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Tuesday, September 24, 2013

आ अब लौट चलें




पूरे एक साल के बाद गणेश चतुर्थी का दिन फिर से आया| पूरे शहर ने बड़े-बड़े पंडालों का निर्माण किया गया है| इन्हीं पंडालों में गणेश जी  की मूर्तियों को बिठाया जाएगा| सुबह से ही भक्त उन्हें अपने-अपने घर ले जाने लगे| मूर्ती की आँखों पर नया रुमाल बाँध दिया और ले कर चल दिए| धीरे-धीरे शाम होने लगी गणेश जी की पूजा का शोर शहर में चारों ओर फैलने लगा| बाज़ारों की चकाचौंध  और घरों की साज सजावट देखकर गणेश जी बहुत प्रसन्न थे| पहला दिन तो उनकी पूजा आराधना में निकल गया| जैसे ही दूसरी रात का आलम देखा वैसे ही गणेश जी का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया| गणेश जी को क्रोध में देखकर मूषक राज ने उन्हें शांत रहने की गुहार लगाई|  जैसे-तैसे करके उसने गणेश जी को शांत किया और बताया कि वे यहाँ पर दस दिन के मेहमान हैं| अब तो उन्हें यह सब देखना और सहना ही होगा|मूसक की बातें सुनकर गणेश जी थोड़ा मुस्कुराए और बोले, हाँ मूषक यह सब तो मुझे देखना ही है ...पर क्या संसार में बस यही सब देखना बाकी है|  

सुनकर गणेश जी की बातें मूषक भी मुस्कराया और बोला – प्रभु यह  तो कुछ नहीं, यह  तो सिर्फ फिल्म का एक सीन है  अभी पूरी फिल्म तो बाकी है| आज तो पंडालों में सिर्फ आपने रीमिक्स गाने सुने हैं| अभी तो न जाने इन दस दिनों में क्या–क्या देखना और सुनना बाकी है| इसी तरह तीसरा दिन भी आया भक्तों ने सुबह की आरती की और भोग चढ़ाया| धीरे-धीरे दिन का सूरज ढल गया| धीरे-धीरे रात का अँधेरा चारों तरफ फैल गया| गणेश पंडालों के पास चहल-पहल बढ़ चुकी थी| भक्तों की भीड़ को देखकर गणेश जी खुश थे सोच रहे थे कि आज की शाम उनके भक्त किसी कीर्तन का आयोजन करने वाले हैं| भजन कीर्तन  की जगह जब मुन्नी बदनाम होने लगी और शीला की जवानी चढ़ने लगी के संगीत को सुनकर गणेश जी को मूर्छा आने लगी| किसी तरह मूषक राज ने उन्हें सँभाला| होश में आते ही वे  मूषक राज से बोले क्या भक्तों ने मुझे यही सब देखने और सुनाने के लिए बुलाया है?
 
गणेश जी की बातों को सुनकर मूषक कुछ मुस्कुराकर बोला  प्रभु आज तो सिर्फ संगीत ही सुना है आगे –आगे देखिए होता है क्या....? दोनों की बातों के बीच जोर से चीखने की आवाज सुनाई दी| गणेश जी थोड़ा घबराकर मूषक से बोले  लगता है हमारा कोई भक्त मुसीबत में है?  गणेश जी की बातें सुनकर मूषक ने मुस्कुराते हुए उन्हें बताया प्रभु आपके भक्त पर संकट नहीं यह तो देवलोक में शम्मी कपूर की आत्मा है| जो यहाँ के संगीत को सुनकर देवलोक में भी नाचने लगा है| तीसरे दिन की शाम भी किसी न किसी तरह बीती|

इसी तरह एक दिन बीता दो दिन बीता, बीते गए चार पाँच दिन| आज सातवाँ दिन है| सुबह से पंडाल के लोगों के इलाके के नेता का इंतजार है| आज तो गणेश जी को भोग भी तभी लगेगा जब नेता जी का पदार्पण होगा| आज नेता जी का हाल ना पूछो| ए. सी कमरे में बैठे संगीत का लुत्फ उठा रहे थे| जब कमरे में आकर सेवक ने सूचना दी तो उन्हें याद आया| आज रात गणेश जी का भोग उन्हें ही तो लगाना है| आठ बजे का कार्यक्रम तय हुआ था| नेता जी अपनी व्यस्तता का हवाला देते हुए नौ बजे जा पहुँचे| इस देश में इन्सान तो इन्सान भगवान को भी नेताओं का इंतजार करना पड़ता है| आज उनकी अनुकंपा से ही गणेश जी को रात्री भोग नसीब होगा...., उनके द्वारा शुरू की गई आरती के बाद ही अन्य कार्यक्रम होंगे|

आज सुबह से ही गणेश जी बहुत खुश हैं| अब तो अपने घर जाने का एक दिन ही शेष बचा है| आज की रात  शांति से निकल जाए बस ...| शाम होते-होते बड़े-बड़े- लाउड स्पीकर स्पीकरों की कतारों को देखकर गणेश जी ने मूषक राज से पूछा – लगता है आग यहाँ पर बड़ा सत्संग होने वाला है| जैसे-जैसे रात होने लगी वैसे-वैसे एक-एक कर लोगों की भीड़ जमाँ होने लगी| कुछ ही देर में जब गणेश जी की आरती शुरू हुई यह देखकर वे बहुत खुश हो गए| उन्हें लगा चलो कम से कम जाने से पहले ही सही मनुष्य ने कुछ सही काम किया| तभी गणेश जी की नजर मंच पर आधे वस्त्रों में  सुसज्जित स्त्री पर गई| उसे अपनी तरफ आते देखकर गणेश जी घबराए और मूषक से बोले लगता है जल्दी-जल्दी में यह भक्त अपना दुपट्टा घर पर ही भूल आई| आकर उसने उन्हें नमन किया और नृत्य के लिए तैयार हुई| गणेश जी को लगा कि किसी भी कार्यक्रम को शुरू करने से पूर्व सभी लोग उनकी वंदना करते हैं तो यह भी वही कर रही होगी| यह सोचकर वे बहुत प्रसन्न थे लेकिन ... जैसे ही गाने की धुन ‘चिकनी चमेली सुनते ही गणेश जी का क्रोध सातवें आसमान पर जा पहुँचा| गणेश जी को क्रोधित होता देखकर मूषक ने बात किसी तरह संभाली| अब तो जो नाच का सिलसिला चला एक के बाद एक ठुमके लगे| लग रहा था मानो गणेश पंडाल नहीं किसी की शादी का रिसेप्सन हो रहा है| आखिर किसी न किसी तरह वह भयानक रात भी बीती|

