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Thursday, October 13, 2011

अंतरनाद

दो बेटियों के बाद बेटे को पाकर गोविन्द फूला न समा रहा था । गोविन्द का कपड़े का व्यापार था  दिल्ली के पास एक छोटे से गाँव से निकलकर वह कई शहरों में गया  व्यापार  किया पर व्यापार  कहीं भी ठीक से चला नहीं अंत में अपने परिवार के साथ हैदराबाद में आया  और यहीं  आकर बस गया । यहाँ पर उसका व्यापार और शहरों के मुकाबले में अच्छा होने लगा  । बेटे को  पाकर मानो उसका छोटा सा परिवार पूरा हो गया हो वह अपने छोटे से परिवार के साथ सुखी जीवन व्यतीत कर रहा था । उसने  बेटे का नाम उमेश रखा । उमेश धीरे -धीरे बड़ा होने लगा, जैसे-जैसे उमेश बड़ा हो रहा था वहीं दूसरी तरफ उसके पिता को व्यापार में दिन-प्रतिदिन घाटा होने लगा । इस घाटे के कारण वह काफी चिंतित रहने लगा उसे  समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर व्यापार में  यह घाटा क्यों शुरु हो गया । एक दिन दुकान में बैठा इसी विषय पर चिंतन कर रहा था और सोचने लगा कि आखिर यह घाटा कहाँ से और कब से शुरु हुआ है.... तब उसके ध्यान में आया कि जब से उमेश उनके जीवन में आया है तभी से घर में कोई न कोई अनहोनी घटना घटित हो रही है........ ऐसा नहीं था कि केवल यह उसकी ही सोच थी इससे पहले भी कई लोगों ने उससे इस बात का जिक्र किया था, लेकिन उसने उन सब लोगों  की बातों पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया लेकिन जब खुद इस बात का चिन्तन करने लगा तो उसे भी लगने लगा कि उसके मित्र जो कह रहे थे वह सब सच है । यह लड़का उनके लिए अशुभ है.........फिर क्या था  उसी क्षण से उसका  लगाव उमेश से एक दम  हट गया , उस दिन से  उससे उखड़े-उखड़े रहने लगा लेकिन यह बात उसने किसी से कही नहीं। अब तो वह  उमेश की छोटी-छोटी गलतियों पर अपनी भड़ास निकालने लगा …... यहाँ तक कि जब उमेश ने दसवी  कक्षा की परीक्षा में  विद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया सभी लोगों ने उसे बधाई दी लेकिन उसके पिता ने एक प्यार का शब्द तक नहीं कहा यह देखकर उसे काफी दुख हुआ लेकिन ................। वैसे वह  एक हँसमुख लड़का था जीवन के कठिन से कठिन काम को हँसते-खेलते करता । सदैव दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहता लेकिन कभी भी अपने दुख को दूसरों के सामने नहीं रखता यही उसकी खास आदत थी कुछ भी हो जाए अपने दुख को किसी से नहीं कहता था ....
    एक दिन की बात है जब वह घर के बाहर  अपने दोस्तों के साथ क्रिकेट खेल रहा था । उस समय उमेश  बैटिंग कर रहा था । खेलने के दौरान उसने जोर से गेंद को मारा  जिसके कारण घर की खिड़की का शीशा टूटकर चकनाचूर हो गया । उस समय उसके पिताजी घर पर ही थे । खिड़की का टूटा शीशा देखकर   आग बबूला हो गए और सीधे बाहर जाकर उसे को दो तमाचे लगाते हुए सीधे घर से  अंदर ले आए और भली-बुरी कहने लगे...... जब उसकी माँ बीच बचाव के  लिए आई तो उन्होंने उसे भी चुप रहने का हुक्म सुना दिया ।गुस्से में उन्होंने कुछ बातें ऐसी भी कह दी जो उन्हें नहीं कहनी चाहिए थी .....  