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Wednesday, October 20, 2010

सौगात

                                      सौगात                                                  

शाम का समय था , मैं अपने मित्रों के साथ दिल्ली की सैर पर था । सैर करते -करते हम लोग कनॉट पैलेस जा पहुँचे । सचमुच कनॉट पैलेस दिल्ली का दिल है । चारो तरफ भीड़ ही भीड़ एक से बढ़कर एक दुकान सारा इलाका लोगों से खचाखच भरा हुआ था । यहाँ पर किसी को किसी की फिक्र ही नहीं ,सब अपनी मस्ती में चले जा रहे है। इसी भागती दिल्ली में हम लोग इधर -उधर सैर कर रहे थे , सैर करते -करते देश की राजनीति पर बातें शु डिग्री हो गई कि  हम कहाँ थे ? कहाँ आ गए । दिन प्रतिदिन बदलती राजनीति और राजनेताओं की स्थिति और आम आदमी की स्थिति में कितना अंतर आ गया है । नेता आज देश सेवा के उद्देश्य से राजनीति में नहीं आते बल्कि अपनी आर्थिक उन्नति के लिए ही राजनीति में घुसते हैं । हम अपनी चर्चा करते हुए इधर -उधर का नजारा देख रहे थे कि तभी कही से पकौड़ियों की खुशबु आई, हमारा ध्यान  राजनीति और राजनेताओं से हटकर उन पकौड़ियो की तरफ लग गया । काफी समय से पैदल  सैर करने के कारण हमें भूख भी लग रही थी सो हम उस दुकान की तरफ चल दिए जहाँ से पकौड़ियों की खुशबु आ रही थी । वहाँ जाकर देखा कि  छोटी सी दुकान है, पर काफी भीड़ थी । हमने पकौड़ियों की तीन प्लेट ली और पास ही रखी बैंच पर जाकर बैठ गए । वास्तव में  पकौड़ियाँ स्वादिष्ट थीं ।


पकौड़ी खाते -खाते अचानक मेरी नजर एक बूढ़े व्यक्ति पर पड़ी जिसकी उम्र होगी यही कोई  अस्सी - पिचासी वर्ष । दुबला पतला फटा कुरता और  धोती पहने  कुछ बेच रहा था ।  स्वयं खड़ा  होकर चलने में असमर्थ था फिर भी लाठी  के सहारे चलने का प्रयास कर रहा था । वह गुब्बारे और बीड़ी, सिगरेट बेच रहा था । इधर -उधर घूमकर गुब्बारे ,बीड़ी, सिगरेट बेचता और किसी पेड़ के नीचे बैठकर सस्ताने लगता । इधर- उधर घूमने के कारण उसकी सांसे फूलने लगती तो  एक स्थान पर बैठकर अपना सामान बेचने की कोशिश करता लेकिन वहाँ पर पहले से ही बैठे लोग उसे वहाँ बैठने नहीं देते ,उसे वहाँ से भगा देते।  बेचारा अपना सामान इकट्ठा कर फिर उसी प्रकार इधर - उधर घूमकर सामान बेचने लगता । उम्र के इस अंतिम  पड़ाव पर वृद्ध को  इस प्रकार का संघर्ष करते हुए देखकर मेंरे मन में उस के विषय में जानने की इच्छा हुई । जिस उम्र में व्यक्ति ईश्वर का भजन ध्यान करता है।  पोते -पोतियो के साथ खलता है लकिन वह वृद्ध यहाँ पर सामान बेच रहा है  आखिर ऐसी क्या वजह होगी कि इसे इस उम्र में भी इस प्रकार काम करना पड़ रहा है?



मैने उस पकौड़ीवाले दुकानदार से उस वृद्ध के बारे में  पूछना चाहा कि वह कौन है?  कहाँ का है ?  आदि बातें ।
दुकानवाले ने बताया कि वह उस वृद्ध के बारे में ज्यादा तो कुछ नहीं जानता पर हाँ इतना जरूर जानता है कि किसी जमाने में वह अच्छा  खासा अमीर व्यक्ति हुआ करता था । दिल्ली के पास एक गाँव है वहाँ पर इसके  पास लगभग तीस बीघे जमीन थी । हँसता खेलता परिवार था । तीन बेटियाँ और एक बेटा । सुना है  इसके बेटे ने इसके साथ धोखा करके इसकी सारी जमा पूँजी अपने नाम कर ली और इसे घर से बेज्जत करके निकाल दिया । यह बेचारा अब अपना जीवन निर्वाह करने के लिए यह काम कर रहा है। जो कुछ दिन भर कमाता है उसी से कुछ खा लेता है । भाईसाहव मैं इसे यहाँ पर पिछले पाँच - छह  सालों से देख रहा हूँ । यह बेचारा किस्मत का मारा अपनों के हाथों ही लुटा हुआ है ।
दुकानवाले से उस वृद्ध के बारे में थोड़ी जानकारी पाकर मेंरे मन में उस वृद्ध से मिलने की इच्छा हुई । मैे अपने साथियों को वहीं ठहराकर उस वृद्ध के पास गया । वह उस समय एक पेड़ के नीचे बैठा था । उससे बात करने के लिए पहले मैने उससे दो गुब्बारो का दाम पूछा – “बाबा गुब्बारा कितने का दिया है।”

