स्टॉप पर बैठा रहा , कुछ समय बाद बस आई मैं बस में चढ गया , बस में चढकर खिड़की वाली सीट पर जाकर बैठ गया , बस में बैठा था किन्तु मेरा मन नानी के पास ही था , बार-बार यही सोच रहा था कि नानी दिल्ली छोड़कर गाँव में क्यों रह रही हैं? बस के चलने का समय हो चुका था बस अपने स्टॉप से धीरे-धीरे चल दी बस के चलते ही हवा के झोके आने लगे ,हवा के झोको के स्पर्ष से मुझे नींद आ गई, बस अपनी गति से चली जा रही थी, तभी देखा कि मैं अपनी ननिहाल में हूँ। “नानी जी नमस्ते।”
“अरे कंजर! आ गयो तू ? नानी ने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर उन्हें चूमा और मेरे सिर पर हाथ फेरकर मुझे आशीर्वाद दिया ।”
“और सुना घर पर सब कैसे हैं?”
“सब ठीक हैं ।”
नानी ने मेरे बैठने के लिए एक खाट बिछा दी थी , खाट पर बैठ गया और नानी से बाते करने लगा कुछ नानी की सुनी , कुछ अपनी सुनाई बातें करते -करते काफी समय बीत चुका था तभी मैंने पूछा-
“नानी , नानाजी कहाँ हैं ?”
“बेटा वो तो घेर (जहाँ पशुओं को रखा जाता है) पर हैं ।”
“अच्छा मैंें नाना जी से मिलकर आता हूँ ।”
“अरे! पहले कुछ खा-पी तो ले ,आ जाएंगे तेरे नाना।”
“बाद में खा-पी लूँगा पहले नाना जी से मिलकर आता हूँ।”
“बड़ो कंजर है मानेगो ना, अच्छा जा।”
“ठीक है । पहले नाना जी से मिल आऊँ।”
नाना जी से मिलने के लिए घेर की तरफ चल पड़ा । घर से घेर कुछ ही दूरी पर है। वहाँ पहुँचकर देखा कि नाना जी भैंसों को चारा खिलाने में लगे हुए हैं , जैसे ही नाना जी की नजर मुझपर पड़ी तो वे वहाँ से सीधे मेरी तरफ चले आए, मैंने उनके चरण स्पर्ष किए -
“नमस्ते नानाजी ।”
“अरे ! पाजी कब आयो ?”
“थोड़ी दे हो गई”
“घर गयो”
“हाँ घर पर नानी से मिलकर सीधे आपसे मिलने के लिए चला आया ।”
“अच्छा और सुना घर में सब कैसे हैं ?”
“जी, सब ठीक - ठाक हैं।”
“नानाजी से कुछ देर बात करने के पश्चात बोले ।”
“अच्छा तू बैठ, मैं जरा भैसों को और चारा डाल दूँ।”
“जी अच्छा ।”
मैने कमरे से एक खाट निकाली और नीम के पेड़ के नीचे बिछाकर बैठ गया। नाना जी अपने काम में जुट गए, नाना जी की उम्र लगभग सत्तर वर्ष होगी , इस उम्र में भी इतनी फुर्ती से कार्य कर रहे हैंे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। भैसों को चारा डालने के पश्चात नाना जी वापस आकर बोले -
“अच्छा ! बता क्या खाएगा - खरबूज या तरबूज?”
“नहीं नानाजी अभी कुछ खाने का मन नहीं है।”
“खाए तो बता अभी खेती से ताजा तुड़वाकर मंगवाता हूँ।”
“नहीं अभी नहीं।”
अच्छा ! तू यही बैठ मैं ज़रा भैसों को पोखर में पानी पिलाकर लाता हूँ, ये बेचारी भी गरमी से बड़ी परेशान हो रही हैं, थोड़ी देर पानी में लोट लगाएंगी तो इन्हें की आराम मिलेगा। कहकर नानाजी भैसों को पोखर की तरफ ले गए । मैं वहीं नीम के पेड़ के नीचे खाट पर बैठा गाँव का नजारा देख रहा था कोई अपनी भैसों से लगा है तो कोई अपनी भेड़ बकरियों की देखभाल में लगा है , दूसरी तरफ बच्चे रेत में खेलने में लगे हुए है। थोड़ी देर बाद मैं घर की तरफ चला गया । जैसे ही घर में घुसा तो देखा कि नानी ने एक बड़ा तरबूज काटकर रखा है। मुझे देखते ही नानी बोली
“मिल आयो अपने नाना ते ?”
