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Wednesday, October 20, 2010

सौगात

                                      सौगात                                                  

शाम का समय था , मैं अपने मित्रों के साथ दिल्ली की सैर पर था । सैर करते -करते हम लोग कनॉट पैलेस जा पहुँचे । सचमुच कनॉट पैलेस दिल्ली का दिल है । चारो तरफ भीड़ ही भीड़ एक से बढ़कर एक दुकान सारा इलाका लोगों से खचाखच भरा हुआ था । यहाँ पर किसी को किसी की फिक्र ही नहीं ,सब अपनी मस्ती में चले जा रहे है। इसी भागती दिल्ली में हम लोग इधर -उधर सैर कर रहे थे , सैर करते -करते देश की राजनीति पर बातें शु डिग्री हो गई कि  हम कहाँ थे ? कहाँ आ गए । दिन प्रतिदिन बदलती राजनीति और राजनेताओं की स्थिति और आम आदमी की स्थिति में कितना अंतर आ गया है । नेता आज देश सेवा के उद्देश्य से राजनीति में नहीं आते बल्कि अपनी आर्थिक उन्नति के लिए ही राजनीति में घुसते हैं । हम अपनी चर्चा करते हुए इधर -उधर का नजारा देख रहे थे कि तभी कही से पकौड़ियों की खुशबु आई, हमारा ध्यान  राजनीति और राजनेताओं से हटकर उन पकौड़ियो की तरफ लग गया । काफी समय से पैदल  सैर करने के कारण हमें भूख भी लग रही थी सो हम उस दुकान की तरफ चल दिए जहाँ से पकौड़ियों की खुशबु आ रही थी । वहाँ जाकर देखा कि  छोटी सी दुकान है, पर काफी भीड़ थी । हमने पकौड़ियों की तीन प्लेट ली और पास ही रखी बैंच पर जाकर बैठ गए । वास्तव में  पकौड़ियाँ स्वादिष्ट थीं ।


पकौड़ी खाते -खाते अचानक मेरी नजर एक बूढ़े व्यक्ति पर पड़ी जिसकी उम्र होगी यही कोई  अस्सी - पिचासी वर्ष । दुबला पतला फटा कुरता और  धोती पहने  कुछ बेच रहा था ।  स्वयं खड़ा  होकर चलने में असमर्थ था फिर भी लाठी  के सहारे चलने का प्रयास कर रहा था । वह गुब्बारे और बीड़ी, सिगरेट बेच रहा था । इधर -उधर घूमकर गुब्बारे ,बीड़ी, सिगरेट बेचता और किसी पेड़ के नीचे बैठकर सस्ताने लगता । इधर- उधर घूमने के कारण उसकी सांसे फूलने लगती तो  एक स्थान पर बैठकर अपना सामान बेचने की कोशिश करता लेकिन वहाँ पर पहले से ही बैठे लोग उसे वहाँ बैठने नहीं देते ,उसे वहाँ से भगा देते।  बेचारा अपना सामान इकट्ठा कर फिर उसी प्रकार इधर - उधर घूमकर सामान बेचने लगता । उम्र के इस अंतिम  पड़ाव पर वृद्ध को  इस प्रकार का संघर्ष करते हुए देखकर मेंरे मन में उस के विषय में जानने की इच्छा हुई । जिस उम्र में व्यक्ति ईश्वर का भजन ध्यान करता है।  पोते -पोतियो के साथ खलता है लकिन वह वृद्ध यहाँ पर सामान बेच रहा है  आखिर ऐसी क्या वजह होगी कि इसे इस उम्र में भी इस प्रकार काम करना पड़ रहा है?



मैने उस पकौड़ीवाले दुकानदार से उस वृद्ध के बारे में  पूछना चाहा कि वह कौन है?  कहाँ का है ?  आदि बातें ।
दुकानवाले ने बताया कि वह उस वृद्ध के बारे में ज्यादा तो कुछ नहीं जानता पर हाँ इतना जरूर जानता है कि किसी जमाने में वह अच्छा  खासा अमीर व्यक्ति हुआ करता था । दिल्ली के पास एक गाँव है वहाँ पर इसके  पास लगभग तीस बीघे जमीन थी । हँसता खेलता परिवार था । तीन बेटियाँ और एक बेटा । सुना है  इसके बेटे ने इसके साथ धोखा करके इसकी सारी जमा पूँजी अपने नाम कर ली और इसे घर से बेज्जत करके निकाल दिया । यह बेचारा अब अपना जीवन निर्वाह करने के लिए यह काम कर रहा है। जो कुछ दिन भर कमाता है उसी से कुछ खा लेता है । भाईसाहव मैं इसे यहाँ पर पिछले पाँच - छह  सालों से देख रहा हूँ । यह बेचारा किस्मत का मारा अपनों के हाथों ही लुटा हुआ है ।
दुकानवाले से उस वृद्ध के बारे में थोड़ी जानकारी पाकर मेंरे मन में उस वृद्ध से मिलने की इच्छा हुई । मैे अपने साथियों को वहीं ठहराकर उस वृद्ध के पास गया । वह उस समय एक पेड़ के नीचे बैठा था । उससे बात करने के लिए पहले मैने उससे दो गुब्बारो का दाम पूछा – “बाबा गुब्बारा कितने का दिया है।”