“पाँच रुपए का।”
“अच्छा दो गुब्बारे देना ।”
गुब्बारे लेकर मैने पैसे देते हुए पूछा “बाबा आप इस उम्र में भी काम  करते हैं वह भी इस हालत में ?”
“अरे ! बेटा क्या क डिग्री इस  पापी पेट को भरने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही होगा।”
“मगर इस हालत में …?”
“हाँ बेटा यह हालत मुझे मेरे बेटे की सौगात है । बेटा जवानी हो या बुढ़ापा यह पापी पेट तो तीनों वक्त का भोजन माँगता है । अब मेरे जैसे बेसहारा बुजुर्गों के सामने दो ही रास्ते   होते हैं एक तो यह कि अपमान और जिल्लत  भरा जीवन जीए ,बच्चों द्वारा फेंके गए टुकड़ों को खाकर घुट-घुटकर जीते रहो । और दूसरा रास्ता यह है कि आप खुद आत्मसम्मान के साथ जीते हुए अपना जीवन बिताओ । किसी के सामने हाथ न फैलाओ चाहे वह तुम्हारा अपना बेटा ही क्यों न हो? जब जीवन के अस्सी साल आत्सम्मान के साथ जीआ हूँ , तो अब क्यों किसी के आगे हाथ फैलाऊँ । भले ही भूखा  मर जाऊँ पर किसी के सामने रोटी कपड़ा और मकान के लिए गिड़गिडाऊँगा नहीं। ईश्वर ने जीवन दिया है वही इस जीवन की नैया पार लगाएगा ।”
पर  “बाबा अब आपकी उम्र कमाने की नहीं ? बच्चों के साथ रहने की है, नाती पोतो के साथ खाने खेलने की है। आप तो ठीक से चल भी नहीं पाते हो बार -बार आपकी साँसे फूल जाती है। आप के बच्चों ने आप को यह सब करने से कभी रोका नहीं ।”


“अरें ! बेटा  मेरी जो यह हालत तुम देख रहे हो ना ? यह मेरे बच्चों की ही दी गई  सौगात है मेरे लिए । यह बूढ़ा कभी मीलों का फासला घंटों में तैय कर लेता था पर अब तो स्थिति ऐसी है कि दस कदम भी लगातार नहीं चल सकता वह भी बिना लाठी के तो  एक कदम भी नहीं रख सकता । सब अपने अपने भाग्य से मिलता है बेटा ।”
क्या कह रहे हो बाबा ? - मैने पूछा
“हाँ बेटा यह बात सुनने में तुम्हे थोड़ी अजीब सी जरूर लगेगी पर जो कुछ भी मैं कह रहा हूँ सब सच है। तुम सोच रहे होगे कि मैं खुद ही अपने बच्चों के पास रहना नहीं चाहता हुँगा सो कोई भी मनगढ़ंत कहानी सुना रहा हूँ । ऐसा कौन कंबख्त बाप होगा जो अपने नाती -पोतों के होते हुए घर से बाहर रहकर एक भिखारी के सामान जीवन बिताएगा। सब किस्मत से मिलता है जब तक्दीर ही खराब हो तो कोई क्या कर सकता है। किस्मत से ज्यादा किसी को न मिला है न मिलेगा । अक्सर तुमने सुना , देखा होगा कि बच्चे माँ - बाप को कोई यादगार सौगात देते हैं । मेरे बच्चों ने भी मुझे इतनी अच्छी यादगार सौगात दी है कि मैं मरते दम तक नहीं भूल सकता । मैं एक ऐसा बदनसीब बाप हूँ जिसे किसी गैर ने नहीं लूटा खुद अपने ही खून ने धोखे से लूट लिया । वाह रे ! किस्मत .......।”

  
आपको लूट लिया बात कुछ समझ में नही आई बाबा - आखिर बात क्या है?


“जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो बूढ़े माँ-बाप उन्हें बोझ से समान लगने लगते हैं। उन्हें लगता है कि वे जो कुछ भी कर रहे हैं सब सही है।  जब तक आपके पास किसी प्रकार की धन दौलत है तब तक बच्चे आपके आगे -पीछे घूमेंगे और जैसे ही उन्हें पता चलेगा कि बूढ़े माँ- बाप के पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है तो बस तभी से वे लोग तुम्हें ताने मार-मारकर घायल कर देंगे। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ । मेरे पास तीस बीघे जमीन थी । जमीन भी कैसी सोना उगलनेवाली । साल में तीन से चार फसल होती थी । ये लगा लो कि साल में कम से कम तीन -चार लाख की फसल आ जाती थी ।”  


आज से करीब बीस साल पहले तक मैं एक नामी जमीनदार हुआ करता था मेरे पास तीस बीघे जमीन थी और पुरखों की एक शानदार हवेली । “मैं अपने बाप की इकलौती संतान था सो जो कुछ पिता के पास था सब मुझे ही मिल गया । ईश्वर की कृपा से मेंरे चार संताने हुई जिनमें तीन बेटियाँ और एक बेटा था। मैने अपनपढ होते हुए भी अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाई उन्हें अपने पैरो पर खड़ा किया ।” लेकिन “मुझे क्या पता था कि जिन बच्चों को मैं पाल पोसकर बड़ा कर रहा हूँ वही एक दिन मुझे  इस हालत में लाकर छोड़ देंगे। अगर ऐसा पता होता कि जिन पौधों के मैं सीच कर बड़ा वृक्ष बना रहा हूँ वे ही मेरी मुसीबत का कारण बनेंगे। तो यह सब हरगिज़ न करता ।”


