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Thursday, October 13, 2011

अंतरनाद

दो बेटियों के बाद बेटे को पाकर गोविन्द फूला न समा रहा था । गोविन्द का कपड़े का व्यापार था  दिल्ली के पास एक छोटे से गाँव से निकलकर वह कई शहरों में गया  व्यापार  किया पर व्यापार  कहीं भी ठीक से चला नहीं अंत में अपने परिवार के साथ हैदराबाद में आया  और यहीं  आकर बस गया । यहाँ पर उसका व्यापार और शहरों के मुकाबले में अच्छा होने लगा  । बेटे को  पाकर मानो उसका छोटा सा परिवार पूरा हो गया हो वह अपने छोटे से परिवार के साथ सुखी जीवन व्यतीत कर रहा था । उसने  बेटे का नाम उमेश रखा । उमेश धीरे -धीरे बड़ा होने लगा, जैसे-जैसे उमेश बड़ा हो रहा था वहीं दूसरी तरफ उसके पिता को व्यापार में दिन-प्रतिदिन घाटा होने लगा । इस घाटे के कारण वह काफी चिंतित रहने लगा उसे  समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर व्यापार में  यह घाटा क्यों शुरु हो गया । एक दिन दुकान में बैठा इसी विषय पर चिंतन कर रहा था और सोचने लगा कि आखिर यह घाटा कहाँ से और कब से शुरु हुआ है.... तब उसके ध्यान में आया कि जब से उमेश उनके जीवन में आया है तभी से घर में कोई न कोई अनहोनी घटना घटित हो रही है........ ऐसा नहीं था कि केवल यह उसकी ही सोच थी इससे पहले भी कई लोगों ने उससे इस बात का जिक्र किया था, लेकिन उसने उन सब लोगों  की बातों पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया लेकिन जब खुद इस बात का चिन्तन करने लगा तो उसे भी लगने लगा कि उसके मित्र जो कह रहे थे वह सब सच है । यह लड़का उनके लिए अशुभ है.........फिर क्या था  उसी क्षण से उसका  लगाव उमेश से एक दम  हट गया , उस दिन से  उससे उखड़े-उखड़े रहने लगा लेकिन यह बात उसने किसी से कही नहीं। अब तो वह  उमेश की छोटी-छोटी गलतियों पर अपनी भड़ास निकालने लगा …... यहाँ तक कि जब उमेश ने दसवी  कक्षा की परीक्षा में  विद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया सभी लोगों ने उसे बधाई दी लेकिन उसके पिता ने एक प्यार का शब्द तक नहीं कहा यह देखकर उसे काफी दुख हुआ लेकिन ................। वैसे वह  एक हँसमुख लड़का था जीवन के कठिन से कठिन काम को हँसते-खेलते करता । सदैव दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहता लेकिन कभी भी अपने दुख को दूसरों के सामने नहीं रखता यही उसकी खास आदत थी कुछ भी हो जाए अपने दुख को किसी से नहीं कहता था ....
    एक दिन की बात है जब वह घर के बाहर  अपने दोस्तों के साथ क्रिकेट खेल रहा था । उस समय उमेश  बैटिंग कर रहा था । खेलने के दौरान उसने जोर से गेंद को मारा  जिसके कारण घर की खिड़की का शीशा टूटकर चकनाचूर हो गया । उस समय उसके पिताजी घर पर ही थे । खिड़की का टूटा शीशा देखकर   आग बबूला हो गए और सीधे बाहर जाकर उसे को दो तमाचे लगाते हुए सीधे घर से  अंदर ले आए और भली-बुरी कहने लगे...... जब उसकी माँ बीच बचाव के  लिए आई तो उन्होंने उसे भी चुप रहने का हुक्म सुना दिया ।गुस्से में उन्होंने कुछ बातें ऐसी भी कह दी जो उन्हें नहीं कहनी चाहिए थी .....  पिता की इन्हीं बातों से नाराज़ होकर उसने घर से बाहर जाने का फैसला कर लिया । उस समय उसकी आयु मात्र पंद्रह- सोलह साल की होगी । गुस्से में आकर वह घर से निकल गया , घर से निकलकर  वह सीधे अपने कॉलेज के मैदान में  एक पेड़े के नीचे जाकर बैठ गया । सारा दिन उसी पेड़ के नीचे बैठा रहा । शाम के समय उसने अपने कुछ मित्रों को उस तरफ आते देखा तो वह वहाँ से उठकर मैदान  से बाहर निकल गया । घर से निकल तो आया अब क्या करे ...?  यही सेचते -सोचते चला जा रहा था तभी उसे रेलगाड़ी का हॉर्न सुनाई दिया। उसने सोचा अगर मैं यहाँ रहुँगा तो घर के लोग उसे ढूँढ़ ही लेंगे इससे अच्छा है  कि वह यहाँ से , इस शहर  से कहीं दूर चला जाए पर कहा......... ?  उसके पास टिकिट खरीदने के लिए पैसे भी तो नहीं हैं। यही सोचते -सोचते वह रेलवे स्टेशन तक जा पहुँचा वहाँ पहुँचकर एक बैंच पर बैठ गया .....।
कुछ समय बाद वहाँ एक रेलगाड़ी आई  उसने देखा कि वह गाड़ी चेन्नई जाएगी कुछ सोच विचार कर वह उस गाड़ी में चढ़ गया। रेलगाड़ी में चढ़ तो गया लेकिन टिकट न होने के कारण काफी सहमा सा खड़ा था । कुछ घंटों के बाद उसने टी.टी को अपनी ओर आते देखा यह देखकर उसके पाँव थर-थर काँपने लगे मन ही मन सोचने लगा अब क्या होगा.....?  कुछ सोच विचार कर रेलगाड़ी के दरवाजे की तरफ खिसक  आया । वहाँ आकर थोड़ी देर खड़ा रहा फिर वहाँ पर बने सौचालय में जाकर छिपकर  बैठ गया । सारी रात उसी सौचालय में बैठा रहा । जब सुबह गाड़ी रेलवे स्टेशन पर रुकी तब वह सहमा -सहमा सा बाहर निकला और जल्दी -जल्दी  रेलगाड़ी से उतरकर प्लेटफॉर्म पर जाकर एक बैंच पर बैठ गया। सुबह का समय था प्लेटफॉर्म पर अधिक भीड़ भी नहीं थी सारी रात टी.टी. के  डर से सो नहीं पाया था । बाहर प्लेटफॉर्म की बैंच पर बैठते ही उसे नींद आ गई । कुछ देर सोने के बाद जगा और इधर-उधर घूमने लगा…… जिस स्थान  पर पहुँचा वहाँ के लोग और उनकी बोली बिलकुल अलग है । वह न तो उस बोली को समझ सकता  है और न बोल सकता है । सारा दिन वह प्लोटफॉर्म पर इधर से उधर भटकता रहा, जब थक  जाता तो किसी बैंच पर बैठ जाता । दो दिन से उसने कुछ नहीं खाया भूखा होने के कारण अब और चलने में असमर्थ है । उसके मन में बार -बार यही सवाल उठ रहा था कि अब वह क्या करे….? अंजाना शहर, अंजाने लोगों के बीच अपने को पाकर  उसकी आँखे छलक आई …..दिन तो उसने इधर -उधर घूमते घामते भूखे-प्यासे जैसे-तैसे करके काट लिया लेकिन जैसे -जैसे रात होने लगी उसकी बेचैनी और बढने लगी कि रात में वह कहाँ जाए ? क्या खाए …? कहाँ सोए ….? आदि प्रश्न उसके मन में चलने लगे। यही सोचते -सोचते एक बैंच पर जाकर बैठ गया  भूखा होने के कारण उसे नींद भी नहीं आ रही थी  सारी रात उसी बैंच पर बैठे - बैठे काट दी. जैसे -जैसे सवेरा होने लगा थके- हारे होने के कारण उसकी आँख लग गई..........
उसने देखा कि वह अपने घर जा पहुँचा है । घर पर माँ का रो-रो कर बुरा हाल है... इधर उसके पिता किसी से कुछ कह नहीं रहे लेकिन उनकी आँखें लाल हैं उनकी आँखों से पता चलता है कि वे भी उमेश के घर से जाने से काफी दुखी है । जैसे ही वह घर पहुँचा उसे देखते ही उसकी माँ ने उसे अपनी छाती से लगा लिया और दहाड़ मारकर रोने लगी । उसके पिता भी  बेटे को पास देखकर अपनी आँखों के आँसुओं को रोक न सके छिपाने की कोशिश तो बहुत की लेकिन आँखों के आँसुओं को रोक न सके   निकल ही आए । पिता की आँखों में अपने लिए आँसुओं को देखकर वह चौंक गया । पिता की आँखों में मेरे लिए आँसू.......? उन्होंने उमेश को अपने सीने से लगा लिया और आँखों से आँसुओं को पोछने लगे.....।

 मेल  -मिलाप के बाद माँ ने आकर पूछा कुछ खाया कि नहीं.....?उसने ना करते हुए सिर हिला दिया..... बहनों ने बताया कि जिस दिन से वह घर से गया है घर में किसे ने अन्न का एक दाना तक नहीं खाया । बस उसकी खोज में लगे हुए हैं घर में दो दिनों से चूल्हा तक नहीं जला ।   माँ-पिता जी ने तीन दिनों से अन्न तो हाथ तक नहीं लगाया । दिन रात उसी कि खोज में लगे रहते  । यह सुनकर उसकी आँखे भर आई , उसकी आँखों में आँसुओं को  देखते ही माँ उसे अपने  सीने से लगाते हुए समझाने लगी- उसने अब जो भी किया सो किया ,लेकिन भविष्य में फिर ऐसा न करने को कहा...।चल हाथ-मूँह धो ले मैं तेरे लिए खाना बनाती हूँ । आज तीन-चार दिनों के बाद घर का चूल्हा जला है। थोड़ी  देर के बाद खाना तैयार हो गया सभी लोग एक साथ बैठकर खाने के लिए बैठे उसने खाने का पहला निवाला मूँह की तरफ बढ़ाया ही था कि एक जोरदार आवाज से वह चौंककर उठ गया । उठते ही वह भौचक्का सा इधर -उधर देखने लगा ...अभी तो में घर पर खाना खाने बैठा था फिर अचानक यहाँ .......? उसने देखा कि सामने दो पुलिसवाले खड़े हैं। पुलिसवालों को अपने सामने खड़ा देखकर उसके हाथ पाँव फूल गए उसे लगा कि शायद वे लोग उसे पकड़कर घर वापस ले जायेंगे । 

ओह!....  वह सपना देख रहा था। पुलिसवालों ने उसे वहा से उठा दिया और वह बैंच से उठकर स्टेशन के बाहर की ओर चल दिया। दो दिन से कुछ न खाने के कारण उससे चला नहीं जा रहा था । स्टेशन से बाहर निकलते ही उसकी आँखों के आगे अंधेरा सा छाने लगा ।  जैसे -तैसे करके वह बाहर एक बैंच पर जाकर बैठ गया । बैंच पर बैठते ही वह सपने वाली बात को सोचने लगा …...घर  पर माँ मेरे लिए कितनी चिंता कर रही होगी.? क्या उन्होंने भी खाना नहीं खाया होगा..? तभी उसे पिता जी की कही वह बात याद आ गई जिसके कारण उसने घर से बाहर आने का फैसला किया था। अन्जान लोग, अन्जान शहर में वह किससे कहे कि उसे भूख लगी है और कैसे कहे........? कुछ देर बाहर बैठने के बाद वहाँ से से उठकर चलने लगा  दो दिन से कुछ न खाने के कारण उसे चक्कर आने लगे उसकी आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा चलते-चलते वह बेहोश होकर सड़क पर ही गिर गया ।
सड़क पर  उसे बेहोश देखकर कुछ लोग वहां पर जमा तो हो गए लेकिन किसी ने उसे अस्पताल ले जाने की नहीं कही   तभी उस भीड़ में से एक आदमी सामने आया उसका नाम अमित था उसने उसे बेहोश देखकर अस्पताल ले गया ।  उसके इलाज के पैसे भी अपनी जेब से दिए उसके होश में आने तक वहीं पर रुका रहा । उसके होश में आने पर उसने उसकी इस अवस्था का करण पूछा , पहले तो कोई जवाब न पाकर उसे लगा कि शायद वह गूँगा है लेकिन जब उसके मूँह से निकला भूख .......    भूख शब्द सुनकर पता चला कि उसकी मातृ भाषा हिन्दी है और वह तमिल  भाषा में पूछ रहा था।
अमित भी चेन्नई का निवासी नहीं था वह भी हिंदी प्रदेश से था लेकिन नौकरी के कारण पिछले बीस सालों से चेन्नई में रह रहा है । इन बीस सालों में उसने तमिल भाषा भी सीख ली थी ....फिर उसने हिन्दी में पूछा  सबसे पहले उसका नाम पूछा, वह कहाँ का रहने वाला है ,माता-पिता कहाँ है आदि प्रश्न उसने पूछ डाले , उमेश केवल अपना नाम बताकर चुप हो गया....  अमित ने फिर से उसकी इस स्थिति के बारे में पूछा तो  उसकी इस अवस्था का  कारण जानकर  वह चौक गया एक छोटी सी बात के लिए कोई इस तरह घर छोड़ देता है क्या……? उसने उसे समझाया कि उसने जो किया है वह गलत है । अमित  ने उसे घर लौटजाने के लिए कुछ पैसे भी देना चाहा लेकिन  उमेश ने पैसे लेने से मना कर दिया ।

