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Thursday, May 10, 2012

अभिलाषा

   आज शिवेक को अपने ऑफिस से बाहर आने में थोड़ी देर हो गई थी | बाहर आकर देखा तो उसके अन्य साथी उसका इंतजार कर रहे थे | बाहर कैब में उसके अन्य साथियों  से पता चला कि आज उसका लास्ट  ड्रॉप है | ऑफिस से निकले एक –एक करके उसके साथी अपने –अपने स्टॉप पर उतरते चले गए | अब कैब में वह और उसका ड्राइवर हेमराज था तभी उसका फोन आया उसने काफी देर तक फोन पर बातें की , शिवेक द्वारा  फोन पर की गई बातें उसका ड्राइवर सुन रहा था| जैसे ही उसने फोन रखा हेमराज ने पूछ लिया.
हेमराज – सर आप किताब छपवा रहे हैं  ....?
शिवेक –नहीं यार मैं नहीं मेरा एक दोस्त कहानियाँ लिखता है | उसी की कहानियों की किताब छपवा रहा हूँ...
हेमराज – कहानियाँ .......कैसी कहानियाँ.....क्या वे नॉवेल लिखते हैं ...?
शिवेक – नहीं यार ऐसे ही आम लोगों की कहानियाँ  हैं | उसने कई कहानियाँ लिखी हैं उनमें से कुछ  समाज में बुज़ुर्गों  के बारे में हैं, कुछ कहानियाँ दोस्ती पर तो कुछ समाज में औरतों पर हो रहे अत्याचारों पर, कहने का मतलब यह कि उसकी कहानियाँ आज के समाज की स्थिती को बयां करती हैं|
हेमराज – सर उन्हें ये कहानियाँ मिलती कहाँ से हैं ?
 कहानियाँ मिलने की बात सुनकर शिवेक थोड़ा मुस्कराया और मुस्कराते हुए बोला -
 शिवेक – अपने आस पास की घटित घटनाओं को वह एक कहानी का रूप दे देता है| ये कहानी मेरी हो सकती है, तुम्हारी हो सकती है, रास्ते पर चलते अन्य किसी भी व्यक्ति की हो सकती है | ये कहानियाँ कोई राजा –रानी की नहीं आम लोगों की हैं |
    शिवेक ने बातों ही बातों में अपने मित्र द्वारा लिखित कुछ कहानियाँ हेमराज को कह सुनाई इन्ही में से एक थी ‘एक माँ ऐसी भी’ जब वह इस कहानी को सुना रहा था तभी हेमराज कह उठा – ‘सर यह कहानी तो बिलकुल मेरी सी लगती है| ऐसा लग रहा है जैसे आप मुझे मेरी ही कहानी सुना रहे हो | ड्राइवर की बातें सुनकर शिवेक ने कहानी सुनाना  बंद करके उसके विषय में पूछ लिया -
शिवेक – क्यों यह कहानी तुम्हें अपनी से क्यों लगी ? क्या तुम्हारे साथ भी ......?
हेमराज –हाँ सर....मैं भी कुछ ऐसा ही बदनसीब हूँ जिसे आज तक माँ के होते हुए माँ का प्यार नसीब न हो    
                सका.........?

   हेमराज की बातें सुनकर शिवेक के मन में उसके जीवन के विषय में जानने की लालसा जाग उठी ...ऐसी क्या बात है जिसके कारण वह अपने आप को बदनसीब कह रहा है... उसने पूछा.
शिवेक – क्यों ऐसा क्या हो गया .......?
हेमराज  – सर मेरी भी कहानी कुछ ऐसी ही है अभी आप जो  कहानी सुना रहे थे  ना - कि एक माँ अपने बच्चों में किस प्रकार का भेदभाव कर सकती है| सर आज के ज़माने में सब कुछ संभव है ....आज माँ  एक बेटे से प्रेम और दूसरे का तिरस्कार भी कर सकती है अगर ऐसा हो तो कोई ताजुब नहीं होगा .....मेरे जीवन की  कहानी भी कुछ ऐसी ही है ...|
शिवेक – ‘मैं कुछ समझा नहीं ...’
हेमराज - सर मेरा बचपन भी कुछ इसी तरह बीता ,बचपन ही क्या आज भी मेरा जीवन तो ऐसा ही है ...कहने को तो माँ है लेकिन आज तक माँ की ममता को तरसता रहा  हूँ ...छोटा था तब बाप का भी प्यार नसीब न हो सका | बाप रोज  शराब  पीकर घर आता था शराब  पीने के कारण रोज –रोज घर में कलह होती थी | वह जो कुछ कमाता उसे शराब  में उड़ा देता | घर का खर्चा माँ दूसरों के घरों में  झाड़ू –बर्तन का  काम करके चलाया करती थी | बाप आधे से ज्यादा समय अपने नशे में धुत पड़ा रहता | उसे तो इस बात से कोई मतलब ही नहीं था कि उसके बच्चे भूखे हैं, उन्होंने खाना खाया कि नहीं, उन्हें किसी चीज की जरूरत है या नहीं | वह तो सुबह शाम अपने नशे में धुत पड़ा रहता और इसी नशे ने एक दिन उसे इस संसार से उठा लिया...| बाप चला गया उसके जाने के बाद तो घर की और बदत्तर स्थिती हो गई | धीरे –धीरे  घर की आर्थिक स्थिति और खराब होती गई जिसके कारण माँ ने हमारी पढ़ाई भी बंद करवा दी | जिस उम्र में बच्चे अपने दोस्तों के साथ स्कूल जाते हैं, खेलते –कूदते हैं, उस उम्र में  मैंने पैसे कमाने के लिए लोगों के जूतों पर पॉलिश करने का काम भी  किया था | लोगों के जूते पॉलिश करके  कुछ ज्यादा पैसे नहीं मिल पाते थे जिसके कारण मुझे रोज –रोज माँ के ताने सुनने पड़ते थे | लेकिन भाई जो कुछ भी कमाकर लाता चाहे कम हो या ज्यादा माँ कभी उससे कुछ नहीं कहती थी | मैं और भाई जो कुछ पैसे कमाकर लाते माँ उन पैसों को ब्याज पर दूसरों को दे देती |


पैसों को ब्याज पर देने की बात सुनकर शिवेक को बहुत अजीब सा लगा कि माँ अपने बच्चों के मेहनत की कमाई को उन पर खर्च न करके ब्याज पर दे देती है ...इसी बीच शिवेक ने हेमराज को टोकते हुए पूछ लिया –
शिवेक –‘फिर तुम लोगों  के घर का खर्चा किस तरह से चलता था .....|’
हेमराज – ‘सर जी   खर्चा क्या चलता था बस .......अपनी हर इच्छा को मारकर जीना यही हमारा बचपन था| बचपन में छोटी- छोटी खुशी पाने के लिए मैं कितना तरसा  हूँ यह तो मैं ही जानता हूँ | दीपावली पर जब घर मिठाइयाँ बनती थी उसमें से भी माँ मुझे केवल कुछ मिठाइयाँ गिनकर देती थी अगर मैं और मिठाई माँगता तो मिठाई तो नहीं मिलती पर हाँ माँ के ताने जरूर मिल जाते ....... वही भाई को वह जितना चाहे खा सकता था| बस घर में अगर पाबंदी थी तो वह मुझ पर मैं बिना माँ की इजाजत के कुछ भी ना खा सकता था न ले सकता था | यहाँ तक कि माँ ताज़ी बनी रोटी  भाई को देती और मुझे बासी रोटी अगर मैंने गलती से भी ताजा बनी हुई रोटियों में से ऊपर से रोटी ले ली तो माँ का चिमटा सीधे मेरे हाथ पर पड़ता था |  जब भी रात की रोटी बच जाती तो माँ  उन रोटियों को ताजा रोटियों के नीचे दबाकर रख देती और उन रोटियों को निकाल कर मेरी थाली में रख देती ......माँ के इस तरह के रवैये के मुझे दुःख तो बहुत होता  लेकिन मैं क्या कर सकता था ........| 

