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Thursday, February 14, 2013

संघर्ष

                                               
        चौबीस साल की सोनल की आँखें आज भी उन चार दीवारों के बीच कुछ खोजती, उनसे बातें करती रहती| उसके मन में एक सवाल था, एक कशमकश थी जिसका  जवाब उसे आज तक नहीं मिल सका था| सोनल को इस मानसिक रोगी अस्पताल में आए हुए करीब एक साल बीत चुका था| इस एक साल में उसने मुश्किल से किसी से बात की होगी| दिन-रात अकेले बैठी कमरे की दीवारों में ही खोई रहती|   पांच साल की उम्र में अपने माता-पिता और दो छोटी बहनों के साथ डगनिया नामक गाँव से दिल्ली आई थी| माता-पिता देहाती मजदूर थे| वह परिवार में सबसे बड़ी थी|  सोनल के माता-पिता के मन में एक टीस थी कि ईश्वर ने उन्हें बेटा क्यों नहीं दिया| अगर बेटा होता तो कम से कम उनके बुढ़ापे का सहारा होता| बेटियाँ जब बड़ी हो जाएँगी अपनी-अपनी ससुराल चली जाएँगी| ऐसा नहीं था कि सोनल के माता-पिता अपनी बेटियों से प्यार नहीं करते थे| वे अपनी तीनों बेटियों से बहुत प्यार करते थे| दिन में जब माता-पिता काम पर चले जाते तब छोटी बहनों को संभालने की जिम्मेदारी सोनल की रहती| वह घर पर ही रहकर अपनी बहनों की देख रेख करती उनके साथ खेलती-कूदती| उनकी बस्ती के पास एक पार्क था| अकसर वह अपनी बहनों के साथ इसी पार्क में खेलती थी| यहाँ वह स्कूल जाते बच्चों को देखती, कंधों पर बैग उसमें पानी की रंग-बिरंगी बोतल| बच्चों को स्कूल जाते देखकर उसका भी मन करता कि वह भी स्कूल जाए और पढ़-लिखकर डॉक्टर बने| उसने कई बार अपने माता-पिता से उसे स्कूल भेजने की बात कही| माता-पिता ने उसकी कही बातों पर कोई  ध्यान नहीं दिया| सोनल ने इसे ही अपनी नियति मानकर जीवन से समझौता कर लिया था| लेकिन उसका मन था कि यह स्वीकारने को तैयार नहीं था कि वह इस तरह से अपने जीवन से समझौता करे| आखिर पढ़ने-लिखने का उसका भी अधिकार है पर पढ़े-लिखे कैसे? यह सबसे बड़ा प्रश्न था|   

        एक दिन की बात है वह अपनी छोटी बहनों के साथ पार्क से घर लौट रही थी| रास्ते में एक झोपड़ी के पास कॉलेज के बच्चों की हलचल  देखकर वह उस झोपड़ी के पास चली गई| वहाँ पर कॉलेज के बच्चे गरीब बच्चों को पढ़ा रहे थे| सोनल और उसकी बहनों को झोपड़ी के बाहर खड़ा देखकर पूर्णिमा नाम की छात्रा ने उन्हें अंदर बुला लिया| उसने उनका नाम पूछा सोनल ने अपना और अपनी दोनों बहनों के नाम बताए| जब उसे पता चला कि पूर्णिमा और उसके दोस्त इस बस्ती में गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए रोज आते हैं तब उसने भी अपने पढ़ने की इच्छा पूर्णिमा को बताई| उसके पढ़ने की इच्छा को जानकर पूर्णिमा ने उसे और उसकी दोनों बहनों को एक-एक नोटबुक और पेंसिल देते हुए कहा कि वे लोग कल से रोज पढ़ने के लिए यहाँ आया करें| पढ़ने की बात सुनकर एक पल के लिए सोनल को लगा जैसे ईश्वर ने उसकी मन्नत पूरी कर दी हो|  दिन में जब उसके माता-पिता काम के लिए चले जाते वह अपनी दोनों बहनों को लेकर पढ़ने के लिए चली जाती|

