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Friday, February 17, 2012

क़र्ज़


किशनलाल  आज से पहले कभी इतना उदास नहीं हुआ . जिन बच्चों को वह अपना समझ रहा था उन बच्चों ने तो उसे  और उनकी पत्नी सावित्री को कब का अपने जीवन से बहार कर दिया था . बच्चे अपने अपने परिवार के साथ सुखी जीवन जी रहे हैं . अगर कोई परेशान है तो वह है किशनलाल. एक समय था जब उसके पास बीस बीघे ज़मीन हुआ करती थी . आसपास के इलाकों में उसका नाम नेक इंसानों में गिना जाता था. उसका भी कभी सुखी घर परिवार हुआ करता था . वर्षों बीत गए सभी बच्चे ज़मीन –जायदाद में अपना –अपना हिस्सा लेकर अलग हो गए . उसके पास जो कुछ था उसने बच्चों में बराबर –बराबर  बाँट दिया केवल एक खानदानी हवेली और कुछ बीघे जमीन के . इस पुरानी हवेली में उसके बचपन की यादें बसी हैं, उसके बचपन की शरारतें हैं . उस हवेली से न केवल उसकी बल्की उसके माता –पिता की यादें भी जुडी हैं . आज उसे याद है कि है कि उस गाँव की यह एकमात्र बड़ी हवेली हुआ करती थी जो उसे अपने पुरखों से विरासत में मिली है .
  बच्चे बड़े हो गए और हवेली पुरानी कभी घर परिवार की शान समझी जाने वाली हवेली अब बच्चों को  खंडहर ,भूत हवेली के सामान लगती है . इसलिए चारों बेटे एक –एक कर उस हवेली तथा बूढ़े माता –पिता को छोडकर अपने अलग – अलग आशियाने बनाकर बस गए . सबसे छोटी बेटी रमा थी उसका विवाह भी कर दिया था . वह भी अपनी ससुराल में अपने परिवार के साथ सुखी जीवन जी रही है. किशनलाल को उसके जीवन से कोई शिकायत नहीं है . उसने अपने जीवन में कभी किसी से किसी प्रकार की सहायता की याचना न की थी , सदैव दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहता था . यहाँ तक कि उसने कभी भी अपने बच्चों से अपनी बीमार पत्नी के इलाज के लिए एक पैसे की मांग तक नहीं की थी .
सावित्री को दिल की बीमारी थी , पिछले कुछ दिनों से  सावित्री को सांस लेने में बहुत तकलीफ हो रही थी . काफी समय तक दवाइयों से ही काम चलता रहा लेकिन अब बीमारी कुछ ज्यादा ही बढ़ चुकी थी ,  इसलिए उसे अस्पताल में भर्ती करवाया गया था , लेकिन जब अचानक एक दिन डॉक्टर ने ऑपरेशन  के लिए दो लाख की बात कही ,दो लाख की बात सुनकर वह स्तंभित  रह गया . ऑपरेशन तो ठीक है लेकिन दो लाख रुपयों का इंजाम कहाँ से होगा.. ? कैसे होगा.. ? उसे दिन-रात यही चिंता सताती रहती. उसके पास  जो कुछ जमा पूंजी  थी  उसने उसका हिसाब लगाया तो देखा कि वह तो मात्र साठ हजार रूपये  है . बाकी की रकम का इंतजाम कैसे होगा.. ? कहाँ से होगा  .....?
    इसी दुविधा का हल निकालने  के लिए उसने चारों बेटों को घर पर बुलावा भेजा . एक –एक कर चारों बेटे आ गए . चारों बेटों के आ जाने पर उसने उन्हें बताया कि सावित्री के ऑपरेशन के लिए जल्द से जल्द दो लाख रुपयों की जरुरत है. दो लाख रुपयों की बात सुनकर चारों बेटे सन्न रह गए . एकाएक माँ के ऑपरेशन की बात और उस ऑपरेशन के लिए दो लाख रूपये  की बात से वे किनारा काटने लगे. किसी का तर्क था कि उसके पास पैसे नहीं है ..किसी ने घर के लोन होने की बात कही तो किसी ने महँगाई का हवाला देते हुए अपना अपना पल्ला झाड़ दिया  और अपने – अपने सुझावों की बौछार करनी शुरू कर दी किसी ने सुझाव दिया कि माँ के ऑपरेशन की जगह अगर दवाइयों से ही काम चल जाए तो अच्छा होगा . किसी ने सुझाव दिया कि अगर माँ को हम एक बार सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए ले जाये तो ठीक होगा .. बच्चों की बातें सुनकर किशनलाल सन्न रह गया . उसने सपने में भी यह कल्पना नहीं की थी कि उसके लाल,  आँखों के तारे अपनी माँ के लिए इतने निष्ठुर भी हो सकते हैं. जिसके आँचल की छाँव में वे पाले –बढ़े थे , आज उनके पास उस माँ के लिए एक रूपया भी नहीं  जिसने अपना पूरा जीवन उन्हें खुशी देने के लिए समर्पित कर दिया था कभी अपनी खुशियों की परवाह नहीं की थी . आज  वही माँ अपने जीवन की कुछ साँसों को पाने के लिए बच्चों की सहायता की प्रतिक्षा कर रही है .  