“हमारा गाँव दिल्ली की सीमाओ से ही लगा हुआ है।  कुछ साल पहले की बात है सरकार ने हमारे यहाँ की सारी जमीन का अधिग्रहण कर लिया था जिसके बदले में मुझे पचास लाख रुपए मिले थे । पचाल लाख रुपयों को देखकर बेटे की नीयत में खोट आ गया वह दिन प्रतिदिन उन रुपयों को हथियाने की कोशिश में लगा रहता उसे डर था कि कहीं मैं उन पैसों को बेटियों में न बांट दूँ। यह सिलसिला काभी समय तक चलता रहा । “एक दिन मेरी पत्नी की तबियत ज्यादा खराब हो गई उसे अस्पताल में भरती करवाया गया उस के इलाज पर मैने लाखों रुपए खर्च कर दिये लेकिन उसे बचाया न जा सका । वह मुझे इस संसार में अकेला छोड़कर चली गई । अच्छा हुआ वह बेचारी पहले ही इस संसार से चली गई नही तो यह सब देखकर  जीते जी अपने आप ही मर जाती । उसे अपने आप पर पछतावा होता कि उसने इस नालायक बेटे को जन्म दिया ।  पत्नी के इलाज पर जो लाखों रुपए खर्च हुए थे उस का बेटे बहु को बहुत दुख था कि लाखों रुपए यों ही बरबाद कर दिए।”


“पत्नी के देहांत के बाद मेरा भी स्वास्थ्य खराब रहने लगा। घर में कोई देखभाल करने वाला जो नहीं था । बेटे को अपने काम से फुरसत नहीं थी और बहु को अपने घर के कामों से फुरसत ही काहाँ थी। समय पर जो कुछ मिल जाता खा लेता नहीं मिलता तो आने  की उम्मीद लगाए बैठा रहता । किसी -किसी दिन तो सुबह से लेकर शाम तक खाना भी नहीं मिल पाता था जब बच्चों को याद आ जाती तो शाम को रुखा -सूखा थाली में रखकर दे जाते ।  खाना बाद में आता पहले तानों से भरी आवाजें घर के अंदर से आने लगती थीं।” 

“धीरे -धीरे मेरा स्वास्थ्य भी खराब होने लगा और एक दिन मुझे सांस लेने में बहुत तकलीफ होने लगी सो अस्पताल में भरती करवाया गया । अस्पताल के खर्चे  के लिए बेटे  ने बैंक के चैक पर मेरे अँगूठे का निशान यह कहकर लगवा लिया कि आपके इलाज के लिए काफी पैसों की जरूरत पड़ेगी और मेरे पास उतने पैसे हैं नहीं । मैं सीधा -साधा किसान बुद्धि का आदमी मैने चैक पक बिना रकम देखे अपना अँगूठा लगा दिया। बेटे ने इस मौके का खूब फायदा उठाया उसने मेरे खाते से तीस लाख रुपए निकालकर अपने खाते में जमा कर लिए । कुछ समय बाद जब मैं ठीक होकर घर वापस आया । एक दिन अनायास ही मैं  बैंक की तरफ चला गया । बैंक जाकर मुझे पता चला कि मेरे बैंक खाते से सारी रकम उस चैक के माध्यम से निकालकर बेटे ने अपने खाते में जमा कर ली है।”


“बैंक से सीधा घर वापस आया और बेटे के घर आने का इंतजार करने लगा । शाम को जब बेटा घर आया तो मैने उससे पूछा कि तुमने मेरे खाते के सारे पैसे अपने खाते में क्यों डाल दिए  ।” बेटे ने कहा कि “आप तो अस्पताल में भरती थे क्या पता था कि आप अस्पताल से घर  वापस भी आते की नहीं इसी लिए मैंने आपके खाते से सारे पैसे निकालकर अपने खाते में जमा कर लिए ।”

“पर बेटे जो कुछ भी मेरे पास है वह सब तेरा ही तो है फिर तुझे इस प्रकार करने की क्या जरूरत थी ।” “जरूरत , जरुरत क्यों नहीं थी? अगर आप पैसो को बैक में ही रखकर मर जाते तो बैंक वाले थोड़े ही इतनी आसानी से लाखों रुपयों को देते । फिर आप को पैसों की ऐसी क्या आवश्यकता है आप को तीनो वक्त का भोजन , पहनने के लिए कपड़े तो मिल ही रहा है ना फिर क्यों चिक - चिक लगा रखी है पैसा , पैसा ? पैसे को क्या छाती पर रखकर मरोगे।”
बेटे की इस प्रकार की कटु बातें  सुनकर मेरा मन किया कि  पुलिस  थाने जाकर शिकायत कर दूँ । फिर सोचा  यह सब करके भी क्या फायदा ? वैसे भी मैंने  यह सब इसी के लिए ही तो इकट्ठा किया था । अपनो द्वारा ठगे जाने के कारण मैने सोचा चलो अब मुझे इस जीवन से मुक्ति ले लेनी चाहिए सो जीवन से मुक्ति पाने के लिए मैंने एक दिन यमुना नदी में कूदकर जान देने की कोशिश की लेकिन वहाँ भी न मर सका । शायद जीवन में और दुख देखने बाकी थे । उस  दिन मैंने फैसला किया कि अब मैं उस घर में वापस लौटकर नहीं जाऊँगा , और ना ही आज तक कभी बेटे - बहु ने मुझे खोजने की कोशिश की । तब से मैं यह काम कर रहा हूँ दिन भर जो कुछ कमा लेता हूँ उसी से अपना पेट भर लेता हूँ । जब तक मुझ में दम है, काम करने की ताकत है। तब तक किसी के आगे हाथ नहीं फैलाऊँगा । आगे की पता नहीं ? अब तो ईश्वर से दिन - रात प्रार्थना करता हूँ कि ईश्वर अब तू मुझे इस संसार से उठा ले ।”