      समय के साथ- साथ सोनल और उसकी बहने बड़ी हो रही थीं| कुछ वर्षों तक पूर्णिमा और उनके दोस्तों ने उन गरीब बच्चों को पढ़ाया| बच्चे भी बड़ी लगन से पढ़ रहे थे| कुछ सालों के बाद पूर्णिमा और उसके दोस्तों का उस बस्ती में आना बंद हो गया| सोनल का पढ़ने का सपना टूट गया| इन दिनों में वह थोड़ा बहुत पढ़ना-लिखना सीख चुकी थी| वह आगे भी पढ़ना चाहती थी लेकिन ऐसा हो न सका| एक दिन सोनल के पिता एक दुर्घटना का शिकार होकर इस संसार से चल बसे| पिता की दुर्घटना का माँ के दिल दिमाग पर गहरा असर पड़ा| वह अपने होशहवास खो चुकी थी| पति के गम में उसका मानसिक संतुलन खराब हो गया| माँ के पागल हो जाने के कारण उसे शहर के सरकारी मानसिक रोगी अस्पताल में भर्ती करवा दिया था| घर  में कमाने वाला कोई नहीं था| मात्र पंद्रह साल की  छोटी उम्र में घर-परिवार की जिम्मेदारी का बोझ उसके कंधों पर आ गया|
 घर का खर्च चलाने के लिए उसने नौकरी की तलाश शुरू कर दी| अधिक पढ़ी-लिखी न होने के कारण वह जहाँ भी जाती निराशा ही हाथ लगती| वह भी हार माने वाली कहाँ थी लगातार कोशिश करती रही| आखिर उसे एक कम्पनी में चपरासी (आया) की नौकरी मिल गई| नौकरी तो मिल गई लेकिन अधिक पढ़ी-लिखी न होने के कारण उसे तरह-तरह की बातें सुननी पड़ती| वह दिन-रात मेहनत से काम करती| इतनी मेहनत से काम करने के बाद भी उसका सुपरवाईजर उसके कामों में कोई न कोई कमी निकाल ही देता| इस तरह एक साल निकल गया| एक दिन उसे ऑफिस में काम खत्म करने में देरी हो गई, उसके अन्य साथी जल्दी काम खत्म करके जा चुके थे| जब वह अपना काम खत्म करके घर जाने लगी तभी उसके सुपरवाईजर ने उसे अपने कैबिन में बुलाया और बैठने के लिए कहा वह जाना चाहती थी लेकिन कुछ जरूरी काम होने की बात कहकर उसे पास ही रखे सोफे पर बैठने के लिए कहा| वह बेचारी डरी सहमी सी जाकर बैठ गई| कुछ देर बातें करने के बाद जैसे ही वह जाने लगी वैसे ही सुपरवाईजर ने उसका हाथ पकड़कर सोफे पर धकेल दिया| उसने अपनी आत्मरक्षा में हाथपैर चलाए, चीखी-चिल्लाई लेकिन उसकी चीख़ों को सुनने वाल वहाँ कोई नहीं था| सुपरवाईजर देर रात तक उसका बलात्कार किया| बलात्कार के बाद उसे धमकी दी गई कि अगर उसने यह बात किसी से कही तो उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा|  

       इस घटना ने उसे झकझोर कर रख दिया था| नौकरी को बचाने के लिए उसने उस घटना के बारे में किसी से कुछ नहीं कहा पर हँसती-मुस्कुराती सोनल एक मुरझाए फूल की तरह रह गई| घर में दो जवान बहनों की जिम्मेदारी उसके कंधों पर थी| अगर नौकरी चली गई तो उनका क्या होगा? यही सोचकर रह गई| दिन बीते, महीने बीते धीरे-धीरे वह इस सदमे से बाहर आने की कोशिश कर ही रही थी कि फिर एक बार उस सुपरवाईजर ही हवस का शिकार होना पड़ा| उसने  उस लाचार लड़की का कई बार बलात्कार किया| वह बेचारी इसी डर से कि अगर कहीं दूसरी जगह नौकरी नहीं मिली तो उसकी बहनों का क्या होगा? उस कड़वे घूँट को पीकर रह जाती| लेकिन हद तो तब हो गई जब एक दिन उस सुपरवाईजर ने उसे अपने कुछ दोस्तों के साथ भी.......यह सुनकर वह चौक गई| उस दिन वह कुछ बहाना बनाकर ऑफिस बाहर निकलने में कामयाब हुई| दूसरे दिन से वह उस ऑफिस में नहीं गई| इसी बीच उसे एक और दुखद घटना का सामना करना पड़ा| उसकी माँ जो सरकारी मानसिक रोगी अस्पताल में भर्ती थी| दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई थी| अस्पताल वालों ने माँ के मृत शरीर को उसके घर भेज दिया| उसके पास जो कुछ पैसे थे माँ के अंतिम क्रियाकर्म में खर्च हो गए| इधर ऑफिस से सुपरवाईजर ने उसे कई बार बुलाया लेकिन वह नहीं गई| उस पर हुए इस अत्याचार को किससे कहे? कौन उस गरीब बेसहारा को इन्साफ दिलाएगा? कोई उसकी कही बातों का विश्वास नहीं करेगा| यही सोचकर वह अपने दुःख को अंदर ही दबाकर रह गई| उसने और कई कंपनियों में नौकरी के लिए आवेदन किया| लेकिन उसके मन में एक डर बैठ गया था कि अगर इस कम्पनी में भी......? उसने कम्पनी में नौकरी करने का विचार ही छोड़ दिया|