“जी”
“आ ना रहे तेरे नाना ? कहा कर रहे है ?”
“नाना भैंसो को पोखर पर पानी पिलाने ले गए हैं।”
“अच्छा ठीक है - ले तरबूजो खा लै , हबाल ही ताजो मंगवायो है।”
“अरे नानी .........?”
“चल चुप चाप बैठजा और सगरे खा जइयो ।”
“इतना बड़ा तरबूज ? मैं अकेला कैसे खा सकता हूँ। नहीं बाबा मेरे से नहीं खाया जाएगा इतना बड़ा तरबूज।”
“अच्छा ठीक है ! तोपे जितनों खायो जाए उतनो खा लियो भली।”
“तभी नानाजी भी आ गए।”
आते ही नानाजी , नानी से बोले “सुन छोरा के लिए जल्दी खाने कू बना।”
“आलू उसीजने (उबलने ) के लिए रखे हैं। बस थोड़ी देर में बनाए देती हूँ।”
नानाजी भी मेरे साथ तरबूज खाने लगे , हम इधर - उधर की बातें करने लगे , तभी मैंने नाना जी से पूछा
“मामाजी कितने दिनों से गाँव नही आए ?”
“पिछले महीने ही आया था तेरा बड़ा मामा।”
“और छोटे मामा जी क्या वो नहीं आते यहाँ ?”
नाय तो , “वो भी आ जाता है महीने दो महीने एक आद चक्कर लगा जाता है।” कहकर नाना जी चुप हो गए। नाना - नानी को देखकर लग रहा था कि वे दोनों अपने बुढापे में एक दूसरे का साथ पाकर कितने खुश हैं। उन्हें इस बात का भी कोई मलाल नहीं कि बच्चे उनके पास न रहकर दिल्ली शहर में बस चुके हैं। दोनों बुढापे में एक दूसरे का सहारा बने हुए हैं । अपने निजी जीवन में ये दोनों कितने खुश हैं , कहने को तो दोनों बहुत खुश है पर कहीं न कहीं उन्हें बच्चों की याद सताती रहती है ,एक दूसरे से अपने मन की बातें करके अपने मन का गम हलका कर लेते हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी दोनों खेतों में मज़दूरी करके अपने खाने का स्वयं इंतज़ाम कर लेते हैं । जब फसल कटने का समय आता है दोनों मिलकर अपने साल भर के खाने के लिए अनाज का इंतजाम कर लेते हैं इतना ही नहीं भैसों के लिए भी भूसे का इंतजाम कर लेते है । यह घर भी कभी बच्चो से भरा रहता था किन्तु आज ये दोनों प्राणी ही रहकर अपना जीवन बिता रहे हैं, जिस घर को इन्होंने यह सोचकर बनाया था कि भविष्य में हमारे बच्चे इस घर में रहेंगे किन्तु ........?