उसने अमित  से कहा कि जब तक वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता , इस लायक नहीं बन जाता कि अपने पिता को कह सके कि वह मनहूस नही है ....तब तक  अपने परिवार के पास नहीं जाएगा। वह कुछ काम करना चाहता है ताकि अपना पेट भर सके। अमित ने उसे बहुत समझाया कि वह एक बार फिर से अपने फैसले पर विचार करे ....... अमित का समझाना सब बेकार गया... उमेश अपनी जिद्द पर था कि अब वह घर वापस लौटकर नहीं जायेगा । एक तो उसकी उम्र मात्र पंद्रह- सोलह की होगी उसके उपर से एक अंजान शहर में वह कहाँ रहेगा और क्या करेगा.....? पर  उमेश के द्रड़ निश्चय को देखते हुए आगे  कुछ नहीं कहा।  तभी डॉक्टर ने बताया कि उमेश को कुछ नहीं हुआ शायद कुछ न खाने के कारण ही उसे चक्कर आ गए होगे , चक्कर आने की वजह से ही वह बेहोश हो गया होगा लेकिन अब वह बिलकुल ठीक है , उमेश  के कुछ न खाने की बात जानकर अमित बाजार से कुछ फल और खाना ले आया , जब फल और खाना  उमेश को दिया पहले तो उसने वह सब सामान लेने से इन्कार कर दिया लेकिन अमित के अधिक आग्रह करने पर उसने वह सब खाना स्वीकार कर तो लेकिन उसकी अंतरात्मा यह स्वीकार ही नहीं कर रही थी कि वह अमित  (जो उसके लिए अनजान है ) के द्वारा दिया गया भोजन ग्रहण करे ..... फिर भी ना चाहते हुए उसने वह भोजन ग्रहण कर लिया  खाते समय उने एक नजर शिवमणि की ओर देखा तो उसकी आँखे छलक आई  .......अवरुद्ध गले से उसने उन्हें धन्यवाद कहते हुए एक आग्रह किया कि यदि हो सके तो वे उसे कहीं काम पर लगा दें  ......अमित  ने उसे फिर एक बार समझाने कि कोशिश की लेकिन .............?   जब अमित ने  उससे पूछा कि वह इस अंजान शहर में रहेगा कहाँ  यह सुनकर वह एक दम मौन बैठ गया उसने कुछ नहीं कहा....उसके इस मौन से अमित समझ गया कि उसे ही कुछ करना होगा.......।  

आज के इस स्वार्थी जमाने में दूसरों के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य करने वाले बहुत कम लोग होते  हैं । अमित ने उसे अपने साथ चलने के लिए कहा इस पर भी  उमेश ने आनाकानी की लेकिन अमित ने उसे समझाया कि वह डरे नहीं वह उस पर भरोसा कर सकता है।  उमेश ने उसकी बात मान तो ले लेकिन उसे बताया कि  वह उनपर बोझ नहीं बनना चाहता । अमित  के समझाने पर वह उनके साथ चला गया ।अमित,उमेश को अपने साथ घर ले आया एक अनजान को घर में देखकर अमित कि पत्नी कुछ सकुचा गयी।  अमित पत्नी के भावों को देखकर समझ गया उसने उमेश के बारे में उसे बताया पहले तो पत्नी ने उसे अपने साथ घर में रखने से साफ़ मना कर दिया लेकिन किसी न किसी तरह  उन्होंने अपनी पत्नी को समझाबुझाकर मना लिया। अमित का छोटा सा परिवार था पति -पत्नी और  दो बच्चे  एक लड़का और एक लड़की । दोनों बच्चे शुशील और आज्ञाकारी ....। दोनों बच्चे पढ़ने -लिखने में भी होशियार थे। अमित  का अपने बच्चों के प्रति प्रेम देखकर उमेश को भी अपने माता-पिता की याद आ गई वह यह भी जानता था कि उसने जो कदम उठाया है वह गलत है लेकिन अब जो हो गया है वह उससे पीछे कदम नही हटाना चाहता।

        धीरे-धीरे समय बीतता गया दिन बीते महीने बीते कुछ दिनों तक तो अमित ने उमेश को आराम करने को कहा ।कुछ दिन आराम करने के बाद  उसे  अपने मित्र के ऑफिस में काम पर लगवा दिया  । उमेश दिन में ऑफिस में  काम करता और रात में अपनी पढाई का काम भी करता। नौकरी के साथ -साथ वह अपनी पढाई भी कर रहा था । अमित के परिवार के  साथ रहते-रहते दो-तीन साल बीत चुके थे । इन्हें बीते दो -तीन सालों में वह उनके परिवार का एक हिस्सा बन गया था। ऐसा नहीं है कि उसे अपने परिवार की याद नहीं आती या वह उनसे मिलना नहीं चाहता लेकिन उसने अपने मन में यह दृड़ निश्चय कर रखा था कि जब तक वह अपने उस मुकाम तक नहीं पहुँच जाता जहाँ उसे जाना है तब तक अपने परिवार से नहीं मिलेगा। समय भी किस रफ़्तार से चलता है  आज उसे अपने परिवार को छोड़े हुए  पूरे तीन  साल  बीत चुके हैं। अक्सर रात को जब सब लोग गहरी नींद में होते है वह चुप से छत पर जाकर कुछ घंटों बैठता रात के उस अँधेरे में अपने आप को एकदम आकेला पाता , उस तनहाई में उसे अपने परिवार खासकर माँ की बहुत याद सताती  माँ को याद कर ऐसा कोई दिन नहीं गया होगा जिस दिन उसकी आँखों से आँसू न छलके हो.......। घंटों छत पर बैठे रहने के बाद ही वह सोने जाता ।  वह , अमित के  परिवार के साथ रह रहा था लेकिन कभी भी वह उस परिवार पर बोझ नहीं बना वह पढ़ने लिखने में होशियार था। वह अमित के दोनों बच्चों को  शाम में घर आकर ट्यूशन पढ़ाता , उनके साथ खेलता हंसी -मजाक करता । बच्चों की लगन  और  उमेश की मेहनत के कारण ही अमित  के दोनों बच्चों ने स्कूल में सभी परिक्षाओं में प्रथम स्थान हासिल किया था ।   उमेश ने भी अपनी डिग्री की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास  कर ली थी।
डिग्री की परीक्षा  पास करने के बाद उसने कई कंपनियों में नौकरी के लिए आवेदन किया । आवेदनों के अनुसार धीरे -धीरे कर उसे कंपनियों से इंटव्यू के लिए फोन , पत्र आने लगे अब उसके सामने एक और समस्या आन खड़ी थी । वह यह कि उसके पास एक भी जोड़ी ऐसे कपड़े नहीं थे जिन्हें पहनकर वह इंटरव्यू जाए और ना ही ढंग के जूते । जो जूते उसके पास थे वह भी पुराने और एक-दो  जोड़ी कपड़े ऐसे थे जिन्हें वह पहनकर बाहर जाता था । ऐसी स्थिति में वह क्या उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे क्या ना करे  अगर नौकरी पानी है तो इंटरव्यू को तो जाना ही होगा कुछ समय अपने आप में चिंतन करने के बाद  उसने फैसला किया कि वह उन्ही कपड़ों और पुराने जूतों से ही इन्टरव्यू देने जाएगा। 

एक दिन कि बात है अमित घर में टहल रहे थी कि  अनायास ही वे  उमेश के कमरे में चले गए , कमरे में जाकर  इधर-उधर घूमकर कमरे का निरिक्षण करने लगे तभी उनकी नजर मेज पर रखे उस लिफाफे पर पड़ी जिसमें उमेश का इन्टरव्यू लैटर था। उन्होंने उस लिफाफे को उठाकर देखा तो पता चला कि अगले सप्ताह  उमेश का इन्टरव्यू एक बड़ी कंपनी में है । वे उमेश की आर्थिक स्थिति से  भली- भांति  परिचित थे साथ ही  उसकी खुद्दारी से भी भली भांति परिचित थे । लैटर पढने के बाद  उन्होंने लिफाफा  उसी प्रकार मेज पर रख दिया और कमरे से बाहर निकल आए। उस रात को भोजन करने के पश्चात उन्होंने उमेश को बात करने के लिए अपने कमरे में बुलाया । उमेश के कमरे में आने के पश्चात उन्होंने उसे बताया कि आज वे अनायास ही उसके कमरे में चले गए थे तो उसके इन्टरव्यू के बारे में पता चला कि अगले सप्ताह उसका इन्टरव्यू है । उन्होंने उमेश को कुछ पैसे देते हुए कहा कि वह कल ही  नए कपड़े और जूते खरीद लाए साथ ही यह भी कह दिया कि   वह  यह न समझे कि ये पैसे वह उसे दान में दे रहे हैं ... ...हाँ जब उसे नौकरी मिल जाएगी और जो पहली तनख्वाह मिलेगी उसमें से वह उनके पैसों को लौटा दे । यह सुनकर उमेश की आँखे भर आई और शरीर में एक हल्का सा  कंपन्न छा गया ...... जो आज तक उसने नहीं किया था इस भावुकता में ही सही उसने अमित  के चरण स्पर्श किए और आँखों को पोछता हुआ अपने कमरे की ओर चला गया . उमेश के द्वारा अपने चरण स्पर्श करने को देखकर उन्हें भी भावुक कर दिया और उनकी आँखों से आँसू कि बूंदें छलक पड़ी ........। उमेश कई कंपनियों में  इन्टरव्यू देकर आ चुका था लेकिन कहीं से कोई जवाब नहीं आया । यह देखकर वह बहुत  निराश होने लगा....। 

लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी कहते हैं ना कि ईश्वर के घर देर है अंधेर नही आखिर वह दिन आ ही गया जब उमेश को एक  कंपनी से फोन आया कि उसे कम्पनी ने चुन लिया है और उसे अगले सप्ताह से कंपनी आना है। एक मल्टीनेशनल कंपनी में अपने चुने जाने की खबर सुनकर वह फूला न समाया । मन ही मन उसने ईश्वर को धन्यवाद किया और साथ ही साथ अमित  को भी जिसकी  बदौलत वह आज इस मुकाम को पा सका है। कम्पनी ने उसे अच्छी पोस्ट और अच्छे वेतन -मान पर रखा था । कंपनी में काम करते हुए  एक महीना बीत गया और आज उसे अपनी नई नौकरी की पहली तन्ख्वाह मिली है।  उसने अपनी पहली तन्ख्वाह से अपनी  माँ और अमित कि पत्नी दोनों के लिए एक -एक साड़ी खरीदी, पिता और अमित  के लिए एक-एक  हाथ घड़ी खरीदी और अपनी दोनों बहनों  एवं अमित के दोनों बच्चों के लिए भी कुछ न कुछ उपहार खरीदे। आज उसकी खुशी का ठिकाना न था । सीधे घर पहुँचकर उसने साड़ी और घड़ी अमित और उसकी पत्नी को दी और उनके चरण स्पर्ष किए । साथ ही उनके उधार दिए हुए पैसे भी दे दिए ।