“पाँच रुपए का।”
“अच्छा दो गुब्बारे देना ।”
गुब्बारे लेकर मैने पैसे देते हुए पूछा “बाबा आप इस उम्र में भी काम  करते हैं वह भी इस हालत में ?”
“अरे ! बेटा क्या क डिग्री इस  पापी पेट को भरने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही होगा।”
“मगर इस हालत में …?”
“हाँ बेटा यह हालत मुझे मेरे बेटे की सौगात है । बेटा जवानी हो या बुढ़ापा यह पापी पेट तो तीनों वक्त का भोजन माँगता है । अब मेरे जैसे बेसहारा बुजुर्गों के सामने दो ही रास्ते   होते हैं एक तो यह कि अपमान और जिल्लत  भरा जीवन जीए ,बच्चों द्वारा फेंके गए टुकड़ों को खाकर घुट-घुटकर जीते रहो । और दूसरा रास्ता यह है कि आप खुद आत्मसम्मान के साथ जीते हुए अपना जीवन बिताओ । किसी के सामने हाथ न फैलाओ चाहे वह तुम्हारा अपना बेटा ही क्यों न हो? जब जीवन के अस्सी साल आत्सम्मान के साथ जीआ हूँ , तो अब क्यों किसी के आगे हाथ फैलाऊँ । भले ही भूखा  मर जाऊँ पर किसी के सामने रोटी कपड़ा और मकान के लिए गिड़गिडाऊँगा नहीं। ईश्वर ने जीवन दिया है वही इस जीवन की नैया पार लगाएगा ।”
पर  “बाबा अब आपकी उम्र कमाने की नहीं ? बच्चों के साथ रहने की है, नाती पोतो के साथ खाने खेलने की है। आप तो ठीक से चल भी नहीं पाते हो बार -बार आपकी साँसे फूल जाती है। आप के बच्चों ने आप को यह सब करने से कभी रोका नहीं ।”


“अरें ! बेटा  मेरी जो यह हालत तुम देख रहे हो ना ? यह मेरे बच्चों की ही दी गई  सौगात है मेरे लिए । यह बूढ़ा कभी मीलों का फासला घंटों में तैय कर लेता था पर अब तो स्थिति ऐसी है कि दस कदम भी लगातार नहीं चल सकता वह भी बिना लाठी के तो  एक कदम भी नहीं रख सकता । सब अपने अपने भाग्य से मिलता है बेटा ।”
क्या कह रहे हो बाबा ? - मैने पूछा
“हाँ बेटा यह बात सुनने में तुम्हे थोड़ी अजीब सी जरूर लगेगी पर जो कुछ भी मैं कह रहा हूँ सब सच है। तुम सोच रहे होगे कि मैं खुद ही अपने बच्चों के पास रहना नहीं चाहता हुँगा सो कोई भी मनगढ़ंत कहानी सुना रहा हूँ । ऐसा कौन कंबख्त बाप होगा जो अपने नाती -पोतों के होते हुए घर से बाहर रहकर एक भिखारी के सामान जीवन बिताएगा। सब किस्मत से मिलता है जब तक्दीर ही खराब हो तो कोई क्या कर सकता है। किस्मत से ज्यादा किसी को न मिला है न मिलेगा । अक्सर तुमने सुना , देखा होगा कि बच्चे माँ - बाप को कोई यादगार सौगात देते हैं । मेरे बच्चों ने भी मुझे इतनी अच्छी यादगार सौगात दी है कि मैं मरते दम तक नहीं भूल सकता । मैं एक ऐसा बदनसीब बाप हूँ जिसे किसी गैर ने नहीं लूटा खुद अपने ही खून ने धोखे से लूट लिया । वाह रे ! किस्मत .......।”

  
आपको लूट लिया बात कुछ समझ में नही आई बाबा - आखिर बात क्या है?


“जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो बूढ़े माँ-बाप उन्हें बोझ से समान लगने लगते हैं। उन्हें लगता है कि वे जो कुछ भी कर रहे हैं सब सही है।  जब तक आपके पास किसी प्रकार की धन दौलत है तब तक बच्चे आपके आगे -पीछे घूमेंगे और जैसे ही उन्हें पता चलेगा कि बूढ़े माँ- बाप के पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है तो बस तभी से वे लोग तुम्हें ताने मार-मारकर घायल कर देंगे। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ । मेरे पास तीस बीघे जमीन थी । जमीन भी कैसी सोना उगलनेवाली । साल में तीन से चार फसल होती थी । ये लगा लो कि साल में कम से कम तीन -चार लाख की फसल आ जाती थी ।”  


आज से करीब बीस साल पहले तक मैं एक नामी जमीनदार हुआ करता था मेरे पास तीस बीघे जमीन थी और पुरखों की एक शानदार हवेली । “मैं अपने बाप की इकलौती संतान था सो जो कुछ पिता के पास था सब मुझे ही मिल गया । ईश्वर की कृपा से मेंरे चार संताने हुई जिनमें तीन बेटियाँ और एक बेटा था। मैने अपनपढ होते हुए भी अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाई उन्हें अपने पैरो पर खड़ा किया ।” लेकिन “मुझे क्या पता था कि जिन बच्चों को मैं पाल पोसकर बड़ा कर रहा हूँ वही एक दिन मुझे  इस हालत में लाकर छोड़ देंगे। अगर ऐसा पता होता कि जिन पौधों के मैं सीच कर बड़ा वृक्ष बना रहा हूँ वे ही मेरी मुसीबत का कारण बनेंगे। तो यह सब हरगिज़ न करता ।”


“हमारा गाँव दिल्ली की सीमाओ से ही लगा हुआ है।  कुछ साल पहले की बात है सरकार ने हमारे यहाँ की सारी जमीन का अधिग्रहण कर लिया था जिसके बदले में मुझे पचास लाख रुपए मिले थे । पचाल लाख रुपयों को देखकर बेटे की नीयत में खोट आ गया वह दिन प्रतिदिन उन रुपयों को हथियाने की कोशिश में लगा रहता उसे डर था कि कहीं मैं उन पैसों को बेटियों में न बांट दूँ। यह सिलसिला काभी समय तक चलता रहा । “एक दिन मेरी पत्नी की तबियत ज्यादा खराब हो गई उसे अस्पताल में भरती करवाया गया उस के इलाज पर मैने लाखों रुपए खर्च कर दिये लेकिन उसे बचाया न जा सका । वह मुझे इस संसार में अकेला छोड़कर चली गई । अच्छा हुआ वह बेचारी पहले ही इस संसार से चली गई नही तो यह सब देखकर  जीते जी अपने आप ही मर जाती । उसे अपने आप पर पछतावा होता कि उसने इस नालायक बेटे को जन्म दिया ।  पत्नी के इलाज पर जो लाखों रुपए खर्च हुए थे उस का बेटे बहु को बहुत दुख था कि लाखों रुपए यों ही बरबाद कर दिए।”


“पत्नी के देहांत के बाद मेरा भी स्वास्थ्य खराब रहने लगा। घर में कोई देखभाल करने वाला जो नहीं था । बेटे को अपने काम से फुरसत नहीं थी और बहु को अपने घर के कामों से फुरसत ही काहाँ थी। समय पर जो कुछ मिल जाता खा लेता नहीं मिलता तो आने  की उम्मीद लगाए बैठा रहता । किसी -किसी दिन तो सुबह से लेकर शाम तक खाना भी नहीं मिल पाता था जब बच्चों को याद आ जाती तो शाम को रुखा -सूखा थाली में रखकर दे जाते ।  खाना बाद में आता पहले तानों से भरी आवाजें घर के अंदर से आने लगती थीं।” 

“धीरे -धीरे मेरा स्वास्थ्य भी खराब होने लगा और एक दिन मुझे सांस लेने में बहुत तकलीफ होने लगी सो अस्पताल में भरती करवाया गया । अस्पताल के खर्चे  के लिए बेटे  ने बैंक के चैक पर मेरे अँगूठे का निशान यह कहकर लगवा लिया कि आपके इलाज के लिए काफी पैसों की जरूरत पड़ेगी और मेरे पास उतने पैसे हैं नहीं । मैं सीधा -साधा किसान बुद्धि का आदमी मैने चैक पक बिना रकम देखे अपना अँगूठा लगा दिया। बेटे ने इस मौके का खूब फायदा उठाया उसने मेरे खाते से तीस लाख रुपए निकालकर अपने खाते में जमा कर लिए । कुछ समय बाद जब मैं ठीक होकर घर वापस आया । एक दिन अनायास ही मैं  बैंक की तरफ चला गया । बैंक जाकर मुझे पता चला कि मेरे बैंक खाते से सारी रकम उस चैक के माध्यम से निकालकर बेटे ने अपने खाते में जमा कर ली है।”