आज तो गणेश जी सुबह से ही खुश हैं| आज उन्हें घर जो जाना है| लेकिन अचानक उनकी खुशी एक चिंता में बदल गई| मूषक राज ने गणेश जी को उदास देखा तो पूछ लिया प्रभु आपकी उदासी का क्या कारण है? मूषक की बात सुनकर गणेश जी बोले–पता नहीं आज फिर मुझे विसर्जित होने के लिए साफ जल नसीब होगा कि नहीं? या फिर उसी गंदगी भरे नाले में मुझे नाक बंद करके डुबकी लगानी होगी? मूषक ने उन्हें समझाया कोई बात नहीं बस दो मिनिट की ही तो बात है, नाक बंद करके आप जल समाधि ले लेना उसके बाद तो फिर एक साल की बारी गई| अगले साल की अगली साल सोचेंगे| तभी मूषक राज को ख्याल आया उसने गणेश जी ने निवेदन किया प्रभु अगर आप आज्ञा दें तो मैं आपसे कुछ कहूँ| गणेश जी ने उसे बोलने की आज्ञा दी| मूषक ने कहा कि क्यों न इस गंदे पानी की समस्या को इंद्र देव के सामने रखें| अगर वे चाहें तो कुछ ही मिनिटों में वर्षा से इस गंदगी को स्वच्छता  में बदल सकते हैं| मूषक की बातें सुनकर गणेश जी मुस्कुराए और बोले तुम्हारा विचार तो सही है लेकिन क्या तुमने सोचा है कि इस बिन मौसम की बरसात से मेरे गरीब भक्तों को कितनी परेशानी होंगी, जिनकी सच्ची भक्ति है मुझ में उन्हें परेशानी होगी| गणेश जी की बातें सुनकर मूषक राज ने कहा ‘धन्य हैं प्रभु आप.......इसी लिए तो विघ्नहर्ता हैं आप..’| मूषक की बातें सुनकर गणेश जी मंद-मंद मुस्कुराए और शांत मुद्रा में बैठ गए| जैसी कि उन्हें आशंका थी इस बार भी भक्त उन्हें उसी गंदे पानी में विसर्जित करेंगे वैसा ही हुआ| इस बरस सब की मनोकामनाओं को पूरा करके वे अपने घर चले गए|  

जाते- जाते एक समस्या की को ध्यान दिलाते गए कि इस संसार में ऐसी गंदगी कब तक ....? जिस पानी में व्यक्ति अपना हाथ नहीं डाल सकता उस में अपने इष्ट देव को कैसे विसर्जित कर सकता है| अगर व्यक्ति आज भी इस समस्या के प्रति नहीं जागा तो हो सकता है निकट भविष्य में उसे और अधिक कठिनाइयों का सामना करना पद सकता है|    

Thursday, February 14, 2013

संघर्ष

                                               
        चौबीस साल की सोनल की आँखें आज भी उन चार दीवारों के बीच कुछ खोजती, उनसे बातें करती रहती| उसके मन में एक सवाल था, एक कशमकश थी जिसका  जवाब उसे आज तक नहीं मिल सका था| सोनल को इस मानसिक रोगी अस्पताल में आए हुए करीब एक साल बीत चुका था| इस एक साल में उसने मुश्किल से किसी से बात की होगी| दिन-रात अकेले बैठी कमरे की दीवारों में ही खोई रहती|   पांच साल की उम्र में अपने माता-पिता और दो छोटी बहनों के साथ डगनिया नामक गाँव से दिल्ली आई थी| माता-पिता देहाती मजदूर थे| वह परिवार में सबसे बड़ी थी|  सोनल के माता-पिता के मन में एक टीस थी कि ईश्वर ने उन्हें बेटा क्यों नहीं दिया| अगर बेटा होता तो कम से कम उनके बुढ़ापे का सहारा होता| बेटियाँ जब बड़ी हो जाएँगी अपनी-अपनी ससुराल चली जाएँगी| ऐसा नहीं था कि सोनल के माता-पिता अपनी बेटियों से प्यार नहीं करते थे| वे अपनी तीनों बेटियों से बहुत प्यार करते थे| दिन में जब माता-पिता काम पर चले जाते तब छोटी बहनों को संभालने की जिम्मेदारी सोनल की रहती| वह घर पर ही रहकर अपनी बहनों की देख रेख करती उनके साथ खेलती-कूदती| उनकी बस्ती के पास एक पार्क था| अकसर वह अपनी बहनों के साथ इसी पार्क में खेलती थी| यहाँ वह स्कूल जाते बच्चों को देखती, कंधों पर बैग उसमें पानी की रंग-बिरंगी बोतल| बच्चों को स्कूल जाते देखकर उसका भी मन करता कि वह भी स्कूल जाए और पढ़-लिखकर डॉक्टर बने| उसने कई बार अपने माता-पिता से उसे स्कूल भेजने की बात कही| माता-पिता ने उसकी कही बातों पर कोई  ध्यान नहीं दिया| सोनल ने इसे ही अपनी नियति मानकर जीवन से समझौता कर लिया था| लेकिन उसका मन था कि यह स्वीकारने को तैयार नहीं था कि वह इस तरह से अपने जीवन से समझौता करे| आखिर पढ़ने-लिखने का उसका भी अधिकार है पर पढ़े-लिखे कैसे? यह सबसे बड़ा प्रश्न था|   