पिता की इन्हीं बातों से नाराज़ होकर उसने घर से बाहर जाने का फैसला कर लिया । उस समय उसकी आयु मात्र पंद्रह- सोलह साल की होगी । गुस्से में आकर वह घर से निकल गया , घर से निकलकर  वह सीधे अपने कॉलेज के मैदान में  एक पेड़े के नीचे जाकर बैठ गया । सारा दिन उसी पेड़ के नीचे बैठा रहा । शाम के समय उसने अपने कुछ मित्रों को उस तरफ आते देखा तो वह वहाँ से उठकर मैदान  से बाहर निकल गया । घर से निकल तो आया अब क्या करे ...?  यही सेचते -सोचते चला जा रहा था तभी उसे रेलगाड़ी का हॉर्न सुनाई दिया। उसने सोचा अगर मैं यहाँ रहुँगा तो घर के लोग उसे ढूँढ़ ही लेंगे इससे अच्छा है  कि वह यहाँ से , इस शहर  से कहीं दूर चला जाए पर कहा......... ?  उसके पास टिकिट खरीदने के लिए पैसे भी तो नहीं हैं। यही सोचते -सोचते वह रेलवे स्टेशन तक जा पहुँचा वहाँ पहुँचकर एक बैंच पर बैठ गया .....।
कुछ समय बाद वहाँ एक रेलगाड़ी आई  उसने देखा कि वह गाड़ी चेन्नई जाएगी कुछ सोच विचार कर वह उस गाड़ी में चढ़ गया। रेलगाड़ी में चढ़ तो गया लेकिन टिकट न होने के कारण काफी सहमा सा खड़ा था । कुछ घंटों के बाद उसने टी.टी को अपनी ओर आते देखा यह देखकर उसके पाँव थर-थर काँपने लगे मन ही मन सोचने लगा अब क्या होगा.....?  कुछ सोच विचार कर रेलगाड़ी के दरवाजे की तरफ खिसक  आया । वहाँ आकर थोड़ी देर खड़ा रहा फिर वहाँ पर बने सौचालय में जाकर छिपकर  बैठ गया । सारी रात उसी सौचालय में बैठा रहा । जब सुबह गाड़ी रेलवे स्टेशन पर रुकी तब वह सहमा -सहमा सा बाहर निकला और जल्दी -जल्दी  रेलगाड़ी से उतरकर प्लेटफॉर्म पर जाकर एक बैंच पर बैठ गया। सुबह का समय था प्लेटफॉर्म पर अधिक भीड़ भी नहीं थी सारी रात टी.टी. के  डर से सो नहीं पाया था । बाहर प्लेटफॉर्म की बैंच पर बैठते ही उसे नींद आ गई । कुछ देर सोने के बाद जगा और इधर-उधर घूमने लगा…… जिस स्थान  पर पहुँचा वहाँ के लोग और उनकी बोली बिलकुल अलग है । वह न तो उस बोली को समझ सकता  है और न बोल सकता है । सारा दिन वह प्लोटफॉर्म पर इधर से उधर भटकता रहा, जब थक  जाता तो किसी बैंच पर बैठ जाता । दो दिन से उसने कुछ नहीं खाया भूखा होने के कारण अब और चलने में असमर्थ है । उसके मन में बार -बार यही सवाल उठ रहा था कि अब वह क्या करे….? अंजाना शहर, अंजाने लोगों के बीच अपने को पाकर  उसकी आँखे छलक आई …..दिन तो उसने इधर -उधर घूमते घामते भूखे-प्यासे जैसे-तैसे करके काट लिया लेकिन जैसे -जैसे रात होने लगी उसकी बेचैनी और बढने लगी कि रात में वह कहाँ जाए ? क्या खाए …? कहाँ सोए ….? आदि प्रश्न उसके मन में चलने लगे। यही सोचते -सोचते एक बैंच पर जाकर बैठ गया  भूखा होने के कारण उसे नींद भी नहीं आ रही थी  सारी रात उसी बैंच पर बैठे - बैठे काट दी. जैसे -जैसे सवेरा होने लगा थके- हारे होने के कारण उसकी आँख लग गई..........
उसने देखा कि वह अपने घर जा पहुँचा है । घर पर माँ का रो-रो कर बुरा हाल है... इधर उसके पिता किसी से कुछ कह नहीं रहे लेकिन उनकी आँखें लाल हैं उनकी आँखों से पता चलता है कि वे भी उमेश के घर से जाने से काफी दुखी है । जैसे ही वह घर पहुँचा उसे देखते ही उसकी माँ ने उसे अपनी छाती से लगा लिया और दहाड़ मारकर रोने लगी । उसके पिता भी  बेटे को पास देखकर अपनी आँखों के आँसुओं को रोक न सके छिपाने की कोशिश तो बहुत की लेकिन आँखों के आँसुओं को रोक न सके   निकल ही आए । पिता की आँखों में अपने लिए आँसुओं को देखकर वह चौंक गया । पिता की आँखों में मेरे लिए आँसू.......? उन्होंने उमेश को अपने सीने से लगा लिया और आँखों से आँसुओं को पोछने लगे.....।

