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Monday, November 2, 2009

सहायक रमेश

दिल्ली में रहने वाला रमेश एक होनहार लड़का है । रमेश जब बहुत छोटा था तभी ईश्वर ने उसके माँ-बाप का साया उसके सिर से छीन लिया उसका अब इस संसार में कोई सहारा नहीं था , कहते है न कि जिसका कोई सहारा नहीं उसकी रक्षा ईश्वर करता है । बचपन से ही अनाथ होने के कारण उसने अपने सभी कार्यों और विचारों में बुद्धिमत्ता विकसित कर ली थी । वैसे तो वह था अनाथ किन्तु उसने कभी भी अपने आप को अनाथों की तरह असहाय नही माना । वह सदैव अपने बल पर , अपनी बुद्धि के बल पर अपने कार्यों को करता था । जैसे - जैसे वह बड़ा होने लगा वैसे -वैसे वह दूसरे बेसहारा और अनाथ लोगों की सहायता करने लगा उसने अपने जीवन का एक लक्ष्य बना लिया था कि जितना उससे हो सकेगा वह गरीब अनाथ और बेसहाराओं की मदद करेगा। धीरे -धीरे समय बीतता गया और रमेश बड़ा होने लगा अब वह एक कुशल टेलर है। रमेश जब भी किसी अनाथ को देखता तो वह उस अनाथ की मदद अवश्य करता था । अब उसकी उम्र विवाह योग्य हो चुकी थी एक दिन उसका विवाह भी हो गया । लड़की के माता-पिता ने रमेश की दूसरों के प्रति सद्व्यवहा और एक एक मेहनती इन्सान को देखकर ही उन्होंने अपनी लड़की का विवाह उसके साथ कर दिया था । रमेश की पत्नी भी काफी समझदार थी उसकी पत्नी भी उसके सभी कार्यों में बराबर सहयोग करती करती थी । रमेश की पत्नी भी सिलाई का कार्य जानती थी वह घर पर ही रहकर औरतों के कपड़ो की सिलाई किया करती थी और रमेश अपनी दुकान पर । वे दोनों अपना जीवन खुशी-खुशी से व्यतीत कर रहे थे। उन दोनो की जितनी भी कमाई होती थी उसमें से अपने खाने -खर्चों को निकालकर वे दोनों बाकी के पैसों को गरीब, बेसहारा अनाथ लोगों की सेवा में लगा देते थे।

एक दिन की बात है जब रमेश अपनी दुकान से घर जा रहा था रास्ते में उसने देखा कि एक बेसहारा बूढा को देखा जो चलने में असमर्थ था उसे चलने में बहुत परेशाना हो रही थी । वैसे तो वहाँ पर बहुत लोग थे किन्तु किसी को इतनी फुरसती ही नहीं कि कोई उस बूढ़ो आदमी की मदद कर दे । जैसे ही रमेश ने देखा कि वह वृद्ध परेशान है वह उनके पास गया और उन्हें सहारा देते हुए उन के घर तक छोड़कर आया । वृद्ध ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा बेटा सदा खुश रहो अगर हर व्यक्ति तुम्हारी तरह दूसरों की सहायता करे तो इस दुनिया से दुखों का ही अंत हो जाएगा लेकिन आजकल तुम्हारे जैसे लोग बहुत कम ही मिलते है जो दूसरो के दुख को अपना समझकर उसे उस दुख से बाहर आने में मदद करते हैं । वृद्ध महोदय को घर छोड़ने के कारण संजय को घर आने में थोड़ी देरी हो चुकी थी जब पत्नी ने इसका कारण पूछा तो संजय ने सारी घटना अपनी पत्नी को बता दी । रमेश के इस कार्य से उसकी पत्नी ने भी उसकी सराहना की और उसे मुँह-हाथ धोकर आने के लिए कहकर खाना बनाने के लिए चली गई । कुछ समय बाद रमेश मुँह- हाथ धोकर आया तब तक उसकी पत्नी ने खाना लगा दिया था । दोनों खाने के लिए बैठे ही थे कि दरवाजे के बाहर से किसी भिखारी की आवाज सुनाइ दी रमेश ने अपनी थाली में से दो रोटी और कुछ चावल ले जाकर उस भिखारी को दे दिए और आकर उसने स्वंय भोजन किया । एक भूखे को भोजन कराकर एक असहय की सहायता करके उसे जो आत्मसंतुष्टि हो रही थी उसे वह व्यक्त नहीं कर सकता था । रमेश की पत्नी भी सदैव उसके कार्यों में उसकी बराबर सहायता करती थी । इस प्रकार संजय और उसकी पत्नी सदैव गरीब ,असहाय बेसहारा लोगों की सहायता करते हुए अपना जीवन व्यतीत करने लगे। जीवन का सच्चा सुख तो सदैव दूसरों की सहायता करने में ही मिलता है। जो दूसरों की सहायता करते हैं ईश्वर भी उनकी सहायता करते हैं । मनुष्य को अपने जीवन में कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए क्योंकि जो व्यक्ति अहंकार करता है वह कभी भी सफल नहीं हो सकता । जो दूसरों के सुख-दुख बांटते हैं ईश्वर भी उनके सुख-दुख का ख्याल रखता है । इसीलिए तो कहा गया है कि मानव सेवा ही माधव सेवा है ।जो व्यक्ति मानवों का तिरस्कार करके ईश्वर को प्रशन्न करने का प्रयास करते है ईश्वर ऐसे लोगों से कभी प्रशन्न नहीं होता और न ही ईश्वर ऐसे लोगो को पसंद करता है।