     अगर वह काम नहीं करेगी तो खाने को कहाँ से मिलेगा| घर का खर्चा बहनों की पढ़ाई का खर्चा सब कहाँ से होगा? उसने ऑफिस में नौकरी करने की जगह आस-पड़ोस के घरों में बर्तन माँजना, कपड़े धोने का काम शुरू कर दिया| जिन घरों में वह काम करती थी उन्हीं में से एक घर था कान्ता प्रसाद का| कान्ता प्रसाद बड़े ही नेक इन्सान थे| उनका एक बेटा था संतोष जितने पिता नेक इन्सान थे उतना ही बेटा नालायक था| कान्ता प्रसाद हमेशा उसकी शिकायतों से परेशान रहते थे| इकलौता बेटा था घर में किसी चीज की कमी नहीं थी| शायद बेटे को अपने माता-पिता की कमजोरी पता थी| इसी लिए  उसके जी में जो आता करता

       एक दिन कान्ता प्रसाद अपनी पत्नी के साथ कुछ दिनों के लिए बाहर गए हुए थे| घर में संतोष अकेला था|  घर में कान्ता प्रसाद और उनकी पत्नी को न पाकर सोनल सहम गई| उसने संतोष से उसके माता-पिता के बारे में पूछा| उसने बताया कि मम्मी पापा कुछ काम से दो दिनों के लिए बाहर गए हैं| यह सुनकर वह और डर गई| उस दिन वह जल्दी-जल्दी काम करके चली गई| इसी तरह दूसरे दिन वह काम करके जाने लगी तभी  संतोष में उसे रात का खाना बनाकर रखने के लिए कहा| उसने संतोष  खाने के लिए रोटी और सब्जी बना दी| घर का सारा काम खत्म करके वह जाने लगी तभी संतोष उसके पास आया और उसे पकड़कर जबर्दस्ती अपने कमरे में ले गया| वहां उसने  सोनल के साथ कई घंटों तक रेप किया, उसे मारा-पीटा यहाँ तक की उसकी अश्लील फिल्म भी बना ली| उसने सोनल को धमकी दी कि अगर उसने यह बात किसी को बताई तो वह उसकी इस फिल्म को अपने सभी दोस्तों के सेल फोन में भेज देगा  और हो सकता है उसके दोस्त अपने और दोस्तों को उसकी फिल्म भेज दें इससे वही बदनाम होगी| अगर उसने ज्यादा होशियारी दिखाई तो हो सकता है जो उसके साथ हुआ उसकी बहनों के साथ भी वैसा ही कुछ हो..........| लड़खड़ाते हुए जख्मी हालत में वह घर पहुंची| घर पहुँचकर उसने अपनी छोटी बहनों को अपनी इस स्थिति का तनिक भी आभास नहीं होने दिया| 

       कुछ दिनों तक वह खामोश रही| एक बार तो उसके मन में आया कि वह पुलिस स्टेशन जाकर उसकी शिकायत दर्ज करवा दे| संतोष को उसके किये का दण्ड मिलना चाहिए यही सोचकर एक दिन वह घर से निकली कुछ दूर पहुँचने पर उसे संतोष की वह धमकी जिसमें उसने कहा था कि अगर उसने इस बारे में किसी को कुछ भी बताया तो वह उसकी बहनों के साथ भी.....? उसके कदम अपने आप रुक गए| वह हताश सी चुपचाप घर लौट आई| बहनों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए वह खामोश रह गई| उसे नहीं पता था कि उसकी खामोशी संतोष की ताकत बन जाएगी| जब कभी भी वह मौका पाता सोनल को डरा धमका कर उसका बलात्कार करता| सोनल ना चाहकर भी...........| संतोष की इन हरकतों ने उस असहाय लड़की की अंतरात्मा तक को झकझोर कर रख दिया| संतोष ने खुद तो उसका बलात्कार किया| जब उसका दिल भर गया तब उसने सोनल पर दबाव डाला कि वह सब कुछ जो उसने उसके साथ किया है वह उसके दोस्तों के साथ भी करे| उसके इन्कार करने पर उसे ब्लेकमेल करता| अगर वह उसके कहे अनुसार नहीं करेगी तो वह उसे मोहल्ले में बदनाम कर देगा| उसकी बनाई अश्लील फिल्म को.....| ना चाहते हुए भी वह उन लोगों की दरिंदगी का शिकार होती| उसके दोस्तों ने भी उसका जी भरकर बलात्कार किया| 