बच्चों की ऐसी कटु बातें सुनकर  उसे लगा कि यदि आज अगर वह दिल का मरीज होता तो शायद आज ही उसे  हार्ट अटैक  आ गया होता . कुछ देर तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा फिर एक एक करके चारों बेटे अपने- अपने घर के लिए रवाना हो गए . किशनलाल कमरे में एक दम अकेला बैठा रह गया  . बेटों के जाने के बाद उसे लगा कि वह किन से सहायता की उम्मीद कर रहा है . उन बच्चों से जिन्होंने कभी अपनी खुशियों के आगे अपने बूढ़े माँ –बाप की कभी कोई परवाह ही नहीं की . उसे लगा कि वह अपने ही बेटों से उनकी माँ के जीवन भी भीख मांग रहा है और बच्चे हैं कि उस विषय के बारे में सोचना भी नहीं चाहते .
    किशनलाल ने सावित्री को अस्पताल में भर्ती तो करवा दिया था लेकिन उसे एक ही चिंता सताए हुए थी कि दो लाख रुपयों का इंतजाम कैसे होगा.......? अगर रुपयों का इंतज़ाम ना हुआ तो ..? परन्तु जिस बात का डर था वही हुआ . सावित्री बच न सकी और इस संसार को छोडकर चली गयी . सावित्री के चले जाने से किशनलाल एक दम अकेला रह गया .  सावित्री  के चले जाने के बाद उसे बेटों की सारी चालाकी धीरे –धीरे समझ में आने लगी कि उसके बेटे  माँ के ठीक होने का नहीं बल्कि उसके मरने का इंतज़ार कर रहे थे . सावित्री के मरते ही सब अपना –अपना हिस्सा चाहते थे सो लेकर चले गए. जब सावित्री का मृत शरीर घर लाया गया था तब चारों बहुएँ किस प्रकार बिलख –बिलख कर रो रही थी . घर में आते ही चारों ने उसके तन के सभी गहने उतारकर रख लिए थे .सभी क्रिया कर्म करने के बाद जब एक दिन किशनलाल ने इस विषय के बारे में चारों बेटों से बात की लेकिन सभी के टाल मटोल एवं गोल मोल  जवाब सुनकर उसे समझ में आ गया कि वे गहनों के बारे में कुछ नहीं बताने वाले . उसे इस बात की हैरानी थी कि बच्चों को ऐसा करने की क्या जरुरत थी वैसे भी जो कुछ है  उन सभी का तो है  ? वह कौन सा अपनी छाती पर रखकर ले जाने वाला है  .
 कुछ दिनों तक घर पर परिचित लोगों का आना –जाना लगा रहा . वह भी धीरे –धीरे खत्म हो गया था. सभी बेटे और बहुएं भी अपने –अपने घर चलते बने किसी ने उनसे यह नहीं कहा कि पिताजी अब आप अकेले हैं ....चलकर हमारे साथ रहिए अब वह इस विशाल हवेली में अकेला है . पिता के इस अकेलेपन में उसकी बेटी ने उसका साथ दिया . यह वही बेटी है जिसे उसने कभी उतना प्यार नहीं किया था जितना बेटों से किया था .यहाँ तक की उसे ठीक तरह से पढ़ना –लिखना भी नहीं सिखाया था.वही बेटी जिसका उनसे कन्यादान कर दिया था .उसकी देखभाल में लगी है . बेटी ही नहीं बल्की दामाद भी उसकी देखभाल में लगा है . बेटी की इस निःस्वार्थ भाव सेवा को देखकर उसका दिल भर आता उनकी  निःस्वार्थ सेवा को देखकर उसकी आँखें छलक आती थी . उसे इस बात का मलाल था कि क्यों सदा उसने बेटों की ही चाह की थी .? अगर बेटे ऐसे होते हैं तो कोई बेटों की कामना ना करे  ऐसे बेटों से तो बेटियां भली . अपने अतीत की सभी कड़वी बातों को भुलाकर बेटी के साथ रहना स्वीकार कर लिया और अपनी हवेली और जो ज़मीन थी सब बेटी के नाम लिख दी . इस पर बेटों ने आपत्ती तो बहुत जताई पर वे अपने इस मकसद में कामियाब ना हो सके . इस ज़मीन- जायदाद को लेकर बाप –बेटों का काफी दिनों तक कोर्ट – कचहरी  में आना जाना लगा रहा लेकिन अंत में जीत किशनलाल की ही हुई .
अब किशनलाल अपनी बेटी के साथ रह रहा है , बेटी के साथ रहकर वैसे तो वह बहुत खुश है लेकिन पता नहीं कहीं  न कहीं  वह अपने आप को बहुत कर्जदार सा महसूस करता है . शायद बेटी के साथ रहने के कारण , उसके घर का खाना खाने के कारण से वह अपने आप को  उसका कर्जदार महसूस करता है . अगर बेटी के घर का खाना खाना अगर पिता के लिए पाप है तो हाँ वह पापी कहलाने के लिए तैयार है .अगर बेटी के घर रहना अपराध है तो वह अपराधी है और शायद वह इस अपराध बोध से कभी छुटकारा न पा सकेगा .पर हाँ बेटों के फेकें हुए सूखे टुकड़ों से बेटी के प्यार के दो निवाले कही बेहतर हैं .