“कमाना खाना तो ठीक है पर आप रहते कहाँ पर हैं?”
“यही पास ही एक बस्ती है उसी में रहता हूँ। मुझ जैसे बदनसीब वहाँ पर और भी बहुत हैं।”
“अभी तो ठीक है गरमी का मौसम है किन्तु शरदी और बरसात में तो आपको बहुत परेशानी उठानी पड़ती होगी।”  

“अब परेशानियो से डर नहीं लगता बेटा । हाँ शरदियों के मौसम में अधिक शरदी के कारण कई दिनो तक बाहर नहीं जा पाता सो कई कई दिनो तक उपवास रखकर ही काटने पड़ते हैं । जब थोड़ा बहुत मौसम खुल जाता है सूरज निकल आता है, तो बाहर सामान बेचकर कुछ पैसे कमा लाता हूँ और इस पापी पेट को भरने की कोशिश करता हूँ । यह पेट है कि भरने का नाम ही नहीं लेता।

जैसे भी हो “बस अब तो मौत का इंतजार है कि कब मौत आए और मुझे इस जीवन से मुक्ति मिल जाए । बेटा हर किसी को जीवन मे सुख नसीब नहीं होता । मुझ जैसे लाखों बदनसीब है जो तिल तिल मर रहे है फिर भी जी रहे हैं।”
“देख लो बेटा यही है मेरे बेटे की सौगात अपने बूढ़े बाप के लिए ।”

Thursday, September 30, 2010

बन्धन

घर के बन्धन तोड़कर , निकले इस मोड़ पर
देखो इन दीवानों को , देखो इन मस्तानो को

                             घर के बंधन तोड़कर , प्यार का बंधन जोड़कर
                              मस्ताने निकल आए आज अपनी राह पर .
न घर का पता न मंजिल का
ये घर से बेगाने होकर चले आए .
                             
                          घर के बन्धन तोड़कर , निकले इस मोड़ पर

                          देखो इन दीवानों को , देखो इन मस्तानो को

लगी जो एक लगन , खिल गए देखो चमन ,
आज  झूमे इनकी मस्ती में,धरती और गगन
अरे देखो इन दीवानों को ,देखो इन मस्तानों को

                                 हंसते हुए दिलों को आंसूं देकर आओगे?
                                 बहते हुए  आंसुओं पर क्या तुम अपना घर बसाओगे .?
                                 टूटे दिलों कि आहें लेकर क्या तुम ख़ुशी से जी पाओगे?

घर के बन्धन तोड़कर , निकले इस मोड़ पर
देखो इन दीवानों को , देखो इन मस्तानो को


                             माना कि जीवन में हर चीज़ पानी ज़रूरी है
                            जिसको तुमने चाह ,उसकी खातिर  हो गए दीवाने ,

राह हो जीने की या पढने की  या हो सच्चाई पर चलने की
जीवन की राह पर तुम  हार न जाना ,सच्चाई की  राह से कभी दूर न जाना .
                         
                              घर के बन्धन तोड़कर , निकले इस मोड़ पर
                               देखो इन दीवानों को , देखो इन मस्तानो को

Monday, September 13, 2010

तितली रानी

       तितली रानी तितली रानी
       सुंदर -सुंदर पंख तुम्हारे
       इतने सुंदर पंख लाई कहाँ से ,


जब तुम फूलों पर मंडराती हो 
फूलों का रस ले जाती हो

       चुपके से तुम मेरी बगीया के फूलों का रस ले जाती हो
       फूलों के रस का क्या तुम अपने घर पर  शहद बनती हो,

होते पंख अगर मुझको भी
मैं भी फूलों पर संग तुम्हारे मंडराता
                                     लेकर फूलों से सुन्दर -सुंदर रंग
                                    मैं भी अपने सपनों को खूब सजाता

तितली रानी तितली रानी
फूल -फूल पर तुम मंडराती हो ,

Thursday, September 9, 2010

मोर


     
देखो मोर नाच रहा है
पंखों को खोल रहा है
        नाच इसका सबको भाता
       जब यह पंखों की छतरी  फैलाता

   

          काले -काले बदल इसको भाते
          देख इन्हे यह पिहू -पिहू का गीत सुनाता



सुनकर इसके गीतों को
  बरखा रानी आती मस्ती में

Monday, September 6, 2010

मैं बड़ा हो गया हूँ

मैं तुम्हें याद आता हूँ ,
जब हम साथ नहीं होते.
मैं बड़ा हो रहा हूँ इतनी जल्दी
देखो तो ज़रा मैं कितना बड़ा हो गया हूँ .
       पकड़कर  हाथ तुम्हारा चलना सीखा
      लो आज मैं दौड़ रहा हूँ
      जबसे मैने चलना सीखा ,
      अब तक बहुत बदल गया हूँ .
साल महीने गुजर  गए
देखो मैं बड़ा हो गया
देखोगे जब तुम मुझको
सोचोगे  यह कब हुआ .
     दीवार पर टंगी मेरी तस्वीर है
     एक नज़र उसे देख लेना
    देखकर  तस्वीर तुम्हे याद मेरी आएगी
    जब मैं छोटा था , तुम्हारी गोदी मैं सोता था .