धीरे-धीरे समय बीतता गया उमेश दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता चला गया । आज वह उस मुकाम पर जा पहुँचा जहाँ वह जाना चाहता था । आज  अपने लक्ष्य को पाकर वह फूला न समा रहा था । अपने लक्ष्य की प्राप्ति के पश्चात उसे लगा कि जिस के लिए उसने अपना घर -परिवार छोड़ा था आज वह उसे मिल चुका है फिर क्यों ना अपने परिवार से मिलने जाया जाये । उसने अपने माता -पिता से मिलने का फैसला किया। अपने ऑफिस से ही घर (हैदराबाद)  जाने की टिकिट करवा ली थी । वर्षो बाद मुझे अपने सामने देखकर माँ कितनी खुश होगी यही सोचकर वह दूसरे दिन अपने माता-पिता से मिलने के लिए निकल पड़ा. आज उसकी खुशी का ठिकाना न था वर्षों से जिस का सपना देखा ,जिसके लिए अपना परिवार छोड़ा दर-दर की ठोकरे खाई आज उसे वह मुकाम हासिल हो गया है।जब वह यह खुशखबरी अपने मात-पिता को सुनाएगा तो वे कितने खुश होंगे...। सारे रास्ते वह इन्ही बातों को सोचता रहा ...कि माँ कितनी खुश होगी मुझे अपने सामने देखरकर और पिताजी.....। आखिरकार वह दूसरे दिन हैदराबाद  अपने परिवार से मिलने पहुँच ही गया । कितनी बदल गई है ये कॉलोनी, कॉलोनी  की सड़क ,गलियों को देखता- देखता वह अपने घर के द्ववार तक जा पहुँचा .....घर के बरामदे में उसकी माँ गेहूँ साफ करने से लगी हुई थी। माँ को देखकर वह चौक गया .......कितनी दुबली हो गयी है और सिर के बाल भी तो सन कि तरह एक दम सफ़ेद हो गए हैं ......आखों पर चस्मा भी लग गया है ..... वह थोडा और नज़दीक गया ।नज़दीक जाकर देखने से पता चला कि वह उसकी माँ ही है .... जैसे ही उसने माँ के चरण स्पर्ष किए माँ तो एक दम चौक गई । माँ उसे पहचाना न सकी ........ जब उसने कहा माँ मैं अमित .........यह सुनकर उसके हाथों में लगा सूप( जिससे गेहूँ साफ करते हैं)  छूट गया वह एक दम सकपकाती हुई खड़ी हो गई जैसे उसे किसी ने बिजली का झटका दे दिया हो। कुछ देर तो वह उमेश के चेहरे को एक टक  निहारती रही और  फिर उसे सीने से लगा लिया , सीने से लगाते ही उसकी आँखों से आँसू बह निकले ...............। माँ के रोने की आवाज सुनकर घर के अंदर से उमेश की दोनों बहनें और उसके पिता  बाहर आ गए।   एक अंजान आदमी को सीने से लगाकर माँ के रोने की बात किसी को समझ में नहीं आई  तभी उसकी नज़र पिताजी पर गयी पिता को अपने समे खड़ा देखकर वह वह थोड़ा सा सहम गया , फिर आगे बढ़कर उसने पिताजी के पैर छुए  । जैसे ही उमेश ने पिता के पैर छूए  वर्षों से बेटे की जुदाई का दुख जो अब टक दिल के अन्दर ही दबा था आज  फूटकर आँखों से छलक आया ........।
कुछ दिन  अपने परिवार के साथ बिताकर  वह फिर से नौकरी पर लौट आया । परिवार से मिलकर आने के पश्चात उसकी जिन्दगी मानो वसंत के समान हो चुकी थी जिस गम को वह वर्षों से मन में दबाकर जी रहा था उसका अंत हो गया अब उसके जीवन में एक नई सुबह का आगमन हुआ । इसी प्रकार हँसते -खेलते उसके जीवन के और चार -पाँच साल बीत गए । इन्हीं चार-पाँच सालों में उसने  समाज में अपना एक अच्छा खासा रुतबा बना लिया था । एक आम कर्मचारी के तौर पर वह कम्पनी में लगा था और आज अपनी मेहनत और कठिन परिश्रम के बल से वह उस कम्पनी के मैनेजर पद तक पहुँच गया है ।
जितना बड़ा पद उतनी बड़ी जिम्मेदारी जब से उमेश कम्पनी का मैनेजर बना है उसकी दिनचर्या ही बदल गयी है हमेशा किसी न किसी काम में  व्यस्त रहता कभी -कभी तो खाना खाने तक का समय नहीं मिल पाता था । एक शाम उमेश अपने ऑफिस से घर जा रहा था रात का समय था ऑफिस से कुछ दूरी पर ही निकला था कि उसकी कार पंचर हो गयी उसने जसे तैसे करके कार का पंचर टायर बदला और घर के लिए रवाना हुआ । कार का टायर बदलने में उसके हाथ पूरी तरह काले हो चुके थे  कुछ ही दूर जाकर  उसने होटल के पास कार रोकी और होटल के अन्दर चला गया अन्दर हाथ साफ किये और एक कप चाय पीकर बाहर आने लगा  । जब वह  चाय पीकर बाहर आ रहा था तभी  उसकी  नज़र सड़क पर सोते एक परिवार पर गयी उसे देखकर वह वहाँ पर थोड़े देर के लिये खड़ा हो गया। एक वृद्धा  अपने बच्चों को अपनी  गोद में लिए सुला रही थी ....वह खुद फुटपाथ पर थी और अपने बच्चों को  एक फटे से बिस्तर पर सुला रखा था ........यह देखकर उमेश कि आँखे भर आई। यह देखकर उसे अपनी माँ की याद आ गयी ......  उस दृश्य को देखने के बाद उसने  फैसला किया कि अब वह भी अपने परिवार  को अपने साथ रखेगा । कुछ दिनों बाद ही  वह अपने परिवार को लेने के लिए निकल चला गया ।
 घर पहुँचकर उसने अपने माता -पिता और दोनों बहनों को उसके  साथ चलकर रहने के लिए कहा उमेश कि इस बात से  माँ और दोनों बहनों ने उसके साथ जाना स्वीकार लिया लेकिन उसके पिता उसके साथ चलकर रहना नहीं चाहते थे । उनका कहना था कि यहाँ पर अब उनकी दुकान ठीक ठाक चल रही है और वे वहाँ  जाकर करेंगे भी क्या...? इस उम्र में वे और कुछ नहीं कर सकते कम से कम दुकान पर जाकर तो बैठ जाते हैं । उमेश के साथ रहने से उन्हें अपनी दुकान  बंद करनी पड़ेगी जो वे करना नहीं चाहते थे । काफी कहा-सुनी, रूठने -मनाने के बाद वे भी तैयार हो गए। हँसता खेलता छोटा सा परिवार । उमेश के पिता यहाँ आकर खुश तो बहुत हुए पर उन्होंने अपनी खुशी किसी से बाँटी  नहीं यहाँ तक कि अपनी पत्नी से भी नहीं । अब उसका पूरा परिवार उसके साथ है छोटा और सुखी परिवार।  एक दिन वह अपने परिवार को गोविन्द के घर ले गया  दोनों परिवार के लोग एक दूसरे से मिलकर बेहद खुश थे । बातों ही बातों में अमित ने उमेश के कठिन परिश्रम और लगन की तारीफ़ की .....।  इसी तरह दिन -महीने ,साल गुजर गए वैसे तो उमेश घर में सबसे छोटा था लेकिन उसने सरे परिवार कि ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली थी । उसने अपनी बहन की शादी बड़ी धूम -धाम से एक समृद्ध परिवार में कर दी  बड़ी बहन अपनी ससुराल में खुश है । छोटी बहन का दाखिला मेडिकल कॉलेज में करवा दिया। आज उस परिवार को देखने से लगता है कितना सुखी परिवार है।

लेकिन उसकी यह खुशियाँ ज्यादा दिनों तक न टिक सकी एक दिन अचानक उसका स्वास्थ्य खराब हो गया . डॉक्टर से स्वास्थ्य की जाँच करवाने पर जो पता  चला वह सुनकर उसके पाँव तले की ज़मीन खिसक गई । डॉक्टर ने उसे बताया कि उसे ब्लड कैंसर हो गया है। जिस  चीज को पाने के लिए उसने अपना घर-परिवार को छोड़ा था आज वह चीज भी उसके प्राणों को  बचाने में असमर्थ हैं। वह मन में सोचने लगा कि ऐसा धन किस काम का जो मनुष्य के प्राणों की रक्षा भी न कर सके । उसने डॉक्टर से उसकी बीमारी के बारे में   कुछ भी बताने के लिये सख्त मना कर दिया । इस खबर ने उसके जीवन में भूचाल ही ला दिया था आज -कल वह एकदम गुमसुम रहने लगा .... ।   
एक दिन उसने सोचा कि जाना तो है लेकिन क्यों ना कुछ अच्छा काम करके इस संसार से जाऊं।  बस फिर क्या था उसने  अपनी बची-खुची जिंदगी को दूसरों की सेवा में लगाने का फैसला किया । इसी लिए उसने अनाथ-बेसहारा बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू कर दिया उसकी कंपनी से और लोग भी गरीब बच्चों को पढाने जाते वह भी उन्ही के साथ जाने लगा  उसने कभी भी अपनी उस बीमरी के विषय में किसी से कुछ नहीं कहा अपने दुख को अंदर ही अंदर दबाता रहा और सदैव मुसकुराता रहता । उसे देखकर कोई सोच भी नहीं सकता था कि उसे इस प्रकार की कोई बीमारी भी हो सकती है। धीरे-धीरे बीमारी बढ़ती ही जा रही थी अब तो नौबत यहाँ तक आ चुकी थी कि उसकी जिन्दगी कुछ ही दिनों की बची थी फिर भी उसने इस का ज़िक्र किसी से नहीं किया न किसी दोस्त से न अपने माता -पिता से , इधर माता -पिता अपने बेटे की शादी के सपने देख रहे थे अक्सर दिनेश की माँ उससे कहती कि अब तो वह शादी कर ले लेकिन वह हमेशा उस बात को हँसी-हँसी में टाल जाता । वह जान बूझकर किसी लड़की का जीवन बर्बाद नहीं करना चाहता था.....।  इस संसार में वह कुछ ही दिनों का मेहमान है कैसे अपने माता-पिता को समझाए इसीलिए वह कोई न कोई बहाना बना देता था। उसने अपने द्वारा जमा की गयी जमा पूँजी अपने पिता के बैंक खाते में जमा कर दी ......।
एक दिन जब वह अपने ऑफिस से घर लौटा तो उसे चक्कर से आने लगे साँस लेने में कठिनाई सी महसूस होने लगी , उसे लगा कि शायद उसका अंत समय निकट आ गया है.......वह अपने कमरे से निकलकर माँ के पास गया उस समय माँ अपने कमरे में कपड़ों की तह बनाकर रख रही थी । उमेश के चेहरे को देखकर माँ ने पूछ लिया - क्या बात है  तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना......?
उमेश - हाँ माँ बस थोड़ी थकावट महसूस हो रही है और सिर दर्द दर्द से फटा जा रहा  है ...।
माँ - ला मैं सिर पर बाम लगा देती हूँ कहते हुए माँ ने उसे बैड पर लिटा दिया ....और बाम लगाने लगी..
उमेश - माँ आज मुझे थोड़ी देर अपनी गोद में सिर रखकर सो लेने दो.....
उमेश की बात सुकर माँ हँस दी ....इतना बड़ा हो गया है लेकिन बचपना अभी तक है ...ठीक है लेट जा...।
उमेश  माँ की गोद में लेट गया और माँ के चेहरे को  एकटक निहारने लगा .............
माँ- क्या हुआ तुझे क्या देख रहा है ......?
उमेश - कुछ नहीं कहकर  करवट पलटकर आँखें बंद कर लेट गया ....
काफी देर होने पर माँ ने उसे आवाज दी ..........लेकिन कोई उत्तर न पाकर माँ घबरा गई  उसने  देखा कि उमेश का शरीर एक दम बर्फ की तरह ठंडा हो गया है  ...... माँ ने उसके पूरे शरीर से हाथ लगाकर देखा फिर उसकी नाक के आगे हाथ लगाया नाक से कोई साँस नहीं आ रही थी यह देखकर उसके होश उड़ गए ...... उसके प्राण पखेरु इस संसार को छोड़कर जा चुके है....। यह देखकर माँ के मुँह से के चीख निकल गयी .......वह बार बार  उमेश  को आवाज लगाए जा रही थी।
चीख को  सुनकर बाहर हॉल में बैठे उमेश के पिता भी कमरे के अंदर दौड़े चले आए कमरे का नजारा देखकर वे भी आवक्क रह गए कि आखिर यह हुआ तो हुआ क्या........? उमेश एक तरफ पड़ा है और उसकी माँ एक कोने में बैठी उसे एक टक उसे निहारे जा रही है ….
उन्होंने भी उमेश को देखा तो वे भी एक दम दंग रह गए  बस बेटे के सिर को गोद में लेकर बैठ गए और .............
जिसे भी इस बात की जानकारी मिली कि उमेश अब इस संसार में नहीं हैं. सुनकर सब के सब दंग रह गए यहाँ तक कि उसके दोस्तों को लगा कि किसी ने उनसे मजाक किया है और उन्होंने उमेश के घर फोन किया तो पता चला कि सच में दिनेश अब इस दुनिया में नहीं है , जब उन बच्चों को पता चला कि उनके दिनेश भैया जो उन्हें पढ़ाने आते थे हमेशा उन्हें हँसाते रहते थे वे नहीं रहे तो वे लोग भी यह खबर सुनकर दंग रह गए उनकी आँखों से आँसू छलक आए .......।   
आज उमेश को गुजरे हुए एक महीन बीत चुका है उसका परिवार अपने आप को संभालने की कोशिशों में लगा है,उमेश की कमी को तो कोई  पूरा नहीं कर सकता ....... ये जीवन ही चलने का नाम है  खुशी हो या गम बस आगे बढ़ते जाना है   घर की छत पर बैठे -बैठे गोविन्द कुछ सोच में डूबे थे तभी उनकी नज़र सड़क पर खेलते बच्चों पर गई उन्हें खेलता देखकर उनके मन में एक टीस से पैदा हुई ........उनकी आँखे एक दम लाल थी जैसे मानो वे अपने आप से लड़ रहे हों......  तभी  उन्हें अंतरनाद सुनाई दी "अब क्यों पछता रहे हो एक दिन तुम ने उसकी तरफ से मुँह  फेरा था .......जिसके लिये मुँह फेरा था आज वो धन -दौलत तुमको देकर तुमसे और इस संसार से मुँह फेरकर चला गया.......। यह सोंचते -सोंचते उनकी आँखें फिर से छलक आई.......आज अपने किए पर पछतावा हो रहा  है कि किस प्रकार उन्होंने लोगों के बहकावे में  आकर अंधविश्वासी होकर उमेश को मनहूस कहा था" ………………

Wednesday, May 18, 2011

चुनौती

आज सुजाता के सिर से बाप का साया भी ईश्वर ने छीन लिया । आज उसे सारी दुनिया में सिर्फ अंधेरी ही नजर आ रहा था । कुछ वर्षों पहले माँ का साया सिर से उठ गया था एक पिता का साया बचा था वह भी चला गया । सुजाता का न कोई भाई है न बहिन वह अपने माँ-बाप की इकलौती संतान थी । कितने जतन से माँ -बाप ने उसे पाला था जीवन में जिस चीज की चाह की वह मिली लेकिन आज वह किसके सहारे रहे….। हमारे समाज में एक अकेली  जवान लड़की का जीना कितना मुश्किल  होता है यह तो वही जानती है । सुजाता के पिता के नाम कुछ दस एकड़ ज़मीन थी और एक घर । सुजाता का एक चाचा था । माता -पिता के गुजरने के बाद वह अपने चाचा - चाची के साथ उनके घर शहर में आ गई थी उसने सोचा था कि माता -पिता तो छोड़ गए ,अब चाचा-चाची ही मेरे माता पिता हैं । जैसे -जैसे समय बीतने लगा वैसे -वैसे उसके चाचा-चाची का असली चेहरा सुजाता के सामने आने लगा। सुजाता को कुछ समय तक तो घर में एक परिवार के सदस्य की तरह देखा जाता था लेकिन कुछ समय बाद वह घर के आम सदस्य से नौकरानी बन गई घर का सारा काम खाना बनाना, बरतन धोना , कपड़े धोना सारे घर की साफ सफाई उसके काँधों पर जबरन रख दी गई । सुजाता के चाचा - चाची बैंक में नौकरी करते थे सुजाता ने कई बार अपने चाचा-चाची से उसे नौकरी पर लगाने का आग्रह किया था लेकिन उन्होंने उसकी बातों को विशेष महत्तव नहीं दिया । दिन प्रतिदिन उसके चाचा-चाची का अत्याचार उसपर बढ़ता ही जा रहा था । अब तो उसे खाने के लिए भी नाप तोलकर  दिया जाने लगा था । फिर भी उसने किसी से कोई शिकायत नहीं की अपना नसीब मानकर वह सब दुखों को सहती रही । उसे पता था कि अगर वह घर से बाहर जाती है तो बाहर समाज उसे चैन से जीने नहीं देगा । एक जवान लड़की वह भी अकेले…..यही सोचकर वह उनके अत्याचारों को सहती रहती घुट -घुट कर जीती । सुजाता की एक चचेरी बहिन भी थी। चचेरी बहिन थी तो सुजाता से दो साल छोटी लेकिन हुकुम ऐसे चलाती थी जैसे सुजाता छोटी हो और वह बड़ी । सुजाता के नाम दस एकड़ ज़मीन है यह सुजाता भी जानती थी और उसके चाचा-चाची भी । साल भर जो कुछ खेतों में पैदा होता था चाचा उसे बेचकर पैसे  चुप अपनी जेब में रख लेते थे उसे तो यह तक नहीं पता कि कब कितनी फसल बिकी और किस खेत में कौन सी फसल है । चाचा -चाची ने उसे एक कैदी के समान घर में रख रखा था न बाहर जाना न किसी से बात करना सब पर पाबंदी थी। इस प्रकार के जीवन से सुजाता तंग आ चुकी थी ...। रह रह कर उसे एक प्रश्न खाए जा रहा था कि क्या यही रिश्ते होते हैं ….?