     इस तरह  सोनल ने मात्र 18 साल की उम्र में सब कुछ खो दिया था, लेकिन उस मुश्किल घड़ी में भी उसने अपना धैर्य नहीं छोड़ा| दिन-प्रतिदिन बात आगे बढ़ती जा रही थी| एक शाम संतोष ने सोनल को अपने दोस्त की पार्टी में काम करने के लिए बुलाया| यहाँ भी संतोष ने उसे अपने एक दोस्त के सामने एक लजीज पकवान की तरह परोस दिया| उसके इन्कार करने पर उसके दोस्त ने उसे पैसों का लालच दिया| उसने बताया कि यहाँ उसे वैसे भी यह सब करना पड़ रहा है चाहे उसकी मर्जी हो या ना हो| अगर वह उसका कहा मानती है तो उसे इस काम के लिए पैसे खूब मिलेंगे| उसे लोगों के घरों में बर्तन मांजने की जरुरत नहीं पड़ेगी|  उसकी बहनों की पढ़ाई-लिखाई भी हो पाएगी| अपनी बहनों के सुनहरे भविष्य के लिए उसने उसकी बात माँ ली|     इसी तरह धीरे-धीरे वह इस कीचड़ में धँसती चली गई| संतोष की हवस ने उसे वैश्यावृत्ति के दलदल में ऐसा ढकेला कि उसके लिए समाज के सभी दरवाजे बंद हो चुके थे

     दिन रात उसे अपनी बहनों की चिंता सताती रहरहकर संतोष की वह धमकी याद आती जो उसने वर्षों पहले उसे दी थी| समय के साथ-साथ उसकी बहने भी बड़ी हो रही थीं| उसकी बहने अब कॉलेज जाने लायक हो चुकी थीं| उसने दोनों बहनों का दाखिला एक कॉलेज में करवा दिया था| दोनों बहने पढ़ने में होशियार थीं| उसने बहनों को कभी भी माँ-बाप की कमी महसूस नहीं होने दी| उनकी ज़रूरतों को पूरा करने की हर संभव कोशिश करती| उन्हें वह सब खुशी देने की कोशिश करती जो उसे नहीं मिल सकीं थीं|
    
     एक दिन दोनों बहने अपने दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने के लिए गई थी| लौटते हुए उन्हें देर रात हो गई थी| उन्होंने रास्ते में कुछ ऐसा देखा जिसे देखकर उन दोनों बहनों के होश उड़ गए| असल में उन्होंने सोनल को उस जगह देखा जहाँ शरीफ घर की स्त्रियों को खड़ा रहना शोभा नहीं देता| देर रात को सोनल के आते ही दोनों बहनों ने सवालों की बौछार शुरू कर दी| सोनल ने भी उन दोनों से कुछ न छिपाते हुए जो कुछ था सब सच कह दिया| सोनल की बातें सुनकर दोनों बहनों के पैरों तले की ज़मीन खिसक गई उनकी बहन एक...... सोचकर ही उन्हें घिन आने लगी| जिस बहन को वे दोनों अपना आदर्श मानती थीं| एक पल में उसे ज़मीन पर गिरा दिया| यह सब जानकर दोनों बहनों ने सोनल से अलग रहने का फैसला किया| सोनल ने उन्हें बहुत समझाया उनके आगे रोई गिडगिडाई उन्हें जाने से रोकने के लिए उसने हर संभव कोशिश की लेकिन उन दोनों बहनों ने उसकी एक न सुनी| बहनों के अलग होने की बात एवं  बहनों द्वारा कही कटु बातों ने उसे झकझोर कर रख दिया था| इस सदमे को वह बरदाश्त न कर सकी| इसी सदमे के कारण उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया|  इसके बाद उसे सरकारी मानसिक रोगी अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया| कुछ महीनों बाद वह कुछ ठीक भी हुई लेकिन अपने जीवन से आस छोड़ चुकी सोनल ने अंत में अपने जीवन को समाप्त करने का फैसला कर लिया और..........अंत समय में उसके हाथों में एक खत था जिसे उसने टूटी-फूटी भाषा में  अपनी बहनों के नाम लिखा था| उसमें लिखा था
मेरी
प्यारी बहनों
  मैं जानती हूँ कि तुम दोनों यह जाकर मुझसे नफरत करने लगी हो कि मैं एक वेश्या हूँ| मेरे जाने के बाद तुम लोगों को यह जानना बहुत जरूरी है  कि तुम्हारी बहन इस धंधे में आई कैसे| मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुम लोगों को शर्मिंदा होना पड़े| कोई भी औरत इस धंधे में खुशी से नहीं आती| जब तुम दोनों छोटी थीं तभी पिताजी चल बसे| पिता के मर जाने के गम में माँ भी पागल हो गई|  तुम दोनों की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आई| मुझसे जितना बन  सका अपनी जिम्मेदारी को निभाने की पूरी कोशिश की पर शायद .....तुम लोगों को मुझ से सदा यही शिकायत थी कि मैंने अच्छी खासी कम्पनी की नौकरी छोड़कर लोगों के घरों में क्यों काम करना शुरू कर दिया| यह वही कम्पनी है जहाँ मेरे साथ पहली बार बलात्कार हुआ| इसीलिए मैंने वह नौकरी छोड़ी और लोगों के घरों में काम किया|