शहर की भीड़ में कार जिस रफ्तार से चली जा रही थी उसी प्रकार हेमराज अपने जीवन की उन बातों को जिन्हें शायद उसने अभी तक  किसी से नहीं  कहा होगा शिवेक को सुनाता जा रहा था –
हेमराज – ‘सर हम दो भाई हैं  मुझ से  बड़ा भाई है | भाई  बहुत ही भोला –भाला है कोई भी उसे आसानी से बेवकूफ बनाकर अपना काम करवा लेता है | वह भी इतना भोला है कि आज के लोगों की चालाकी को समझता ही नहीं है | मैंने उसे कई बार समझाने  की कोशिश की लेकिन........ माँ को मेरा भाई को समझाना कतई अच्छा नहीं लगा | माँ ने मुझे ही उलटी सीधी बातें सुना दी
माँ – ‘इसे तेरी सीख की जरूरत नहीं है ......तू अपने आप को बहुत श्याना समझता है ना ...मैं सब समझती हूँ |
हेमराज – ‘पर माँ मैं तो भाई के अच्छे के लिए ही यह सब कह रहा था .....|’
माँ – ‘हाँ ..हाँ मुझे सब पता है तू किस के भले के लिए कह रहा है इसे तेरी नसीहत की जरूरत नहीं समझा ...|’
 हेमराज – सर भाई इतना भोला है कि........भाई के इसी भोलेपन का लोग नाजायज फायदा उठाते हैं लेकिन उ
सकी समझ में है कि कुछ आता ही नहीं | भाई के इसी भोलेपन के कारण  माँ बचपन से ही उसकी तरफ अधिक ध्यान देती और मेरी तरफ कम......इसीलिए अकसर  मेरे साथ  दोहरा व्यवहार किया जाता रहा है | मैं मानता हूँ कि भाई को शायद मुझ से ज्यादा माँ के सहारे की ज्यादा जरूरत है लेकिन मैं ........| बचपन में बच्चों को अपना जन्मदिन मनाने की बहुत लालसा होती है| इसी लालसा के कारण एक दिन मैंने अपने जन्मदिन पर माँ से कहा था कि माँ मैं भी इस बार अपना जन्मदिन मनाऊंगा| मेरे इतने कहने से ही  माँ भड़कते हुए बोली –          माँ – जिस दिन तू अपने पेंट की इन दोनों जेबों  में पैसे भरकर लाएगा उस दिन मैं तेरा जन्मदिन मनाउंगी...कहते हुए उसका गला भर आया उसकी आवाज उसके शब्दों का साथ नहीं दे रही थी ....उसकी आँखों से आँसू टपकने  लगे .......|
  माँ का यह तोहफा मैं कभी नहीं भूल सकता ......, सर मैंने उस दिन फैसला किया कि मैं एक दिन अपनी मेहनत से बड़ा आदमी बनकर दिलाउंगा......| जीवन में सभी के दिन एक जैसे  नहीं होते कभी मैं एक- एक रुपए के लिए तरसता था लेकिन आज ईश्वर की कृपा से इस लायक हो गया हूँ कि किसी के आगे हाथ नहीं  फैलाना पड़ता | बचपन तो बचपन पिछले कुछ सालों तक मैं घर में एक नौकर की तरह ही काम किया  करता था | रोज सुबह उठकर भाई और माँ के लिए सड़क पार से पानी भरकर लाता था क्योंकि हमारे घर पर पानी का कनेक्शन नहीं था बाहर सरकारी नल से सबके लिए पानी भरकर लाने की जिम्मेदारी मेरी थी | मैं सुबह उठकर पानी भरता फिर भाई  के ऑटो  की साफ- सफाई करता अगर उसमें कहीं मिट्टी लगी  रह जाती या कुछ कमी रह जाती तो माँ और भाई के ताने सुनने पड़ते थे |  जब माँ और भाई नहा लेते तब मैं अपने नहाने के लिए  पानी लाकर नहाता कभी –कभी तो दिल करता था कि इस जिल्लत भरी जिन्दगी से तो मौत भली ....पर मैंने कभी ऐसा करने का सोचा नहीं .....यही सोचता था कि कभी न कभी मेरे भी दिन बदलेंगे
हेमराज के भाई के तानों की बात सुनकर शिवेक को कुछ अजीब सा लगा क्योंकि कुछ देर पहले उसने कहा था कि उसका भाई बहुत ही भोला –भाला है फिर उसका हेमराज को ताने मारना उसकी समझ में नहीं आया इसीलिए उसने हेमराज को टोकते हुए पूछा –
शिवेक – ‘एक मिनट  अभी तो तुम कह रहे थे कि तुम्हारा भाई बहुत ही भोला है .....फिर वो भला तुम्हें क्यों ताने मारेगा  ........’
हेमराज – हाँ सर वह भोला है .......भोले का मतलब वह बहुत ही भावुक किस्म का आदमी है ... उसकी इसी  भावुकता का लोग फायदा  उठाते हैं .....एक बार की बात है हमारे इलाक़े के एक विधायक के परिवार के लोगों को मंदिर जाना था उसने भाई को फोन किया भाई उसके परिवार को मंदिर दर्शन कराकर लाया ऑटो मीटर में पाँच सौ रुपए आए लेकिन विधायक ने उसे एक सौ रुपए और एक शराब की आधी बोतल दे दी  और भाई से प्यार से हंस बोल लिया बस भाई उसे लेकर खुशी –खुशी घर आ गया .....अब यह उसकी भावुकता नहीं तो और क्या है ......यह सब देखकर मैं उसे समझाता था लेकिन माँ ......|
शिवेक –‘ फिर घर का खर्चा कैसे चलता है ....?’
हेमराज – कुछ मैं अपनी कमाई में से  घर में दे देता हूँ और कुछ माँ कमाकर लाती है| जब से भाई बड़ा हुआ है उसके भी बाप की तरह नशे की लत लग गई है | जब तक अकेला था तब तक तो ठीक था लेकिन अब तो घर में उसकी पत्नी है दो बच्चे हैं | उसकी इसी लत के कारण घर में आर्थिक तंगी रहती  है | सब ने उसे बहुत समझाया लेकिन वह है कि किसी की सुनता ही नहीं .......|