किसी ने सही कहा है कि समय सदा एक सा नही होता । हाय रे बुढापा ........।

तभी अचानक बस के जोरदार ब्रोक लगे और मेरी आँख खुल गई। मैंने देखा कि मैं तो बस में बैठा हूँ , बस में भीड़ बहुत हो चुकी थी , थोड़ी देर के बाद मेरा बस स्टॉप आ गया , बस से उतरकर नानी के पास जाने के लिए घोड़ा गाड़ी में बैठकर गाँव की तरफ चल दिया । चारो तरफ हरियाली ही हरियाली मानो धरती माता ने हरी चुनरिया ओढ़ रखी हो , कहीं सरसों के पीले फूल महक रहे थे तो कहीं गन्ने की हरियाली तो कहीं धान की फसल की हरियाली । हरियाली देखते -देखते गाँव भी आ गया । तांगेवाले को पैसे देकर घर की तरफ चल दिया । नानी घर के बाहर ही खाट पर बैठी अपनी हुकिया( हुक्का) पी रही थी । नानी के पास जाकर मैंने चरण स्पर्ष किया , मुझे देखकर नानी चौंक पड़ी । “अरे जी! कंजर कहाँ ते आ गयो ? आ आजा बैठ जा।”
“और सुना कहकर नानी ने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर उन्हें चूमा और मेरे सिर पर अपना स्नेह भरा हाथ फेरकर मुझे आशीर्वाद दिया ।”
“बाल-बच्चे सब ठीक - ठाक हैं।”
“हाँ नानी सब ठीक-ठाक हैं । आप कैसी हैं ?”
“ठीक हूँ ।” तभी नानी ने बाहर बैठे-बैठे ही आवाज लगाई “अरी लाली पानी लइयो , देखियो भैया आयो है।” नानी की आवाज सुनकर मामी जी पानी से भरा लोटा और एक गिलास लेकर आ गर्इं । मामीजी को देखकर मैंने उनसे नमस्कार किया –
मामी जी ने मेरा हाल चाल पूछा और घर की राजी-खुशी पूछकर वे अंदर चली गर्इं। नानी ने अपने लिए नई चिलम लगा ली थी, मैं नानी जी के साथ ही बाहर खाट पर बैठा था , नानी जो हुकिया पी रही थी उसका धुआँ मेरी तरफ आ रहा था , यह देखकर नानी ने मेरे लिए एक अलग से खाट बिछवा दी और मैं उस पर जाकर बैठ गया । यात्रा की थकावट को दूर करने के लिए थोड़ी देर लेट गया । शाम का समय था सभी लोग अपने -अपने कामों में लगे हुए थे। घर के अंदर मामीजी खाना बनाने की तैयारी में लगी थी । घर के अंदर दो भैंसे बंधी थी वहीं दूसरी तरफ बच्चे खेल रहे थे , घर ज्यादा बड़ा नहीं था किन्तु घर में रहने वाले सभी प्राणियों का दिल बहुत बड़ा है। वहाँ बैठे-बैठे मेरे मन में बार-बार एक ही प्रश्न उठ रहा था कि आखिर नानी अपने बच्चों को छोड़कर यहाँ गाँव में क्यों रह रहीं हैं ? तभी मामाजी भी वहाँ आ गए । मुझे देखकर मामा जी का चेहरा खिल उठा , मैने उनसे नमस्कार किया उन्होंने मेरा हाल-चाल पूछा और आपस में बातें करने लगे तभी मामाजी ने घर के भीतर आवाज लगाई ।
“अरे! सुनो ।”
मामाजी की आवाज सुनकर मामाजी की बड़ी लड़की बाहर आई ।
“क्या बात है?”
“अरे लाली ! भैया के लिए कुछ चाय नाश्ता तैयार किया कि नही?”
“हाँ माँ चाय बना रही है। बस दो मिनट में लेकर आती हूँ” कहकर लाली घर के भीतर चली गई। थोड़ी देर के बाद तीन कपों में चाय ,नमकीन,बिसकिट हमारे सामने लाकर रख दिये। नमकीन ,बिसकिटों को देखकर मैंने कहा कि “नमकीन ,बिसकिटों की क्या ज़रुरत थी चाय ही काफी थी।
“अरे! खा, खा तू कौन सा रोज - रोज आने वाला है?”