Thursday, October 29, 2009

बूढ़ी हड्डियाँ

सरदी का मौसम था। सरदी भी कैसी ; जिससे हमारी आपकी हड्डियाँ भी जम जाएँ। इसी कड़कड़ाती सरदी में मैं अपने कमरे में गरमागरम  कॉफी  का आनंद ले रहा था कि मेरी नज़र खिड़की के बाहर पड़ी। सड़क पर एक वृद्ध चला जा रहा था। सबेरे के साढे़ सात बजे थे। मुझे याद आया, आज स्कूल की बस आठ बजे आने वाली है और मेरा ध्यान उस वृद्ध से हटकर अपने आपको तैयार करने में चला गया। जल्दी-जल्दी उठा और नहा-धोकर स्कूल जाने के लिए निकल पड़ा। सात-पचपन हो चुके थे। मैं जल्दी-जल्दी बस स्टॉप की तरफ लपका। मगर मेरे, बस स्टॉप तक पहुँचते-पहुँचते स्कूल-बस वहाँ से निकल चुकी थी। मैं हताष सा खड़ा रह गया। तभी मेरी नज़र पुनः उस वृद्ध पर पड़ी जो कुछ देर पहले मेरी खिड़की के सामने से आया था। उस वृद्ध को देखकर न जाने क्यों मेरे मन में उसके बारे में जानने की इच्छा हुई। मैं धीरे-धीरे उसके समीप गया ही था कि बस आ गई और वह उस बस में चढ़ गया। वह बस मेरे स्कूल की दिशा में जाने वाली थी, यो मैं भी उसी में चढ़ गया।
बस के भीतर का नज़ारा किसी भी संवेदनशील प्राणी को भौंचक करने के लिए पर्याप्त था। वैसे तो आजकल सरकार भी वृद्धों को बहुत सी सुविधाएँ प्रदान कर रही है, जैसे रेलगाड़ियों के टिकट पर नियायत, बस में अलग से सीट। और भी बहुत सारी बातें हैं जिनके बारे में अभी यहाँ चर्चा करना आवश्यक नहीं है। हाँ तो, हम बस की बात कर रहे थे। वे वृद्ध सज्जन बस में चढ़े और उस भीड़ में अपने लिए सीट खोजने लगे। बस में वैसे तो साफ-साफ बड़े अक्षरों में लिखा ही रहता है कि अमुक सीट महिलाओं के लिए है, अमुक सीट विकलांगों के लिए है, अमुक सीट वृद्धों के लिए है, लेकिन भीड़ उस सबको पढ़कर भी अनपढ़ बनी रहती है। आज की पीढ़ी अपने आपको सुशिक्षित कहती है, मानती है किंतु उस शिक्षा को मात्र किताबों तक ही सीमित रखती है। इस बस में भी एक सीट पर साफ अक्षरों में लिखा था ‘‘वृद्धों के लिए’’। वृद्ध सज्जन ने देखा और मैंने भी देखा कि उस सीट पर दो नवयुवक बैठे आपस में गपशप  कर रहे हैं। एक ने वृद्ध को देख खड़ा होकर सीट देनी चाही किंतु उसके मित्र ने उसे ऐसा करने से रोकते हुए कहा, ‘‘अरे यार, इस बुड्ढ़े को क्या जरूरत थी इतनी सरदी में घर से बाहर आकर बस चढ़ने की? हम तो ऑफिस  जा रहे हैं। इसे इतनी जल्दी कहाँ जाना है जो सुबह-सुबह बस चढ़कर सीट पाने आ गया? अपनी जवानी में यह बहुत सीटों पर बैठ चुका; अब इसे खड़ा ही रहने दो।’’