शिवेक – ‘तुम्हारी माँ उसे समझती नहीं ....|’
हेमराज – सर माँ ने भी उसे एक दो बार समझाया लेकिन बाद में उसने भी उसे समझाना छोड़ दिया ....वह दिन भर में जितने पैसे कमा कर लाता उसमें से कुछ पैसों  को शराब में उड़ा देता है ..जो कुछ पैसे बचते हैं  उन्हें माँ को लाकर दे देता और माँ उन पैसों को दूसरों को ब्याज पर दे देती है| एक तरफ माँ का ब्याज के लिए पैसों को देना दूसरी तरफ भाई का शराब में पैसे उड़ाना जिसके कारण घर में आर्थिक तंगी इस कदर जम चुकी है कि घर में बच्चे एक-एक दाने के लिए तरसते रहते हैं...........|
शिवेक – तुम अपनी माँ, भाई के साथ नहीं रहते क्या ?
हेमराज – नहीं सर शादी से पहले रहता था |शादी के कुछ दिनों बाद ही माँ ने मुझे और मेरी पत्नी को घर से यह कहकर बाहर निकाल दिया कि अब तू बड़ा हो गया है ,शादी भी हो गई है अब तू अपना कही और बसेरा कर यह घर सब लोगों के लिए छोटा पड़ता है ....|
शिवेक – और तुम्हारा बड़ा भाई, उसका परिवार |
हेमराज – भाई और उसका परिवार माँ के साथ ही रहता है | माँ को बचपन से ही भाई से अधिक लगाव रहा है |   वह जो भी करता था सब सही था ......वह कभी भी उसे किसी काम के लिए रोकती –टोकती नहीं थी | अगर वही काम मैं करता  तो घर में कलह का भूचाल आ जाता था |  मैं आज तक नहीं समझ पाया कि माँ बचपन से आज तक मेरे साथ सौतेलों जैसा  व्यवहार क्यों करती है | माना कि भाई को माँ की जरूरत शायद मुझ से ज्यादा होगी लेकिन मैं भी तो उसी माँ का बेटा हूँ फिर माँ मेरे साथ ऐसा क्यों........ मैंने माँ की इस नफरत को भी प्यार समझ कर जीवन से समझौता करके जीना सीख लिया है पर आज भी मेरा मन माँ के प्यार को ....... कहते हुए उसकी आँखों से आँसुओं की धार बहने लगी .....|
हेमराज को इस प्रकार रोते देखकर शिवेक की आँखें भी नम हो गई थी | उसने  हेमराज को किसी चाय की दुकान पर कार रोकने के लिए कहा कुछ देर बाद एक चाय की दुकान आई उसने कार रोकी  दोनों कार से उतरे शिवेक ने चाय वाले से दो चाय देने को कहा और एक गिलास में पानी ले जाकर हेमराज को देते हुए कहा कि वह अपना मुँह धो ले ... हेमराज ने अपना मुँह धोया और दोनों चाय पीकर वहाँ से शिवेक के घर के लिए रवाना हुए ...| शायद अभी हेमराज के मन में और कुछ था कहने के लिए कुछ दूर जाने के बाद उसने फिर कहा  –
हेमराज – सर मैंने यह कार किस तरह ली है यह तो मैं ही जनता हूँ कुछ दोस्तों से उधार लिया कुछ बैंक से लोन तब जाकर मैंने यह सैकिंड  हैण्ड कार खरीदी है | कार को देखकर माँ को लगता है कि मेरे पास बहुत पैसा है और में उन लोगों को नहीं दे रहा हूँ इसकी माँ को बहुत जलन रहती है कि मैंने अपनी कार खरीद ली है और बड़ा भाई अभी तक ऑटो चलाता है | आज भी  जब मैं माँ से मिलने  जाता हूँ तो माँ के चेहरे पर वह खुशी नहीं  होती जो एक माँ अपने बेटे को देखकर खुश होती है | यहाँ तक कि  मुझे स्वयं माँ से कहना पड़ता है कि माँ एक कप चाय पिला  दो इस पर माँ का जवाब होता है – घर में दूध नहीं है तब मैं ही  दूध ,चीनी और चाय पत्ती के लिए पैसे देता हूँ तब मुझे एक कप चाय पीने को मिलती है |  सर जो गलतियाँ मेरे बाप ने की थी वह गलती मैं नहीं करना चाहता | मैं अपने बच्चों को हर सुख- सुविधा और अच्छी शिक्षा दिलाउंगा ताकि वे समाज में सुखी जीवन जी सके | जिन दुखों को मैंने देखा है ऐसी कोई भी स्थिति उनके सामने ना आए ..... कल को मेरे बच्चे मुझे यह कहकर ना कोसे कि हमारे बाप ने हमारे लिए क्या किया ...... सर जी  अब तो जीवन की यही एक अभिलाषा है कि एक न एक दिन माँ मुझे प्यार से बेटा कहकर बुलाए अपने प्यार के आँचल की छांव में.........कहते हुए एक बार फिर भावुक होकर बच्चों के सामान फूट –फूट कर रोने लगा ...........|
    हेमराज के जीवन की कहानी सुनकर शिवेक की आँखें भी नम हो गई थी उसने हेमराज को शांत करते हुए कहा कि तुम चिंता मत करो एक ना एक दिन तुम्हें अपनी माँ का प्यार अवश्य मिलेगा ....ईश्वर के घर देर है अंधेर नहीं .......इसी बीच उसका घर आ गया था ...| वह कार से उतरा और हेमराज से चिंता ना करने और ईश्वर पर भरोसा रखने की बात कहकर घर की तरफ चला गया और हेमराज अपनी कार लेकर वहाँ से ऑफिस के लिए निकल आया | घर पहुंचकर शिवेक के मन में बार –बार एक ही प्रश्न  उठ रहा था क्या हो गया है इस संसार को और क्या हो गया है आज की माँ को ......... माँ भी अपने बच्चों में ..........? घर के अंदर जाकर उसने एक लंबी सांस ली और सोफे पर जाकर बैठ गया |