        एक दिन की बात है वह अपनी छोटी बहनों के साथ पार्क से घर लौट रही थी| रास्ते में एक झोपड़ी के पास कॉलेज के बच्चों की हलचल  देखकर वह उस झोपड़ी के पास चली गई| वहाँ पर कॉलेज के बच्चे गरीब बच्चों को पढ़ा रहे थे| सोनल और उसकी बहनों को झोपड़ी के बाहर खड़ा देखकर पूर्णिमा नाम की छात्रा ने उन्हें अंदर बुला लिया| उसने उनका नाम पूछा सोनल ने अपना और अपनी दोनों बहनों के नाम बताए| जब उसे पता चला कि पूर्णिमा और उसके दोस्त इस बस्ती में गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए रोज आते हैं तब उसने भी अपने पढ़ने की इच्छा पूर्णिमा को बताई| उसके पढ़ने की इच्छा को जानकर पूर्णिमा ने उसे और उसकी दोनों बहनों को एक-एक नोटबुक और पेंसिल देते हुए कहा कि वे लोग कल से रोज पढ़ने के लिए यहाँ आया करें| पढ़ने की बात सुनकर एक पल के लिए सोनल को लगा जैसे ईश्वर ने उसकी मन्नत पूरी कर दी हो|  दिन में जब उसके माता-पिता काम के लिए चले जाते वह अपनी दोनों बहनों को लेकर पढ़ने के लिए चली जाती|

      समय के साथ- साथ सोनल और उसकी बहने बड़ी हो रही थीं| कुछ वर्षों तक पूर्णिमा और उनके दोस्तों ने उन गरीब बच्चों को पढ़ाया| बच्चे भी बड़ी लगन से पढ़ रहे थे| कुछ सालों के बाद पूर्णिमा और उसके दोस्तों का उस बस्ती में आना बंद हो गया| सोनल का पढ़ने का सपना टूट गया| इन दिनों में वह थोड़ा बहुत पढ़ना-लिखना सीख चुकी थी| वह आगे भी पढ़ना चाहती थी लेकिन ऐसा हो न सका| एक दिन सोनल के पिता एक दुर्घटना का शिकार होकर इस संसार से चल बसे| पिता की दुर्घटना का माँ के दिल दिमाग पर गहरा असर पड़ा| वह अपने होशहवास खो चुकी थी| पति के गम में उसका मानसिक संतुलन खराब हो गया| माँ के पागल हो जाने के कारण उसे शहर के सरकारी मानसिक रोगी अस्पताल में भर्ती करवा दिया था| घर  में कमाने वाला कोई नहीं था| मात्र पंद्रह साल की  छोटी उम्र में घर-परिवार की जिम्मेदारी का बोझ उसके कंधों पर आ गया|
 घर का खर्च चलाने के लिए उसने नौकरी की तलाश शुरू कर दी| अधिक पढ़ी-लिखी न होने के कारण वह जहाँ भी जाती निराशा ही हाथ लगती| वह भी हार माने वाली कहाँ थी लगातार कोशिश करती रही| आखिर उसे एक कम्पनी में चपरासी (आया) की नौकरी मिल गई| नौकरी तो मिल गई लेकिन अधिक पढ़ी-लिखी न होने के कारण उसे तरह-तरह की बातें सुननी पड़ती| वह दिन-रात मेहनत से काम करती| इतनी मेहनत से काम करने के बाद भी उसका सुपरवाईजर उसके कामों में कोई न कोई कमी निकाल ही देता| इस तरह एक साल निकल गया| एक दिन उसे ऑफिस में काम खत्म करने में देरी हो गई, उसके अन्य साथी जल्दी काम खत्म करके जा चुके थे| जब वह अपना काम खत्म करके घर जाने लगी तभी उसके सुपरवाईजर ने उसे अपने कैबिन में बुलाया और बैठने के लिए कहा वह जाना चाहती थी लेकिन कुछ जरूरी काम होने की बात कहकर उसे पास ही रखे सोफे पर बैठने के लिए कहा| वह बेचारी डरी सहमी सी जाकर बैठ गई| कुछ देर बातें करने के बाद जैसे ही वह जाने लगी वैसे ही सुपरवाईजर ने उसका हाथ पकड़कर सोफे पर धकेल दिया| उसने अपनी आत्मरक्षा में हाथपैर चलाए, चीखी-चिल्लाई लेकिन उसकी चीख़ों को सुनने वाल वहाँ कोई नहीं था| सुपरवाईजर देर रात तक उसका बलात्कार किया| बलात्कार के बाद उसे धमकी दी गई कि अगर उसने यह बात किसी से कही तो उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा|  

       इस घटना ने उसे झकझोर कर रख दिया था| नौकरी को बचाने के लिए उसने उस घटना के बारे में किसी से कुछ नहीं कहा पर हँसती-मुस्कुराती सोनल एक मुरझाए फूल की तरह रह गई| घर में दो जवान बहनों की जिम्मेदारी उसके कंधों पर थी| अगर नौकरी चली गई तो उनका क्या होगा? यही सोचकर रह गई| दिन बीते, महीने बीते धीरे-धीरे वह इस सदमे से बाहर आने की कोशिश कर ही रही थी कि फिर एक बार उस सुपरवाईजर ही हवस का शिकार होना पड़ा| उसने  उस लाचार लड़की का कई बार बलात्कार किया| वह बेचारी इसी डर से कि अगर कहीं दूसरी जगह नौकरी नहीं मिली तो उसकी बहनों का क्या होगा? उस कड़वे घूँट को पीकर रह जाती| लेकिन हद तो तब हो गई जब एक दिन उस सुपरवाईजर ने उसे अपने कुछ दोस्तों के साथ भी.......यह सुनकर वह चौक गई| उस दिन वह कुछ बहाना बनाकर ऑफिस बाहर निकलने में कामयाब हुई| दूसरे दिन से वह उस ऑफिस में नहीं गई| इसी बीच उसे एक और दुखद घटना का सामना करना पड़ा| उसकी माँ जो सरकारी मानसिक रोगी अस्पताल में भर्ती थी| दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई थी| अस्पताल वालों ने माँ के मृत शरीर को उसके घर भेज दिया| उसके पास जो कुछ पैसे थे माँ के अंतिम क्रियाकर्म में खर्च हो गए| इधर ऑफिस से सुपरवाईजर ने उसे कई बार बुलाया लेकिन वह नहीं गई| उस पर हुए इस अत्याचार को किससे कहे? कौन उस गरीब बेसहारा को इन्साफ दिलाएगा? कोई उसकी कही बातों का विश्वास नहीं करेगा| यही सोचकर वह अपने दुःख को अंदर ही दबाकर रह गई| उसने और कई कंपनियों में नौकरी के लिए आवेदन किया| लेकिन उसके मन में एक डर बैठ गया था कि अगर इस कम्पनी में भी......? उसने कम्पनी में नौकरी करने का विचार ही छोड़ दिया|