 मेल  -मिलाप के बाद माँ ने आकर पूछा कुछ खाया कि नहीं.....?उसने ना करते हुए सिर हिला दिया..... बहनों ने बताया कि जिस दिन से वह घर से गया है घर में किसे ने अन्न का एक दाना तक नहीं खाया । बस उसकी खोज में लगे हुए हैं घर में दो दिनों से चूल्हा तक नहीं जला ।   माँ-पिता जी ने तीन दिनों से अन्न तो हाथ तक नहीं लगाया । दिन रात उसी कि खोज में लगे रहते  । यह सुनकर उसकी आँखे भर आई , उसकी आँखों में आँसुओं को  देखते ही माँ उसे अपने  सीने से लगाते हुए समझाने लगी- उसने अब जो भी किया सो किया ,लेकिन भविष्य में फिर ऐसा न करने को कहा...।चल हाथ-मूँह धो ले मैं तेरे लिए खाना बनाती हूँ । आज तीन-चार दिनों के बाद घर का चूल्हा जला है। थोड़ी  देर के बाद खाना तैयार हो गया सभी लोग एक साथ बैठकर खाने के लिए बैठे उसने खाने का पहला निवाला मूँह की तरफ बढ़ाया ही था कि एक जोरदार आवाज से वह चौंककर उठ गया । उठते ही वह भौचक्का सा इधर -उधर देखने लगा ...अभी तो में घर पर खाना खाने बैठा था फिर अचानक यहाँ .......? उसने देखा कि सामने दो पुलिसवाले खड़े हैं। पुलिसवालों को अपने सामने खड़ा देखकर उसके हाथ पाँव फूल गए उसे लगा कि शायद वे लोग उसे पकड़कर घर वापस ले जायेंगे । 