Thursday, May 3, 2012

पुस्तक लोकार्पण

 प्रिय दोस्तों  पिछले रविवार 29/4/2012 को मेरी पुस्तक शिव की कलम से "ऑटोग्राफ  और  अन्य कहानियाँ "का लोकार्पण डॉ दामोदर खडसे एवं सुश्री सुभ्रा मिसरा जी ने किया ......इस कार्यक्रम की कुछ तस्वीरें यहाँ पर लगा रहा हूँ |
धन्यवाद


                     पुस्तक  लोकार्पण कार्यक्रम का संचालन करती सुश्री सरोज जी एवं  मंच पर आसीन डॉ सुनील देवधर जी, मुख्य अतिथी डॉ दामोदर खडसे जी , श्रीमती इंदिरा शबनम  एवं सुश्री सुभ्रा मिसरा जी 


                                           लोकार्पण समारोह में उपस्तिथ मित्रगण



  पुस्तक  लोकार्पण करते   श्री  शिवकुमार  ,डॉ सुनील देवधर जी, मुख्य अतिथी डॉ दामोदर खडसे जी , श्रीमती  इंदिरा शबनम  एवं सुश्री सुभ्रा मिसरा जी 

                                      पुस्तक पर अपने विचार व्यक्त करती सुश्री सुभ्रा मिसरा जी

                                   पुस्तक पर अपने विचार व्यक्त करते डॉ सुनील देवधर  जी




                               
                                    पुस्तक पर अपने विचार व्यक्त करती श्रीमती इंदिरा शबनम  जी


                            पुस्तक पर अपने विचार व्यक्त करते पुस्तक के कहानीकार  श्री शिवकुमार राजौरिया .