     अगर वह काम नहीं करेगी तो खाने को कहाँ से मिलेगा| घर का खर्चा बहनों की पढ़ाई का खर्चा सब कहाँ से होगा? उसने ऑफिस में नौकरी करने की जगह आस-पड़ोस के घरों में बर्तन माँजना, कपड़े धोने का काम शुरू कर दिया| जिन घरों में वह काम करती थी उन्हीं में से एक घर था कान्ता प्रसाद का| कान्ता प्रसाद बड़े ही नेक इन्सान थे| उनका एक बेटा था संतोष जितने पिता नेक इन्सान थे उतना ही बेटा नालायक था| कान्ता प्रसाद हमेशा उसकी शिकायतों से परेशान रहते थे| इकलौता बेटा था घर में किसी चीज की कमी नहीं थी| शायद बेटे को अपने माता-पिता की कमजोरी पता थी| इसी लिए  उसके जी में जो आता करता

       एक दिन कान्ता प्रसाद अपनी पत्नी के साथ कुछ दिनों के लिए बाहर गए हुए थे| घर में संतोष अकेला था|  घर में कान्ता प्रसाद और उनकी पत्नी को न पाकर सोनल सहम गई| उसने संतोष से उसके माता-पिता के बारे में पूछा| उसने बताया कि मम्मी पापा कुछ काम से दो दिनों के लिए बाहर गए हैं| यह सुनकर वह और डर गई| उस दिन वह जल्दी-जल्दी काम करके चली गई| इसी तरह दूसरे दिन वह काम करके जाने लगी तभी  संतोष में उसे रात का खाना बनाकर रखने के लिए कहा| उसने संतोष  खाने के लिए रोटी और सब्जी बना दी| घर का सारा काम खत्म करके वह जाने लगी तभी संतोष उसके पास आया और उसे पकड़कर जबर्दस्ती अपने कमरे में ले गया| वहां उसने  सोनल के साथ कई घंटों तक रेप किया, उसे मारा-पीटा यहाँ तक की उसकी अश्लील फिल्म भी बना ली| उसने सोनल को धमकी दी कि अगर उसने यह बात किसी को बताई तो वह उसकी इस फिल्म को अपने सभी दोस्तों के सेल फोन में भेज देगा  और हो सकता है उसके दोस्त अपने और दोस्तों को उसकी फिल्म भेज दें इससे वही बदनाम होगी| अगर उसने ज्यादा होशियारी दिखाई तो हो सकता है जो उसके साथ हुआ उसकी बहनों के साथ भी वैसा ही कुछ हो..........| लड़खड़ाते हुए जख्मी हालत में वह घर पहुंची| घर पहुँचकर उसने अपनी छोटी बहनों को अपनी इस स्थिति का तनिक भी आभास नहीं होने दिया| 

       कुछ दिनों तक वह खामोश रही| एक बार तो उसके मन में आया कि वह पुलिस स्टेशन जाकर उसकी शिकायत दर्ज करवा दे| संतोष को उसके किये का दण्ड मिलना चाहिए यही सोचकर एक दिन वह घर से निकली कुछ दूर पहुँचने पर उसे संतोष की वह धमकी जिसमें उसने कहा था कि अगर उसने इस बारे में किसी को कुछ भी बताया तो वह उसकी बहनों के साथ भी.....? उसके कदम अपने आप रुक गए| वह हताश सी चुपचाप घर लौट आई| बहनों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए वह खामोश रह गई| उसे नहीं पता था कि उसकी खामोशी संतोष की ताकत बन जाएगी| जब कभी भी वह मौका पाता सोनल को डरा धमका कर उसका बलात्कार करता| सोनल ना चाहकर भी...........| संतोष की इन हरकतों ने उस असहाय लड़की की अंतरात्मा तक को झकझोर कर रख दिया| संतोष ने खुद तो उसका बलात्कार किया| जब उसका दिल भर गया तब उसने सोनल पर दबाव डाला कि वह सब कुछ जो उसने उसके साथ किया है वह उसके दोस्तों के साथ भी करे| उसके इन्कार करने पर उसे ब्लेकमेल करता| अगर वह उसके कहे अनुसार नहीं करेगी तो वह उसे मोहल्ले में बदनाम कर देगा| उसकी बनाई अश्लील फिल्म को.....| ना चाहते हुए भी वह उन लोगों की दरिंदगी का शिकार होती| उसके दोस्तों ने भी उसका जी भरकर बलात्कार किया| 

     इस तरह  सोनल ने मात्र 18 साल की उम्र में सब कुछ खो दिया था, लेकिन उस मुश्किल घड़ी में भी उसने अपना धैर्य नहीं छोड़ा| दिन-प्रतिदिन बात आगे बढ़ती जा रही थी| एक शाम संतोष ने सोनल को अपने दोस्त की पार्टी में काम करने के लिए बुलाया| यहाँ भी संतोष ने उसे अपने एक दोस्त के सामने एक लजीज पकवान की तरह परोस दिया| उसके इन्कार करने पर उसके दोस्त ने उसे पैसों का लालच दिया| उसने बताया कि यहाँ उसे वैसे भी यह सब करना पड़ रहा है चाहे उसकी मर्जी हो या ना हो| अगर वह उसका कहा मानती है तो उसे इस काम के लिए पैसे खूब मिलेंगे| उसे लोगों के घरों में बर्तन मांजने की जरुरत नहीं पड़ेगी|  उसकी बहनों की पढ़ाई-लिखाई भी हो पाएगी| अपनी बहनों के सुनहरे भविष्य के लिए उसने उसकी बात माँ ली|     इसी तरह धीरे-धीरे वह इस कीचड़ में धँसती चली गई| संतोष की हवस ने उसे वैश्यावृत्ति के दलदल में ऐसा ढकेला कि उसके लिए समाज के सभी दरवाजे बंद हो चुके थे