धीरे -धीरे समय बीता आज सुजाता की  चचेरी बहन की शादी है । सारा घर  रौशनी से सजा हुआ था,  चारो तरफ चहल-पहल थी सभी रिश्तेदार आए । आज सुजाता भी बहुत खुश थी सभी रिश्तेदारों से मिलकर उसे अच्छा लगा लेकिन वह किसे अपने मन की पीड़ा कहे… । देखते देखते चचेरी बहन की शादी हो गई वह अपनी ससुराल चली गई । इधर धीरे-धीरे सारे रिश्तेदार भी विदा हो चुके थे । चाचा -चाची ने अपनी बेटी का विवाह तो बड़ी धूम-धाम से कर दिया लेकिन कभी सुजाता के विवाह के विषय में नहीं सोचा । अक्सर उनके रिश्तेदार उन्हें टोकते रहते –‘कि अब तो सुजाता के बारे में भी सोचना चाहिए उसके भी हाथ पीले कर देने चाहिए । वह भी  विवाह के योग्य हो गई है। भले ही विवाह में  ज्यादा रुपया खर्च नहीं करना किसी गरीब के घर ही विवाह कर दो.. ।’ जब भी सुजाता के विवाह का प्रश्न आता चाचा कोई न कोई बहाना बनाकर उसे टाल देते ।

एक दिन उसके चाचा ने कहा – ‘बेटा नदी पार जो जमीन है उसे बेच देते है अभी अच्छे दाम मिल रहे है ।’ सुजाता को लगा कि वे अपनी ज़मीन को बेचने की बात कह रहे है क्योंकि दोनो की ज़मीन एक साथ ही तो थी । सुजाता ने भी कह दिया कि आप की मरजी ज़मीन आपकी है अब उसे बेचो या न  बेचो । यह सुनकर उसके चाचा को मानो मुँह माँगी मन्नत मिल गई हो.। तुरंत ही वे ज़मीन के कागज लेकर आ गए और सुजाता को उन पर हस्ताक्षकरने के लिए कहने लगे । हस्ताक्षर की बात सुनकर सुजाता को दाल में कुछ काला लगा उसने पूरे कागजात पढ़े ,कागजात पढ़ने के बाद उसके पैरों तले की ज़मीन खिसक गई असल में उसके चाचा अपनी ज़मीन नही सुजाता की दस एकड़ ज़मीन बेचना  चाह रहे थे । जब सुजाता ने यह प्रश्न किया कि वे उसकी ज़मीन क्यों बेचना चाह रहे है तो उन्होंने कहा कि उस ज़मीन को बेचकर तेरे हाथ पीले जो करने हैं नहीं तो इतने पैसे कहाँ से आएंगे .......। यह देखकर सुजाता ने कागजातों पर हस्ताक्षर करने से साफ मना कर दिया । अब क्या था  अब तो सुजाता पर दिन रात ज़मीन के कागजातों पर हस्ताक्षर करने का दवाव बढ़ने लगा । अब वह क्या करे उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था लेकिन वह जानती थी कि वह किसी भी हालत में अपने पिता की ज़मीन को उनके नाम नहीं लिखेगी उसके लिए उसे चाहे कितने ही अत्याचारों का सामना क्यों न करना पड़े.।
अत्याचारों का सिलसिला लगातार चलता रहा सुजाता उन अत्याचारों को सहती रहती ।अपने कमरे में बैठी अपने अतीत के दिनों को याद करते हुए सोच रही थी कि - क्या ये वही चाचा-चाची है जो कभी मुझपर इतना  लाड़ लड़ाते थे ….? माँ-पिता क्या गए इनका लाड़ - प्यार भी चला गया क्या वह सिर्फ दिखावा था ? सोचते-सोचते उसकी आँखें भर आई…। आज उसे अपने माता -पिता की बहुत याद आ रही थी .......। तभी दरवाजे के खटकटाने की आवाज़ हुई सुजाता अपनी आँखों के आँसुओं को पोंछती हुई दरवाजा खोलने के लिए गई । दरवाजा खुलते ही उसने देखा कि चाची लाल तमतमाती हुई बाहर खड़ी हैं । चाची ने दरवाजा खुलते ही आव देखा न ताव सीधे सुजाते के गाल पर एक ज़ोर का तमाचा लगाते हुए दहाड़ने लगी .....। आज चाची का यह रौद्र रुप देखकर सुजाता के रोगटे खडे हो गए । आज तक उसके माता -पिता ने उसे दो अँगुली तक नहीं लगाई ...... आज चाची ने बिना किसी कसूर के ......। कुछ देर तो वह मूर्तीवत खड़ी रही उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे तभी चाची ने उसका हाथ पकड़ा और जोर का झटका देते हुए कमरे से बाहर खींचते हुए चिल्लाने लगी ..... सुजाता वहाँ से सीधे  रसोई में जाकर खाना बनाने लगी । इधर चाची का बड़बड़ाना लगातार जारी था कभी वह सुजाता को कोसती कभी उसके माँ-बाप को ......।

      आज घर में दावत का आयोजन किया गया है । उसके चाचा का प्रमोशन जो हुआ है । शाम को चाचाजी के सभी दोस्त खाने पर आने वाले हैं । मेहमानों के लिए खाना बनाने की ज़िम्मेदारी सुजाता को दी गई साथ ही साथ यह हिदायत भी दी गई कि खाने में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं होनी चाहिए वर्ना......। खाना बनाने में सुजाता की  सहायता के लिए घर के दो नौकर भी थे । बीस से तीस लोगों का खाना बनाना कोई बच्चों का खेल तो नहीं … एक बार तो सुजाता के मन में आया कि वह कह दे वह इतने सारे लोगों के लिए अकेले खाना नहीं बना सकती फिर न जाने क्या सोचकर खाना बनाने के काम में लग गई ...। जैसे ही सूरज आसमान की गोद में छिपा एक -एक करके मेहमानों का आना शुरु हो गया ...इन्हीं में से एक थे अनुराग  जो कि उसी बैंक में मैनेजर के पद पर कार्य कर रहे थे जिस बैंक में उसके चाचा-चाची कार्य कर रहे थे। वे सुजाता को तब से जानते थे जब वह बहुत छोटी थी। सुजाता को अपने सामने दीन हीन हालत में देखकर वे चौक गए पहले तो उन्हें लगा कि शायद सुजाता की सक्ल की कोई और लड़की है। लेकिन जब सुजाता ने आकर उन्हें ‘नमस्ते अंकल जी कहा’ तब उन्हें पता चला कि वह सुजाता ही है । अनुराग  को यह तो पता था कि सुजाता के माता -पिता का स्वर्गवास हो चुका है लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि वह अपने चाचा-चाची के साथ इसी शहर में रह रही है। जब उन्होंने सुजाता से उसकी कुशलता का समाचार पूछा तो उसकी आँखें भर आई...सुजाता ने अपनी आप बीती किसी तरह उन्हें कह सुनाई .... अनुराग को सुजाता की आप बीती सुनकर यकीन ही नहीं हो रहा था कि सीधे-साधे दिखने वाले उसके चाचा-चाची इतने निर्दयी होंगे ... ।

अनुराग ने सुजाता को समझाया कि वह यहाँ रहकर अपना जीवन बर्बाद न करे । उन्होने समझाते हुए कहा कि– ‘तुम पढ़ी लिखी होकर भी क्यों अनपढ़ों के समान यहाँ इनके अत्याचार  सह  रही हो ऐसा तो है नहीं कि तुम्हारे पास घर नहीं है या ज़मीन जायदाद नहीं है । यह तो तुम भी अच्छी तरह जानती हो कि अगर तुम अपनी दस एकड़ ज़मीन को किराए पर दोगी तो इतना पैसा तो तुम्हें मिल ही जाएगा कि तुम आराम से घर बैठी खाओगी और फिर तुम पर किसी का कोई अहसान नहीं होगा...। तुम पढ़ी लिखी हो कही नौकरी क्यों नहीं कर लेती . अगर यहाँ इसी प्रकार घुट घुट कर जीती रही तो ये लोग तुम्हारा इसी प्रकार शोषण करते रहेंगे। क्यों किसी बेसहारे के समान इनकी चौखट पर पड़ी हो ...जब तक तुम स्वयं अत्याचार के खिलाफ नहीं खड़ी होगी कोई भी तुम्हारी मदद नहीं कर सकता अब फैसला तुम्हें करना है.....। यदि तुम्हें मेरी मदद की कभी भी ज़रूरत पड़े तो बिना संकोच  कह देना ।

धीरे -धीरे दावत समाप्त हुई घर आए हुए सभी मेहमान अपने - अपने घरों को जा चुके थे । अनुराग की कही बातों ने सुजाता पर न जाने क्या जादू सा कर दिया था कि अब वह अपने चाचा के घर को छोड़कर अपने घर जाने के लिए तैयार हो चुकी थी । आज रात उसने जैसे - तैसे काटी सारी रात वह सुबह होने का इंतजार करती रही  सुबह होते ही उसने अपने चाची-चाचा के सामने अपने घर जाने की बात कही तो दोनों यह सुनकर सन्न रह गए । उन्हें लगा कि यदि वह अपने घर जाकर रहेगी तो जो दस एकड़ ज़मीन है वह जाती रहेगी और वे किसी भी कीमत पर उस ज़मीन को छोड़ना नहीं चाहते थे। अगर सुजाता उनके साथ न रहकर अकेली रहेगी तो जो कुछ खेती से आमंदनी हो रही है वह भी रुक जाएगी , अब तक तो जो कुछ भी खेती में पैदावार हो रही थी उस सब के वे ही कर्ता धर्ता थे जब सुजाता वहाँ नहीं रहेगी तो वह सब कुछ बंद हो जाएगा और फिर घर पर भी तो  काम करने के लिए भी कोई नही रहेगा । इसी लिए उन्होंने उसे समझाया कि तुम्हारा अकेले रहना ठीक नहीं है और फिर तुम्हें यहाँ पर किसी चीज़ की कमी तो है नहीं.... फिर क्यों तुम वहाँ जाकर अकेले रहना चाहती हो । वैसे भी आज-कल का ज़माना ठीक नहीं है आदि बातें …. लेकिन सुजाता ने निर्णय ले लिया था कि अब वह इस घर में नहीं रहेगी….