                                       पुस्तक पर अपने विचार व्यक्त करते डॉ दामोदर खडसे जी 


                                      पुस्तक के लोकार्पण के पश्चात मेरे परिवारगण एवं मित्र गण

Wednesday, April 11, 2012

प्रेम


प्रतिदिन की तरह कवलजीत  छत पर  सूख रहे  कपड़ों को उतारने के लिए गई तो सामने के घर में किसी व्यक्ति की चहल -पहल को देखकर सकपका गई क्योंकि कई महीनों से यह घर बंद पड़ा था | असल में यह घर  भी उन्हीं का है | कवलजीत छत से जल्दी –जल्दी कपड़े उतार कर नीचे आई और अपनी  बड़ी बहन प्रीतो को उस घर के विषय में बताया | कवलजीत की बात सुनकर उसे याद आया कि कल ही उस में एक नया किराएदार आया है, उसका नाम निलेश है और वह सॉफ्टवेर कम्पनी में काम करता है | कवलजीत के पूछने पर कि इस बात की जानकारी उसे क्यों नहीं दी गई के जवाब में प्रीतो ने कहा कि वह उसे बताना ही भूल गई |   
  दोनों  बहनें पास ही बने एक दूसरे मकान में रहती हैं | दोनों बहनें उम्र के दूसरे पड़ाव को पार करने को हैं लेकिन अभी तक दोनों बहनों का विवाह नहीं हुआ है | दोनों बहनों की उम्र में पाँच साल का अंतर है |  माता –पिता, एक दो रिश्तेदार  और कुछ गिने चुने लोगों के अलावा कोई नहीं | जिस उम्र में स्त्रियाँ अपने सांसारिक सुखों में लिप्त रहती हैं  उस उम्र में ये दोनों बहने अपने बूढ़े माँ- बाप की सेवा में लगी थी | ऐसा नहीं है कि इन दोनों  बहनों के चरित्र में कोई खराबी है या ये सुंदर नहीं हैं | असल में इनके पिता शादी  के लिए जन्म कुंडलियों के पूर्ण मेल पर अत्यधिक विश्वास करते थे | जब कभी भी कोई रिश्ता आया या यूँ कहें कि जितने भी रिश्ते आए किसी का भी मेल उनकी कुंडलियों से पूरी तरह से नहीं हो पाया  जिसका परिणाम यह हुआ कि दोनों बहनें आज भी उस सांसारिक सुख से वंचित हैं | कुंडलियों के मेल के चलते, समय अपनी रफ्तार से दौड़ता चला गया और ये दोनों अपनी उम्र के उस पड़ाव को पीछे छोड़ चुकी हैं जिसमें स्त्रियाँ अपने घर –परिवार ,ससुराल के विषय में सपने सँजोती हैं | ऐसा नहीं है कि उन्हें विवाह करने की इच्छा न थी  इन्होंने भी अन्य  लड़कियों के सामान ससुराल , पति के सपने संजोये थे लेकिन कुंडलियों के मेल के कारण उनके सपने सिर्फ सपने ही बनकर रह गए|
    जब विवाह की उम्र निकल गई तब पिता भी अकसर इसी चिंता में डूबे रहते कि किसी तरह उनकी बेटियों के हाथ पीले हो जाये लेकिन अब तो थक हारकर उन्होंने भी उम्मीद का दामन छोड़ दिया | घर में बैठी दो –दो जवान बेटियों की इस स्थिती के लिए पिता अपने आप को दोषी ठहराते | उन्हें अपनी गलती का अहसास तो हुआ लेकिन बहुत देर के बाद| बेटियों के विवाह की चिंता और रिश्तेदारों के तानों ने  उन्हें  इतना आहत कर दिया कि वे मृत्यु की सैया तक जा पहुँचे और इसी चिंता के कारण एक दिन इस संसार से चल बसे |  हमारे देश में जवान बेटी अगर घर में कुंवारी हो तो माँ –बाप को चिंता तो होती ही है |  माँ भी इसी चिंता में दिन रात कुढ़ती रहती , एक तो उम्र का अंतिम पड़ाव उस पर जवान बेटियों का घर में क्वाँरी  बैठे रहना यह देखकर वे भी अंदर ही अंदर कुढ़ती रहती | चेहरे से तो दिखाती  कि वे बहुत खुश हैं लेकिन  मन ही मन बेटियों के विवाह के लिए ईश्वर  से प्रार्थना  करती रहती | बेटियों की इसी चिंता के कारण धीरे –धीरे उनका भी स्वास्थ्य बिगड़ने लगा | माँ के बिगड़ते स्वास्थ्य को देखते हुए  दोनों  बहनों ने माँ को बहुत समझाया लेकिन माँ..... तो माँ है ....| माँ ने तो  यहाँ तक कह दिया कि यदि उन्हें कोई लड़का पसंद हो तो वे अपनी स्वेच्छा से अपना विवाह कर सकती हैं | दोनों बहनों ने इस उम्र में विवाह करने से इन्कार कर दिया | माँ भी बेटियों  के वैवाहिक जीवन  को देखने की  लालसा में एक दिन इस संसार से चल बसी | माँ –बाप के चले जाने के बाद दोनों बहने एक दम बिखर  गई  | उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने आप को संभालते  हुए एक  दूसरे का सहारा बनकर आगे बढ़ने लगी | मर्दों के वर्चस्व की इस दुनिया में उन दोनों बहनों ने अपने शील की रक्षा किस प्रकार की है ये तो वही जानती हैं  | जैसे –जैसे समय बीतता गया वैसे – वैसे उन्होंने अपनी सभी इच्छाओं, कामनाओ से समझौता करके  अकेले जीना सीख लिया  | बदलते समय में दोनों बहनों ने न जाने कितने ही जीवन के उतार चढ़ाव  सहे लेकिन कभी अपने आप को कमजोर नहीं होने दिया |
पिता ने अपने जीते जी दोनों बेटियों के नाम अपनी संपत्ति का बटवारा सामान रूप से कर दिया था | इसी सम्पती में  इन दोनों बहनों के नाम ये दो मकान थे एक वह जिसमें वे रहती हैं  दूसरा जो उन्होंने किराए पर दे रखा है | वैसे तो दोनों बहने अपने पैरों पर खड़ी हैं | निलेश को इस मकान में आए हुए तीन महीने बीत गए | उसकी पत्नी और बच्चे दूसरे शहर में रहते हैं वह इस घर में अकेला ही रहता है| एक दिन प्रीतो को अपने ऑफिस के सेमीनार के लिए शहर से बाहर जाना पड़ा, जाते –जाते वह  कवलजीत से कहती गई कि वह आज शाम को निलेश से इस महीने के किराए का चैक लेती आए| कवलजीत  इस बात के लिए तैयार नहीं थी कि वह निलेश से चैक लेने के लिए उस घर में जाए , उसने प्रीतो से वहाँ न जाने की अपनी इच्छा व्यक्त की | प्रीतो  ने उसे बताया कि यदि वह आज या कल चैक लेने नहीं गई तो फिर उसे वह चैक अगले महीने ही मिलेगा क्योंकि निलेश कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जा रहा है |
कवलजीत  ना चाहते हुए भी चैक लेने के लिए दूसरे दिन चली गई | जिस दिन कवलजीत निलेश के घर पर गई उसे देखकर वह सकपका गया क्योंकि अब तक उसकी बड़ी बहन ही महीने का चैक लेने आती थी | निलेश एक हंसमुख और मिलनसार व्यक्ति है उसने  घर पर आई कवलजीत  का आदर – सत्कार किया | निलेश के  आदर– सत्कार से वह बहुत प्रभावित हुई | यह पहली बार था कि किसी पुरुष ने उसका इतना आदर– सत्कार किया था | ऐसा नहीं था कि उसकी जान पहचान किसी व्यक्ति से नहीं थी या उसकी दोस्ती नहीं थी सब कुछ तो  था लेकिन न जाने निलेश की बातों ने उस पर क्या जादू कर दिया कि  ......  | जब से उसकी जान –पहचान निलेश  से हुई है तब से उसका दिल बार- बार  निलेश से मिलने को करता उसके घर जाने को करता | धीरे –धीरे उसका निलेश के घर आना-जाना बढ़ गया | जान पहचान  धीरे –धीरे दोस्ती  में बदल  गई | इन तीन-चार महीनों में उसमें अलग  सा बदलाव आ गया था  | घंटों अकेले छत पर  बैठे रहना बार –बार निलेश को देखना उसकी कही बातों को याद करना , उसके  हंसी –मजाक को याद करके अपने –आप में  ही हँसने लगना, बार – बार बालकनी में किसी न किसी बहाने से आना  और निलेश की तरफ निहारना |
इन दिनों उसका घंटों आईने के सामने बैठना एक आम बात हो गई | इस उम्र में अपने आप को सजाना सँवारना, जो शौक उसने अपने बचपन ,जवानी में नहीं किये ,उन्हें वह अब इस ढलती उम्र में करने लगी थी  | रह –रहकर निलेश के विषय में सोंचना और अपने आप को उसकी उम्र के अनुसार बनाने की कोशिश करना........  उसकी उम्र और निलेश की उम्र में दस , बारह  साल का फर्क होगा | उम्र के इसी  फर्क को कम करने के लिए उसने  ब्यूटी पार्लर  जाना शुरू कर दिया था | धीरे – धीरे यह जान पहचान दोस्ती में बदली  और कब दोस्ती से प्रेम  में बदल गयी उसे पता ही नहीं चला | निलेश इस बात से एक दम अंजान था | वह तो जब भी कवलजीत  से मिलता अपने व्यवहार के अनुसार हंसी – मजाक किया करता उसके इसी  व्यवहार ने कवलजीत  को उसकी ओर आकर्षित कर लिया था | कवलजीत  के  दिन - प्रतिदिन के बदलाव को निलेश भी महसूस कर रहा था लेकिन उसने इस विषय पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया | उसने  कवलजीत से प्रेम करने के विषय में कभी सोचा तक नहीं था| वह सोचता भी कैसे वह विवाहित है उसके दो छोटे-छोटे  बच्चे हैं | वह तो कवलजीत  से केवल एक मकान मालकिन और इंसानियत के नाते ही हंसी- मजाक किया करता था |
कई बार कवलजीत ने चाहा कि वह निलेश से अपने प्रेम का इज़हार कर दे लेकिन न कर सकी ....| उसे पता है कि वह विवाहित है उसका अपना हँसता खेलता परिवार है| अपने प्रेम के इज़हार से वह निलेश के सुखी पारिवारिक जीवन में कांटे नहीं बोना चाहती थी  लेकिन........ प्रेम तो ......प्रेम है | शायद इसी लिए किसी ने कहा है कि प्रेम तो जात –पात  उम्र नहीं देखता जो मन को भा गया बस मन उसका हो गया .....| किसी अनहोनी की आशंका से वह अपने मन के भावों को मन में ही दबाकर बैठ गई | अकसर  जब भी वह अकेली होती तो अपने आप से यही कहती कि  प्रेम में यह जरूरी नहीं कि प्रेम को पाया ही जाए .....सोचते- सोचते उसकी आँखें भर आती और वह एकांत में बैठी  एक टक आसमान की और निहारती रहती  मानो ऊपर वाले से.......... | घंटों एकांत में बैठने के बाद अपने मन को समझती कि  प्रेम का यह अर्थ केवल पाना ही नहीं होता...... |
           