     दिन रात उसे अपनी बहनों की चिंता सताती रहरहकर संतोष की वह धमकी याद आती जो उसने वर्षों पहले उसे दी थी| समय के साथ-साथ उसकी बहने भी बड़ी हो रही थीं| उसकी बहने अब कॉलेज जाने लायक हो चुकी थीं| उसने दोनों बहनों का दाखिला एक कॉलेज में करवा दिया था| दोनों बहने पढ़ने में होशियार थीं| उसने बहनों को कभी भी माँ-बाप की कमी महसूस नहीं होने दी| उनकी ज़रूरतों को पूरा करने की हर संभव कोशिश करती| उन्हें वह सब खुशी देने की कोशिश करती जो उसे नहीं मिल सकीं थीं|
    
     एक दिन दोनों बहने अपने दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने के लिए गई थी| लौटते हुए उन्हें देर रात हो गई थी| उन्होंने रास्ते में कुछ ऐसा देखा जिसे देखकर उन दोनों बहनों के होश उड़ गए| असल में उन्होंने सोनल को उस जगह देखा जहाँ शरीफ घर की स्त्रियों को खड़ा रहना शोभा नहीं देता| देर रात को सोनल के आते ही दोनों बहनों ने सवालों की बौछार शुरू कर दी| सोनल ने भी उन दोनों से कुछ न छिपाते हुए जो कुछ था सब सच कह दिया| सोनल की बातें सुनकर दोनों बहनों के पैरों तले की ज़मीन खिसक गई उनकी बहन एक...... सोचकर ही उन्हें घिन आने लगी| जिस बहन को वे दोनों अपना आदर्श मानती थीं| एक पल में उसे ज़मीन पर गिरा दिया| यह सब जानकर दोनों बहनों ने सोनल से अलग रहने का फैसला किया| सोनल ने उन्हें बहुत समझाया उनके आगे रोई गिडगिडाई उन्हें जाने से रोकने के लिए उसने हर संभव कोशिश की लेकिन उन दोनों बहनों ने उसकी एक न सुनी| बहनों के अलग होने की बात एवं  बहनों द्वारा कही कटु बातों ने उसे झकझोर कर रख दिया था| इस सदमे को वह बरदाश्त न कर सकी| इसी सदमे के कारण उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया|  इसके बाद उसे सरकारी मानसिक रोगी अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया| कुछ महीनों बाद वह कुछ ठीक भी हुई लेकिन अपने जीवन से आस छोड़ चुकी सोनल ने अंत में अपने जीवन को समाप्त करने का फैसला कर लिया और..........अंत समय में उसके हाथों में एक खत था जिसे उसने टूटी-फूटी भाषा में  अपनी बहनों के नाम लिखा था| उसमें लिखा था
मेरी
प्यारी बहनों
  मैं जानती हूँ कि तुम दोनों यह जाकर मुझसे नफरत करने लगी हो कि मैं एक वेश्या हूँ| मेरे जाने के बाद तुम लोगों को यह जानना बहुत जरूरी है  कि तुम्हारी बहन इस धंधे में आई कैसे| मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुम लोगों को शर्मिंदा होना पड़े| कोई भी औरत इस धंधे में खुशी से नहीं आती| जब तुम दोनों छोटी थीं तभी पिताजी चल बसे| पिता के मर जाने के गम में माँ भी पागल हो गई|  तुम दोनों की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आई| मुझसे जितना बन  सका अपनी जिम्मेदारी को निभाने की पूरी कोशिश की पर शायद .....तुम लोगों को मुझ से सदा यही शिकायत थी कि मैंने अच्छी खासी कम्पनी की नौकरी छोड़कर लोगों के घरों में क्यों काम करना शुरू कर दिया| यह वही कम्पनी है जहाँ मेरे साथ पहली बार बलात्कार हुआ| इसीलिए मैंने वह नौकरी छोड़ी और लोगों के घरों में काम किया|

   मैंने यह सोचकर घरों में काम करना शुरू किया था कि यहाँ ऐसा कुछ नहीं होगा| लेकिन यहाँ भी मेरे साथ वही हुआ जो कम्पनी में हुआ था| मुझे मारा गया धमकाया गया कि अगर मैंने यह बात किसी से कही तो वे लोग तुम लोगों के साथ भी यह सब कर देंगे| तुम लोगों की खातिर मैं चुप चाप सब कुछ सहती रही|  मेरे भी कुछ सपने थे कि मेरा भी अपना घर-परिवार हो| लेकिन मुझे सिर्फ और सिर्फ धोखा मिला| बार-बार मेरी इज्जत के साथ खेला गया| मैं उस कड़वे घूँट को पीकर भी जीती रही कि कहीं उसकी कड़वाहट तुम लोगों की जिन्दगी पर न आ जाए|  
अब शायद मेरा काम इस दुनिया में पूरा हो चुका है| तुम दोनों से ही मेरी दुनिया थी| जब तुम दोनों ही मेरे साथ नहीं रहोगी तो मैं इस दुनिया में जी कर क्या करूँगी| भगवान  तुम दोनों को सदा सुखी रखे| सदा खुश रहना ..................
तुम्हारी अभागी बहन
सोनल  
चिट्ठी पढ़कर दोनों बहनों की नज़रें शर्म से झुक गईं| वे दोनों अपने किए पर बहुत शर्मिंदा थीं| पर अब बहुत देर हो चुकी थी| पंछी पिंजरा छोड़कर जा चुका था|