पहले वाले की सदाशयता इस तर्कपूर्ण उपदेश से पलभर में जाती रही। मुझे यह स्थिति खल रही थी इसलिए मैंने उन युवकों के एक सीट खाली करने को कहा तो वृद्ध ने मुझे टोकते हुए कहा, ‘‘नहीं, रहने दो, बेटा। मैं खड़ा रहकर भी जा सकता हूँ। अभी इन बूढ़ी हड्डियों में बहुत जान है। इतनी जल्दी नहीं टूटेंगी ।’’
कहते हुए वृद्ध की आवाज नम हो आई थी। मैं विचलित हो गया और उन्हें अपनी सीट पर बिठाते हुए कहा, ‘‘बाबा, आप यहाँ बैठ जाइए।’’
पहले तो उन्होंने मना किया - ‘‘रहने दो, बेटा! यों ही ठीक हूँ।’’ जब मैंने उनसे बार-बार कहा और स्वयं उठकर खड़ा हो गया, तब उन्होंने बैठना स्वीकार किया। सीट पाकर उन्होंने एक चैन की सांस ली और बैठकर अपनी टाँगों को अपने हाथों से दबाना शुरू कर दिया जो अब तक खड़े रहने के कारण शायद दुःख रही थीं।
बस अपनी गति से चलती जा रही थी। हर स्टॉप पर नए लोग चढ़ते, कुछ पुराने उतर जाते। इसी भागादौड़ी में मेरा भी स्टॉप आ गया। मैंने देखा कि मेरे पीछे वे वृद्ध सज्जन उसी स्टॉप पर उतर गए।
हम लोग साथ-साथ चल रहे थे। जिज्ञासावश  मैंने  उनसे पूछ ही लिया, ‘‘बाबा, आप इस उम्र में, इतनी सरदी में कहाँ जा रहे हैं?’’
उन्होंने मेरी तरफ स्नेह से देखा और कहा ‘‘बेटा, पेट की आग को शांत करने के लिए कमाने जा रहा हूँ।’’
सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि लगभग पैंसठ वर्ष की आयु पार कर चुके वृद्ध को भी कमाने जाना पड़ रहा है। मैंने उनसे फिर पूछा ‘‘बाबा, आपके परिवार में कितने लोग हैं।’’ उन्होंने बड़ी भाव-भीनी मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया, ‘‘मैं और मेरी पत्नी दो प्राणी हैं।’’
‘‘और आपके बच्चे ?’’
बच्चों का नाम सुनते, वह भावभीनी मुस्कान एक अनजाने दुःख की दास्तान के पीछे छिप सी गई - ‘‘बच्चे? बच्चे हैं न! मेरे दो बेटे हैं। बड़ा विदेश  में  एक सॉफ्टवेर  कंपनी में मैनेजर है और छोटा बैंक में एकाउंटेंट। बड़ा बेटा और उसका परिवार अमेरिका में रहता है, छोटा बेटा इसी शहर में है।’’
‘‘क्या, बाबा, बेटा आपकी देखभाल नहीं करता? बड़ा बेटा आपकी जरूरतों के लिए पैसे नहीं भेजता?’’
ये प्रश्न सुनकर वृद्ध कुछ चुप से हो गए और शांत भाव में चलने लगे। मैंने भी चलते-चलते उनसे पूछ ही लिया, ‘‘छोटे बेटे के बीबी-बच्चे आपकी देखभाल नहीं करते क्या?’’
सुनकर न जाने क्यों उनकी बूढ़ी आँखों से आँसू छलक आए। यह देख मुझसे रहा न गया। आखिर मैंने पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है, बाबा? आपकी आँखों में आँसू?’’