Wednesday, March 28, 2012

पुलिया



जब भी मैं गाँव की उस पुलिया से गुजरता तो मेरी नजरे उस स्त्री पर जाकर अटक जाती  जो वर्षों से इसी पुलिया के पास अपना बसेरा बनाकर रह  रही है | एक झोपड़ी और उस झोपड़ी के बहार चार –पाँच घड़ों की कतार | सुबह से शाम तक जितने भी वाहन उस सड़क से गुजरते वह स्त्री उन सभी यात्रियों को पानी पिलाती और फिर अपने झोपड़ी में जाकर बैठ जाती| ऐसी कोई  बस न होगी जो वहाँ ना रुकती हो जब भी बस आकार रुकती वह अपने एक बड़े से जग में पानी भर कर पानी पिलाने को तैयार रहती, जो भी मुसाफिर बस से उतरता वह उन्हें मातृत्व भाव से पानी पिलाती और अपने आप को तृप्त सा अनुभव करती | ऐसा नहीं था कि वह पानी पिलाने का काम किसी कमाई के लिए या किसी अन्य स्वार्थ के लिए करती थी | वह तो इस काम को निस्स्वार्थ भाव से करती थी | उसकी इस निस्स्वार्थ भाव सेवा को देखकर मेरे मन में उसके विषय में जानने की इच्छा हुई |
उस पुलिया के पास एक विशाल पीपल के पेड़ के नीचे एक चाय वाले की छोटी सी दुकान थी | अपनी जिज्ञासा को शांत करने और अपने मन में उठे सवालों के जवाबों के लिए  मैं उस दुकान पर चला गया | बातों ही बातों में मैंने चायवाले से उस स्त्री के विषय में बात छेड़ी पहले तो वह समझ ही नहीं पाया कि मैं किस स्त्री के विषय में बात कर रहा हूँ जब मैंने उसे पानी पिलाती स्त्री की तरफ इशारा करके पूछा तब उसकी समझ में आया |
ओ......... आप सावित्री बहन के बारे में पूछ रहे हैं ...
हाँ ...
भैया - एक समय था जब उसका एक हँसता –खेलता सुखी परिवार था | आज वह इस संसार में एक दम अकेली है | एक दिन की बात है जब उसका पति और बेटा फसल से लदी हुई बुग्गी(बैल गाड़ी) एक खेत से दूसरे खेत आर ले जा रहे थे कि इसी पुलिया पर एक तेज रफ़्तार से आते हुए ट्रक ने बुग्गी को पीछे से ऐसी टक्कर मारी कि बुग्गी सीधे  सड़क से नीचे खड्डों में जा गिरी दोनों बाप –बेटे उस फसल से लदी बुग्गी के नीचे जा दबे | आस –पास खेतों में काम कर रहे कुछ किसानों ने इस घटना को देखा देखते ही वे लोग अपना –अपना काम छोडकर भागे और सभी लोगों ने मिलकर उस बुग्गी  को सीधा किया और नीचे दबे दोनों बाप –बेटे को बाहर निकाला | बाप ने तो घटना स्थल पर ही दम तोड़ दिया लेकिन बेटे की साँसे अभी तक चल रही थीं | दुर्घटना की खबर पाकर सावित्री  भी वहाँ पहुँची पति की लाश और बेटे की टूटती साँसे देखकर वह हताश हो गई | इधर गाँव के लोगों ने उसके बेटे और पति को एक पेड़ की छाँव में लाकर लिटा दिया था | बेटे की टूटी साँसों को देखकर वह बदहवास सी फफकर रोती जाती और आसपास खड़े लोगों से उसके बेटे को बचाने  की गुहार करती जाती | किसी भी  गाँव वाले के पास ऐसा कोई साधन ही नहीं था कि जल्द से जल्द उसके बेटे को पास ही के कस्बे के अस्पताल पहुँचाया जा सके | इसी बीच बेटे के मुँह से माँ... शब्द सुनकर वह उसे अपनी गोद में लेकर बैठ गई ......अपनी टूटती साँसों को जानकर बेटा भी माँ की गोद में तड़प रहा था | अपने जवान बेटे को इस प्रकार तडपते देखकर वह बार –बार ईश्वर से विनती करती जाती कि उसकी गोद को सूनी ना करे मांग तो उसने सूनी कर दी कम से काम उसकी गोद तो सूनी ना करे ........ तभी बेटे के  मुँह से माँ ....प ..पानी ......पानी सुनकर वह इधर उधर देखने लगी .... बेटे के लिए पानी लेने के लिए वह इधर –उधर दौड़ी लेकिन वहाँ आस पास पानी का नामोनिशान तक न था .. वह बदहवास  माँ अपने लाल को बचाने के लिए वहाँ खड़े हर एक व्यक्ति से फरियाद कर रही थी | कुछ लोग पानी लेने के लिए दौड़े .. लेकिन जब तक वे लोग पानी ला पाते उसके बेटे की साँसों ने उसका साथ छोड़ दिया | एक तरफ पति की लाश दूसरी तरफ बेटे की ...इस हादसे  ने उसे पूरी तरह तोड़ कर रख दिया था | जब से यह हादसा हुआ था तब से वह केवल एक बुत के सामान जी रही थी | उस दिन से ही उसने  यह निर्णय लिया कि वह इस पुलिया के पास पानी पिलाने का काम करेगी | उसी दिन से ही वह  अपना धर्म समझकर इस काम को कर रही है |
    ऐसा नहीं है कि वह केवल गर्मियों में ही मुसाफिरों को पानी पिलाती है | वर्ष के सभी मौसमों में उसका काम है सुबह उठना और उन चारों  घड़ों को धोना और पास के गाँव के  कुंए से पानी खींचकर उन घड़ों को भरकर झोपड़ी के पास लाकर रखना यही उसकी दिनचर्या बन गई है | अब तो उसकी झोपड़ी पर ना केवल मनुष्य पानी पीते हैं बल्कि पशु –पक्षी भी अपनी प्यास बुझाने आते हैं | इसकी झोपड़ी से कोई भी प्यासा नहीं लौटता | जब  फसल कटाई का समय आता है उन दिनों में वह नित्य सुबह ही उन घड़ों को भरकर खेतों में मजदूरी करने के लिए चली जाती | सुबह से दोपहर तक खेतों में मजदूरी करती दोपहर बाद वह सड़क पर बनी अपनी झोपडी में वापस आ जाती | ऐसा नहीं था कि उसके पास घर नहीं है , गांव में उसके पास एक पक्का मकान है  लेकिन वह उस में ना रहकर उस झोपडी में ही रहती है उस घर में बस वह अपना सामन रखती और सुबह शाम खाना बनाकर खा आती है | इसकी इस निस्स्वार्थ भाव सेवा के कारण आस – पास के गाँवों में इसकी बड़ी इज्जत की जाती है | उस स्त्री की दर्द भरी कहानी सुनकर मेरी आँखें  भी नम हो गयी | कुछ देर वहाँ बैठने के बाद मैं घर की तरफ चला आया .... बार –बार मेरा मन यही कह रहा धन्य है वह स्त्री जिसने अपने दुखों को भुलाकर समाज सेवा की यह एक अनोखी पहल की है ..|
 