ओह!....  वह सपना देख रहा था। पुलिसवालों ने उसे वहा से उठा दिया और वह बैंच से उठकर स्टेशन के बाहर की ओर चल दिया। दो दिन से कुछ न खाने के कारण उससे चला नहीं जा रहा था । स्टेशन से बाहर निकलते ही उसकी आँखों के आगे अंधेरा सा छाने लगा ।  जैसे -तैसे करके वह बाहर एक बैंच पर जाकर बैठ गया । बैंच पर बैठते ही वह सपने वाली बात को सोचने लगा …...घर  पर माँ मेरे लिए कितनी चिंता कर रही होगी.? क्या उन्होंने भी खाना नहीं खाया होगा..? तभी उसे पिता जी की कही वह बात याद आ गई जिसके कारण उसने घर से बाहर आने का फैसला किया था। अन्जान लोग, अन्जान शहर में वह किससे कहे कि उसे भूख लगी है और कैसे कहे........? कुछ देर बाहर बैठने के बाद वहाँ से से उठकर चलने लगा  दो दिन से कुछ न खाने के कारण उसे चक्कर आने लगे उसकी आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा चलते-चलते वह बेहोश होकर सड़क पर ही गिर गया ।
सड़क पर  उसे बेहोश देखकर कुछ लोग वहां पर जमा तो हो गए लेकिन किसी ने उसे अस्पताल ले जाने की नहीं कही   तभी उस भीड़ में से एक आदमी सामने आया उसका नाम अमित था उसने उसे बेहोश देखकर अस्पताल ले गया ।  उसके इलाज के पैसे भी अपनी जेब से दिए उसके होश में आने तक वहीं पर रुका रहा । उसके होश में आने पर उसने उसकी इस अवस्था का करण पूछा , पहले तो कोई जवाब न पाकर उसे लगा कि शायद वह गूँगा है लेकिन जब उसके मूँह से निकला भूख .......    भूख शब्द सुनकर पता चला कि उसकी मातृ भाषा हिन्दी है और वह तमिल  भाषा में पूछ रहा था।
अमित भी चेन्नई का निवासी नहीं था वह भी हिंदी प्रदेश से था लेकिन नौकरी के कारण पिछले बीस सालों से चेन्नई में रह रहा है । इन बीस सालों में उसने तमिल भाषा भी सीख ली थी ....फिर उसने हिन्दी में पूछा  सबसे पहले उसका नाम पूछा, वह कहाँ का रहने वाला है ,माता-पिता कहाँ है आदि प्रश्न उसने पूछ डाले , उमेश केवल अपना नाम बताकर चुप हो गया....  अमित ने फिर से उसकी इस स्थिति के बारे में पूछा तो  उसकी इस अवस्था का  कारण जानकर  वह चौक गया एक छोटी सी बात के लिए कोई इस तरह घर छोड़ देता है क्या……? उसने उसे समझाया कि उसने जो किया है वह गलत है । अमित  ने उसे घर लौटजाने के लिए कुछ पैसे भी देना चाहा लेकिन  उमेश ने पैसे लेने से मना कर दिया ।

उसने अमित  से कहा कि जब तक वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता , इस लायक नहीं बन जाता कि अपने पिता को कह सके कि वह मनहूस नही है ....तब तक  अपने परिवार के पास नहीं जाएगा। वह कुछ काम करना चाहता है ताकि अपना पेट भर सके। अमित ने उसे बहुत समझाया कि वह एक बार फिर से अपने फैसले पर विचार करे ....... अमित का समझाना सब बेकार गया... उमेश अपनी जिद्द पर था कि अब वह घर वापस लौटकर नहीं जायेगा । एक तो उसकी उम्र मात्र पंद्रह- सोलह की होगी उसके उपर से एक अंजान शहर में वह कहाँ रहेगा और क्या करेगा.....? पर  उमेश के द्रड़ निश्चय को देखते हुए आगे  कुछ नहीं कहा।  तभी डॉक्टर ने बताया कि उमेश को कुछ नहीं हुआ शायद कुछ न खाने के कारण ही उसे चक्कर आ गए होगे , चक्कर आने की वजह से ही वह बेहोश हो गया होगा लेकिन अब वह बिलकुल ठीक है , उमेश  के कुछ न खाने की बात जानकर अमित बाजार से कुछ फल और खाना ले आया , जब फल और खाना  उमेश को दिया पहले तो उसने वह सब सामान लेने से इन्कार कर दिया लेकिन अमित के अधिक आग्रह करने पर उसने वह सब खाना स्वीकार कर तो लेकिन उसकी अंतरात्मा यह स्वीकार ही नहीं कर रही थी कि वह अमित  (जो उसके लिए अनजान है ) के द्वारा दिया गया भोजन ग्रहण करे ..... फिर भी ना चाहते हुए उसने वह भोजन ग्रहण कर लिया  खाते समय उने एक नजर शिवमणि की ओर देखा तो उसकी आँखे छलक आई  .......अवरुद्ध गले से उसने उन्हें धन्यवाद कहते हुए एक आग्रह किया कि यदि हो सके तो वे उसे कहीं काम पर लगा दें  ......अमित  ने उसे फिर एक बार समझाने कि कोशिश की लेकिन .............?   जब अमित ने  उससे पूछा कि वह इस अंजान शहर में रहेगा कहाँ  यह सुनकर वह एक दम मौन बैठ गया उसने कुछ नहीं कहा....उसके इस मौन से अमित समझ गया कि उसे ही कुछ करना होगा.......।  