‘‘क्या बताऊँ, बेटा! यह तो जीवन की कहानी है। जिन्हें हम पाल पोसकर बड़ा करते हैं, जिनके सुख-दुःख का दिन-रात ख्याल रखते हैं ; वे ही बुढ़ापे में छोड़कर चले जाते हैं। बेटा! मैंने अपनी जवानी में खूब धन कमाया और बच्चों को उच्च शिक्षा  दिलाई, उनका जीवन स्तर ऊँचा उठाया। बच्चों को सदैव खुश रखने का प्रयास करता था उनकी हर इच्छा पूरी किया करता था। बड़े बेटे को विदेश भेजने के लिए मुझे अपनी सारी जमा पूँजी लगानी पड़ी। फिर भी यह सोचकर संतोश होता था कि इन पैसों से कम से कम मेरे बेटे का सपना तो पूरा हो गया। बुढ़ापे की चिंता नहीं थी। सोचता था, आखिर बेटा जो भी कमाएगा, उसमें से हमारे लिए कुछ-न-कुछ तो भेजेगा ही। और हुआ भी कुछ ऐसा ही। पर जब बड़ा बेटा वहाँ से कुछ पैसे भेजता तो उन पैसों को मैं अपने छोटे बेटे के भविष्य के निर्माण में लगा देता। बड़े बेटे ने कुछ एक या डेढ़ साल पैसे भेजे होंगे, उसके बाद से आज तक एक फूटी कौड़ी तक नहीं आई।‘‘ क्षण भर रुककर धीमी आवाज में बोले, ‘‘उसने वहीं पर शादी भी कर ली और अपना पारिवारिक जीवन ख़ुशी -ख़ुशी  व्यतीत कर रहा है ... और मैं यहाँ ....!’’
        कुछ क्षण फिर चुप्पी रही। फिर जैसे अपने आपसे बात कर रहे हों, इस तरह उन्होंने कहना शुरू किया, ‘‘मेरा तो सब ठीक है किंतु उसकी वृद्धा माँ दिन रात उसे याद करती है। मरने से पहले एक बार उसे देखना चाहती है। मैं उसकी ममता को कैसे समझाऊँ कि जिस लाल का वह दिन रात इंतजार करती है, अब वह नहीं आएगा। अब वह हमारा लाल नहीं, किसी और का पति और किसी का पिता है। अब उसे हमारे साथ की नहीं, अपने आनेवाले कल के साथ की जरूरत है। .... अब वह एक कंपनी का मैनेजर है। उसको अपने भविष्य की चिंता है। उसके लिए जो बीत गया है वह जरूरी नहीं ; और हम दोनों अब उसका बीता हुआ कल हैं। ‘तुम व्यर्थ ही चिंता करती हो? वह ठीक है।’ मैं अक्सर उसे यही कहकर सांत्वना देता रहता हूँ। इन बूढ़ी हड्डियों का क्या भरोसा कब साथ छोड़ दें ? वह बेचारी तो इसी आस पर जी रही है कि उसका बेटा एक-न-एक दिन उसके पास जरूर आएगा।’’
‘‘बाबा, आपके तो दो बेटे हैं न ?’’
‘‘हाँ, बेटा। बेटे तो भगवान ने दो दिए हैं।’’
‘‘तो क्या छोटा बेटा भी आपकी देखभाल नहीं करता? और आपको इस उम्र में कमाने की क्या जरूरत ? आपकी पेंशन  भी तो आती होगी ?’’