Friday, February 17, 2012

क़र्ज़


किशनलाल  आज से पहले कभी इतना उदास नहीं हुआ . जिन बच्चों को वह अपना समझ रहा था उन बच्चों ने तो उसे  और उनकी पत्नी सावित्री को कब का अपने जीवन से बहार कर दिया था . बच्चे अपने अपने परिवार के साथ सुखी जीवन जी रहे हैं . अगर कोई परेशान है तो वह है किशनलाल. एक समय था जब उसके पास बीस बीघे ज़मीन हुआ करती थी . आसपास के इलाकों में उसका नाम नेक इंसानों में गिना जाता था. उसका भी कभी सुखी घर परिवार हुआ करता था . वर्षों बीत गए सभी बच्चे ज़मीन –जायदाद में अपना –अपना हिस्सा लेकर अलग हो गए . उसके पास जो कुछ था उसने बच्चों में बराबर –बराबर  बाँट दिया केवल एक खानदानी हवेली और कुछ बीघे जमीन के . इस पुरानी हवेली में उसके बचपन की यादें बसी हैं, उसके बचपन की शरारतें हैं . उस हवेली से न केवल उसकी बल्की उसके माता –पिता की यादें भी जुडी हैं . आज उसे याद है कि है कि उस गाँव की यह एकमात्र बड़ी हवेली हुआ करती थी जो उसे अपने पुरखों से विरासत में मिली है .
  बच्चे बड़े हो गए और हवेली पुरानी कभी घर परिवार की शान समझी जाने वाली हवेली अब बच्चों को  खंडहर ,भूत हवेली के सामान लगती है . इसलिए चारों बेटे एक –एक कर उस हवेली तथा बूढ़े माता –पिता को छोडकर अपने अलग – अलग आशियाने बनाकर बस गए . सबसे छोटी बेटी रमा थी उसका विवाह भी कर दिया था . वह भी अपनी ससुराल में अपने परिवार के साथ सुखी जीवन जी रही है. किशनलाल को उसके जीवन से कोई शिकायत नहीं है . उसने अपने जीवन में कभी किसी से किसी प्रकार की सहायता की याचना न की थी , सदैव दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहता था . यहाँ तक कि उसने कभी भी अपने बच्चों से अपनी बीमार पत्नी के इलाज के लिए एक पैसे की मांग तक नहीं की थी .
सावित्री को दिल की बीमारी थी , पिछले कुछ दिनों से  सावित्री को सांस लेने में बहुत तकलीफ हो रही थी . काफी समय तक दवाइयों से ही काम चलता रहा लेकिन अब बीमारी कुछ ज्यादा ही बढ़ चुकी थी ,  इसलिए उसे अस्पताल में भर्ती करवाया गया था , लेकिन जब अचानक एक दिन डॉक्टर ने ऑपरेशन  के लिए दो लाख की बात कही ,दो लाख की बात सुनकर वह स्तंभित  रह गया . ऑपरेशन तो ठीक है लेकिन दो लाख रुपयों का इंजाम कहाँ से होगा.. ? कैसे होगा.. ? उसे दिन-रात यही चिंता सताती रहती. उसके पास  जो कुछ जमा पूंजी  थी  उसने उसका हिसाब लगाया तो देखा कि वह तो मात्र साठ हजार रूपये  है . बाकी की रकम का इंतजाम कैसे होगा.. ? कहाँ से होगा  .....?
    इसी दुविधा का हल निकालने  के लिए उसने चारों बेटों को घर पर बुलावा भेजा . एक –एक कर चारों बेटे आ गए . चारों बेटों के आ जाने पर उसने उन्हें बताया कि सावित्री के ऑपरेशन के लिए जल्द से जल्द दो लाख रुपयों की जरुरत है. दो लाख रुपयों की बात सुनकर चारों बेटे सन्न रह गए . एकाएक माँ के ऑपरेशन की बात और उस ऑपरेशन के लिए दो लाख रूपये  की बात से वे किनारा काटने लगे. किसी का तर्क था कि उसके पास पैसे नहीं है ..किसी ने घर के लोन होने की बात कही तो किसी ने महँगाई का हवाला देते हुए अपना अपना पल्ला झाड़ दिया  और अपने – अपने सुझावों की बौछार करनी शुरू कर दी किसी ने सुझाव दिया कि माँ के ऑपरेशन की जगह अगर दवाइयों से ही काम चल जाए तो अच्छा होगा . किसी ने सुझाव दिया कि अगर माँ को हम एक बार सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए ले जाये तो ठीक होगा .. बच्चों की बातें सुनकर किशनलाल सन्न रह गया . उसने सपने में भी यह कल्पना नहीं की थी कि उसके लाल,  आँखों के तारे अपनी माँ के लिए इतने निष्ठुर भी हो सकते हैं. जिसके आँचल की छाँव में वे पाले –बढ़े थे , आज उनके पास उस माँ के लिए एक रूपया भी नहीं  जिसने अपना पूरा जीवन उन्हें खुशी देने के लिए समर्पित कर दिया था कभी अपनी खुशियों की परवाह नहीं की थी . आज  वही माँ अपने जीवन की कुछ साँसों को पाने के लिए बच्चों की सहायता की प्रतिक्षा कर रही है .  बच्चों की ऐसी कटु बातें सुनकर  उसे लगा कि यदि आज अगर वह दिल का मरीज होता तो शायद आज ही उसे  हार्ट अटैक  आ गया होता . कुछ देर तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा फिर एक एक करके चारों बेटे अपने- अपने घर के लिए रवाना हो गए . किशनलाल कमरे में एक दम अकेला बैठा रह गया  . बेटों के जाने के बाद उसे लगा कि वह किन से सहायता की उम्मीद कर रहा है . उन बच्चों से जिन्होंने कभी अपनी खुशियों के आगे अपने बूढ़े माँ –बाप की कभी कोई परवाह ही नहीं की . उसे लगा कि वह अपने ही बेटों से उनकी माँ के जीवन भी भीख मांग रहा है और बच्चे हैं कि उस विषय के बारे में सोचना भी नहीं चाहते .
    किशनलाल ने सावित्री को अस्पताल में भर्ती तो करवा दिया था लेकिन उसे एक ही चिंता सताए हुए थी कि दो लाख रुपयों का इंतजाम कैसे होगा.......? अगर रुपयों का इंतज़ाम ना हुआ तो ..? परन्तु जिस बात का डर था वही हुआ . सावित्री बच न सकी और इस संसार को छोडकर चली गयी . सावित्री के चले जाने से किशनलाल एक दम अकेला रह गया .  सावित्री  के चले जाने के बाद उसे बेटों की सारी चालाकी धीरे –धीरे समझ में आने लगी कि उसके बेटे  माँ के ठीक होने का नहीं बल्कि उसके मरने का इंतज़ार कर रहे थे . सावित्री के मरते ही सब अपना –अपना हिस्सा चाहते थे सो लेकर चले गए. जब सावित्री का मृत शरीर घर लाया गया था तब चारों बहुएँ किस प्रकार बिलख –बिलख कर रो रही थी . घर में आते ही चारों ने उसके तन के सभी गहने उतारकर रख लिए थे .सभी क्रिया कर्म करने के बाद जब एक दिन किशनलाल ने इस विषय के बारे में चारों बेटों से बात की लेकिन सभी के टाल मटोल एवं गोल मोल  जवाब सुनकर उसे समझ में आ गया कि वे गहनों के बारे में कुछ नहीं बताने वाले . उसे इस बात की हैरानी थी कि बच्चों को ऐसा करने की क्या जरुरत थी वैसे भी जो कुछ है  उन सभी का तो है  ? वह कौन सा अपनी छाती पर रखकर ले जाने वाला है  .
 कुछ दिनों तक घर पर परिचित लोगों का आना –जाना लगा रहा . वह भी धीरे –धीरे खत्म हो गया था. सभी बेटे और बहुएं भी अपने –अपने घर चलते बने किसी ने उनसे यह नहीं कहा कि पिताजी अब आप अकेले हैं ....चलकर हमारे साथ रहिए अब वह इस विशाल हवेली में अकेला है . पिता के इस अकेलेपन में उसकी बेटी ने उसका साथ दिया . यह वही बेटी है जिसे उसने कभी उतना प्यार नहीं किया था जितना बेटों से किया था .यहाँ तक की उसे ठीक तरह से पढ़ना –लिखना भी नहीं सिखाया था.वही बेटी जिसका उनसे कन्यादान कर दिया था .उसकी देखभाल में लगी है . बेटी ही नहीं बल्की दामाद भी उसकी देखभाल में लगा है . बेटी की इस निःस्वार्थ भाव सेवा को देखकर उसका दिल भर आता उनकी  निःस्वार्थ सेवा को देखकर उसकी आँखें छलक आती थी . उसे इस बात का मलाल था कि क्यों सदा उसने बेटों की ही चाह की थी .? अगर बेटे ऐसे होते हैं तो कोई बेटों की कामना ना करे  ऐसे बेटों से तो बेटियां भली . अपने अतीत की सभी कड़वी बातों को भुलाकर बेटी के साथ रहना स्वीकार कर लिया और अपनी हवेली और जो ज़मीन थी सब बेटी के नाम लिख दी . इस पर बेटों ने आपत्ती तो बहुत जताई पर वे अपने इस मकसद में कामियाब ना हो सके . इस ज़मीन- जायदाद को लेकर बाप –बेटों का काफी दिनों तक कोर्ट – कचहरी  में आना जाना लगा रहा लेकिन अंत में जीत किशनलाल की ही हुई .
अब किशनलाल अपनी बेटी के साथ रह रहा है , बेटी के साथ रहकर वैसे तो वह बहुत खुश है लेकिन पता नहीं कहीं  न कहीं  वह अपने आप को बहुत कर्जदार सा महसूस करता है . शायद बेटी के साथ रहने के कारण , उसके घर का खाना खाने के कारण से वह अपने आप को  उसका कर्जदार महसूस करता है . अगर बेटी के घर का खाना खाना अगर पिता के लिए पाप है तो हाँ वह पापी कहलाने के लिए तैयार है .अगर बेटी के घर रहना अपराध है तो वह अपराधी है और शायद वह इस अपराध बोध से कभी छुटकारा न पा सकेगा .पर हाँ बेटों के फेकें हुए सूखे टुकड़ों से बेटी के प्यार के दो निवाले कही बेहतर हैं .