जो कुछ उसका सामान था वह लेकर वह किसी न किसी तरह वह चाचा-चाची का घर छोड़कर निकली ,  वह घर से बाहर तक तो आ गई लेकिन अपने घर तक कैसे जाए यह सबसे बड़ा प्रश्न था क्योंकि उसके पास किराए के लिए के रुपया तक नहीं था । चाचा-चाची ने उसे एक रुपया तक नहीं दिया यहाँ तक कि जो चप्पलें उन्होंने उसे खरीदकर दीं थी वे भी उसके पाँवों से निकलवा ली । सुजाता बिना चप्पलों के नंगे पाँव घर से निकल आई .... गरमी के दिन थे सूरज की ताप से सारी धरती जैसे मानो एक गरम तवा सी बन चुकी थी उसपर नंगे पाँव चलना कितना कठिन होगा यह तो वही जान सकता है जिसपर बीती होगी। कुछ देर सुजाता सड़क पर एक पेड़ के नीचे बैठी रही यही सोचती रही कि वह अपने घर तक कैसे जाए, घर भी वहाँ से करीब पंद्रह से बीस किलोमीटर दूर था  ... कुछ देर सोचने के बाद वह खड़ी हुई अपना सामान उठाया और पैदल चलने लगी । ऊपर सूरज आग बरसा रहा था नीचे सड़क दहक रही थी वह सड़क के किनारे उगी घास पर पाँव रख-रखकर चलती चली गई कुछ दूर जाती फिर किसी पेड़ की छाँव में आराम करने लग जाती इसी प्रकार चलते-चलते दोपहर से शाम हो गई भूखी प्यासी सुजाता आखिरकार अपने घर पहुँच ही गई ....। गरमी में बीस किलोमीटर पैदल चलने के कारण उसके पैरों में छाले पड़ चुके थे । कुछ छाले तो फूट चुके थे जिसके कारण उसे अत्यधिक पीड़ा हो रही थी । घर में कुछ भी नहीं था जो वह उन छालो पर लगा सके ।

सारा घर धूल से भरा पड़ा था । शुक्र है …वह घर को जैसा छोड़कर गई थी वैसा ही है। अब वह घर तो आ गई है लेकिन खाएगी क्या सामान कहाँ से लाएगी उसके पास तो पैसे ही नहीं है...। थकी हारी सुजाता ने जैसे तैसे घर थोड़ा बहुत साफ किया और भूखी प्यासी अपने कमरे में सोने के लिए लेट गई लेकिन छालों की पीड़ा के कारण वह सारी रात सही ढ़ंग से सो न सकी। घर में न बिजली थी  न पानी ...क्योकि साल भर से बिजली का बिल नहीं जमा किया इसी लिए बिजली काट दी गई थी वही हाल पानी का भी था ...। दूसरे दिन सुबह लंगड़ाते -लंगड़ाते  वह पड़ौस की दुकान जिससे हमेशा उसके पिताजी सामान खरीदा करते थे उस दुकान पर गई और कुछ खाने का सामान उधार लेकर आई, दुकादार सुजाता को अच्छी तरह जानता -पहचानता था। इसीलिए उसने सुजाता को उधार सामान दे दिया । दो दिन से भूखी सुजाता ने खाना बनाकर खाया ....। खाना खाने के बाद वह घर की साफ - सफाई में लग गई । उसके कपड़े और पिताजी के कपड़े इधर उधर बिखरे पड़े थे । जैसे ही उसने पिता जी के कपड़े  देखकर उसकी आँखें भर आर्इं..... कपड़ों को झाड़ कर बक्से में रखने लगी तभी एक कपड़े  से कुछ पैसे नीचे गिरे उसने पैसों को देखा और उठाकर गिनने लगी  वे तीन सौ रुपए थे जो पिताजी के कुर्ते में रखे थे । इतने पैसे पाकर उसे लगा जैसे पिताजी को पहले से ही पता था कि उनकी बेटी को उनके जाने के बाद इन पैसो की सख्त ज़रूरत पड़ेगी । इसीलिए वे इतने सारे पैसे अपने कुर्ते में रखकर छोड़ गए थे। मेरी मदद के लिए….. यह सोचकर वह फूट-फूटकर रोने लगी.....।

आज सुजाता को चाचा-चाची का घर छोड़े हुए एक महीना बीत चुका है वह अपनी ज़िन्दगी को धीरे -धीरे पटरी पर ला रही है । जो पैसे उसे पिता के कुर्ते से मिले थे सबसे पहले उसने दुकानदार का उधार चुका दिया। घर पर न बिजली थी न पानी बिजली का बिल भी बहुत था और पानी का भी ....इतना पैसा कहाँ से लाए ...तभी उसे अनुराग की कही बातें याद आई कि उसके पास दस एकड़ ज़मीन है वह उस ज़मीन को किराए पर देकर भी पैसे कमा सकती है ..उसने ऐसा ही किया एक साल के लिए अपनी ज़मीन एक किसान को किराए पर दे दी ... चाचा ने ज़मीन को किराए पर न देने के लिए कहा लेकिन अब सुजाता ने चाचा की एक न सुनी ....किराए के जो पैसे मिले थे उनसे उसने अपने घर की बिजली और पानी के नए कनेक्शन लगवाए । बिजली और पानी के कनेशनों के लिए उसे कितनी भाग -दौड़ करनी पड़ी तब जाकर कही काम बन पाया था । बिजली पानी की समस्या तो उसने भाग-दौड़ करके हल कर ली थी लेकिन अब सबसे बड़ी समस्या यह थी कि आगे का सफर बिना नौकरी के कैसे चलेगा.....?

एक दिन वह बाजार से सामान लेकर लोट रही थी कि उसकी मुलाकात बचपन की सहेली कल्पना से होती है । दोनों सहेलियाँ एक दूसरे को आमने सामने देखकर चौक जाती है फिर बातें करती हुए घर आती है । कल्पना एक प्राइवेट स्कूस में टीचर की नौकरी करती है । जब कल्पना ने सुजाता की आपबीती सुनी तो उसकी भी आँखें भर आई ... । कुछ समय सुजाता के पास बैठने के बाद वह घर लौट आई दूसरे दिन उसने अपने स्कूल में अपनी प्रिसीपल से सुजाता के विषय में बात की जब प्रिसिपल ने यह सारी घटना सुनी तो उन्होने सुजाता को अगले दिन स्कूल आने के लिए कहा .... प्रिसिपल ने सुजाता का इन्टरव्यू लिया और उसे प्राइमरी कक्षाओ के लिए नियुक्त कर लिया ...। स्कूल में नौकरी मिल गयी । इधर अपनी दस एकड़ ज़मीन को दूसरे किसानों को भाड़े पर दे देती  इस प्रकार अब उसका जीवन सुख से  व्यतीत होने लगा । जब तक वह स्कूल में रहती तब तक तो सारा दिन अच्छे ढंग से गुजर जाता जैसे ही शाम होती उसे घर में अकेलापन खाने को दौड़ता। अपने  इस अकेलेपन को दूर करने के लिए वह घर पर गरीब बच्चों को पढाने लगी उन्हें  वैदिक मंत्रों की शिक्षा देने लगी । वैदिक मंत्रों की शिक्षा उसने अपने पिताजी से प्राप्त की थी । उसके पिता  एक ब्रााहृण ज्योतिषी थे । नौकरी के साथ -साथ सुजाता ने आगे की पढ़ाई का काम भी शुरू कर दिया । धीरे -धीरे उसने एम.फिल तक की पढ़ाई कर ली । अब उसे बच्चों को पढ़ाने का अनुभव चार -पाँच साल हो चुका था एक स्कूल में काम करने के बाद उसने दूसरे स्कूल में नौकरी की जहाँ उसे ज्यादा  तन्ख्वाह मिलने लगी इस प्रकार वह अपने जीवन की गाढ़ी को आगे चलाने लगी। जीवन की इस आपाधापी में समय कैसे गुजर गया पता ही नही चला । बीस -पच्चीस साल की सुजाता अब जीवन के दूसरे पड़ाव को भी पार करने लगी थी । मानसिक तनाव  कारण  सिर के पूरे बाल सफेद हो चुके थे। जीवन  जीने के संघर्ष ने उसे समय से पहले ही वृद्धावस्था की देहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया था ।

एक दिन जब सुजाता स्कूल से घर लौटी तो एक चिट्ठी को पढ़कर उसके पैरों तले की ज़मीन खिसक गई । वह चिट्ठी कोर्ट का नोटिस था । उसके चाचा ने उसकी दस एकड़ ज़मीन पर अपना मालिकाना हक जताया था । इसी लिए उन्होंने सुजाता के ऊपर केस कर दिया था कि वह उनकी ज़मीन पर जबरन कब्जा करके खेती कर रही है..। सुजाता ने कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी कि उसके चाचा इस हद तक नीचे गिर सकते हैं  । उसने भी एक वकील से मिलकर कोर्ट में अपना पक्ष रखा । कोर्ट कचहरी के रोज रोज चक्कर लगाना ....स्कूल जाना बच्चों को पढ़ाना । धीरे -धीरे जमा पूजी कोर्ट कचहरी के चक्करों  में समाप्त होने लगी यहाँ तक कि उसे अपना घर तक बेचना पड़ा। वह चाहती थी कि किसी भी प्रकार से अपने पिता की ज़मीन को बचा सके लेकिन...........। कोर्ट कचहरी के फैसले इतनी जल्दी कहाँ आते हैं ...तारीख पर तारीख एक साल दो साल देखते देखते बीस साल बीत गए लेकिन उस ज़मीन का कोई फैसला न हो सका ... कोर्ट कचहरी के इसी झंझट के कारण उसकी तबीयत खराब होने लगी इधर कोर्ट कचहरी का खर्चा , उधर घर का किराया और अब बीमारी का खर्चा आमदनी उतनी थी नहीं ….जैसे तैसे सरकारी अस्पताल में जाकर अपना इलाज करवाया।   वह इस हालत  में क्या करे क्या ना करे उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था .....कभी कभी तो उसे लगता कि ऐसी ज़िदगी से तो मौत भली । लेकिन उसने भी ठान लिया था कि मौत के विषय में तो कायर लोग सोचते हैं और वह कायर नहीं है ।  कुछ भी हो वह कोई भी ऐसा काम नहीं करेगी जिससे उसकी और उसके स्वर्गवासी माता -पिता की बदनामी हो ...... आत्मसम्मान से जीवन जीने की चुनौती को वह जीतकर ही दिखाएगी. ।

आखिर एक दिन उसके सब्रा का बाँध टूट गया । एक अकेली जान कहाँ -कहाँ, किस किस से लड़े   इन कोर्ट कचहरी के झंझटो से तंग आकर उसने अपना केस वापस ले लिया । वह ज़मीन जिसके लिए अपना घर तक बेच दिया था । चाचा को दे दी। इस ज़ालिम समाज में अकेला होना भी पाप है। वह अपने पेट के लिए कमाए कि केस लड़ने के लिए ....एक अकेली औरत के लिए समाज में इज्जत से जीना कितना दूभर होता है यह तो वही जानती है ….पग पग पर उसे ज़ालिम समाज में बैठे भेड़ियों से रोज लड़कर अपनी रक्षा खुद करनी होती है…..।

Friday, March 18, 2011

नन्ही मुस्कान


किशनलाल जेल की कालकोठरी में बैठा कुछ सोच रहा था । सोचते सोचते उसकी  आँख लग गई (उसे नींद आ गई)  ....... तभी उसे बाबा ...बाबा के शब्द सुनाई दिए । बाबा शब्द सुनकर किशनलाल ने इधर-उधर देखा  सामने एक छोटी बच्ची नजर आई वही उसे बाबा ..बाबा कहकर पुकार रही थी
किशनलाल – ‘कौन हो तुम जो मुझे बाबा ..बाबा कहकर पुकार रही हो.?’         
बाबा .. मैं तुम्हारी मुस्कान
किशनलाल -‘मेरी मुस्कान ...?’ 
कुछ दोनों पहले ही तो परिवार के लोगों ने मुझे यह नाम दिया था …भूल गए मुझे।
अपनी बच्ची को सामने खड़ा देखकर किशनलाल ने झट से उसे अपनी गोदी में भर लिया और उसे चूमने लगा ।
उसने देखा कि मुस्कान उससे  कुछ कहना चाह रही है।  मुस्कान बाबा के आँसू पोंछते हुए कहने लगी.   
“बाबा मेरा क्या कसूर था जो मुझे इस संसार में आते ही ……बाबा  मैं तो तुम्हारे आँगन में खिली एक नन्ही कली थी  फिर क्यों मुझे फूल बनने से पहले ही तोड़ दिया गया क्यों बाबा क्यों….?  मै भी जीना चाहती थी बड़ी होकर कुछ बनना चाहती थी , बड़ी होकर  तुम्हारे सपनों को साकार करना चाहती थी। मै तुम्हारी आँखों का तारा बनकर जीना चाहती थी । बाबा मैं जानती थी बेटियाँ माँ-बाप के लिए  पराया धन होती हैं लेकिन मैं  ........।  तुम ही तो कहते थे कि बेटियाँ बेटों से कम नहीं होती  फिर  क्यों बेटियों की ही बली दी जाती है। बेटियाँ तो बाबा (बाप) को बेटों से ज्यादा प्यारी होती है लेकिन मैने ऐसा कौन का अपराध  किया था…. किस गुनाह की मुझे यह सज़ा मिली.... न मैं माँ की ममता देख सकी न बाप का प्यार….न मैं सुख देख सकी ना दुख क्यों मुझे संसार के किसी बंधन में बंधने  से पहले ही आज़ाद कर दिया गया।  मैं तो तुम्हारे घर की इज्जत बनकर  जीना चाहती थी फिर क्यों मुझे किसी के घर की इज़्जत बनने से पहले ही घर-संसार से बाहर कर दिया गया……? बेटियाँ तो  फूलों की तरह होती हैं जो सदैव दूसरों के आँगन को महकाया करती हैं फिर क्यों बेटियों को  फूल बनने से पहले ही नष्ट कर दिया जाता है। सब ने मुझे मुस्कान नाम दिया था फिर क्यों मेरे मुस्काने से पहले ही मुझे  संसार से अलविदा कर दिया गया….. ।”
मुस्कान की बातें सुनकर किशनलाल उसे समझाने का प्रयास करता - ‘नहीं बेटी  ऐसा नहीं है ।’
बाबा कब तक अपने आप से झूठ बोलते रहोगे । अब तो सच्चाई को स्वीकर कर लो…बेटियों के आने से कहीं मिठाइयाँ नहीं बाँटी जाती। 
नींद में किशनलाल को बड़बड़ा हुआ देखकर पास ही बैठे एक अन्य कैदी ने उसे  झकझोकर जगाया।
जैसे ही वह नींद से जगा . उसने अपने चारों तरफ पागलों की तरह देखना शुरू  कर दिया यह देखकर उसके कैदी साथी ने उससे पूछा  ‘क्या हुआ ….? क्या ढ़ूँढ़ रहे हो...?’ 
किशनलाल  - ‘भाई अभी -अभी मेरी बच्ची मुस्कान मुझसे बातें कर रही थी । कहाँ गई मुस्कान…..।’
उसकी बातें सुनकर साथी कैदी ने अपनी आवाज़ मे कठोरता आते हुए कहा ‘क्या पागल हो गए हो तुम्हें शायद याद नहीं कि तुम जेल में बंद हो यहाँ कोई मुस्कान -वुस्कान नहीं है चुपचाप सो जाओ और हमें भी सोने दो।