‘‘हाँ, बेटा।पेंशन  तो आती है। वह सब घर के खाने-खर्चे में ही लग जाते हैं। घर का किराया और हमारी दवाइयों का खर्च कहाँ से चले ? उसके लिए मुझे कुछ न कुछ तो करना ही होगा। इस उम्र में दो ही रास्ते हैं। या तो खुद कमाऊँ या फिर दूसरों के आगे भीख मांगूँ। भीख मैं माँग नहीं सकता। सारा जीवन स्वाभिमान के साथ जिया है तो अब क्या किसी के सामने हाथ फैलाऊँ ? अब तो भगवान से एक ही प्रार्थना है कि कभी भी किसी के सामने हाथ फैलाने की नौबत न आने दे।’’
‘‘आपने जवानी में इतना कमाया तो क्या आपके पास आपका मकान नहीं है कि किराए पर मकान लेकर रह रहे हैं ?’’
‘‘अरे, बेटा! तुम एक मकान की बात करते हो, कभी मेरे पास दो-दो मंजिले दो मकान हुआ करते थे। पर आज मेरे पास अपना कहने के लिए कुछ नहीं।’’
‘‘तो क्या आपने अपने मकान बेच दिए ?’’
‘‘एक मकान तो बड़े बेटे को विदेश  भिजवाने के लिए बेचना पड़ा ....।’’
‘‘और दूसरा ?’’
‘‘दूसरे मकान में छोटा बेटा रहता है।’’
‘‘तो आप उसके पास क्यों नहीं रहते ? क्या वह आपको नहीं रखना चाहता ? या आप खुद उससे अलग रहना चाहते हैं ?’’
‘‘अरे, बेटा! कौन कम्बख्त ऐसा होगा जो अपने भरे-पूरे परिवार को छोड़कर अकेला रहना चाहे। जब तक छोटे बेटे का ब्याह नहीं हुआ था तब तक सब ठीक चल रहा था। बस जैसे ही बेटे का ब्याह हुआ, कुछ ही सालों में घर में कलह शुरू हो गई। रोज़-रोज़ की चिख-चिख से तंग आकर मैंने अपने आपको अलग करने का फैसला कर ही लिया। रोज़-रोज़ बहू का यह कहकर ताने देना कि मैं किसी काम का नहीं हूँ, घर पर बैठा-बैठा रोटी तोड़ता रहता हूँ - मुझसे सहा नहीं गया।’’ एक बार फिर उनकी आँखें और आवाज नम हो आई थीं।
‘‘बेटे ने आपको रोका नहीं ?’’
‘‘बेटा तो चाहता था कि हम उसके साथ रहें किंतु.... ?’’
मुझे लगा जैसे वे अपने छोटे बेटे का बचाव कर रहे थे, ‘‘बेटा, घर में बच्चे खुश  रहें, इसी में हमारी खुशी  है। जब जवानी हँस कर काटी है तो बुढ़ापे के लिए क्या रोना। एक न एक दिन बुढ़ापा सभी को आना है। जबसे मैं रिटायर हुआ हूँ और जबसे ये सब परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई हैं, तबसे तो मैं भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि मुझे इस जहान से उठाले तो अच्छा हो। जब तक हाथ पैर चल रहे हैं, तब तक ठीक है। बस घिसट-घिसट कर न जीना पड़े। अब तक शान से जिया हूँ, चाहता हूँ शान से ही मरूँ।’’
वृद्ध की बातें सुनकर मेरा मन उन युवकों के प्रति घृणा से भर गया जो बुढ़ापे में माँ-बाप को बोझ समझते हैं। बातें करते-करते मेरा स्कूल भी आ गया। वे आगे चले गए और मैं स्कूल में उस दिन कक्षाओं में मन नहीं लगा। वृद्ध की कहानी मेरे दिमाग में चलती रही और मन बार-बार पूछता रहा , क्या इसी दिन के लिए माँ-बाप संतान चाहते हैं .............।