Thursday, January 24, 2013

लम्हा


घर में अकेली बैठी फरहाना की तंद्रा फोन की घंटी बजने से टूटी| उसने फोन उठाया और बात की, फोन रेडियो स्टेशन से शुभांगी  ने किया था| शुभांगी ने बताया कि वह रेडियो एफ.एम में काम करती है| उसका फोन नंबर उसके एक मित्र ने दिया है| असल में शुभांगी ने उसे  रेडियो स्टेशन पर बुलाने के लिए ही फोन किया है| रेडियो से बुलावे को फरहाना ने  सहर्ष स्वीकार कर लिया थाफरहाना एक भोली-भाली  और आकर्षक व्यक्तित्व की है| उसकी उम्र लगभग पैंतीस साल की होगी उसके परिवार के नाम पर पति और सास ससुर हैं| उसकी शादी को चार बरस बीत चुके हैं| वह अपने इस छोटे परिवार के साथ बहुत खुश है| हर समय घरवालों की खोजी नजरें उसे अंदर ही अंदर परेशान करती रहती हैं| घर के सभी सदस्यों को एक बच्चे की चाह है, जिसे वह अभी तक पूरी नहीं कर सकी है| बाहरी तौर पर  घरवाले यही जताते कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि संतान अभी हो या बाद में| किन्तु अंदर ही अंदर वे एक आस लगाए बैठे है कि वह शुभ घड़ी कब आएगी  जब उनके घर में भी बच्चे की किलकारियां गूंजेंगी|

फरहाना का पति साजिद एक  सॉफ्टवेर कम्पनी में सॉफ्टवेर इंजीनियर के तौर पर कार्य कर रहा है| वह स्वयं भी  तो एक सॉफ्टवेर कम्पनी में काम करती है| अच्छा वेतन, खुद का फ्लैट, कार, या यूँ कहें कि खुश रहने की सभी सुख-सुविधाएँ उस घर में मौजूद हैं| अगर कमी है किसी चीज की तो वह एक बच्चे की| शादी के कुछ वर्षों तक तो सब ठीक-ठाक चलता रहा लेकिन बूढ़े सास-ससुर की चाह को पूरा न कर पाने के कारण वह काफी मानसिक तनाव में रहने लगी| अपने इस मानसिक तनाव को दूर करने के लिए उसने बच्चा गोद लेने का फैसला किया| इसके लिए वह अनाथालय भी गई| उसने वहाँ एक बच्ची को पसंद किया लेकिन घरवालों की स्वीकृति न मिलने के कारण उसे अपना फैसला बदलना पड़ा| बच्चों के प्रति अपनी ममता को वह और ज्यादा दिन न रोक सकी| बच्चा भले ही गोद न ले सकी लेकिन पर बच्चों के प्रति अपनी ममता को भी न रोक सकी| इसलिए उसने सोचा कि बच्चा गोद नहीं लिया जा सकता तो क्या हुआ? ऐसे अनाथ बच्चों के लिए काम तो किया जा सकता है| उस दिन से ही उसने अपने आप को एक ऐसी स्वयं सेवी संस्था से जोड़ लिया जो गरीब और अनाथ बच्चों के लिए काम करती है|

 समय के साथ-साथ उसने अपने जीवन से समझौता कर लिया| गरीब और अनाथ बच्चों की देख-रेख को अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर वह आगे बढ़ने लगी| उसकी इस पहल में वह अकेली नहीं थी| उसके इस कार्य को देखकर उसके अन्य सहयोगी भी उसके साथ जुड़ गए| सब ठीक-ठाक चल रहा था| एक दिन अचानक उसकी तबीयत खराब होने के कारण अस्पताल में भर्ती करवाया गया| डॉक्टर ने उसका चैकप किया कुछ दवाइयाँ लिखकर दे दीं| एक-दो दिन में वह ठीक हो गई और फिर उसी व्यस्तता में जुट गई| समय के साथ-साथ फरहाना का काम भी बढ़ता जा रहा था| एक तरफ दिन-प्रतिदिन ऑफिस का बढ़ता काम दूसरी तरफ उन गरीब अनाथ बच्चों की देख-रेख| उसने अपने आप को इन कामों में इतना व्यस्त कर लिया कि अपनी तबीयत के प्रति कोई चिंता ही नहीं थी| इन बच्चों के बीच रहकर, उनके लिए काम करके उसे एक आत्मीय सुख की अनुभूति होती थी| आखिर इन्सान का शरीर बना तो हाड़ माँस का ही ना? अपनी बीमारी की अनदेखी के कारण कुछ ही महीनों में धीरे-धीरे उसकी  तबीयत फिर से खराब रहने लगी| अपने स्वास्थ्य की अनदेखी के कारण इस बार उसकी तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब हो गई थी| उसकी इस स्थिति को देखते हुए डॉक्टर ने बारीकी से जाँच पड़ताल की और कुछ टेस्ट करवाए| जाँच पड़ताल करने के बाद डॉक्टर ने कैंसर होने की बात बताई| 

फरहाना को कैंसर की बीमारी होने की बात सुनकर साजिद को डॉक्टर की कही बातों पर विश्वास ही नहीं हुआ| उसने डॉक्टर को फिर से फरहाना स्वास्थ्य की जाँच करने के लिए कहा, लेकिन  डॉक्टर ने उसे समझाया कि उसने यह बात पूरी जाँच पड़ताल करने के बाद ही कही है| इस खबर को सुनकर फरहाना के होश उड़ गए| एक ही पल में उसे लगा जैसे उसके शरीर में प्राण ही नहीं हैं| कुछ देर डॉक्टर के क्लिनिक में बैठने के बाद वे लोग अपने घर के लिए निकले| घर आते समय दोनों के बीच एक गहरी खामोशी थी, दोनों के मन में एक मानसिक द्वंद्व था| कुछ समय बाद साजिद ने देखा कि फरहाना गहरी चिंता में डूबी हुई है| दोनों के बीच की खामोशी भी एक दूसरे से बहुत कुछ कह रही थी| साजिद  उसे सब कुछ ठीक होने का दिलासा देना चाहता था पर कह न सका| फरहाना ने उस खामोशी में साजिद की तरफ देखा जैसे वह भी उससे यही कहना चाह रही हो कि सब कुछ ठीक हो जायेगा. लेकिन..............इस खामोश सफर पर चलते हुए वे दोनों अपने घर जा पहुँचे| 