हम तीनों ने चाय पी और आपसी बातें करने में लग गए । मामा जी की आर्थिक स्थिति कुछ ठीक नही है अगर यह कहा जाय कि मामा जी की आर्थिक खराब है तो कुछ गलत नहीं होगा। आर्थिक स्थिति भले खराब हो किन्तु इनका दिल ,स्वभाव बहुत अच्छा है। भला इस जमाने में अपने बूढे माँ -बाप की सेवा से जी चुराने वालों की कमी नहीं वहीं एक गरीब व्यक्ति जिसके पास गरीबी चारो तरफ हाथ पसारे बैठी है, उसे अपनी बूढी मौंसी की सेवा करने में कोई आपत्ती नहीं है। यहां पर नानी जी घर के कामों में मामी जी का हाथ बटाती है, घर के कामों में ही नहीं बल्कि खेतों में मज़दूरी के कामों में भी इनका बराबर हाथ बटाती हैं। तभी मामाजी को किसी ने बाहर से आवाज दी , मामाजी उस आदमी के साथ चले गए शायद कोई ज़रुरी काम होगा । मामाजी के जाने के बाद मैंने नानी की तरफ देखा तो उनके हँसतेे चेहरे के पीछे किसी दुख की परछाई साफ नजर आ रही थी। नानी की चिलम भी ठंडी हो चुकी थी अब नानी शांत मुद्रा में बैठी कुछ सोच रही थी । मैने उन्हे आवाज़ दी -
“नानी , नानी मेरी आवाज सुनकर नानी अपनी शांत मुद्रा से जागती हुई बोली क्या बात है ?”
“नानी क्या सोच रही हो ?”
“कुछ नही बेटा ।”
मुझे उनके जवाब से संतुष्टि नहीं हुई , मैने फिर पूछा “क्या बात है ? नानी आप क्या सोच रही हो?”
“कुछ नही बेटा , कोई बात नहीं है।”
बातों ही बातों में नानी से पूछा कि “नानी आप दिल्ली से यहाँ क्यों चली आर्इं ?”
“यूँ ही वहाँ मेरा मन नहीं लगता । उन बंद घरों में मेरा तो दम घुटता है खुली हवा का तो वहा नामोंनिशान तक नहीं और फिर घर में बैठे -बैठे मेरा दम घुटता है, या मारे गाम कू चली आई यहाँ कम ते कम खुला माहौल तो है, शुद्ध हवा तो मिलती है।”

नानी कह कुछ रहीं थी, किन्तु उनके चेहरे के हाव-भाव कुछ और नजर आ रहे थे ऐसा लग रहा था कि नानी मुझसे कुछ छिपा रही हैं ।
“नानी आखिर बात क्या है? वहाँ आप का मन नहीं लगता या कोई और बात है। यह सुनकर उन बूढ़ी आँखों में आँसू भर आए । नानी की आँखों में आँसू देखकर, मैं अपनी खाट के उठकर उनके पास जाकर बैठ गया ,उन्हें अपनी बाहों में भरकर पूछा आखिर बात क्या है? आप रोने क्यों लगी?”
“कुछ ना बस यो ही आँखन ते आँसू निकल आए गि तो खुशी के आँसू हैं।”
“नहीं नानी कुछ न कुछ तो है जो आप मुझे बता नहीं रहीं हैं।”
“कुछ ना बेटा आँसुन को कहा है गि तो यों ही आँखन में आ जामें ।”
“नहीं ,नहीं कोई न कोई बात तो जरूर है , आखिर बात क्या है ? आप रोने क्यों लगी आप दिल्ली से यहाँ गाँव में क्यों आ गई ? वहाँ पर तो आप को किसी चीज की कमी नहीं , दोनों मामा अच्छा खासा कमाते हैं । आप वहीं बच्चों के पास क्यों नहीं रहती ?” यह सुनकर नानी की आँखों से आँसू जोर-जोर से गिरने लगे , वह फफक फफककर रोने लगी । मैने उन्हें अपने सीने से लगाकर चुप कराया , जब नानी चुप हो गई तब पूछा अब बताओ “आप रो क्यों रही हो ?”