माँ






माँ तुझे सलाम तेरे जज्बे को सलाम
देकर अपनी साँसें तूने मुझको जीवन दिया  है
तेरी आँखों से ही तो मैने देखी दुनिया सारी
देकर जीवन की साँसे तूने हम पर किया उपकार
माँ तुझे सलाम तेरे जज्बे को सलाम।





    अगर न होती तुम तो मुझको संसार में लाता कौन
    अगर न होती तुम तो मुझको जीवन देता कौन
    अगर न होती तुम तो संसार को बसाता कौन
    ईश्व पहुँच नहीं सकता हर जगह इसलिए उसने बनाया तुमको
 




        माँ तुझे सलाम तेरे जज्बे कोसलाम।                                                                 
खुद भूखी रहकर मेरा पेट सदा ही भरती हो
खुद धूप में नंगे पाँव चलकर मुझे गोद में उठा ले जाती हो
आए कोई संकट मुझपर तुम मेरी ढाल बन जाती हो
मेरी रक्षा की खतिर तुम बडे-बड़ों से लड़ने से भी नहीं घबराती हो
माँ तुझे सलाम तेरे जज्बे को सलाम।





मेरी खुशियों की खातिर तुमने अपनी खुशियों का दिया है बलिदान
माँ तू ममता की है मूरत तुझमें ही बसता है भगवान
तेरे बिना इस जग में जीना नही तुझ बिन जीवन की कोई आस नहीं
हे माँ तुझे सलाम तेरे जज्बे को सलाम ।


Tuesday, October 27, 2009

आत्मविश्वास ही सफलता की प्रथम सीढी है

 आत्मविश्वास ही सफलता की प्रथम सीढी है ।यह इस आधार पर कहा जा सकता है कि जिस व्यक्ति का आत्मविश्वास कमजोर होता है वह अपने जीवन में कभी भी सफलता प्राप्त नहीं कर पाता । सफलता एवं उन्नती के शिखर पर केवल वहीं पहुँच सकता है जिसका मनोबल , आत्मविश्वास सुदृढ़ होगा। आत्मविश्वास का जन्म मन में होता है । मनुष्य का मन समस्त इन्द्रियों का स्वामी और गतिविधियों का केन्द्र माना जाता है । मन के संकेत पर ही एवं उसकी प्रेरणा से ही शरीर का संचालन सुचारु रुप से होता है । यदि मन न होता तो मनुष्य शरीर अपने आप में बड़ा लाचार होता , क्योकि मनुष्य का मन जो कहता है वह वही करता है किन्तु मनुष्य की कुछ सीमाएं भी हैं उन्हें वह पार नहीं कर सकता । मनुष्य का शरीर आग में जल जाता है , पानी में गल जाता है ,वायु-धूप में वह सूख जाता है , शीत धाम वर्षा सभी इसे विचलित कर देती हैं । यह तन थक जाता है , टूट जाता है और हिम्मत हार बैठता है । इस बेचारे शरीर से मनुष्य वह सब कुछ नहीं कर सकता था जो आज उसने कर दिखाया है मात्र शरीर से यह सब संभव नही हो सकता उसके लिए उसे अपने आप को आत्मविश्वासी बनाना होगा तभी वह अपने आप को ऊँचाइयों के शिखर पर पहुँचा सकता है।