घर पहुँचकर फरहाना किसी से बात किए बिना सीधे अपने कमरे में चली गई| साजिद बाहर बैठक में जाकर बैठ गया| उसे लग रहा था मानो आज वह संसार में एक दम अकेला हो गया है| उसके दिल की धड़कने धीरे-धीरे तेज होती जा रही थीं| तरह–तरह के ख्याल उसके मन में आने लगे| इस खबर को अपने घरवालों से कैसे कहे? यही सोच रहा था कि उसकी माँ रसोई से बाहर आई और उसके इस तरह चिंतित बैठने का कारण पूछा| माँ को सामने देखकर साजिद  अपने आप पर काबू न रख सका| अब तक जिस दुःख दर्द को रोक रखा था| उसकी आँखों से छलक आया| जवान बेटे की आँखों में आँसू देखकर माँ घबरा गई| वह उसके पास बैठ गई| माँ को अपने पास बैठा पाकर वह उनकी गोदी में लेट गया और फूट-फूटफूटकर रोने लगा| कुछ देर तो माँ की समझ में कुछ नहीं आया| माँ ने उसे शांत किया और उसके इस प्रकार रोने का कारण जाना तो उनके पैरों तले की ज़मीन खिसक गई| इसी बीच साजिद के पिता भी वहाँ आ चुके थे| दोनों माँ-बेटे को गंभीर बैठे देखकर उन्होंने भी पूछ लिया कि "क्या बात है दोनों माँ-बेटे इस प्रकार क्यों बैठे हैं"? जब उन्हें इस गंभीर विषय के बारे में पता चला तो वे भी इस बात को सुनकर सन्न रह गए| इस खबर ने हँसते-खेलते परिवार में  मातम का सा माहौल बना दिया| घर में सन्नाटा पसरा रहा| कुछ देर बाद साजिद ने अपने माता-पिता से कहा कि अब जो हो गया है उसे बदला तो नहीं जा सकता पर हाँ फरहाना की जितनी भी बची-खुची जिन्दगी है| उसमें वह उसे सारी खुशियाँ देना चाहता है| इसीलिए उसने अपने माता-पिता से वादा लिया कि वे लोग भी फहराना को खुश रखने में उसकी हर संभव सहायता करेंगे कहते –कहते उसकी आँखें फिर से छलक आईं| वह नहीं चाहता कि उसके दुःख का तनिक भी आभास फरहाना को हो| अपने दुःख को उसके सामने जाहिर करके उसे और परेशान नहीं करना चाहता| इतना सब कुछ होने के बाद कभी भी उसने अपने व्यवहार में तनिक भी दया या करुणा की भावना फरहाना को महसूस नहीं होने दी| उसका व्यवहार वैसा ही रहा जैसा पहले था|

आज फरहाना रेडियो एफ.एम पर शुभांगी के निमंत्रण पर आई है| शुभांगी रेडियो एफ.एम की एम. जे है| शुभांगी से कुछ देर बातें करने के बाद वे दोनों स्टूडियो के अंदर चली गई| कुछ ही समय में उनका शो शुरू हुआ|  
  
शुभांगी – नमस्ते दोस्तों  ...... आप सुन रहे हैं रेडियो एफ. एम. मैं शुभांगी| आज  चल रहा है 

आपकी पसंद प्रोग्राम| हमारे साथ हैं फरहाना| फरहाना जी स्वागत है आपका इस शो में| फरहाना 

मुझे सिर्फ आपका नाम पता है आपके बारे में मैं और कुछ नहीं जानती|

फरहाना – धन्यवाद| शुभांगी .....मैं एक ऐसी संस्था से जुड़ी हुई हूँ जो समाज के गरीब अनाथ बच्चों के लिए काम करते हैं| मेरी कोशिश रहती है कि ऐसे बच्चों का स्कूली शिक्षा के साथ-साथ व्यक्तित्व विकास भी हो सके| जिससे कि ये  लोग भी समाज के साथ कदम-से कदम मिलाकर चल सकें|
शो के दौरान उसने अपने दोस्तों के लिए, रिश्तेदारों के लिए तरह-तरह के अपने पसंद के गाने सुनवाए| उसने जितने भी गाने सुनवाए  उन सब गानों से उसकी कोई न कोई याद जुड़ी थी| उन गानों के जरिये वह अपने उन पलों को याद कर रही थी जो उसने अपने माता-पिता, बहन और दोस्तों के साथ बिताए थे|

इस एक घण्टे के शो में शुभांगी और फरहाना की काफी बातें हुई| शो अपने अंतिम पड़ाव पर था और फरहाना को अपना अंतिम गाना सुनवाना था तब शुभांगी ने  कहा-
 
शुभांगी -  फरहाना अब  हमारे इस शो का आखिरी गाना  सैंया.....जिसे कैलाश खैर ने बहुत ही खूबसूरती के साथ गाया है| इस गाने को आप किसके लिए सुनवाना चाहती हो|

फरहाना – इस गाने को मैं अपने पति जिनका नाम साजिद है को डेडीकेट करना चाहती हूँ| साजिद को लगता है जैसे मैं उनसे प्यार नहीं करती| पर सच तो यह है कि मैं उन्हें अपने आप से भी ज्यादा प्यार करती हूँ| यह गाना खासकर उनके लिए ....... 