आज के इस स्वार्थी जमाने में दूसरों के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य करने वाले बहुत कम लोग होते  हैं । अमित ने उसे अपने साथ चलने के लिए कहा इस पर भी  उमेश ने आनाकानी की लेकिन अमित ने उसे समझाया कि वह डरे नहीं वह उस पर भरोसा कर सकता है।  उमेश ने उसकी बात मान तो ले लेकिन उसे बताया कि  वह उनपर बोझ नहीं बनना चाहता । अमित  के समझाने पर वह उनके साथ चला गया ।अमित,उमेश को अपने साथ घर ले आया एक अनजान को घर में देखकर अमित कि पत्नी कुछ सकुचा गयी।  अमित पत्नी के भावों को देखकर समझ गया उसने उमेश के बारे में उसे बताया पहले तो पत्नी ने उसे अपने साथ घर में रखने से साफ़ मना कर दिया लेकिन किसी न किसी तरह  उन्होंने अपनी पत्नी को समझाबुझाकर मना लिया। अमित का छोटा सा परिवार था पति -पत्नी और  दो बच्चे  एक लड़का और एक लड़की । दोनों बच्चे शुशील और आज्ञाकारी ....। दोनों बच्चे पढ़ने -लिखने में भी होशियार थे। अमित  का अपने बच्चों के प्रति प्रेम देखकर उमेश को भी अपने माता-पिता की याद आ गई वह यह भी जानता था कि उसने जो कदम उठाया है वह गलत है लेकिन अब जो हो गया है वह उससे पीछे कदम नही हटाना चाहता।

        धीरे-धीरे समय बीतता गया दिन बीते महीने बीते कुछ दिनों तक तो अमित ने उमेश को आराम करने को कहा ।कुछ दिन आराम करने के बाद  उसे  अपने मित्र के ऑफिस में काम पर लगवा दिया  । उमेश दिन में ऑफिस में  काम करता और रात में अपनी पढाई का काम भी करता। नौकरी के साथ -साथ वह अपनी पढाई भी कर रहा था । अमित के परिवार के  साथ रहते-रहते दो-तीन साल बीत चुके थे । इन्हें बीते दो -तीन सालों में वह उनके परिवार का एक हिस्सा बन गया था। ऐसा नहीं है कि उसे अपने परिवार की याद नहीं आती या वह उनसे मिलना नहीं चाहता लेकिन उसने अपने मन में यह दृड़ निश्चय कर रखा था कि जब तक वह अपने उस मुकाम तक नहीं पहुँच जाता जहाँ उसे जाना है तब तक अपने परिवार से नहीं मिलेगा। समय भी किस रफ़्तार से चलता है  आज उसे अपने परिवार को छोड़े हुए  पूरे तीन  साल  बीत चुके हैं। अक्सर रात को जब सब लोग गहरी नींद में होते है वह चुप से छत पर जाकर कुछ घंटों बैठता रात के उस अँधेरे में अपने आप को एकदम आकेला पाता , उस तनहाई में उसे अपने परिवार खासकर माँ की बहुत याद सताती  माँ को याद कर ऐसा कोई दिन नहीं गया होगा जिस दिन उसकी आँखों से आँसू न छलके हो.......। घंटों छत पर बैठे रहने के बाद ही वह सोने जाता ।  वह , अमित के  परिवार के साथ रह रहा था लेकिन कभी भी वह उस परिवार पर बोझ नहीं बना वह पढ़ने लिखने में होशियार था। वह अमित के दोनों बच्चों को  शाम में घर आकर ट्यूशन पढ़ाता , उनके साथ खेलता हंसी -मजाक करता । बच्चों की लगन  और  उमेश की मेहनत के कारण ही अमित  के दोनों बच्चों ने स्कूल में सभी परिक्षाओं में प्रथम स्थान हासिल किया था ।   उमेश ने भी अपनी डिग्री की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास  कर ली थी।
डिग्री की परीक्षा  पास करने के बाद उसने कई कंपनियों में नौकरी के लिए आवेदन किया । आवेदनों के अनुसार धीरे -धीरे कर उसे कंपनियों से इंटव्यू के लिए फोन , पत्र आने लगे अब उसके सामने एक और समस्या आन खड़ी थी । वह यह कि उसके पास एक भी जोड़ी ऐसे कपड़े नहीं थे जिन्हें पहनकर वह इंटरव्यू जाए और ना ही ढंग के जूते । जो जूते उसके पास थे वह भी पुराने और एक-दो  जोड़ी कपड़े ऐसे थे जिन्हें वह पहनकर बाहर जाता था । ऐसी स्थिति में वह क्या उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे क्या ना करे  अगर नौकरी पानी है तो इंटरव्यू को तो जाना ही होगा कुछ समय अपने आप में चिंतन करने के बाद  उसने फैसला किया कि वह उन्ही कपड़ों और पुराने जूतों से ही इन्टरव्यू देने जाएगा। 