    आज वैज्ञानिक,सास्कृतिक और कलात्मक उपलब्धियाँ मनुष्य के शरीर के कारण नहीं अपितु उसके आत्मविश्वास के कारण ही प्राप्त हो सकी हैं । आत्मविश्वास वह है जिसे न तो कोई तोड़ सकता है , न उसे हिला सकता है यदि वह आत्मविश्वास द्रढ़ है तो । मनुष्य का मन भी उस की सफलता में कहीं न कहीं भागीदार अवश्य होता है क्योंकि मन के अंदर ही किसी कार्य को करने की इच्छा का जन्म होता है । मन शरीर का एक ऐसा यंत्र है जिससे शरीर का संचालन सुचारु रुप से होता है। इस लिए हम कह सकते हैं कि जो व्यक्ति अपने मन से हार मान बैठता है उसे संसार की को भी ताकत नहीं जिता सकती और जो व्यक्ति अपने मन से नही हारा है उसे संसार की कोई भी ताकत हरा नहीं सकती । जो व्यक्ति अपने मन मे दृढ संकल्प के साथ कार्य आरंभ करता है वह कभी भी जीवन में हारता नहीं । मन न हारने का अर्थ है हिम्मत न हारना , अपना हौसला बनाए रखना । जब तक मनुष्य में यह हौसला बना रहता है वह शांत नहीं बैठता वह कोई न कोई नए कार्य को करने में निरंतर लगा ही रहता है । जिस व्यक्ति का आत्मविश्वास दृढ है वह बार-बार  असफल होकर भी सफलता की राह पर सदा गतिशील रहता है । सफलता भी उसी के कदम चूमती है जो अपने आप को सफलता पर ले जाना चाहता है । जीवन एक संघर्ष है और जो इस संघर्ष में सफल होता है वही सही अर्थों में मनुष्य है और जो इस संघर्ष से घबराकर विचलित हो जाते हैं उनका जीवन व्यर्थ है । जीना है तो सदैव आत्मविश्वास के साथ ।आत्मविश्वासी व्यक्ति तो  पहाड़ों को भी काटकर नदियाँ बना सकता है, बस जरुरता है दृढ़ संकल्प की  । जीवन एक संघर्ष है इसके लिए अंग्रेजी में एक कहावत है कि - "किसी भी लड़ाई में तब तक हार नहीं माननी चाहिए जब तक कि जीत न ली जाए।" वास्तव में कोई भी संघर्ष या लड़ाई मनुष्य  अपने आत्मबल  ( आत्मविश्वास ) के भरोसे पर ही जीत सकता है। मनुष्य शरीर तो एक साधन मात्र रहता है।
    हमें इतिहास में अनेक ऐसे व्यक्तियो के  उदाहरण मिल जाएंगे जिन्होंने अपने आत्मबल के भरोसे से दुनिया को झुका दिया असंभव को भी संभव कर दिखाया । हमें हमारे इतिहास में अनेक व्यक्तियों के जीवन चरित्र पढ़ने को मिलते हैं जो आजीवन कठिनाइयाँ झेलते रहे किन्तु अन्त में सफल हुए। आज उन व्यक्तियों को असाधारण महापुरुषों की श्रेणी में रखते हैं । इसका क्या कारण है?  इसका कारण यही है कि इन लोगों ने विषम परिस्थितियों के आगे अपने घुटने नहीं टेके और उसका डटकर मुकाबला किया और उन विषम परिस्थितियों पर विजय प्राप्त की इसी कारण आज हम उन्हें असाधारण मनुष्य मानते हैं । जैसा  कि हम उदाहरण  राष्ट्रपिता महात्मागाँधी जी का ले सकते हैं जिन्होने अपने जीवन में अपने आत्मविश्वास के बल पर ब्रिटिश साम्राज्य की नीव हिला कर रख दी थी । ब्रिटिश सरकार उन्हें तोड़ न सकी क्यों ? क्योंकि उनका आत्मविश्वास सुदृढ़ था । यदि उनका मनोबल कमजोर पड़ जाता तो शायद आज हम आजादी की हवा में सांस न ले रहे होते बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के शासकों के अत्याचारों का शिकार हो रहे होते । इस लिए हम कह सकते हैं कि  जिस व्यक्ति का आत्मविश्वास दृढ़ होता है उसे बड़ी से बड़ी बाधा भी नही हरा सकती । यह बात जरूर है कि जो व्यक्ति सच्चाई की राह पर चलता है उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है किन्तु सफलता भी उसी व्यक्ति के कदम चूमती है जो सच्चाई और आत्मविश्वास के साथ अपने लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयास करता है ।
 दूसरा उदाहरण हम स्वामी विवेकानंद का ले सकते हैं जिन्होंने अपनी विदेश यात्रा के दौरान जब अमेरिका में भाषणों के दौरान उन्हें भाषण देने की अनुमति न मिलने  पर वे निराश नहीं हुए ,बल्कि उन्होंने किसी न किसी तरह भाषण देने की अनुमति प्राप्त कर ही ली  उन्होंने अपना आत्मविश्वास नहीं खोया उन्हें केवल कुछ समय की ही अनुमति मिली थी किन्तु जैसे ही उन्होंने अपना भाषण आरंभ किया वहाँ पर बैठे सभी लोग उनके भाषण सुनकर मंत्र मुग्ध हो गए और उन्होंने पाँच मिनट के स्थान पर बीस मिनट का भाषण दिया और अपने देश का नाम उज्ज्वल किया । यह सब कार्य उन्होंने अपने आत्मविश्वास के बल पर ही किया । उन्होंने आशा का दामन नहीं छोड़ा और आज एक महान पुरुष के रुप में याद किए जाते हैं । जो व्यक्ति आत्मविश्वास के साथ अपना कार्य करता उसे सफलता अवश्य मिलती है।