अपनी बेटी की कही बातों को याद कर आज उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था कि उसने जो किया वह गलत था । बार -बार उसे अपनी बेटियों की याद आने लगी.... जो कुछ भी उसने किया था आज उसपर उसे पछतावा हो रहा था । अपने आप को संसार का सबसे बड़ा पापी मान रहा था जिसने अपने ही हाथों अपनी हँसती - खेलती दुनिया को तबाह कर दिया  । कभी  अपने अतीत की सुनहरी यादों को याद करके हँसने लगता तो कभी अपने द्वारा किए उस जघंन्य अपराध को याद कर दहाड़ मार कर रोने लगता.... किशनलाल को इस तरह रोता हुआ देखकर उसके अन्य कैदी साथी उसे सांत्वना देते …धीरज बंधाते ।

रात काफी हो चुकी थी  रात के अंधेरे में सभी कैदी अपने-अपने बिस्तरों पर सोए हुए थे । इधर किशनलाल एक टक रोशनदान से आती रोशनी को देखते हुए कुछ सोच रहा था । सोचते -सोचते वह अपने अतीत की गहराइयों में खो गया.....
किशनलाल और उसकी माँ अस्पताल में एक बेन्च पर चिंता मग्न बैठे थे  । आज किशनलाल की पत्नी कमला को बच्चा होने वाला है । किशन लाल के चार बेटियाँ है , किशनलाल को इस बार उम्मीद है कि ज़रूर बेटा ही होगा , वह बैठा-बैठा ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है कि इस बार ईश्वर उसकी झोली में एक बेटा दे दे ........। घंटों बैठे रहने  के बाद एक नर्स ने आकर उसे सूचना दी - आपकी पत्नी ने बेटी को जन्म दिया है । बेटी पैदा होने की खबर सुनते ही किशनलाल के पैरों तले ज़मीन खिसक गई । उसे लगा जैसे उसे किसी ने गहरी खाई में फेंक दिया हो। वह एक मूर्ती के समान बैंच पर बैठ गया उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि इस बार उसकी पत्नी फिर से बेटी को जन्म देगी । बेटे  की चाह के लिए उसने कितने ही मंदिर ,मस्जिद में जाकर माँथा टेका था कितनी ही मन्नते माँगी, ओने-टोटके जो कुछ हो सकता था  सब कुछ करवाया लेकिन .... । कुछ समय बाद अस्पताल की एक आया बच्ची को गोद में लेकर बाहर आई जहाँ किशनलाल और उसकी माँ बैठे थे। 
आया- “देखो कितनी सुन्दर है बच्ची , बिल्कुल चाँद का टुकड़ा लग रही है।”   
किशनलाल ने बेटी की तरफ देखा तक नही और वह वहाँ से उठकर बाहर चला गया । किशन की माँ ने एक नज़र अपनी पाँचवी पोती को देखा तो उसकी  आँखों से आँसू छलक आए .....। आया बच्ची को वापस अंदर ले गई ।

किशनलाल को आज ईश्वर पर बहुत क्रोध आ रहा था। वह बार बार ईश्वर को कोसने लगा  कि उसने उससे ज्यादा तो कुछ नहीं माँगा था केवल एक बेटा ही तो माँगा था उससे वह भी नहीं हो सका फिर तू किस बात का भगवान ...तूने मुझे पहले से ही चार-चार बेटियाँ दी मैने तुझसे कभी कोई शिकायत नहीं की लेकिन इस बार भी ........। नहीं ..नहीं अब मैं और बेटियों का भार नहीं  सह सकता .... । क्या करे क्या न करे उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था? इसी कश्मकश में  सीधे घर जा पहुँचा । जैसे ही वह घर पहुँचा चारो बेटियों ने उसे घेरकर पूछा-“ बाबा क्या हुआ....? माँ कैसी है ?आ गया हमारा भैया..... कैसा है वह…?  हमें भी ले चलो ना माँ के पास हम भी भैया को देखना चाहती हैं ...क्या हुआ बाबा तुम कुछ बोलते क्यों नहीं, क्या हुआ..?”
किशनलाल –“कुछ नही... ।”
कैसा है हमारा छोटू , हमारा भैया ....?   
उसने बेटियों की तरफ देखा उनके सिर पर हाथ फेरा........ बिना कुछ कहे  बाहर निकल आया ... ।
इधर अस्पताल में उसकी पत्नी और माँ उसके आने का इंतजार कर रही थीं  । घर से वह निकला तो था कहीं और जाने के लिए किन्तु न जाने उसके कदम उसे अस्पताल में ले आए जैसे ही वह अस्पताल में घुसा , उसका सामना माँ से हुआ ।

माँ- “कहाँ चला गया था तू ...? कब से तेरा इंतजार कर रहे हैं .. तेरा फोन भी नहीं लग रहा ..क्या हुआ..?”
उसने निराशाभरी नज़रों से माँ की तरफ देखा और एक लंबी साँस छोड़ते हुए बोला –‘कुछ नहीं माँ... मन थोड़ा बेचैन था इसी लिए बाहर चला गया था ...।’ उसकी माँ को पता है कि वह क्यों बुझा-बुझा सा लग रहा है । उसे लग रहा था कि इस बार तो उसे अपने बेटे की प्राप्ति होगी लेकिन उसके सारे सपने चकनाचूर हो गए । यहाँ तक कि किशन की माँ भी यही उम्मीद लगाए हुए थी कि ईश्वर इस बार तो उसे पोते के दर्शन करवाएगा लेकिन ऐसा हो न सका .. किशन की माँ ने उसे अपना नसीब मानकर स्वीकार कर लिया  लेकिन किनशन इस बात को कतई स्वीकार करना नहीं चाहता था। किशन की मानसिक स्थिति को देखते हुए उसकी माँ ने उसे समझाने की कोशिश की…
माँ – “मैं जानती हूँ कि तू यहाँ से क्यों  उठकर चला गया .............पर बेटा किस्मत को तो कोई बदल नहीं सकता ना.. कहते हुए  माँ की आँखें भर आईं । ”
किशन ने माँ से कुछ नहीं कहा वह माँ को लेकर अस्पताल के अंदर चला गया जहाँ उसकी पत्नी को रखा गया था। जैसे ही किशन की पत्नी ने उसे देखा वैसे ही उसकी आँखे नम हो गईं .... जो सपने उसने अपने आनेवाले बेटे के लिए बुने थे सब चकनाचूर हो गए । उसने एक नज़र  पत्नी की तरफ देखा और बैंच पर बैठ गया । तभी माँ नवजात शिशु को अपनी गोद में उठाकर उसके सामने ले आई , जैसे ही माँ बच्ची को उसके पास लेकर आई वैसे ही वह वहाँ से उठा और कमरे से बाहर निकल गया उसने बच्ची को एक नज़र देखा तक नहीं । माँ उसे पुकारती रह गई पर उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा सीधा अस्पताल से बाहर निकल गया । बार-बार उसके मन में एक ही ख्याल आ रहा था पाँचवी बार भी बेटी.....?

 दो दिन के बाद कमला को अस्पताल से छुट्टी मिल गयी वह दो दिन की बच्ची को गोद में लिए घर आ गयी । जब  घर के परिवारवालों ने नन्हीं बच्ची को देखा तो उसके चेहरे को देखते ही किशनलाल की बेटी रीना कहने लगी– ‘देखो तो कितनी सुंदर है, कैसी मुसकुरा रही है , हम इसका नाम मुस्कान रखेगे ।’ मुस्कान नाम सुनकर घर के अन्य लोगों ने भी हाँमी भर दी । कितना सुन्दर नाम है मुस्कान । कमला को न जाने क्यों एक अजीब सी घबराहट हो रही थी , न जाने क्यों आज उसका मन किसी अनहोंनी की आशंका से काँप रहा था । कमला ने कभी सोचा भी न था कि इस नन्ही सी बच्ची के आने से उसकी ज़िन्दगी में इतना बदलाव आ जाएगा जो पति उसे जान से भी ज्यादा चाहता था उसका बर्ताव भी बदल जाएगा । आज- कल वह घर में कम और बाहर की दुनिया में ज्यादा रहने लगा  है । घर पर भी आता तो चुप चाप रहता न किसी से बोलना न किसी से हँसी - मजाक करना । यह सब देखकर कमला मन ही मन घुटती रहती अपने आप को कोसती रहती । घर के  अन्य लोगो ने जो हुआ उसे अपना भाग्य मानकर स्वीकार कर लिया। घर-परिवार के सभी लोग दिखावे के लिए तो खुश थे लेकिन बेटा न होने का गम  उनकी हँसी में साफ झलक रहा था। जब से यह नन्हीं सी जान किशन के घर-परिवार में आई है  पता नहीं वह मन ही मन किन ख्यालों में खोया रहता ...। घरवालों ने दोस्तों ने, रिश्तेदारों ने, किशन को समझाया कि जो हो गया उसे लेकर ज्यादा चिंता करने की जरुरत नहीं । अगर तुझे बेटे की इतनी ही चाह है तो एक बच्चा गोद ले लेना लेकिन इस तरह जीवन में निराश नहीं हुआ करते । सब ठीक हो जाएगा किन्तु किशन को किसी की बात समझ में नही आती.. किशन किसी और के बच्चे को गोद लेना नहीं चाहता था उसे तो अपना ही बेटा चाहिए था।

 एक रात को किशन  वह सब कर गुजरा जिसकी किसी ने कल्पना भी न की थी। किशन ने अपनी पाँचों बेटियों को संसार के बंधन से मुक्त कर दिया . ….बीच -बचाव में पत्नी भी बुरी तरह घायल हो गई।  सुबह होते ही उसने अपने आप को  पुलिस के हवाले कर दिया। पुलिस ने बुरी तरह घायल कमला को अस्पताल में भर्ती करवा दिया ।  सुबह जिसने भी यह खबर सुनी सुनकर दंग रह गया । अब घर में एक बूढ़ी माँ के अलावा और कौन बचा था। यह सब देखकर बूढ़ी माँ का रो-रोकर बुरा हाल था ।  पुलिस भी यह सब जानकर दंग रह गई कि कोई बेटे की चाह में अपने हँसते-खेलते परिवार का नाश कर सकता है । अस्पताल में भर्ती कमला का इलाज डॉक्टरों ने तुरंत शु डिग्री कर दिया  जिसके कारण उसे बचाने में डॉक्टरों ने कामियाबी हासिल कर ली लेकिन पाँचों बेटियों को ……. । पिछले तीन चार दिनों से अस्पताल में पड़ी है जैसे ही कमला को होश आता वैसे ही वह अपनी बेटियों को पुकारने लगती। जब हद से ज्यादा हो जाता तो डॉक्टर नींद का इंजेक्शन  लगा देते । पिछले तीन-चार दिनों से वह एक ज़िदा लाश के समान थी ...उसकी आँखों के आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे । इधर किशनलाल की विधवा बूढ़ी माँ इस घटना से बहुत विचलित हो चुकी थी एक तरफ बहू अस्पताल में भर्ती , दूसरी तरफ जवान बेटा जेल में ...। पिछले तीन -चार दिनों से वह अस्पताल में कमला के सिरहाने से हिली तक नहीं । जब भी कमला होश में आती और बेटियों को याद कर रोने लगती तब माँ ही उसे सांत्वना देती उसे संभालती ..। रिश्तेदारों ने कमला की सास को घर  जाकर कुछ आराम करने के लिए कहा लेकिन वे एक पल के लिए भी  वहाँ से न हिली।  कमला की हालत में धीर- धीरे सुधार हो रहा था ।
अचानक किशनलाल को जोर का धक्का लगा धक्का लगने के कारण उसकी आँखे खुल गई सामने देखा तो हवलदार खड़ा था। वह जल्दी उठने के लिए चिल्ला रहा था।किशलाल ने हवलदार की तरफ देखा और एक लंबी साँस लेते हुए उठ खड़ा हुआ ..।          

Monday, February 14, 2011

तेरी महफिल

तेरे साथ हम तेरी महफिल तक जा पहुँचे,
दिल का गम छिपाकर तेरी महफिल में जा बैठे।
     दुनिया की नजरों से बचकर तेरे साथ हम मैखाने में जा बैठे,
     मय के दो प्यालों के साथ हमें वहाँ से लौटना पड़ा
     तेरे साथ तेरी महफिल में हमें बैठना पड़ा ।

साथ तेरा पाकर हमने लुफ्त खूब उठाया 
रात गहरी होने लगी तनहाइयाँ बढ़ने लगी
हमें साथ तेरे खाली हाथ लौटना पड़ा
तेरे साथ तेरी महफिल में हमें बैठना पड़ा ।

  मैखाने में अगर हमें देख ले कोई ,यूँ तीखी नज़रों से
  अब तो अंगुलियाँ जमाने की हम पर उठने लगी
  तेरी खातिर हमें वहाँ से यूँ खाली हाथ लौटना पड़ा
  तेरे साथ तेरी महफिल में हमें बैठना पड़ा ।

महफिल चाँद सितारों सी सजी थी, चाँद अपनी जवानी में था
चेहरा न नजर आया यार का ,हमें खाली हाथ लौटना पड़ा
तेरे साथ तेरी महफिल में हमें बैठना पड़ा ।