“भैया जब बच्चे शादी शुदा हो जाते हैं तब उन्हें बूढ़े माँ-बाप बोझ लगने लगते हैं , और जब बच्चे अच्छा खासा कमाने लगें तो उन्हें बूढ़े माँ-बाप मखमल की चादर में टाट का सा पैबंद लगने लगते हैं ,उनकी खुशियों में रुकावट से महशूस होने लगते हैं ।”
“आखिर बात क्या है …….?”
“बेटा जब से तेरे नाना का स्वर्गवास हुआ है तब से इस बुढ़िया की तो यही हालत है। कभी दिल्ली बच्चों के पास चली जाती हूँ तो कभी यहाँ चली आती हूँ। जब तक तेरे नाना जीवित थे तब तक दोनों प्राणी अपना जीवन एक दूसरे के सहारे काट रहे थे , शायद ई·ार को हमारा सम्मानजनक जीवन जीना रास नहीं आया । तेरे नाना मुझे यहाँ अकेला छोड़कर खुद तो चले गए । मुझे दर -दर भटकने, किडर-किडर कर जीने के लिए छोड़ गए। इससे अच्छा होता कि रामजी मुझे भी उठा लेता कम से कम यह सब तो न देखना पड़ता । भरे पूरे परिवार के होते हुए भी मैं अभागिन इधर -उधर मारी -मारी फिरती हूँ । कभी यहाँ तो कभी कहीं और वाह रे राम जी........ तेरी माया…?”
“नानी,मामाजी आप को अपने पास रखना नहीं चाहते या फिर आप उनके पास नहीं रहना चाहती?”
“अरे भैया! इसमें तेरे मामा का कोई दोश नहीं , मेरी किस्मत ही फूटी है। आज मेरे पास कोई धन -दौलत नहीं है ? न कोई ज़मीन - जायदाद ? न कोई जमा पूंजी ? मैं बुढ़िया उन लोगों के लिए किस काम की । उनकी पत्नियों को मुझ बुढ़िया से बास आती है। अब तू ही बता बेटा जब मेरा शरीर नहाने के लिए पानी मांगता ही नहीं तो मैं कैसे रोज-रोज नहा लू और अगर मैं नहा भी लेती हूँ तो मेरे जोड़ों में दर्द शुरु हो जाता है । सारे शरीर में दर्द होने लगता है । जोड़ों के दर्द की पीड़ा से अकेली कमरे में पड़ी कराहती रहती हूँ, वहाँ यह पूछने वाला भी नही कि माँ क्या हुआ ?आप क्यों कराह रही हो? जब शाम को तेरा मामा दुकान से आता है मुझे बैठक वाले कमरे में न पाकर सीधा मेरे पास आएगा मेरा हालचाल मालुम करके दवा गोली दे देता है। बाकी तो वहाँ मैं एक अछूत के समान पड़ी रहती हूँ । कोई बात करने वाला नही,कोई पूछनेवाला नहीं । अकेली छत पर इधर से उधर भटती रहती हूँ।”
“अच्छा ! तो बच्चे भी आपके पास नहीं आते? क्या उन्हें भी आप से कोई लगाव नहीं ?”