जालिम दुनिया

ये जालिम दुनिया हमें चाहे या न चाहे
हम तो चाहेंगे तुम्हें  हर दिन हर पल
ये दुनिया बड़ी जालिम है दिल तोड़कर हँसती है
मतलब पड़े तो दिल जोड़ लेते हैं लोग
मतलब निकल गया तो साथ छोड़ देते हैं लोग
दिल को एक खिलौना बनाकर खेल लेते हैं लोग।
      दिल की हर धड़कन तेरे लिए धड़कती है
      जीवन के हर मोड़ पर साथ तेरा ढूँढती है
      जब भी तुम दिल से मुझे पुकारोगे,पास सदा मुझे पाओगे
      जीवन की हर राह पर याद मैं तुम्हें आऊँगा
         ये जालिम दुनिया हमें चाहे न चाहे
         हम तो चाहेंगे तुम्हें हर दिन हर पल     ।
तडप उठोगे जब याद हमारी आएगी
ढूँढोगे तुम हमें जब हम दूर चले जाएंगे
तन से भले ही दूर हो जाएं पल दिल तो तुम्हारे पास ही होगा
तेरे दिल की धड़कनों मे बसकर साथ तेरा हम पाएंगे
जब कभी भी ये हाथ दुआ को उठेंगे
तेरी सलामती ,तेरी खुशी के लिए सदा दुआ करेंगे
 ये जालिम दुनिया हमें चाहे न चाहे
 हम तो चाहेंगे तुम्हें हर दिन हर पल।

कर्मवीर बन

कर्मवीर बन ए इन्सान
कर्मभीरु न बन ए इन्सान।

    जो कर्मवीर है वही भाग्यवान है
    जो कर्महीन है वह भाग्यहीन है।

कर्म ही भाग्य का निर्माता है
कर्म के बल से तू पहाड़ों को भी झुका दे
सच्चाई की राह पर तू चलता जा ।

    लाख बाधाएँ आए राह में
    तू अपना लक्ष्य साधे चल
    देख बाधाओं को तू अपना लक्ष्य छोड़ न देना
    सच्चाई की राह तो तू छोड़ न देना।

मंजिल उसे ही मिलती है जो अपनी राह बनाता है
न सोच कि राह में क्या मिलेगा तुझे
मन में अपने मंजिल पाने की ललक जगाले तू
कर्मवीर बनकर अपनी मंजिल को पा ले तू।।

Wednesday, October 21, 2009

तेरा साथ

तुझसे मिलने का मैं हर पल ढूँढू रोज नया बहाना।
हर शाम तेरे साथ गुजारने का मैं नित ढूँढूं नया बहाना।
पास अपने रोकने का मैं नित ढूँढू नया बहाना।
जो शाम मेरी तुझसे मिले बिना गुजर जाए उस रात मुझे नींद भला कैसे आए।
तेरे आने की नित राह यूँ निहारु जैसे प्यासा मयूर बदरा को।
काँटों भरी राह पर भी मैं ढूँढू तुझसे मिलने का नया बहाना
दुनिया को दिखाने को अब मैं हँसने का बहाना ढूँढता हूँ।
तेरी याद भुलाने के लिए अब मैं ढूँढू कोई नया बहाना।।

बेरहम दुनियाँ में अब मैं जीने का सहारा ढूँढता हूँ
अब तो तेरी याद भुलाने को मैं मरने का बहाना ढूँढता हूँ
मरकर भी किसी मोड़ पर अगर तू मिल जाए
तुझे देखकर मैं खुशी-खुशी इस जहान से विदा हो जाऊँ।।