Thursday, April 29, 2010

छोटी बहू

कल रात पड़ौस के घर में बड़ी हलचल मची हुई थी । एक आदमी अपनी पत्नी को बड़ी ही बेरहमी से मार रहा था । वह बेचारी रो रही थी और आदमी उस पर दना दन बजाए जा रहा था। वह पिटती जा रही ,और रोती जा रही थी, पर उस निर्दयी को उस पर लेशमात्र भी दया नहीं आ रही थी । वह उसे कभी थप्पड़ों से तो कभी घूंसों से तो कभी लात सें मार रहा था और जब हाथ-पैरो से मारते - मारते थक गया तो एक लकड़ी उठा ली और उससे मारने लगा । शायद कोई जानवर को भी इतनी बेरहमी से न मारता होगा जिस बेरहमी से वह अपनी पत्नी को पीट रहा था । जब तक स्त्री से सहा गया वह मार खाती रही जब उसका सब्र टूट गया तो उसे भी क्रोध आ गया ।उसने खड़े होकर ड़ंड़े को पकड़ लिया और बोली – “बस ! बहुत हो चुका , अब तक चुपचाप मार खा रही थी सो खाई अब अगर तुमने मुझे हाथ भी लगाया तो ठीक न होगा। तुम इन्सान हो या जानवर ? इस तरह तो कोई किसी जानवर को भी नहीं मारता होगा जिस तरह तुम मुझे पीट रहे हो ? आखिर मेरा कसूर क्या है ? जो तुम मुझे इतनी बेरहमी से पीट रहे हो। जब से ब्याह कर इस घर में आई हूँ तब से लेकर आज तक तुम लोगों ने जो - जो अत्यार मुझपर किए मैने चुप- चाप सहे लेकिन अब और न सहुँगी। आज से मेरा तुमसे कोई रिश्ता -नाता नहीं । सहने की भी एक सीमा होती है। मैं कहीं भी मेहनत मज़दूरी करके अपना और अपने बच्चों का पेट भर लुँगी, और अगर कहीं कोई काम नहीं मिला तो भीख मांगुँगी पर लौटकर इस घर में न आऊँगी” - कहकर अपने दो-तीन माह के बच्चे को गोद में उठाया और दूसरे हाथ से अपने तीन-चार साल के बेटे को पकड़कर घर से बाहर चलने लगी।वहीं पर उसकी सास खड़ी थी । सास ने दोनों बच्चों को उससे छीनते हुए कहा- “तुझे जहाँ कहीं भाड़-कूएँ में जाना है तो जा बच्चों को कहाँ ले जा रही है?” दोनों बच्चों को लेकर सास -बहू में खूब जमकर बहस हुई । हाय रे! विधाता ये कैसा जमाना जहाँ औरत ही औरत की दुश्मन बनी बैठी है। एक माँ दूसरी माँ का दर्द ही नहीं समझती तो वह कैसी माँ? खैर जो भी हो आखिर बहू को बिना बच्चों के ही घर से बाहर निकाल दिया गया और घर के दरवाजे अंदर से बंद कर लिए गए । बेचारी बहू.......काफी समय तक बाहर दरवाजे पर ही रोती - बिलखती रही । आज उसका साथ देने वाला वहाँ कोई नहीं था । बेचारी बाहर बैठी-बैठी बच्चों के लिए बिलख रही थी, किन्तु निर्दयी माँ -बेटे को उस पर तनिक भी दया न आई। बाहर स्त्री रो रही थी और अंदर उसके दोनों बच्चे । हाय रे! ह्यदयहीनता मानव का मानव के प्रति यह अत्याचार । एक दिन इसी स्त्री को ये लोग बड़े ही जतन से ब्याहकर लाए होंगे । एक दिन इसी स्त्री के साथ पति ने न जाने कितने कस्में बादे किये होंगे, न जाने उस स्त्री की एक झलक के लिए, उससे बातें करने के लिए क्या-क्या बहाने बनाए होंगे । किन्तु आज इतना निष्ठुर हो गया है , मानो उसे पहचानता ही न हो । कभी उसने स्त्री को उसके सुख-दुख में साथ देने का वादा किया होगा किन्तु आज वह अपने उन सब वादों को भूल चुका है ।