Tuesday, January 17, 2012

आख़री इंतज़ार

फोन की घंटी बजी आकाश ने फोन की तरफ देखा घर से फोन था . फोन उठाते ही जो बात उसने सुनी बात सुनकर उसके होश उड़ गए . फोन उसकी बेटी ने यह बताने के लिए किया था कि आज सुबह  दादी को दिल का दौरा पड़ा है और  उन्हें अस्पताल में भर्ती  करवाया गया है . माँ को दिल के  दिल के दौरे की बात सुनकर आकाश अपने सभी काम छोडकर माँ को देखने के लिए तुरंत हवाई यात्रा की टिकट निकलवाकर  अमृतसर से चेन्नई के लिए रवाना हो गया . जब से उसने माँ के दिल के दौरे की बात सुनी थी तभी से उसका दिल बैठा जा रहा था .
    आकाश की माँ पिछले कई  बर्षों से  बुढ़ापे की बिमारियों से ग्रस्त थी और पिछले कई महीनों  से वे अस्पताल के आई .सी यू में भर्ती थी और आज अचानक दिल का दौरा . किसी अनहोनी की  आशंका से उसका दिल घबरा रहा था . हवाई जहाज में बैठा –बैठा वह माँ की सलामती की दुआ कर रहा था .अमृतसर से चेन्नई का सफर पूरा करके  वह सीधा अस्पताल गया .  जैसे ही वह अस्पताल पहुँचा उसे एक और  दुखद घटना का सामना  करना पड़ा . अस्पताल में माँ के साथ –साथ पिता जी भी भर्ती थे .  घर में  जब उसके पिता मोहन  को इस बात की जानकारी मिली कि उनकी पत्नी को दिल का बड़ा  दौरा पड़ा है. यह खबर सुनकर वे भी हडबडाते हुए अस्पताल जा पहुँचे . आई .सी यू का कमरा पहली मंजिल पर था.  वे  सीडियों से ऊपर जा रहे कि अचानक उनका पैर फिसल गया और वे सीधे  सीडियों से लुढकते हुए नीचे जा गिरे  . सीडियों से गिरने के कारण उनकी छाती की पसलियो और पैर की हड्डी में गहरी चोट आई . एक तो बुढ़ापा उस पर से शरीर में इस प्रकार की चोट...... एक तरफ माँ दूसरी तरफ पिता... आकाश को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह हो क्या रहा है . क्या ईश्वर उसका इम्तहान ले रहा .
आकाश के बेटे ने उसे बताया कि दादा जी तो अभी  ठीक हैं, आप पहले दादी से मिल आओ . वह माँ से मिलने के लिए चला गया . जैसे ही वह माँ के कमरे के  सामने  पहुँचा  वहाँ पर उसकी पत्नी और बेटी उसे देखते ही रोने लगी , उन्हें रोता देखकर उसकी आँखों में आँसू भर आये पर अपने आँसुओं को किसी तरह रोककर उसने पत्नी और  बेटी को सांत्वना देते हुए कहा माँ को कुछ नहीं होगा ईश्वर इतना निर्दयी नहीं हो सकता . पत्नी और बेटी को शांत करके वह माँ से मिलने  कमरे के अंदर गया . माँ सो रही थी . जैसे ही उसने माँ का हाथ अपने हाथ में लिया माँ की आँखें खुल गयी . बेटे को सामने देखकर माँ की आँखों से आँसुओं की धार बह निकली  . माँ को रोते देखकर उसका दिल भर आया और वह भी अपने आप पर काबू न रख सका . जिस दुःख  को  वह अब तक  सब से छिपाता फिर रहा था आँखों से आँसुओं के रूप में बाहर आने लगा . माँ का सिर अपनी बाँहों में भर कर माँ को चुप करने लगा ...वैसे भी वह माँ का लाड़ला जो था .उसकी आँखों से आँसू छलकते रहे . माँ को शांत करके वह पिताजी से मिलने के लिए गया . पिता के पास जाकर उनकी हालत को देखकर वह  फिर अपने आप पर काबू न रख सका .....इधर पिताजी उधर माँ दोनों को एक साथ अस्पताल में देखकर वह टूट सा गया था . जिस बाप की उँगली  पकड़कर चलना सीखा था आज वे एक अपाहिज की तरह अस्पताल के बिस्तर पर पड़े हैं . पिता ने  उससे उसकी माँ का हाल पूछा . इस वक्त उन्हें अपने से ज्यादा अपनी पत्नी की चिंता थी .उसने पिताजी को बताया कि अभी माँ ठीक है  आप चिंता न करें .  आकाश के यह वाक्य कि आप चिंता न करें पर पिता के दर्द भरे वाक्य अ ..अ ....अरे बेटा उसकी चि ...चि ....चिंता न करूं तो किसकी करूँ . जिसके साथ जी .. ...जीवन के सत्तर साल बिता दिए.....  वे थोड़े देर रुके  कुछ वाक्य बोलने पर ही उनकी साँसें फूलने लगी थी ... वे थोड़ी देर रुके फिर बोले  जि ...जिस ...जिसने  सदैव मेरा सुख – दुःख में साथ दिया आज जब उसे मेरे साथ की जरुरत है मैं......कहते हुए उनकी आँखें भर आई .इन वाक्यों ने आकाश को झकझोर कर रख दिया . अपनी भावनाओं पर काबू रखकर पिताजी को समझाया कि उसके रहते  वे निराश न हों. कुछ देर पिता के पास रहने  के बाद वह कमरे से बाहर निकल आया .  उसने परिवार के लोगों को पिताजी के साथ घटित घटना को माँ को न बताने के लिए कहा.    
  कुछ समय बाद आकाश की माँ का इलाज कर रही डॉक्टर से उसकी मुलाकात हुई  . आकाश को देखे ही डॉक्टर ने उसे  बताया कि अभी माजी खतरे से बाहर है  लेकिन एक बात तो कहनी होगी कि इतने  बड़े दिल के दौरे  के बाद भी उनकी सांसे चल रही है यह तो किसी चमत्कार से कम नहीं है. इस तरह ये और कितने दिन .... कहकर डॉक्टर वहाँ से चली गई . डॉक्टर के चले जाने के बाद आकाश कमरे में गया. उसे लगा  कि माँ  कुछ खोज रही है , माँ कमरे में चारो तरफ देख रही थी .  आकाश की पत्नी और बेटी ने उनके कमरे में चारों तरफ देखने का कारण पूछा लेकिन वह कुछ न बोली . आकाश को पता था कि माँ उसके छोटे बेटे  विकास  को कमरे में खोज रही हैं .  वही बेटा जो वर्षों पहले घर परिवार के लोगों से  आपसी मन मुटाव और कलह के कारण अपनों से रिश्ता तोड़कर दूसरे शहर में अपने परिवार के साथ खुशी – खुशी सुखी  जीवन बिता रहा है .आकाश ने माँ और पिता के अस्पताल में होने की जानकारी विकास को दे दी थी और अनुरोध भी  किया था कि एक बार माँ से आकर मिल ले  पर विकास  की तरफ से कोई सकारात्मक उत्तर न पाकर उसे और चिंता हो रही थी .
    माँ को निराश देखकर उसने माँ का ध्यान दूसरी तरफ करने के लिए अपने  ऑफिस की कुछ बातें छेड दी. आई . सी .यू में माँ तो  दूसरे कमरे में पिता उसका मन एक जगह नहीं लग रहा था .  कुछ समय माँ के पास बैठने के बाद वह पिता को  देखने के लिए चला गया . सीडियों से गिरने के कारण उनकी पसली की  हड्डी और एक पैर की हड्डी टूट गयी थी इस लिए उनके पैर और पसलियों पर प्लास्टर लगाया गया था. यहाँ आए हुए दो दिन गुजर चुके थे . अस्पताल से ही  उसने अपने सभी रिश्तेदारों और मित्रों को इस घटना की  जानकार दे दीन थी  .दो दिन बीत जाने पर भी जब विकास नहीं  आया तो एक बार फिर उसने विकास को फोन किया और  एक बार  माँ को सपरिवार आकार देखने का अनुरोध  किया  . पहले तो विकास  ने घर आने की बात को सिरे से नकार दिया लेकिन आकाश के समझाने , अनुरोध करने पर वह इस बात के लिए सहमत तो हो गया लेकिन कब आएगा यह नहीं कहा . धीरे –धीरे अस्पताल में आये हुए एक सप्ताह बीत चुका था . माँ – पिता से मिलने उन्हें देखने के लिए  सभी रिश्तेदार और जान पहचान के लोग आ गए थे  , लेकिन अभी तक विकाश  नहीं आया . माँ आई .सी .यू में भर्ती थी , बहार एक कमरे में पिता  दोनों ही ऐसी अवस्था में कि कभी भी कुछ हो सकता था . आकाश जब भी माँ के कमरे में जाता  माँ की नज़रे आकाश की ओर इस तरह देखती कि जैसे पूछ रही हों कि अभी तक विकास   क्यों नहीं आया ....?
एक दिन की बात है आकाश माँ के सिरहाने बैठा माँ से बातें कर रहा था  बातों ही बातों में माँ ने मिठाई का जिक्र छेड दिया  माँ ने उसे कहा कि उसका बहुत दिनों से कलाकंद  खाने का दिल कर रहा है ...  पहले तो आकाश ने मना कर दिया क्योंकि उन्हें सुगर की बीमारी है . लेकिन माँ के बार –बार अनुरोध करने पर  मिठाई लाने को कह तो दिया लेकिन डरता था कि कहीं माँ को कुछ हो गया तो .....? पर माँ के  बार –बार अनुरोध करने पर  एक दिन  वह माँ के लिए मिठाई ले आया और डरते – डरते  एक मिठाई का टुकड़ा माँ को खिला दिया . मिठाई खिला तो दी लेकिन  मन ही ईश्वर से माँ के स्वस्थ होने की प्रार्थना करते रहता . इसी तरह दस दिन बीत गए माँ की हालत तो वैसी की वैसी बनी हुई थी लेकिन पिता का स्वस्थ धीरे –धीरे  सुधर रहा था . इधर आकाश ने अपने दफ्तर से कुछ समय की छुट्टी ले रखी थी वहीँ दूसरी तरफ उसके पूरे परिवार पत्नी और बच्चों ने भी अपने –अपने कॉलेजों  से छुट्टी ले रखी थी पूरा परिवार वृद्द माता –पिता की देख रेख में लगा हुआ था . माँ और पिताजी की इस तरह की हालत देखकर  उसका दिल रोता था अब तो हालत यह थी कि हर साँस उनकी सलामती कि दुआ  लेकर ही निकल रही थी .
     इधर माँ से जो भी मिलने आता माँ कमरे के दरवाजे की तरफ एक आस भरी नज़रों से देखती रहती . कुछ देर एक टक दरवाज़े की तरफ देखती ओर फिर आँखें बंद कर लेती . आने –जाने वालों से नपी –तुली बात कर वह आँखें बंद कर लेती . हर रिश्तेदार उनकी हालत को देखकर हैरान था कि बुढ़ापे में सूकर  काँटा  हो चुकी माँ की साँसें न जाने किस में अटकी हैं . जब भी कमरे का दरवाज़ा खुलता उन्हें लगता कि शायद अब विकास  अपनी बीमार माँ से मिलने  उसकी अटकी साँसों को मुक्त करने आ गया हो लेकिन........ , माँ तो माँ है... न जाने कब तक बेटे के आने की राह निहारेंगी  उसके आने के  इन्जार में उसकी  बूढी आँखें पथरा चुकी थी . धीरे –धीरे समय अपनी गति से चलता गया और एक दिन वह भी आ ही गया जब माँ की अटकी साँसों ने उसका साथ छोड़ दिया .वह संसार के बंधनों की जंजीरों को तोड़कर जा चुकी थी .  माँ की अंतिम इच्छा पूरी ना होने पर आकाश को बहुत दुःख हुआ .... जिसके लिए माँ की साँसे अटकी थी वह नहीं आया... . अपने परिवार को ना जोड़ पाने पर आकाश पूरी तरह टूट चुका था ...