शुभांगी – फरहाना आप गाती भी हो...?
फरहाना – हाँ कभी-कभी .....
शुभांगी – फिर तो साजिद जी के लिए इस गाने की कुछ लाइन आप गा कर सुना दें........
फरहाना -  हीरे मोती मैं ना चाहूँ ........ मैं तो चाहूँ संगम तेरा ......
           मैं तो तेरी ......सैंया .....तू है मेरा............सैंया ....
           तू जो छू ले प्यार से ...............आराम से मर जाऊं........ |
 गाते हुए उसकी आँखें नम  हो चुकी थीं| लेकिन अपने आप पर काबू रखते हुए उसने शुभांगी को यह आभास नहीं होने दिया कि उसे किसी प्रकार का कोई दुःख भी है|

शुभांगी – क्या बात है ......आप तो बहुत अच्छा गाती हैं|
फरहाना- बस ......... यूँ ही गुनगुना लेती हूँ |  
इस गाने के बाद शुभांगी ने अपने सभी श्रोताओं और फरहाना को धन्यवाद कहा| इसी के साथ उसने अपना शो समाप्त किया| इस प्रकार शो खत्म हुआ दोनों स्टूडियो से बाहर आईं| बाहर फरहाना का मित्र सुमित उनका इन्तजार कर रहा था| अपने मित्र को देखकर फरहाना बहुत खुश हुई| सुमित वही  है जिसने फरहाना का फोन नंबर शुभांगी को दिया था| शुभांगी भी उसे अपने  रेडियो स्टेशन में देखकर बहुत खुश हुई| तीनों के बीच कुछ संवाद हुए| सुमित ने उसके शो के बारे में पूछा -

सुमित – फहराना कैसा रहा तुम्हारा शो |
फरहाना – मुस्कुराते हुए ... एक दम बढिया.....बड़ा मज़ा आया शुभांगी के साथ बातें करके|  थैंक्स  सुमित तुम्हारा यह सरप्राइज़ बहुत ही अच्छा था .....यार मेरा भी एक सपना था कि मैं भी एम. जे  बनूँ. पर वह सपना तो पूरा ना हो सका| पर आज तुम्हारी वजह से कम से कम मैं रेडियों स्टेशन पर तो आ सकी| इतना कहकर  वह पानी पीने के लिए चली गई|
उसके जाने के बाद सुमित ने शुभांगी को भी धन्यवाद कहा और उसके शो के बारे में पूछा
सुमित –फहराना के चेहरे पर दिख रही मुस्कराहट से तो लग रहा है जैसे तुम्हारा शो काफी अच्छा रहा है ?
शुभांगी – यार शो तो बहुत अच्छा था पर मेरी एक बात समझ में नहीं आई फरहाना ने जितने भी गाने चुने वह सब दर्द भरे थे, सेंटी टाइप के गाने थे एक भी गाना उसने रोमांटिक नहीं चुना........क्या उसे डाँस ...धमाल के गाने पसंद नहीं है?
सुमित – अरे यार ऐसा नहीं है उसे डाँस के गाने भी बहुत पसंद हैं यहाँ तक कि वह अच्छा नाचती भी है पर .......
शुभांगी – पर क्या सुमित ?
सुमित - असल में उसे कैंसर है और वह भी लास्ट स्टेज का| डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है  कि अब वह इस संसार में कुछ ही दिनों की मेहमान है|
फरहाना को कैसर होने की बात सुनकर शुभांगी चौक गई| उसे सुमित की कही बात पर विश्वास नहीं हो रहा था| उसे लगा जैसे वह उसके साथ मज़ाक कर रहा है| फरहाना के व्यवहार से कतई नहीं लगता कि वह इस संसार में कुछ ही दिनों की मेहमान है| सुमित ने उसे बताया -
 
सुमित – मुझे भी जब इस बात का पता चला तब मुझे भी अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ पर यह सच है कि उसे कैंसर है और वह भी लास्ट स्टेज का| उसके मुस्कुराते चेहरे के पीछे का सबसे बड़ा दुःख यही है| लेकिन उसने आज तक किसी के सामने अपने इस दुःख को नहीं बताया| उसने अपनी इस बीमारी के बारे में  मुझे भी कुछ नहीं बताया| जब वह हॉस्पिटल में थी तब एक दिन में उससे मिलने गया था| मैंने डॉक्टर से बात की तब पता चला कि उसे कैंसर है|

आज रेडियो स्टेशन पर फरहाना के जीवन के इस राज को जानकर शुभांगी का दिल भर  आया| उसके मुस्कुराते हुए चेहरे के पीछे कितना दुःख –दर्द छिपा था आज पता चला| इस संसार में ऐसे भी लोग होते हैं जो अपने दुःख-दर्द को अपने अंदर ही अंदर समेटे हुए दूसरों को सदैव खुश रखने का प्रयास करते हैं| उन्हीं में से फरहाना भी एक है| उसकी अपनी कोई संतान नहीं है| उसे अपने जीते जी अभी बहुत सारे काम करने हैं| उन बच्चों के लिए जो उसके अपने तो हैं नहीं पर शायद भगवान ने उसकी ममता को देखते हुए उसकी झोली में इतने बच्चों को दे दिया मातृत्व सुख पाने के लिए| उसे पता है कि अब उसे कोई भी दवा इस संसार में नहीं बचा सकती| फिर भी अपने जीवन के इन अंतिम क्षणों में उसने अपना इलाज इस लिए जारी रखा है कि शायद कोई चमत्कार हो जाए और उसे अपने जीवन का वह लम्हा मिल जाए जिससे आज तक वह वंचित है| उसे पता है वह कभी भी इस संसार से विदा हो सकती है फिर भी अपने जीवन के बचे हुए दिनों के हर लम्हें को कुछ इस तरह जीना चाहती है जिससे उसके जाने के बाद भी लोग उसे याद रखें|

हम लोग अपने जीवन के एक-एक लम्हे का मोल नहीं समझते| उसे यूँ ही बातों में, व्यर्थ के कामों में व्यतीत कर देते हैं| लेकिन जब हमें अपने जीवन के बीते हुए हर लम्हे का अहसास होता है शायद तब तक बहुत देर हो चुकी होती है| जीवन का हर लम्हा बहुत ही कीमती है और फरहाना जैसे लोग अपनी इतनी तकलीफों के बीच भी खुशी का एक-एक लम्हा खोज कर उसे जी भरकर जी लेना चाहते हैं ... न जाने खुशियों के ये लम्हे  कल मिले ना मिले ..........