वाह रे इन्सान ..........।इन दोनों के ब्याह को हुए बहुत दिन भी नहीं बीते , कुल चार -पाँच साल हुए होंगे । इन्हीं चाल-पाँच सालों में ही इनकी यह हालत है । सास - बहू का झगड़ा तो घर -घर की कहानी है किन्तु इस प्रकार किसी की बसी बसाई गृहस्ती टूट जाए यह भी तो ठीक नहीं । रोज़-रोज़ सास -बहू का झगड़ा , सास का दिन -रात बहू को ताने मारते रहना, हर काम में नुकस निकालते रहना , बहू भी सहे तो कितना....आखिर वह भी तो हाड़ -मास की ही से ही बनी है, कोई मशीन तो है नहीं। उसके सीने में भी और लोगों की तरह दिल है जो धड़कता है, वह भी खुशी - गम महसूस करती है । आज अगर बहू की जगह उनकी बेटी पर कोई इस तरह का आरोप लगा रहा होता तो यही माँ उसकी ढ़ाल बन जाती । किन्तु यह उसकी बेटी नहीं है बहू है। क्यों लोग बहुओं को बेटी का दर्जा नहीं दे पाते । स्त्री के रोने की आवाज सुनकर आस-पड़ौस के कुछ लोग वहाँ पर एकत्रित हो गए । आस-पड़ौस के लोगों ने घर के बंद क्यों दरवाजों को खुलवाया और घर के अंदर लोगों की भीड़ जमा हो गई । वहाँ पर इकट्ठे हुए लोगों ने घटना की जानकारी जानी तो कुछ लोग वहू के पक्ष में बातें करने लगे, तो कुछ लोग बहू की सास और बेटे के पक्ष में बातें करने लगे ।दर अल यह झगड़ा शुरू हुआ था एक चाँदी की पायलों की जोड़ी को लेकर । सास कहती कि मैने इसके ब्याह के समय इसे पाव किलो चाँदी की पायल दी थी जिन्हें यह अपने माइके में रख आई है या बेच दी हैं। बहू कहती कि मैने ब्याह के दूसरे महीने बाद ही उन पायलों को उन्हें लौटा दिया था । उसके बाद से उसने वे पायल न तो देखी हैं और न ही उसे उन पायलों के बारे में कुछ पता है। सास यह सिद्ध करने का प्रयास कर रही थी कि बहू ने पायल वापस दी ही नहीं हैं। एक तरफ सास और दूसरी तरफ बहू दोनों एक दूसरे पर आरोप - प्रत्यारोप करने में लगीं थी । बहू रोती जाती और बार-बार यही दोहराती कि वह उन पायलों के बारे में कुछ नहीं जानती उसने पायलों को बहुत दिनों पहले ही सास को लौटा दिया था। मुझ पर बेवजह ही चोरी का इल्जाम लगा रही हैं। किन्तु सास इस बात को मानने के लिए तैयार ही नही कि बहू ने कभी उसे पायल दी थी । पुरुष काठ के उल्लू के समान एक कोने में खड़ा तमाशा देख रहा था । जब स्त्री ने वहाँ पर एकत्रित भीड़ को उसकी करतूत बताई कि उसने उसे किस बेरहमी से मारा है उसने वहाँ पर खड़ी अन्य औरतों को अपने शरीर पर मार के पड़े निशानों को दिखाया तो सभी लोगों ने आदमी की निंदा की । जब से वह ब्याह कर उस घर में आई थी तब से अब तक कभी भी उसने किसी चीज की चाह नहीं की जो रुखा सूखा मिल जाता था उसी से संतुष्ट होकर अपना जीवन व्यतीत कर रही थी । दिन -रात बैलों की तरह काम करती रहती फिर भी उसे एक प्यार का बोल नसीब नहीं हो पाता । इस पूरे फसाद की जड़ वह सास ही थी । सास दिन -रात बहू की उलटी -सीधी चुगली बेटे से करती रहती । एक तो थका हारा आदमी जब घर पहुँचता है वह चाहता है कि घर पर दो मिनिट सुकून से गुजारे पर जब उसके घर आते ही घर में कलह शुरू हो जाती तो उसका भी पारा चढ़ जाता और उसका सारा गुस्सा बहू पर ही निकलता । सास नहीं चाहती कि उसका बेटा उसकी किसी भी बात को काटे । वह चाहती कि उस घर में सदैव उसका ही राज चले वह नहीं चाहती कि उसके बहू बेटे उसकी किसी भी आज्ञा की अवहेलना करें । उसके इसी व्यवहार के कारण उसके तीन बेटे और बहुएँ घर छोड़कर जा चुके थे। यह बेटा सबमें छोटा था । सास की दिन- रात की कलह के कारण ही घर में सदैव कलह मचा रहता था, घर में सदैव अशांति का माहौल बना रहता। इसी के कारण घर में किसी भी प्रकार की कोई बरकत नहीं हो पा रही थी । दिन -रात बहू के खिलाफ बेटे के कान भरती रहती थी ताकि उसका बेटा सिर्फ उसकी ही बात सुने जो वह कहे वही सच हो । उसे लगता है कि अगर बेटा बहू की बातों पर विश्वास करने लगेगा तो उसका उस घर से राज खत्म हो जाएगा।
वहाँ पर खड़ी भीड़ ने उन लोगों को समझाया कि इस प्रकार घर में लड़ाई -झगड़े नहीं किया करते । किन्तु माँ-बेटे के कान पर जूँ तक न रेंगी । बहू ने अपने दोनों बच्चों को उठाया और घर से चलने लगी तो उसके पति ने पूछा – “बच्चों को कहाँ ले जा रही है?”
“कहीं भी ले जाऊँ, दुनिया बहुत बड़ी है कही भी चली जाउँगी जहाँ चैन से जी सकूँ।”
“खाएगी क्या”
“इससे तुम्हें क्या लेना -देना मैं चाहे कुछ खाऊँ या भूखी रहूँ । तुम्हें मेरी चिंता करने की कोई जरूरत नही है।”
“जितनी मेहनत यहाँ करती हूँ अगर इतनी मेहनत मैं कही भी करुँगी तो इज्ज की रोटी कमा ही सकती हूँ । तुम इसकी चिंता मत करों मैं बच्चों को वापस लेकर तुम्हारी चौखट पर पाँव भी नहीं रखूँगी। इतनी ताकत अभी भी मुझ में हैं कि तुम दोनों माँ-बेटे से ज्यादा मेहनत मजदूरी कर सकती हूँ। अगर कही कोई मजदूरी नहीं मिली तो भीख माँगकर अपना और अपने बच्चों का पेट पालुँगी । लौटकर यहाँ कभी न आऊँगी” कहकर उसने बड़े बच्चे का हाथ पकड़ा और बाहर जाने लगी तो दोनो माँ-बेटे ने उसका रास्ता रोक लिया । बहू ने दोनों को ऐसी ललकार मारी कि उनके होश उड़ गए उन्होंने कभी कल्पना भी न की होगी कि वह ....................। दोनों अपना सा मुँह लेकर हट गए । ऐसा लग रहा था जैसे कि आज स्वयं माँ काली ने उसके शरीर में प्रवेश कर लिया हो जो अत्याचारियों का नाश करने के लिए ही आई हो। स्त्री अपने दोनों बच्चों को लेकर घर छोड़कर चली गई । वहाँ पर खड़ी भीड़ देखती की देखती रह गई ।