“बैंक से सीधा घर वापस आया और बेटे के घर आने का इंतजार करने लगा । शाम को जब बेटा घर आया तो मैने उससे पूछा कि तुमने मेरे खाते के सारे पैसे अपने खाते में क्यों डाल दिए  ।” बेटे ने कहा कि “आप तो अस्पताल में भरती थे क्या पता था कि आप अस्पताल से घर  वापस भी आते की नहीं इसी लिए मैंने आपके खाते से सारे पैसे निकालकर अपने खाते में जमा कर लिए ।”

“पर बेटे जो कुछ भी मेरे पास है वह सब तेरा ही तो है फिर तुझे इस प्रकार करने की क्या जरूरत थी ।” “जरूरत , जरुरत क्यों नहीं थी? अगर आप पैसो को बैक में ही रखकर मर जाते तो बैंक वाले थोड़े ही इतनी आसानी से लाखों रुपयों को देते । फिर आप को पैसों की ऐसी क्या आवश्यकता है आप को तीनो वक्त का भोजन , पहनने के लिए कपड़े तो मिल ही रहा है ना फिर क्यों चिक - चिक लगा रखी है पैसा , पैसा ? पैसे को क्या छाती पर रखकर मरोगे।”
बेटे की इस प्रकार की कटु बातें  सुनकर मेरा मन किया कि  पुलिस  थाने जाकर शिकायत कर दूँ । फिर सोचा  यह सब करके भी क्या फायदा ? वैसे भी मैंने  यह सब इसी के लिए ही तो इकट्ठा किया था । अपनो द्वारा ठगे जाने के कारण मैने सोचा चलो अब मुझे इस जीवन से मुक्ति ले लेनी चाहिए सो जीवन से मुक्ति पाने के लिए मैंने एक दिन यमुना नदी में कूदकर जान देने की कोशिश की लेकिन वहाँ भी न मर सका । शायद जीवन में और दुख देखने बाकी थे । उस  दिन मैंने फैसला किया कि अब मैं उस घर में वापस लौटकर नहीं जाऊँगा , और ना ही आज तक कभी बेटे - बहु ने मुझे खोजने की कोशिश की । तब से मैं यह काम कर रहा हूँ दिन भर जो कुछ कमा लेता हूँ उसी से अपना पेट भर लेता हूँ । जब तक मुझ में दम है, काम करने की ताकत है। तब तक किसी के आगे हाथ नहीं फैलाऊँगा । आगे की पता नहीं ? अब तो ईश्वर से दिन - रात प्रार्थना करता हूँ कि ईश्वर अब तू मुझे इस संसार से उठा ले ।”

“कमाना खाना तो ठीक है पर आप रहते कहाँ पर हैं?”
“यही पास ही एक बस्ती है उसी में रहता हूँ। मुझ जैसे बदनसीब वहाँ पर और भी बहुत हैं।”
“अभी तो ठीक है गरमी का मौसम है किन्तु शरदी और बरसात में तो आपको बहुत परेशानी उठानी पड़ती होगी।”  

“अब परेशानियो से डर नहीं लगता बेटा । हाँ शरदियों के मौसम में अधिक शरदी के कारण कई दिनो तक बाहर नहीं जा पाता सो कई कई दिनो तक उपवास रखकर ही काटने पड़ते हैं । जब थोड़ा बहुत मौसम खुल जाता है सूरज निकल आता है, तो बाहर सामान बेचकर कुछ पैसे कमा लाता हूँ और इस पापी पेट को भरने की कोशिश करता हूँ । यह पेट है कि भरने का नाम ही नहीं लेता।

जैसे भी हो “बस अब तो मौत का इंतजार है कि कब मौत आए और मुझे इस जीवन से मुक्ति मिल जाए । बेटा हर किसी को जीवन मे सुख नसीब नहीं होता । मुझ जैसे लाखों बदनसीब है जो तिल तिल मर रहे है फिर भी जी रहे हैं।”
“देख लो बेटा यही है मेरे बेटे की सौगात अपने बूढ़े बाप के लिए ।”

4 comments:

  1. यही आज का सच है ………………बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत किया है जज़्बातो को।

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  2. सुन्‍दर लेखन.....सच्‍चाई बयां करता ....।

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  3. Superb!!

    Best Regards
    Amit Anuraag

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  4. राजा को रंक और रंक को राजा बनते देर नहीं लगती... समय बड़ा बलवान होता है :(

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