एक दिन कि बात है अमित घर में टहल रहे थी कि  अनायास ही वे  उमेश के कमरे में चले गए , कमरे में जाकर  इधर-उधर घूमकर कमरे का निरिक्षण करने लगे तभी उनकी नजर मेज पर रखे उस लिफाफे पर पड़ी जिसमें उमेश का इन्टरव्यू लैटर था। उन्होंने उस लिफाफे को उठाकर देखा तो पता चला कि अगले सप्ताह  उमेश का इन्टरव्यू एक बड़ी कंपनी में है । वे उमेश की आर्थिक स्थिति से  भली- भांति  परिचित थे साथ ही  उसकी खुद्दारी से भी भली भांति परिचित थे । लैटर पढने के बाद  उन्होंने लिफाफा  उसी प्रकार मेज पर रख दिया और कमरे से बाहर निकल आए। उस रात को भोजन करने के पश्चात उन्होंने उमेश को बात करने के लिए अपने कमरे में बुलाया । उमेश के कमरे में आने के पश्चात उन्होंने उसे बताया कि आज वे अनायास ही उसके कमरे में चले गए थे तो उसके इन्टरव्यू के बारे में पता चला कि अगले सप्ताह उसका इन्टरव्यू है । उन्होंने उमेश को कुछ पैसे देते हुए कहा कि वह कल ही  नए कपड़े और जूते खरीद लाए साथ ही यह भी कह दिया कि   वह  यह न समझे कि ये पैसे वह उसे दान में दे रहे हैं ... ...हाँ जब उसे नौकरी मिल जाएगी और जो पहली तनख्वाह मिलेगी उसमें से वह उनके पैसों को लौटा दे । यह सुनकर उमेश की आँखे भर आई और शरीर में एक हल्का सा  कंपन्न छा गया ...... जो आज तक उसने नहीं किया था इस भावुकता में ही सही उसने अमित  के चरण स्पर्श किए और आँखों को पोछता हुआ अपने कमरे की ओर चला गया . उमेश के द्वारा अपने चरण स्पर्श करने को देखकर उन्हें भी भावुक कर दिया और उनकी आँखों से आँसू कि बूंदें छलक पड़ी ........। उमेश कई कंपनियों में  इन्टरव्यू देकर आ चुका था लेकिन कहीं से कोई जवाब नहीं आया । यह देखकर वह बहुत  निराश होने लगा....। 

लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी कहते हैं ना कि ईश्वर के घर देर है अंधेर नही आखिर वह दिन आ ही गया जब उमेश को एक  कंपनी से फोन आया कि उसे कम्पनी ने चुन लिया है और उसे अगले सप्ताह से कंपनी आना है। एक मल्टीनेशनल कंपनी में अपने चुने जाने की खबर सुनकर वह फूला न समाया । मन ही मन उसने ईश्वर को धन्यवाद किया और साथ ही साथ अमित  को भी जिसकी  बदौलत वह आज इस मुकाम को पा सका है। कम्पनी ने उसे अच्छी पोस्ट और अच्छे वेतन -मान पर रखा था । कंपनी में काम करते हुए  एक महीना बीत गया और आज उसे अपनी नई नौकरी की पहली तन्ख्वाह मिली है।  उसने अपनी पहली तन्ख्वाह से अपनी  माँ और अमित कि पत्नी दोनों के लिए एक -एक साड़ी खरीदी, पिता और अमित  के लिए एक-एक  हाथ घड़ी खरीदी और अपनी दोनों बहनों  एवं अमित के दोनों बच्चों के लिए भी कुछ न कुछ उपहार खरीदे। आज उसकी खुशी का ठिकाना न था । सीधे घर पहुँचकर उसने साड़ी और घड़ी अमित और उसकी पत्नी को दी और उनके चरण स्पर्ष किए । साथ ही उनके उधार दिए हुए पैसे भी दे दिए ।