“अरे ! बेटा बच्चे भी तो अपने माँ-बाप से ही सीखते हैं । बहु तो बहु बच्चों के पास भी समय नही कि वे मेरा हाल चाल पूछ सके अब तुझे तो पता है कि मुझे हुकिया पीने की आदत है मेरे हुकिया पीने से उनके घर में बास फैलती है। वहां उन लोगो को मेरा हुकिया पीना ही खटकता है । मैं बिना हुकिया के नही रह सकती यह बात उन्हें भली भांति पता है फिर भी ................? अकेली छत पर पड़ी रहती हूँ। सुबह तेरा मामा चाय के लिए बुला लेता है तो मैं नीचे चली जाती हूँ । एक गिलास चाय पीकर मैं फिर वापस छत पर आ जाती हूँ क्योंकि मेरे नीचे जाते ही बहु का चेहरा बदल जाता है यह देखकर मुझसे वहाँ नहीं रहा जाता । तेरा मामा तो दुकान पर चला जाता है । मैं बेसहाराओंें की तरह छत पर इधर से उधर भटकती रहती हूँ । कोई यह तक कहने वाला नही कि माँ आप अकेली छत पर क्यों घूम रही हो आकर नीचे कमरे में बैठ जाओ, मैं अपनी मरजी से चली जाउँ तो ठीक है नहीं तो कोई पूछने वाला तक नही । मेरे हुक्का पीने से उन लोगों को मुझसे बास आती है ।”

“ठीक है बड़े मामा के यहाँ आपका मन नहीं लगता ,छोटे मामा भी तो हैं वहां पर आप उनके पास क्यों नहीं रहती ? वो तो आपसे बहुत प्यार करते हैं बच्चे भी आपकी इज्जत करते है,फिर आप वही बच्चों के साथ क्यों नही रह लेती ?” “अरे ! बेटा केवल बेटे के चाहने से क्या होता है। बेटा तो चाहता है कि मैं उसके साथ रहूँ किन्तु उसकी महारानी (पत्नी ) है ना वह भी कुछ कम नहीं है। वैसे भी छोटे का अक्सर हाथ तंग रहता है । इस महगाई के जमाने में चार बच्चों को पालना कोई मामूली बात नही , उसकी इतनी आमंदनी नहीं कि इतना बोझ उठा सके पर फिर भी वह तो चाहता है कि मैं उसके पास ही रहूँ।”
“ठीक है छोटे की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है किन्तु बड़े तो ई·ार की कृपा से अच्छा खासा कमाते हैं । उन्हें तो किसी चीज की कमी नहीं उनकी तो दो-दो दुकाने है साथ ही साथ दो घर भी है उन दोनों घरो में आपके लिए एक कमरा तक नहीं है उनके पास…?”
“बेटा जब उन्हें मेरी जरूरत ही नही तो फिर रहने या न रहने का सवाल ही नहीं उठता। जब उन्हें माँ की जरुरत ही नहीं और होगी भी कैसे जब उनके सास ,ससुर और साला जो है उनके आगे मेरी क्या जरुरत ? वैसे भी बहुओ को कितना भी बेटियों की तरह प्यार करो बहु कभी बेटी नहीं बनती उनके लिए तो सास हमेशा सास ही रहती है वह कभी माँ नहीं बनती। और फिर जब उनके अपने माँ-बाप साथ में है तो मेरी हैसियत ही क्या मैं आखिर सास जो हूँ। सास तो सदा से बहुओं की आँखों में खटकती रही है।”
“वह सब तो ठीक है जब वे लोग इतने लोगों को अपने साथ रख सकते है तो क्या आप के रहने के लिए एक कमरा , तीन वक्त की रोटी तक नही है उनके पास ।”
“उन्हें मेरे दो वक्त की रोटी नहीं मेरा वहाँ रहना खटकता है, यूँ तो उनके सास-ससुर के लिए रोज सुबह -शाम बादाम का दूध पिलाया जाता है ,खूब काजू किश्मिश का भोग लगता है फिर मेरे दो वक्त की रोटी का सवाल कैसे आए। अब भैया तू ही बता कि मैं कैसे वहाँ घुट- घुट कर जीऊँ............ ?”
“मामा जी कुछ नहीं कहते?”