Monday, January 24, 2011

ऑटोग्राफ भाग तीन

गौरव भागता हुआ अमित के पास आया । भागने के कारण उसकी साँसें फूल रही थी। अमित ने उसके इस तरह भागकर आने का कारण पूछा ....? गौरव ने बताया कि दो महिने पहले जिस कम्पनी में उन दोनों ने नौकरी के लिए आवेदन दिया था उसका इन्टरव्यू के लिए पत्र आया है । इन्टरव्यू अगले सप्ताह की बारह तारीख को है । इन्टरव्यू की खबर सुनकर अमित की खुशी का ठिकाना न रहा । इन्टरव्यू के लिए उन्हें हैदराबाद जाना था । हैदराबाद जाने के लिए उन्होंने तत्काल में रेल टिकट निकलवाई और हैदराबाद के लिए निकले..। इन्टरव्यू दोपहर एक बजे था दोनों अमित और गौरव कम्पनी में बाहर बजे ही पहुँच गए थे । वहाँ जाकर देखा तो दोनों दोस्त वहाँ का नजारा देखकर दंग रह गए । अमित - बाप रे ..... इतने सारे लोग सभी के सभी इन्टरव्यू के लिए। अमित की बात का समर्थन करते हुए गौरव ने भी कहा हाँ यार ऐसा लगता है कि शहर के पूरे लोग यहीं पर आकर ठहर गए हों। अमित और गौरव सहमें से वहाँ पर जा  बैठे जहाँ पर सभी लोग बैठे थे । मन में एक प्रकार की घबराहट थी कि पता नहीं नौकरी मिलेगी कि नहीं ...। एक -एक करके इन्टरव्यू देकर बाहर निकल रहे थे बाहर बैठे सभी लोगों का यही हाल था सब के सब कुछ सहमे से बैठे थे वहाँ पर बैठे सभी लोह अपनी बारी आने का इंतज़ार कर रहे थे । कुछ घंटों इन्तज़ार करने के पश्चात गौरव का नम्बर आया । गौरव को इन्टरव्यू के लिए अंदर गए हुए कम से कम एक घंटा हो गया बाहर अमित की टेन्शन बढ़ती जा रही थी कि पता नहीं अंदर किस प्रकार के प्रश्न पूछे जा रहे हैं। थोड़ी देर बाद गौरव मुस्कुराता हुआ बाहर निकला । गौरव के चेहरे की मुस्कुराहट को देखकर अमित को लगा जैसे उसकी नौकरी पक्की हो गई है। गौरव ने आकर बताया कि यह तो पहला ही राउन्ड था जो उसने क्लीयर कर लिया है अभी तो तीन राउन्ड और बाकी हैं। कुल चार राउन्डस की बात सुनकर अमित और भी घबरा गया । गौरव ने उसे बताया कि अभी तो उसका सामान्यज्ञान और जनरल विषय का ही इन्टरव्यू लिया गया है जो उसने क्लीयर कल लिया है उसने अमित को समझाया कि जो भी वे लोग तुमसे प्रश्न पूछे उसका शांती से सोचकर सही जवाब देना अगर प्रश्न का उत्तर नहीं आता है तो उन्हें सीधे-सीधे मना कर देना  आदि बातें । थोड़ी देर के बाद अमित का नम्बर आया वह इन्टरव्यू के लिए अंदर गया एक घंटे के बाद वह बाहर निकला बाहर आते समय उसके चेहरे पर भी वहीं रौनक थी जो गौरव के चेहरे पर थी। उसका चेहरा देखते ही गौरव समझ गया था कि उसने अपना पहला राउन्ड क्लीयर कर लिया है। इसी तरह दोनों दोस्तों ने एक -एक कर दो राउन्ड तो क्लीयर कर लिए तीसरे राउन्ड में अमित पीछे रह गया अर्थात गौरव ने अपना तीसरा राउन्ड क्लीयर कर लिया अमित तीसरे राउन्ड में बाहर हो गया । अमित का तीसरा राउन्ड क्लीयर न होने की वजह से गौरव भी बहुत दुखी हुआ । अब बारी थी चौथे और आखिरी राउन्ड की अमित बाहर बैठा अपने दोस्त की सफलता के लिए मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था । कुछ समय बाद गौरव बाहर निकला गौरव के चेहरे पर एक मायूसी थी , मायूसी थी चौथे राउन्ड में बाहर होने की अर्थात गौरव चौथे और आखिरी राउन्ड में बाहर हो गया । यहाँ पर दोनों दोस्तों को निराशा ही हाथ लगी । हाँ यहाँ आकर उन्हें यह पता चल गया कि इन्टरव्यू में किस प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं । यह उन दोनों का पहला इन्टरव्यू था । दोनों मित्र एक दूसरे का हौसला बढ़ाते हुए यह कहते – ‘कोई बात नहीं यार यह ज़रूरी नहीं कि जिस इन्टरव्यू को हम अटेन्ड करे उस में सलैक्ट भी हो। कोई बात नहीं इस में सलैक्ट नहीं हुए तो क्या  किसी और  कम्पनी में सही.....?’ दोनों हैदराबाद से  दिल्ली के लिए  रवाना हुए । दिल में एक मायूसी तो थी ही लेकिन क्या करे...?
अमित खिड़की के पास बैठा कुछ सोच रहा था। गौरव को लगा कि कही वह फिर से उन बीती बातों यानी कि निधी के बारे में तो नहीं सोच रहा इसीलिए उसने एक नया विषय छेड़ते हुए कहा –‘अरे अमित तुमने बहुत दिनों से कोई शेरोशायरी नही की । आज कुछ सुनाओ ना यार ।
अमित-' नहीं यार अभी शेरोशायरी का मूड़ नहीं है।'
गौरव-‘अरे यार अभी तक तुम्हारा मूंड़ ऑफ है... छोड़ ना यार यहाँ नौकरी नहीं मिली तो क्या हुआ कहीं ना कही मिल ही जाएगी तू चिंता क्यों कर रहा है ? बहुत दिनों से तेरी कोई कविता नहीं सुनी। अपनी कविता या शायरी सुना दे….।’
अमित  - ‘अरे यार अभी मुझे कुछ याद नहीं है....?’
गौरव – ‘अच्छा कोई पुरानी ही सुना दे..।’
अमित - 'तू भी ना.....?'

अब तो सीने में एतबार के खंजर उतर गए , जो बरता एहतियात तो अपने साए से ही डर गए,
अब तो वक्त की ठोकरों में पड़ा सोच रहा हूँ, मेरा दुख दर्द बाँटने वाले वो लोग किधर गए।
शायद जी को सुकूँ मिल जाए दोस्तों के बीच,सुकूँ की तलाश में हम किस -किस के घर चले गए,
दोस्तों के बीच भी हमें सुकूँ ना मिला ,आज उनके बीच ही बेगाने हम हो गए..।
हमने भी जीना चाहा हँसी - खुशी  हमें तो अपने ही जीते जी मार गए,
अब तो सीने में एतबार के खंजर उतर गए , जो बरता एहतियात तो अपने साए से ही डर गए।

गौरव - 'वाह …वाह....!  क्या बात है.....?'
छोड़ इन गम भरी बातों को कब तक उसकी यादों को अपने सीने से लगाकर रखेगा……?
अमित - क्या करुँ यार भूलना तो बहुत चाहता हूँ लेकिन .......?
गौरव - 'क्यों उन बीती बातों को तू अपने सीने से लगाकर बैठा है । छोड़ उन सब बातों को और यह  
       बता कि आगे और क्या करने का इरादा है?'
अमित - 'यार आगे एम. बी.ए. करने का इरादा है लेकिन ......?'
गौरव - 'लेकिन क्या..?'
अमित - "यार एम.बी.ए करने के लिए पैसे भी तो चाहिए और  अभी मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे मेरी एम.बी.ए. की फीस जमा कर सकें । घर में पिताजी अकेले कमानेवाले हैं। हम तीन भाई बहन  और इस महंगाई में घर का खर्च चलना कितना मुश्किल है यह तो मैं भी जानता हूँ । मम्मी -पापा अपनी छोटी-छोटी खुशियों का बलिदान करके हमे सुखी रखने का प्रयाश करते रहते हैं । हमारा भविष्य बनाने के लिए पिताजी दिन रात मेहनत करते हैं । अब मैं इस लायक हो गया हूँ कि पिता जी का कुछ बोझा हलका कर सकूं तो नौकरी ही नहीं मिल रही ...। धीरे-धीरे करके पूरा एक साल होने जा रहा है। सोचा था कि जैसे ही पढ़ाई खत्म होगी कही न कहीं नौकरी ज़रूर मिल जाएगी लेकिन ....।"
गौरव - कोई बात नहीं यार नौकरी एक न एक दिन मिल ही जाएगी चिंता मत कर ।
अमित और गौरव दिल्ली लौट आए । यहाँ आकर दोनों ने कई कम्पनियों में नौकरी के लिए आवेदन किया । कॉलेज के दोस्तों में केवल गौरव ही था जो लगातार अमित से मिलता रहता था।
दोनों ने साथ-साथ कई कम्पनियों में नौकरियों के लिए आवेदन किया, साथ-साथ कम्पनियों में इन्टरव्यू भी दिया । कुछ समय बाद गौरव को पुणे में एक आई.टी कम्पनी में नौकरी मिल गई लेकिन अमित की नौकरी की तलाश अभी भी जारी थी।

इसी तरह समय का चक्र चलता रहा और अमित उसी में पिसता रहा जहाँ कही जाता निराशा ही हाथ आती । यह बात उसके भी समझ में नहीं आ रही थी कि आखिर उसके ही साथ ऐसा क्यों हो रहा है? यहाँ तक कि गौरव जो कि उससे पढने -लिखने में कम होशियार था उसे भी नौकरी मिल गई लेकिन अमित ने हार नहीं मानी वह लगातार मेहनत करता रहा । अमित के घर की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी । अमित बच्चों के ट्यूशन से जितने पैसे कमाता था उसमें से कुछ घर के खर्चे  के लिए माँ को दे दिया करता बाकी  पैसे खुद के खर्चे के लिए रख लेता । इन्टरव्यू के चक्कर में उसके काफी बच्चों ने ट्यूशन छोड़ दिया था क्योंकि अब वह उन बच्चों पर उतना ध्यान नहीं दे पाता था । अब तो गिने चुने पाँच -छह बच्चे ही बचे थे । घर की आर्थिक स्थिति और नौकरी न मिलने के कारण अमित काफी परेशान रहने लगा। अमित की माँ ने उसे समझाया कि परेशानी से किसी समस्या का हल नहीं निकलता । आज नहीं तो कल तुम्हें नौकरी मिल ही जाएगी नौकरी को लेकर इतनी चिंता करना ठीक नहीं है इस तरह तो तुम्हारी तबीयत भी खराब भी हो सकती है ।