Thursday, April 1, 2010

एक मुलाकात

शहरों की भीड़-भाड़ भरी ज़िन्दगी में आदमी दिन-रात दौड़ता ही रहता है। इसी दौड़ का नतीजा है कि शहरों का वातावरम दिन-प्रतिदिन प्रदूषित होता जा रहा है। प्रदूषण भी इतना कि सांस लेने के लिए शुद्ध वायु का अभाव पड़ता जा रहा है। शहरों में अक्सर लोग शुद्ध वायु प्राप्त करने के लिए पार्कों में टहलने चले जाते हैं। एक शाम मैं भी एक पार्क में जा बैठा । पार्क का शांत वातावरण मेरे मन को मोहने लगा चारो ओर हरियाली ही हरियाली कहीं गुलाब के फूल खिले थे तो कही गेंदे,चमेली के । रह कर कानों में कोयल के कूकने की आवाज भी बड़ी ही मधुर लग रही थी । शांत वातावरण में बैठा कुछ सोच रहा था कि अचानक मुझे कुछ आवाज सुनाई दी - क्या मैं यहाँ पर बैठ सकता हूँ? मैने सकपका कर उधर देखा तो एक व्यक्ति मेंरे पास खड़ा था । मैने हाँमी भरते हुए उसे बैठने के लिए जगह दे दी । बैंच पर बैठने के कुछ समय तक तो वह व्यक्ति शांत बैठा रहा , मैं भी अपनी मस्ती में शांत वातावरण का आनंद ले रहा था कि अचानक उस व्यक्ति ने कहा कितना सुन्दर पार्क है? मैने हामी भरते हुए अपना सिर हिला दिया । फिर धीरे -धीरे बातों का सिलसिला चल पड़ा बातों ही बातों में उसने अपना नाम बता दिया । मैने भी उसे अपना नाम बता दिया। नामों की जान पहचान के बाद बात आ गई कि आप क्या करते हैं ? मैने बताया कि मैं एक शिक्षक हूँ , उसने बताया कि वह एक दुकान में सुनार का काम सीख रहा है । “कितने साल से हो यहाँ पर ?”- मैने पूछा
“यही कोई दो-तीन साल से ।”
“यहाँ किसके साथ रहते हो?”
“अकेला ही रहता हूँ ।”

उसके अकेले रहने की बात सुनकर मैंने उसके माता -पिता के बारे में पूछ लिया । मेरे इस सवाल से वह थोड़ा सा चिंतित सा हो गया। उसकी चेहरे से लग रहा था कि जैसे वह इस प्रश्न से नाखुश था । उसकी इस अवस्था को देखकर मैने पूछ ही लिया कि आखिर बात क्या है- तुम इतने गम्भीर क्यों हो गए ।
असल में मेरे पिताजी अब इस दुनिया में नहीं हैं । जब मैं तीन-चार साल का था तभी पिता जी का स्वर्गवास हो गया था । मेरे बड़े भाई ने ही मुझे पाला -पोसा, उसी की छत्र छाया में पला बड़ा हुआ हूँ। वहीं पूरे परिवार का पालन -पोषण करता था ।
“पालन - पोषण करता था , मतलब ?”- मैने पूछा
असल में, “अब बड़ा भाई भी इस दुनिया में नहीं है।”
क्या ?
हाँ “बड़े भाई को भी गजुरे हुए तीन-चार साल हो चुके हैं।”
ओह ! मैंने अफसोस जताते हुए कहा।
क्या हो गया था तुम्हारे बड़े भाई को क्या कोई बीमारी हो गई थी ? या ......

नहीं “उन्हें कोई बीमारी नहीं थी । एक दिन भैया सवेरे-सवेरे खेतों पर फसल देखने के लिए गए थे । वहाँ पर उन्हें एक साँप ने काट लिया । उनका काफी इलाज करवाया किन्तु सब बेकार और एक दिन भैया हम सब को छोड़कर इस दुनिया से चले गए । भैया तो इस दुनिया से चला गया लेकिन अपने पीछें दो साल का बेटा ,पत्नी और हम सब को अनाथ कर गया एक वही तो था जो मुझे अपने बेटे से भी ज्यादा प्यार करता था । भाई ने कभी भी मुझे अपना भाई नही बेटा माना था । कहकर उसकी आँखें भर आई। फिर थोड़ा संभलकर कहने लगा कि भाई की मृत्यु के बाद से ही मेरी पढ़ाई भी छूट गई । एक वहीं तो था जो मुझे पढ़ाना -लिखाना चाहता था । बाकी के दोनों भाईयों को तो मेरी कोई चिंता ही नहीं चाहे मेरी पढ़ाई छूटे या कुछ उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता …. घर की तंगी हालत को देखते हुए मैने अपने आप को पढ़ाई से दूर कर लिया और काम की तलाश में यहाँ आ गया। हमारे पास इतनी खेती तो है नहीं कि हम तीनों भाइयों का गुजारा हो सके वैसे भी खेती में उतनी पैदावार भी नहीं होती । काम की तलाश में शहर चला आया। यहाँ आकर सुनार की दुकान में काम कर रहा हूँ थोड़ी बहुत आमदनी भी होती है और अपना कारीगरी का काम भी सीख रहा हूँ।”