   मैंने यह सोचकर घरों में काम करना शुरू किया था कि यहाँ ऐसा कुछ नहीं होगा| लेकिन यहाँ भी मेरे साथ वही हुआ जो कम्पनी में हुआ था| मुझे मारा गया धमकाया गया कि अगर मैंने यह बात किसी से कही तो वे लोग तुम लोगों के साथ भी यह सब कर देंगे| तुम लोगों की खातिर मैं चुप चाप सब कुछ सहती रही|  मेरे भी कुछ सपने थे कि मेरा भी अपना घर-परिवार हो| लेकिन मुझे सिर्फ और सिर्फ धोखा मिला| बार-बार मेरी इज्जत के साथ खेला गया| मैं उस कड़वे घूँट को पीकर भी जीती रही कि कहीं उसकी कड़वाहट तुम लोगों की जिन्दगी पर न आ जाए|  
अब शायद मेरा काम इस दुनिया में पूरा हो चुका है| तुम दोनों से ही मेरी दुनिया थी| जब तुम दोनों ही मेरे साथ नहीं रहोगी तो मैं इस दुनिया में जी कर क्या करूँगी| भगवान  तुम दोनों को सदा सुखी रखे| सदा खुश रहना ..................
तुम्हारी अभागी बहन
सोनल  
चिट्ठी पढ़कर दोनों बहनों की नज़रें शर्म से झुक गईं| वे दोनों अपने किए पर बहुत शर्मिंदा थीं| पर अब बहुत देर हो चुकी थी| पंछी पिंजरा छोड़कर जा चुका था|

14 comments:

  1. नमस्ते शिव कुमार जी,

    सोनल का संघर्ष बहुत ही मार्मिक लगा. एक यथार्थ का चित्रण किया आपने अपनी इस रचना " संघर्ष" के द्वारा. पढ़ कर बहुत अच्छा लगा

    वैलेंटाइन डे की शुभकामनाये

    धन्यवाद् और बधाई
    अमित अनुराग हर्ष

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  2. Hi Sir

    A very painful story. I am feeling pity for sonal


    thank you
    Shubhangi

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  3. बहुत मार्मिक और आज के समाज का सच..आभार

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  4. Sir

    nice and true story. beautifully presented the bitter truth


    thx
    Tanmay

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  5. Hello sir

    After reading this story I don't have any words to say. Simply good

    Thank you

    Radhika

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  6. Hi sir

    very good story.


    thanks
    best luck
    Upendra

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  7. सुन्दर कहानी . मुबारक बाद स्वीकारें

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  8. संवेदनशील कहानी ... दिल को छूती है ....

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  9. शिव जी कहानी बहुत अच्छी है। गरीबों के साथ अन्याय-अत्याचार हमेशा होते रहे हैं। सोनल के संघर्ष की कहानी पढ कर अन्य लडकियां सजग बनी रहे। अपनी अस्मिता बनाए रखने में सफल हो। गरीब लडकियों के लिए मार्गदर्शक कहानी है। बधाई।

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  10. shiv sir aap ki kahani ek aisa sach kahti hai jo aaj ke daur me ho raha hai..behad sahi, sachi aur dil ko chune wale kahani hai.

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  11. नमस्ते शिवकुमार जी ,

    आशा करता हूँ कि आप सकुशल होंगे . बहुत दिनों से आपकी कोई रचना और कहानी आपके इस ब्लॉग मंच नहीं आई इस लिए आपको यह मेसेज लिख रहा हूँ . ऐसा प्रतीत हो रहा हैं जैसे की आपने इस मंच से सन्यास ले लिया है। आपकी सर्वोत्तम कहानियों के इंतज़ार में-

    आपका नियमित पाठक
    अमित अनुराग हर्ष

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