5 comments:

  1. Bahut sach hain, betiyan papa ki ladli hoti hain...

    Amit Anuraag

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  2. Sir

    It looks like you have taken the story from my maternal uncle's family. This actually happened. How do you think this all?

    Regards
    Shubhangi

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  3. यह कहानी भारत के आज के परिवार , और समाज जो कभी एक साथ रहकर अपने आप को खुश नसीब समझते थे लेकिन आज समाज में स्वार्थ इतना बढ़ गया है की ना बाप का प्यार दिखता है ना माँ की ममता .. ( आज तो ना बाप बड़ा न भया बस सबसे बड़ा रूपया ) को दर्शाता है आज व्यक्ति परिवार के रिश्ते नातो को भूलता जा रहा है की असली सुख पुराने, आज और आगे आने वाले रिश्तो को निभाने में है न की उनको पैसे के लिए कुचलने में.

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  4. उपरोक्त सुंदर प्रस्तुति हेतु आभार .......... स:परिवार होली की हार्दिक शुभकानाएं......

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  5. अनुराज जी , सुभांगी जी , अजीत जी और भाकुनी जी आप सभी का बहुत -बहुत धन्यवाद कि आप लोगों ने अपने कीमती समय से कुछ समय क़र्ज़ कहानी को पढ़ने के लिए निकाला ...धन्यवाद ..
    आप सभी को होली की हार्दिक सुभकामनाएँ

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