धीरे-धीरे समय बीतता गया उमेश दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता चला गया । आज वह उस मुकाम पर जा पहुँचा जहाँ वह जाना चाहता था । आज  अपने लक्ष्य को पाकर वह फूला न समा रहा था । अपने लक्ष्य की प्राप्ति के पश्चात उसे लगा कि जिस के लिए उसने अपना घर -परिवार छोड़ा था आज वह उसे मिल चुका है फिर क्यों ना अपने परिवार से मिलने जाया जाये । उसने अपने माता -पिता से मिलने का फैसला किया। अपने ऑफिस से ही घर (हैदराबाद)  जाने की टिकिट करवा ली थी । वर्षो बाद मुझे अपने सामने देखकर माँ कितनी खुश होगी यही सोचकर वह दूसरे दिन अपने माता-पिता से मिलने के लिए निकल पड़ा. आज उसकी खुशी का ठिकाना न था वर्षों से जिस का सपना देखा ,जिसके लिए अपना परिवार छोड़ा दर-दर की ठोकरे खाई आज उसे वह मुकाम हासिल हो गया है।जब वह यह खुशखबरी अपने मात-पिता को सुनाएगा तो वे कितने खुश होंगे...। सारे रास्ते वह इन्ही बातों को सोचता रहा ...कि माँ कितनी खुश होगी मुझे अपने सामने देखरकर और पिताजी.....। आखिरकार वह दूसरे दिन हैदराबाद  अपने परिवार से मिलने पहुँच ही गया । कितनी बदल गई है ये कॉलोनी, कॉलोनी  की सड़क ,गलियों को देखता- देखता वह अपने घर के द्ववार तक जा पहुँचा .....घर के बरामदे में उसकी माँ गेहूँ साफ करने से लगी हुई थी। माँ को देखकर वह चौक गया .......कितनी दुबली हो गयी है और सिर के बाल भी तो सन कि तरह एक दम सफ़ेद हो गए हैं ......आखों पर चस्मा भी लग गया है ..... वह थोडा और नज़दीक गया ।नज़दीक जाकर देखने से पता चला कि वह उसकी माँ ही है .... जैसे ही उसने माँ के चरण स्पर्ष किए माँ तो एक दम चौक गई । माँ उसे पहचाना न सकी ........ जब उसने कहा माँ मैं अमित .........यह सुनकर उसके हाथों में लगा सूप( जिससे गेहूँ साफ करते हैं)  छूट गया वह एक दम सकपकाती हुई खड़ी हो गई जैसे उसे किसी ने बिजली का झटका दे दिया हो। कुछ देर तो वह उमेश के चेहरे को एक टक  निहारती रही और  फिर उसे सीने से लगा लिया , सीने से लगाते ही उसकी आँखों से आँसू बह निकले ...............। माँ के रोने की आवाज सुनकर घर के अंदर से उमेश की दोनों बहनें और उसके पिता  बाहर आ गए।   एक अंजान आदमी को सीने से लगाकर माँ के रोने की बात किसी को समझ में नहीं आई  तभी उसकी नज़र पिताजी पर गयी पिता को अपने समे खड़ा देखकर वह वह थोड़ा सा सहम गया , फिर आगे बढ़कर उसने पिताजी के पैर छुए  । जैसे ही उमेश ने पिता के पैर छूए  वर्षों से बेटे की जुदाई का दुख जो अब टक दिल के अन्दर ही दबा था आज  फूटकर आँखों से छलक आया ........।
कुछ दिन  अपने परिवार के साथ बिताकर  वह फिर से नौकरी पर लौट आया । परिवार से मिलकर आने के पश्चात उसकी जिन्दगी मानो वसंत के समान हो चुकी थी जिस गम को वह वर्षों से मन में दबाकर जी रहा था उसका अंत हो गया अब उसके जीवन में एक नई सुबह का आगमन हुआ । इसी प्रकार हँसते -खेलते उसके जीवन के और चार -पाँच साल बीत गए । इन्हीं चार-पाँच सालों में उसने  समाज में अपना एक अच्छा खासा रुतबा बना लिया था । एक आम कर्मचारी के तौर पर वह कम्पनी में लगा था और आज अपनी मेहनत और कठिन परिश्रम के बल से वह उस कम्पनी के मैनेजर पद तक पहुँच गया है ।
जितना बड़ा पद उतनी बड़ी जिम्मेदारी जब से उमेश कम्पनी का मैनेजर बना है उसकी दिनचर्या ही बदल गयी है हमेशा किसी न किसी काम में  व्यस्त रहता कभी -कभी तो खाना खाने तक का समय नहीं मिल पाता था । एक शाम उमेश अपने ऑफिस से घर जा रहा था रात का समय था ऑफिस से कुछ दूरी पर ही निकला था कि उसकी कार पंचर हो गयी उसने जसे तैसे करके कार का पंचर टायर बदला और घर के लिए रवाना हुआ । कार का टायर बदलने में उसके हाथ पूरी तरह काले हो चुके थे  कुछ ही दूर जाकर  उसने होटल के पास कार रोकी और होटल के अन्दर चला गया अन्दर हाथ साफ किये और एक कप चाय पीकर बाहर आने लगा  । जब वह  चाय पीकर बाहर आ रहा था तभी  उसकी  नज़र सड़क पर सोते एक परिवार पर गयी उसे देखकर वह वहाँ पर थोड़े देर के लिये खड़ा हो गया। एक वृद्धा  अपने बच्चों को अपनी  गोद में लिए सुला रही थी ....वह खुद फुटपाथ पर थी और अपने बच्चों को  एक फटे से बिस्तर पर सुला रखा था ........यह देखकर उमेश कि आँखे भर आई। यह देखकर उसे अपनी माँ की याद आ गयी ......  उस दृश्य को देखने के बाद उसने  फैसला किया कि अब वह भी अपने परिवार  को अपने साथ रखेगा । कुछ दिनों बाद ही  वह अपने परिवार को लेने के लिए निकल चला गया ।
 घर पहुँचकर उसने अपने माता -पिता और दोनों बहनों को उसके  साथ चलकर रहने के लिए कहा उमेश कि इस बात से  माँ और दोनों बहनों ने उसके साथ जाना स्वीकार लिया लेकिन उसके पिता उसके साथ चलकर रहना नहीं चाहते थे । उनका कहना था कि यहाँ पर अब उनकी दुकान ठीक ठाक चल रही है और वे वहाँ  जाकर करेंगे भी क्या...? इस उम्र में वे और कुछ नहीं कर सकते कम से कम दुकान पर जाकर तो बैठ जाते हैं । उमेश के साथ रहने से उन्हें अपनी दुकान  बंद करनी पड़ेगी जो वे करना नहीं चाहते थे । काफी कहा-सुनी, रूठने -मनाने के बाद वे भी तैयार हो गए। हँसता खेलता छोटा सा परिवार । उमेश के पिता यहाँ आकर खुश तो बहुत हुए पर उन्होंने अपनी खुशी किसी से बाँटी  नहीं यहाँ तक कि अपनी पत्नी से भी नहीं । अब उसका पूरा परिवार उसके साथ है छोटा और सुखी परिवार।  एक दिन वह अपने परिवार को गोविन्द के घर ले गया  दोनों परिवार के लोग एक दूसरे से मिलकर बेहद खुश थे । बातों ही बातों में अमित ने उमेश के कठिन परिश्रम और लगन की तारीफ़ की .....।  इसी तरह दिन -महीने ,साल गुजर गए वैसे तो उमेश घर में सबसे छोटा था लेकिन उसने सरे परिवार कि ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली थी । उसने अपनी बहन की शादी बड़ी धूम -धाम से एक समृद्ध परिवार में कर दी  बड़ी बहन अपनी ससुराल में खुश है । छोटी बहन का दाखिला मेडिकल कॉलेज में करवा दिया। आज उस परिवार को देखने से लगता है कितना सुखी परिवार है।