गौरव अक्सर अमित को  कॉल करता था यह जानने के लिए कि कही उसे नौकरी मिली की नहीं । एक दिन गौरव ने अमित को अपने पास पुणे आने के लिए कहा । उसने बताया कि यदि वह वहाँ आ जाएगा तो नौकरी ढूँढने में वह भी उसकी कुछ सहायता कर सकता है। अमित को गौरव की बात सही लगी और एक दिन वह पुणें आ गया । यहाँ वह एक पेइन्ग गैस्ट की तरह रहने लगा । यहाँ आकर उसके सामने सबसे बड़ी समस्या नौकरी पाने की थी और दूसरी नया शहर न को जान-पहचान का केवल गौरव है जिसे वह इतने बड़े शहर में जानता है। यहाँ आकर अमित ने कुछ आई.टी. कम्पनियों में नौकरी के लिए अपलाई कर दिया था । वह रोज़ सा ही किसी ना किसी कम्पनी में इन्टरव्यू देने के लिए जाता लेकिन अभी तक उसे नौकरी नहीं मिल पाई । जहाँ कही भी वह इन्टरव्यू के लिए जाता उसके ज्ञान की प्रशंसा तो सब लोग करते लेकिन साथ ही साथ नौकरी करने का अनुभव भी मांगते । नौकरी करने का अनुभव अमित को था नहीं ...। यहाँ आकर अमित और परेशान रहने लगा एक तरफ परिवार की आर्थिक स्थिति दूसरी तरफ खुद का बेरोज़गार रहना उसे बहुत परेशान करता रहता था ।
एक दिन दोपहर का समय था अमित खाना खाने के लिए बैठा पहला निवाला खाने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि सेलफोन पर कॉल आया कॉल किसी अन्जान का था। निवाला वापस थाली में रखते हुए फोन लिफ्ट किया ।
अमित- ‘हैलो’
फोन पर सारी बातें सुनकर वह थोड़ी देर के लिए समझ ही नही पाया कि जो कुछ उसने सुना क्या वह सब सही है..........।
उसने पास उसका दोस्त भी बैठा खाना खा रहा था, अमित को भौचक्का देखकर दोस्त ने पूछा कि ‘क्या बात है तुम ऐसे भौचक्के क्यों रह गए । किसका फोन था ...सब कुछ ठीक तो है ना .... ।’
अमित की खुशी का ठिकाना नही था अपने दोस्त को गोदी में भरते हुए कहा कि जिस कम्पनी में पिछले सप्ताह उसने इन्टरव्यू दिया था उस कम्पनी में उसकी नौकरी पक्की हो गई है और ऑफर लैटर लेने कि लिए सोमवार को बुलाया है। अमित यह कहते कहते भावुक हो गया उसकी आँखों से खुशी के आँसू गिरने लगे ।
अमित का दोस्त यह देखकर कि नौकरी मिलने की खुशी में सब लोग तो खुश होते है और यह कि रोने लगा ….।
अमित ने बताया कि वह गम के आँसू नहीं खुशी के आँसू हैं । कितने दिनों से नौकरी पक्की होने की खबर सुनने के लिए उसके कान तरस गए थे ।
इस खुशी की खबर को सुनने के बाद अमित से थाली में रखा खाना भी न खाया जा सका ।
उसने ये दो दिन शनिवार और रविवार किस तरह से काटे थे यह तो वही जानता है। सोमवार की सुबह  दस बजे वह उस कम्पनी के लिए निकल चला आज उसकी खुशी का ठिकाना न था । वह सोच रहा था कि पहले अपोइन्मेन्ट लैटर मिल जाए फिर वह घर पर मम्मी -पापा को यह खुशखबरी सुनाएगा। कुछ समय बाद वह अपनी मंज़िल तक पहुँच ही गया । वहाँ पर कुछ घंटों इन्तज़ार करने का बाद उसे अपना अपोइन्मेन्ट लैटर मिला। दो दिन के बाद उसे नौकरी ज्वाइन करनी थी । वहाँ से सीधा घर आया और सबसे पहले घर  फोन करके यह खुशखबरी दी फिर गौरव को । आज सचमुच उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था, बार-बार ईश्वर को धन्यावाद देता .। वह दिन भी आया जिस दिन उसे अपना ऑफिस ज्वाइन करना था । आज उसका पहला दिन था ऑफिस में नौकरी मिलने की खुशी उसके चेहरे पर साफ देखी जा सकती थी फिर भी एक अनजाने भय की छाया भी देखी जा सकती थी शायद आज उसका ऑफिस में पहला दिन है इसी लिए वह थोड़ा सा भयभीत है।
अमित के ऑफिस ज्वाइन करने के कुछ महीनों बाद उसे कम्पनी की तरफ से पाँच दिन की  वर्कशॉप  के लिए  भेजा गया। इस वर्कशॉप में कई कम्पनियों के नए ज्वाइन किए हुए एम्प्लोय आए हुए थे । यहाँ पर अमित का बहुत से नए लोगों के साथ परिचय हुआ , नए लोगों के साथ काम करने का मौका मिला इन पाँच दिनों में यहाँ पर उसके मित्रों का एक समूह बन गया था । नए मित्रों के साथ उसका भी मन लग रहा था । वर्कशॉप के अंतिम दिन वहाँ पर आए सभी लोगों को कुछ ना कुछ प्रेसेंट करना था । किसी ने गाना गाया किसी ने नाच प्रस्तुत किया किसी ने जोक्स कहे…।  अमित और उसके दोस्तों को विषय दिया गया था  जीवन में धन की महत्ता  जिसे उन्हें एक हास्यात्मक नाटक के रुप में प्रस्तुत करना था। अमित और उसके दोस्तों ने वह नाटक बखूबी प्रस्तुत किया ।
पाँच दिनों के बाद वर्कशाप समाप्त करके  अमित फिर से  कम्पनी में पहुँचा।  कम्पनी ज्वाइन करके छह-सात महीनें बीत चुके हैं । अमित के कामों में अक्सर कोई न कोई कमी रह जाती है। वह अभी तक अपने अतीत की यादों से पूरी तरह से बाहर नहीं निकल पाया है। उसी कारण वह अपने काम में पूरी तरह ध्यान नहीं लगा पाता जिसके कारण उसकी बनाई हुई रिपोर्टस में कोई न कोई कमी रह जाती है।  यहाँ पर उसके कुछ दोस्त बने जब उन्हें पता चलता है कि अमित की बनाई हुई रिपोर्टस में अक्सर गलतियाँ हो जाती तो वे लोग उसकी सहायता करते हैं। ऐसा नहीं है कि अमित को विषय की जानकारी नही है उसे विषय की बराबर जानकारी है लेकिन क्या करे अभी तक वह अपने अतीत से बाहर नहीं आ सका है ...। जैसे-जैसे समय बीतता गया वैसे-वैसे उसके अतीत की यादें भी धूमित होती चली गयीं। अपने आप को कम्पनी के कामों में इतना व्यस्त कर लिया था कि साँस लेने तक की फुरसत नहीं थी । कम्पनी हर साल अपने कर्मचारियों में से कुछ कर्मचारियों को एम.बी.ए की शिक्षा के लिए चुनती है । एम.बी.ए की पढ़ाई का खर्चा कम्पनी ही देती है। अमित की मेहनत का ही परिणाम  था कि कम्पनी द्वारा बीस हजार कर्मचारियों में से चुने गए दस कर्मचारियों में उसका भी नाम था । जब उसे यह सूचना मिली कि कम्पनी की तरफ से एम.बी.ए करने का मौका मिला है तो उसकी खशी का ठिकाना न रहा...अमित ने तुरंत यह खबर अपने मम्मी -पापा ,अपने दोस्त गौरव को सुनाई। किसी ने सच ही कहा है मेहनत का फल हमेशा माठा होता है। आज उसे लग रहा था कि ईश्वर के घर देर है अँधेर नहीं....।

समय भी न जाने मनुष्यों के साथ कैसे -कैसे खेल खेलता है । जिस कॉलेज से अमित और उसके अन्य साथी एम.बी.ए करते है उसी कॉलेज से निधी भी एम.बी.ए कर रही है । न अमित को इस बात का पता था कि निधी भी इसी कॉलेज से एम.बी.ए कर रही है और ना ही निधी को पता था कि अमित भी इसी कॉलेज से एम.बी.ए कर रहा है। आखिर एक दिन दोनों अमित और निधी का आमना सामना हो ही जाता है। निधी और अमित एक दूसरे को अपने सामने देखकर चौक गए । निधी को अपने सामने खड़ा देखकर अमित को लगा कि ज़रूर यह उसका भ्रम है .. निधी की तो शादी हो चुकी है अब पता नहीं वह कहाँ होगी ...। लेकिन  जब निधी ने उसे हाय ... कहा तो उसे यकीन हुआ कि वह निधी ही है जो उसके सामने खड़ी है..। उस दिन बस हाय...हैलो तक ही बात हुई। उस रात अमित बहुत बेचैन रहा कि अब वह क्या करे ....? जिसे भुलाने में उसे वर्षों लग गए है आज वह फिर उसके सामने आकर खड़ी हो गई है । एक साल पहले के अमित और आज के अमित में ज़मीन-आसमान का फर्क है ...। अमित ने मन ही मन फैसला किया कि अब वह निधी के किसी भी बहकावे में नहीं आएगा उसे अब अपने कैरियर को बनाना है बस और कुछ नहीं…..।

इसी कॉलेज में अमित की दोस्ती वैशाली नाम की लड़की से होती है जो निधी और अमित दोनों की दोस्त है । कुछ दिनों बाद अमित को पता चलता है कि निधी की जिस लड़के के साथ शादी हुई थी एक साल के अंदर ही दोना का तलाक भी हो गया है।  एक दिन निधी ने वैशाली से संदेश भिजवाया कि वह अमित से मिलकर कुछ बात करना चाहती है । निधी ने वैशाली को अपने और अमित के विषय में सब कुछ बता दिया था ...। जब अमित ने भी निधी से मिलना स्वीकार कर लिया । एक दिन वे दोनों मिले.....निधी ने अपना दुखड़ा अमित को कह सुनाया .... अमित ने उसका दुखड़ा सुना लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं दी ...। अमित ने उसे समझाया कि जो कुछ हो गया है उसे वह बदल तो नहीं सकता , लेकिन अब वह उसके लिए और कुछ नहीं कर सकता… । निधी यह देखकर हैरान थी कि क्या यह वही अमित है जो कभी उसकी एक आहट पर जान न्यौछावर करने को तैयार रहता था। अमित, निधी  के भावों को समझ गया… लेकिन उसने उससे कुछ नहीं कहा । कुछ समय निधी के साथ व्यतीत करने के पश्चात अमित ने निधी से कहा  ‘देखो निधी अब मैं जीना चाहता हूँ…., जीवन में कुछ बनना चाहता हूँ उम्मीद करता हूँ कि तुम ......... और वह चला गया । अमित के मुख से इस प्रकार के वाक्य सुनकर वह सन्न रह गई। उस दिन के पश्चात अमित ने निधी की तरफ न देखा और न किसी प्रकार की कोई बात की...। निधि से हुई मुलाकात को उसने एक बुरा सपना समझकर भुला दिया । एम.बी.ए की पढ़ाई समाप्त हो गई। अमित वापस अपनी कम्पनी में एक और ऊँचे पद पर कार्य करने लगा ... ।  
यह सब सोचते -सोचते अमित सो गया। अगले दिन सुबह दस बजे उसकी छोटी बहन ने आकर उसे जगाया। अपनी छोटी बहन को सामने देखकर वह चौक गया ... ‘छोटी तू यहाँ ….?’
‘भैया मैं यहाँ नहीं तो कहाँ होगीं..?’
‘ओह ! शायद मैं सपना देख रहा था ....?’
‘अच्छा जल्दी से उठो और नहा धोकर आ जाओ चाय नाश्ता तैयार है।’
‘अच्छा तू चल मैं आता हूँ’- कहकर अमित ने छोटी बहन को भेज दिया । जैसे ही वह उठने लगा उसकी ऑटोग्राफ की किताब नीचे गिर गयी । किताब के साथ-साथ उसमें रखी एक पुरानी तस्वीर भी नीचे गिर गयी । यह तस्वीर क़ॉलेज के  दोस्तों की थी । उस तस्वीर के पीछे उसके कुछ दोस्तों के फोन नम्बर भी लिखे हुए थे । उसने फोटो और ऑटोग्राफ की किताब उठाकर टेबल पर रख दी और नहाने के लिए बाथरूम में चला गया। जैसे ही वह बाथरूम से निकला उसके फोन पर गौरव का फोन आया। गौरव के फोन को देखकर वह बहुत खुश हुआ।
अमित- 'हैलो "
गौरव –‘अबे आज-कल तो बहुत बिज़ी हो गया है एक फोन करने तक का समय भी नहीं मिलता है..।’
अमित- ‘यार तू तो जानता है ऑफिस में कितना काम रहता है...।’
गौरव-  ‘अच्छा यह बता अभी  कहाँ पर है।’
अमित –‘ दिल्ली ।’
गौरव – ‘क्या बात कर रहा है ? कब आया तू दिल्ली..?’
अमित – ‘दो दिन हो गए यार.. और तू बता कहाँ है तू।’
गौरव – ‘यार मैं भी कल ही दिल्ली आया हूँ । अच्छा सुन .... ।’
अमित – ‘बोल ना..।’
गौरव- ‘कोई तुझसे बात करना चाह रहा है..?’
अमित – ‘कौन…?’
गौरव – ‘अब यह तो तू उसकी बातें सुनकर पहचान कर लेना।’
अमित – ‘अबे.. बता ना कौन है...?’
गौरव – ‘ले उससे बात कर ... ।’
     अमित ने जब उस व्यक्ति से बातें करना शु डिग्री किया तो पहले वह उसे पहचान नहीं सका कुछ देर बाद उसकी समझ में आ गया कि वह उसके कॉलेज का दोस्त जयकुमार है। यह वही जयकुमार था जिसे ब्लड कैंसर हो गया था, अमित और उसके दोस्तों ने मिलकर उसके इलाज के लिए पैसे इकट्ठे किए थे।
जयकुमार को फोन पर पाकर वह एक दम चौक गया । उससे बातें करने के बाद पता चला कि वह दिल्ली में ही  भारतीय स्टेट बैंक में काम करता है । अमित ने उससे कॉलेज के दोस्तों के विषय में पूछा कि क्या वह अब भी उन दोस्तों के सम्पर्क में है या नहीं ? उसने बताया कि ज्यादा तो नहीं पर हाँ एक -दो  मित्रों से उसकी अक्सर मुलाकात होती रहती है।  अमित ने सब दोस्तों से मिलने की इच्छा जताई और कहा कि आज दोपहर दो बजे के बाद सब लोग उसी कॉलेज में मिलेंगे जहाँ से सब लोग अलग हुए थे । अमित ने सभी को दोपहर दो बजे का समय दिया। गोविन्द से बातें करने के बाद उसने सुबह का नाश्ता किया और अपने दोस्तों से मिलने के लिए चला गया। कॉलेज घर से थोड़ा दूर ही था । जैसे ही वह उस इलाके में पहुँचा वहाँ का नज़ारा देखकर वह दंग रह गया जहाँ कभी छोटे-छोटे घर हुआ करते थे, वहाँ उनके स्थान पर बड़े-बड़े अपार्टमेंन्ट खड़े हो गए हैं।  थोड़ी देर के बाद वह अपने कॉलेज जा पहुँचा कॉलेज भी पूरी तरह बदल चुका था । कॉलेज के सामने दो छोटे -छोटे मॉल बन चुके थे । कॉलेज की मुख्य इमारत उन मॉलों के बीच दबकर रह गई थी । दो सालों में हुए इस बदलाव को देखकर अमित भौचक्का रह गया ।  सबसे पहले पहुँचनेवालों में अमित ही था। उसके बाद गौरव और जयकुमार आए धीरे-धीरे एक दो दोस्त और आए । आज ये लोग एक दूसरे से वर्षों बाद मिल रहे थे ...सब एक दूसरे को देखकर यही सोच रहे थे कितने बदल गए हैं सब ...। सभी दोस्त एक दूसरे के गले मिल और एक दूसरे सी राजी-खुशी पूछी सभी कॉलेज के अंदर गए और उसी जगह जाकर बैठ गए जहाँ कभी उनका सारा ग्रुप बैठा करता था । थोड़ी देर बैठने के बाद  चारो-पाँचों दोस्त एक साथ अपने लैक्चररों से मिलने चले गए । कॉलेज के प्रांगड़ में  अमित की नज़र एक पेड़ के नीचे बैठे कुछ बच्चों पर गई वे लोग एक दूसरे से हँसी- मजाक कर रहे थे कुछ एक दूसरे से किसी विषय पर बहस कर रहे थे यह सब देखकर  उसे अपने उन दिनों की यादों में खो गया जब वे लोग भी कभी इसी प्रकार वहाँ पर बैठा करते थे………..उसने अपने दोस्तों से कहा ‘अरे यार हम लोग भी कभी इसी प्रकार उस पेड़ की छाँव में इकट्ठे होकर बैठते थे कितना हँसी -मजाकर किया करते थे...?’सभी दोस्तों ने उस पेड़ की तरफ देखा और सभी ने एक साथ कहा ‘हाँ यार  कॉलेज के वे दिन भी क्या थे…… ?’ सभी कॉलेज के दिनों की उन मीठी यादों में खो गए……………।

----------------     समाप्त    -----------------------------