“भैया अब मामा भी कितना कहे जब ज्यादा कुछ कह देता है तो फिर घर में कलह शुरु हो जाता है। अब मेरी वजह से घर में कलह हो यह मुझसे नहीं देखा जाता। एक-दो दिन की बात हो तो ठीक है रोज-रोज मेरी वजह से घर में कलह हो यह भी तो अच्छी बात नहीं । अब मेरा क्या है मैं तो जीवन के अंतिम पड़ाव पर हूँ। मेरी वजह से घर में बच्चों को परेशानी हो यह मुझसे नहीं देखा जाता । मैं तो अपने बचे कुचे जीवन को जैसे तैसे काट लुँगी ,भगवान उन्हें सदा खुश रखे , वो सदा फले- फूले दिन- रात उन्नती करें मेरा क्या .............? मैं वहाँ से ज्यादा खुश तो यहाँ गाँव में ही हूँ यहाँ कम से कम खुली हवा और सम्मान की रोटी तो मिलती है ।”
“ यहाँ पर मुझे किसी प्रकार का कोई कस्ट नहीं है ,और फिर ये भी तो अपने ही बच्चे हैं । बहन का बेटा भी तो अपना बेटा ही हुआ। भले ही मैने इसे अपनी कोख से जन्म नहीं दिया तो क्या जिन्हें अपनी कोख से जना है उन्हेंे तो मेरी कोई जरूरत ही नहीं । यह बेचारा गरीब है लेकिन है दिलवाला भले ही इसके पास धन-दौलत न हो लेकिन प्यार, अपनापन खूब है इसकी गरीब कुटिया में। मुझे अपनी माँ की तरह ही रखता है कभी भी मुझे किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने देता । इसका पूरा परिवार मेरी खूब सेवा करता है पति पत्नी बच्चे सभी मेरी खूब सेवा करते हैं।यहाँ मैं कम से कम खुली हवा में चैन की सांस तो ले सकती हूँ, अपना दुख दर्द बाटने के लिए आसपास के लोगों से बात तो कर सकती हूँ ,वहाँ तो मैं अकेली छत पर भटकती रहती थी । इसे भी तो मैने ही पाला पोसा है जब यह छोटा था तभी इसकी माँ इसे छोड़कर चल बसी थी , तब से मैंने ही इसे पाला-पोसा था । जब मैंने इसे पाला पोसा था अब यह बेचारा मुझ बुढ़िया को पाल पोस रहा है।”
“अब तू ही बता कि मैं कहा रहूँ वहाँ जहा मेरी कोई जरूरत ही नही या वहाँ जहाँ प्यार है, अपनापन है । और फिर मैं वहाँ क्यों जाऊँ जहाँ मेरी जरूरत ही नहीं ? वहाँ जाकर क्यों मैं उनकी खुशहाल ज़िन्दगी में दुख भरूं मेरे वहां जाते ही घर में कलह शुरू हो जाएगी इससे तो मैं यही ठीक हूँ। कम से कम यहाँ शांति से तो जी रही हूँ।”
“अच्छा ठीक है । कम से कम मामा जी आप को आपके खर्चे पानी के लिए पैसा भैजते है या वह भी नहीं ? यह सुनकर नानी चुप हो गई । क्या हुआ नानी आप चुप क्यों हो गई ? क्या दोनों में से कोई भी आप को पैसे नहीं भेजते।” “अरे ! भैया उन्हें क्या जरूरत है मुझे पैसे वैसे भेजने की । कोई एक फूटी कौड़ी भी नहीं भेजता और मुझे उनके पैसे चाहिए भी नहीं अभी तो ई·ार की कृपा से हाथ-पाँव चल रहे हैं । अपना इंतजाम खुद कर लेती हूँ । तेरा यह मामा है ना इसके सहारे जीवन कट रहा है । अब ये बेचारे भी कितना करेंगे फिर भी अपनी श्रद्धा से बेचारे मेरे लिए कुछ न कुछ करते ही रहते है मुझे कुछ काम करने ही नहीं देते कहते है कि आप चुपचाप खाट पर बैठी रहा करो हम हैं न काम करने के लिए आप को काम करने की कोई जरूरत नहीं है।”
“बेटा मैं घर पर ही रहकर घर के कामों में हाथ बटाती रहती हूँ । मेरा घर पर काम करना भी तेरे मामा को अच्छा नही लगता कहता है मौसी आप आराम से खाट पर बैठी रहा करो काम करने के लिए बच्चे हैं ना फिर आप क्यो काम करती हो,आप बस खाट पर बैठी रहा करोे और आराम किया करो किसी चीज की जरूरत है तो बच्चों से कह दिया करो । अब बेटा जिन्हें मेरी जरूरत नही वहाँ जाकर क्यों मैं अपनी दुरगति करवाऊँ। यहाँ रहकर अपना वक्त काट रही हूँ अब जीवन का क्या है बस रामजी से प्रार्थना करती हूँ कि हे! रामजी हाथ पाँव के चलते में ही तू मुझे उठा लेना ।” “वहाँ पर बच्चों के पास धन-दौलत है किन्तु बूढ़े माँ-बाप को रखने के लिए जगह नहीं है। यह बेचारा गरीब धन दौलत से सही लेकिन दिल का बहुत अमीर है इसके मुकाबले में कोई टिकता ही नहीं -भगवान इसे सदा खुश रखे । वाह रे रामजी तेरी माया क्या तुझसे मांगा और क्या पाया...........?”