लेकिन उसकी यह खुशियाँ ज्यादा दिनों तक न टिक सकी एक दिन अचानक उसका स्वास्थ्य खराब हो गया . डॉक्टर से स्वास्थ्य की जाँच करवाने पर जो पता  चला वह सुनकर उसके पाँव तले की ज़मीन खिसक गई । डॉक्टर ने उसे बताया कि उसे ब्लड कैंसर हो गया है। जिस  चीज को पाने के लिए उसने अपना घर-परिवार को छोड़ा था आज वह चीज भी उसके प्राणों को  बचाने में असमर्थ हैं। वह मन में सोचने लगा कि ऐसा धन किस काम का जो मनुष्य के प्राणों की रक्षा भी न कर सके । उसने डॉक्टर से उसकी बीमारी के बारे में   कुछ भी बताने के लिये सख्त मना कर दिया । इस खबर ने उसके जीवन में भूचाल ही ला दिया था आज -कल वह एकदम गुमसुम रहने लगा .... ।   
एक दिन उसने सोचा कि जाना तो है लेकिन क्यों ना कुछ अच्छा काम करके इस संसार से जाऊं।  बस फिर क्या था उसने  अपनी बची-खुची जिंदगी को दूसरों की सेवा में लगाने का फैसला किया । इसी लिए उसने अनाथ-बेसहारा बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू कर दिया उसकी कंपनी से और लोग भी गरीब बच्चों को पढाने जाते वह भी उन्ही के साथ जाने लगा  उसने कभी भी अपनी उस बीमरी के विषय में किसी से कुछ नहीं कहा अपने दुख को अंदर ही अंदर दबाता रहा और सदैव मुसकुराता रहता । उसे देखकर कोई सोच भी नहीं सकता था कि उसे इस प्रकार की कोई बीमारी भी हो सकती है। धीरे-धीरे बीमारी बढ़ती ही जा रही थी अब तो नौबत यहाँ तक आ चुकी थी कि उसकी जिन्दगी कुछ ही दिनों की बची थी फिर भी उसने इस का ज़िक्र किसी से नहीं किया न किसी दोस्त से न अपने माता -पिता से , इधर माता -पिता अपने बेटे की शादी के सपने देख रहे थे अक्सर दिनेश की माँ उससे कहती कि अब तो वह शादी कर ले लेकिन वह हमेशा उस बात को हँसी-हँसी में टाल जाता । वह जान बूझकर किसी लड़की का जीवन बर्बाद नहीं करना चाहता था.....।  इस संसार में वह कुछ ही दिनों का मेहमान है कैसे अपने माता-पिता को समझाए इसीलिए वह कोई न कोई बहाना बना देता था। उसने अपने द्वारा जमा की गयी जमा पूँजी अपने पिता के बैंक खाते में जमा कर दी ......।
एक दिन जब वह अपने ऑफिस से घर लौटा तो उसे चक्कर से आने लगे साँस लेने में कठिनाई सी महसूस होने लगी , उसे लगा कि शायद उसका अंत समय निकट आ गया है.......वह अपने कमरे से निकलकर माँ के पास गया उस समय माँ अपने कमरे में कपड़ों की तह बनाकर रख रही थी । उमेश के चेहरे को देखकर माँ ने पूछ लिया - क्या बात है  तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना......?
उमेश - हाँ माँ बस थोड़ी थकावट महसूस हो रही है और सिर दर्द दर्द से फटा जा रहा  है ...।
माँ - ला मैं सिर पर बाम लगा देती हूँ कहते हुए माँ ने उसे बैड पर लिटा दिया ....और बाम लगाने लगी..
उमेश - माँ आज मुझे थोड़ी देर अपनी गोद में सिर रखकर सो लेने दो.....
उमेश की बात सुकर माँ हँस दी ....इतना बड़ा हो गया है लेकिन बचपना अभी तक है ...ठीक है लेट जा...।
उमेश  माँ की गोद में लेट गया और माँ के चेहरे को  एकटक निहारने लगा .............
माँ- क्या हुआ तुझे क्या देख रहा है ......?
उमेश - कुछ नहीं कहकर  करवट पलटकर आँखें बंद कर लेट गया ....
काफी देर होने पर माँ ने उसे आवाज दी ..........लेकिन कोई उत्तर न पाकर माँ घबरा गई  उसने  देखा कि उमेश का शरीर एक दम बर्फ की तरह ठंडा हो गया है  ...... माँ ने उसके पूरे शरीर से हाथ लगाकर देखा फिर उसकी नाक के आगे हाथ लगाया नाक से कोई साँस नहीं आ रही थी यह देखकर उसके होश उड़ गए ...... उसके प्राण पखेरु इस संसार को छोड़कर जा चुके है....। यह देखकर माँ के मुँह से के चीख निकल गयी .......वह बार बार  उमेश  को आवाज लगाए जा रही थी।
चीख को  सुनकर बाहर हॉल में बैठे उमेश के पिता भी कमरे के अंदर दौड़े चले आए कमरे का नजारा देखकर वे भी आवक्क रह गए कि आखिर यह हुआ तो हुआ क्या........? उमेश एक तरफ पड़ा है और उसकी माँ एक कोने में बैठी उसे एक टक उसे निहारे जा रही है ….
उन्होंने भी उमेश को देखा तो वे भी एक दम दंग रह गए  बस बेटे के सिर को गोद में लेकर बैठ गए और .............
जिसे भी इस बात की जानकारी मिली कि उमेश अब इस संसार में नहीं हैं. सुनकर सब के सब दंग रह गए यहाँ तक कि उसके दोस्तों को लगा कि किसी ने उनसे मजाक किया है और उन्होंने उमेश के घर फोन किया तो पता चला कि सच में दिनेश अब इस दुनिया में नहीं है , जब उन बच्चों को पता चला कि उनके दिनेश भैया जो उन्हें पढ़ाने आते थे हमेशा उन्हें हँसाते रहते थे वे नहीं रहे तो वे लोग भी यह खबर सुनकर दंग रह गए उनकी आँखों से आँसू छलक आए .......।   
आज उमेश को गुजरे हुए एक महीन बीत चुका है उसका परिवार अपने आप को संभालने की कोशिशों में लगा है,उमेश की कमी को तो कोई  पूरा नहीं कर सकता ....... ये जीवन ही चलने का नाम है  खुशी हो या गम बस आगे बढ़ते जाना है   घर की छत पर बैठे -बैठे गोविन्द कुछ सोच में डूबे थे तभी उनकी नज़र सड़क पर खेलते बच्चों पर गई उन्हें खेलता देखकर उनके मन में एक टीस से पैदा हुई ........उनकी आँखे एक दम लाल थी जैसे मानो वे अपने आप से लड़ रहे हों......  तभी  उन्हें अंतरनाद सुनाई दी "अब क्यों पछता रहे हो एक दिन तुम ने उसकी तरफ से मुँह  फेरा था .......जिसके लिये मुँह फेरा था आज वो धन -दौलत तुमको देकर तुमसे और इस संसार से मुँह फेरकर चला गया.......। यह सोंचते -सोंचते उनकी आँखें फिर से छलक आई.......आज अपने किए पर पछतावा हो रहा  है कि किस प्रकार उन्होंने लोगों के बहकावे में  आकर अंधविश्वासी होकर उमेश को मनहूस कहा था" ………………

12 comments:

  1. Namastey Shiv Kumarji,

    Kafi dino ke baad aapki rachana aayi. Padh kar kafi achchha laga. Yeh kahani dil ko chho gayi..

    Badhai sweekar kare
    Aapka pathak

    Amit Anuraag

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  2. This comment has been removed by the author.

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  3. Hello Sir,

    A very nicely written story.

    Congrats

    Thanks
    Shubhangi

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  4. Shiv ji,

    Aise matter aap late kahan se hain, shabdh hi nahii hain kuchh kahne kee liye..

    badhaii

    Tamnay Tiwari

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  5. Dear Sir,

    Congratulations for your new story. It's good to know about the fact behind this story.

    Thanks & Regards
    Radhika

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  6. कहानी पसन्द आयी, प्लॉट में एक पूरे उपन्यास की सम्भावनायें दिख रही हैं।

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  7. विचारणीय कथ्य लिए कहानी.......

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  8. Nice story Shiva ji . Enjoyed reading. Thanks.

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  9. सच है कोई मनहूस नहीं होता, हर कोई अपने भाग का भोगता है॥

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  10. बहुत ही मार्मिक और संवेदनशील कहानी।

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