चार भाइयों में से एक तो चला गया बचे हम तीन हम तीनों में से दो भाई तो अपने बच्चे -पत्नियों के साथ खुश हैं । बचा मैं और मेरी माँ साथ में भाभी और भतीजा इन की जिम्मेदारी मेरी है। जब तक बडे भैया जीवित थे तब तक सारा परिवार एक ही छत के नीचे रहता था किन्तु भैया के जाते ही दोनो मझले भाइयों ने हमे घर से ऐस निकाल फेंका जैसे दूध में से मक्खी। मेरे पास अपनी पढ़ाई को बीच में ही छोड़ने के अलावा और कोइ चारा भी नहीं था। भाई जब ईश्वर देता है तो छप्पर फाड़र देता है और जब लेने पर आता है तो लेता ही चला जाता है। मैं तो ऐसा अभागा जिसे न तो पिता का प्यार नसीब हुआ एक पिता तुल्य भाई था उसे भी ईश्वर ने छीन लिया ।

जीवन की राह बहुत ही मुश्किलों भरी होती है । यहाँ आकर भी कई महिनों तक मुझे कोई काम नहीं मिला । न रहने का कोई ठिकाना था न खाने का जो कुछ पैसे थे खत्म हो गए थे । एक दिन एक चांट वाले के पास नौकरी मिल गई । मैने यहाँ चांट की ठेलियो पर झूठे बर्तन साफ करने का काम भी किया तब जाकर मुझे एक वक्त का भोजन नसीब होता था । खुले आसमान के नीचे सो जाता था क्योंकि इतने बड़े शहर में मेरा न तो कोई रिश्तेदार था और ना ही कोई जान पहचान का किसी अनजाने को कोई भाड़े पर कमरा भी नहीं देता था । जब मैने चाट वाले के यहाँ काम करना शुरु किया तब उसने मुझे एक कमरा भाड़े पर दिलवाया ।

जब चाट वाले को मरी आर्थिक परिस्थिति की जानकारी हुई तो उसने अपने जान पहचान के एक सुनार के यहाँ मुझे काम पर लगवा दिया । वहाँ पर मुझे तीन-चार हजार रुपए मिलते थे और दिन में जितने गहने बना देता था उस पर थोड़ा बहुत कमीशन भी मिलता था । वहाँ पर एक साल तक तो ठीक चलता रहा मैंने सोने चाँदी का काम जल्दी ही सीख लिया । मैं दिन- रात काम करता था इससे मुझे दुकानवाले को मुझे ज्यादा कमीशन देना पड़ता था यह देखकर कि मैं अन्य कारीगरों की तुल्ना में अधिक कमा रहा हूँ दुकानवाले की भी नियत खराब हो गई और उसने मेरे द्वारा बनाए गए गहनों पर मुझे कमीशन देने से इन्कार कर दिया, यहाँ तक कि उसने मुझे बिना तनख्वाह दिए नौकरी से निकाल दिया । अब मुझे ज्यादा तकलीफ नहीं हुई अब तक बाजार में मैने अपनी एक पहचान बना ली थी उसके नौकरी से निकालने के बाद मैने एक बड़े शो रूम में काम करना शुरु कर दिया यहाँ पर मुझे वहाँ की अपेक्षा अधिक तनख्वाह मिलने लगी ।

आज ईश्वर की कृपा से मैं इतना कमा लेता हूँ जिसमें मेरा गुजारा हो जाता है और कुछ पैसे अपनी माँ के पास भी भेजता रहता हूँ । एक बात तो है इन शहरो में कोई किसी का नहीं है । बिना मतलब के कोई किसी से बात तक नहीं करना चाहता । शहरों से अच्छे तो हमारे गाँव ही हैं कम से कम वहाँ पर आदमी - आदमी को पूछता तो है। यहाँ तो सब अपनी मस्ती में ही लगे रहते हैं मरने वाला मरे तो मरे जीने वाले जीए । लेकिन गाँव से बाहर निकरल ही हमारा नसीब खुल सकता है। अगर हममें काबलियत है तो शहर ही हैं जो हमारे सपनों को साकार कर सकते हैं। अब मुझे समझ में आया कि गाँव से लोग शहर की ओर क्यों भागते हैं। कुछ भी हो जो सकून की सांस गाँव में मिलती है शहरो में नहीं । शहरों में कमाने के लिए अपार धन है किन्तु अपनापन बहुत कम है।

उसकी आप बाती सुनते -सुनते समय का कोई पता ही नहीं चला । सूरज आसमान की गोद में समा चुका था । चहचहाती चिड़िया भी अपने-अपने घोंसलों में जाकर आराम कर रहीं थी । यहाँ पर पहले की अपेक्षा और भीड़ हो चुकी थी । कोई दौड़ रहा था तो कोई व्यायाम ,योगा कर रहा था । सब अपने - अपने कामों में व्यस्थ थे । ये जीवन है इसमें कोई किसी के लिए नहीं रुकता । शायद चलना ही जीवन है .........।