नानी की सारी कहानी सुनकर मेरे मन में एक व्यथा सी उत्पन्न हो गई । आखिर जीवन है क्या.....? धन-दौलत इकट्ठी करना , बच्चों को पालना , खाना -पीना ऐश करना क्या यही जीवन है ? आखिर क्यों मानव अपने बीते कल सेे मुँह मोड़ता है? क्या माँ-बाप का ही फर्ज है बच्चों को पाल पोसकर बड़ा करना उन्हे अच्छी शिक्षा दिलाकर उनके जीवन की नीव को मजबूत करना । बच्चों की अपने माँ-बाप के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं । जिन्हें माँ-बाप ने बड़ी मिन्नतो से माँगा था वही बच्चे बड़े होकर बूढ़े माँ-बाप का तिरस्कार करते है सोचो उन के दिल पर क्या बीतती होगी जिनकी एक खुशी के लिए उन्होंने हर कुर्बानी दी अपनी इच्छाओं को दबाकर उन्हें खुशी दी उनकी हर इच्छा को पूरा किया । जब वही बच्चे बुढ़ापे में माँ-बाप से गैरों सा व्यवहार करते है तो सोचो उन माँ-बाप के दिल पर क्या बीतती होगी, उस माँ के कलेज पर क्या बीतती होगी जिसे उसने अपनी कोख में नौ मास रखकर पालन -पौषण किया था। खुद दुख सहकर सदा अपनी संतान के सुख की सोचने वाली माँ जब असहाय हो जाती है तो बच्चे क्यों उसका तिरस्कार करते है वैसे तो देवी माँ का दिन रात जागरण करवाते है ,लेकिन जिस माँ ने देवी माँ से बड़ी मिन्नते करके उस लाल को मांगा था आज उस लाल को यह तक नही पता कि उसकी जननी किस हाल में जी रही है । जरा सोचो उस माँ का दिल कितना रोता होगा जिसके लालों को उसकी हालत की जानकारी ही नहीं ,जो अपने भरे - पूरे परिवार को छोड़कर दर -दर भटकती फिर रही है अपने लिए आश्रय मांगती फिर रही हो।यदि हमारे समाज में यही चलता रहा तो एक दिन ऐसा आएगा जब माँ-बाप संतान की चाह ही नहीं करेंगे । आखिल आज की पीढी को भी सोचना होगा कि आज जो वे अपने बूढ़े माँ-बाप के साथ कर रहे है कल बूढ़े होने का समय उनका है ,उन्हे भी बूढ़ा होना है...........आज जो वे अपने बूढ़े माँ-बाप के साथ कर रहे हैं कल उन्हें भी वहीं मिलेगा......तब उन्हें अहसास होगा माँ-बाप के दिल का दर्द । यह तो सच ही है जैसा बोओगे कल वैसी ही फसल तैयार होगी , वही आगे चलकर ब्याज के साथ मिलेगा।


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