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Thursday, September 27, 2012

अस्तित्व


रोज़ की तरह आदित्य ऑफिस जाने के लिए तैयार हो गया| तैयार होकर घर के बाहर अपनी कैब का इंतज़ार करने लगा थोड़ी देर के बाद उसकी कैब आई और वह ऑफिस के लिए रवाना हो गया| उनके ऑफिस के सप्ताह का आखिरी दिन था अर्थात शुक्रवार था (वीकेंड था) इसलिए आज उसका मन ज्यादा काम करने का नहीं था| उसने इस सप्ताह का साप्ताहिक कार्यक्रम भी (वीकेंड प्लान) तैयार नहीं किया था| वह सोच रहा था कि ऑफिस जा कर अपने दोस्तों के साथ कुछ प्लान बनाएगा| ऑफिस पहुँचकर उसने सबसे हाय, हेल्लो की और अपने केबिन में चला गया| केबिन में जाकर अपना कंप्यूटर चालू किया| इधर अन्य सहयोगियों का एक दूसरे के साथ हँसी-मजाक अभी चालू ही था| कुछ देर बाद  उसने अपनी टीम के बाकी सदस्यों (मेम्बरों) को अपने कैबिन में बुलाया और आनेवाले वीकेंड प्लान के बारे में पूछा| कुछ साथी जो पुणे के आस-पास के थे इस वीकेंड में  घर जा रहे थे| बचे अन्य साथियों  का कोई विशेष प्लान नहीं था| जो लोग वीकेंड पर कहीं नहीं जा रहे थे उनके साथ आदित्य ने  वीकेंड प्लान्स के आईडिया सजेस्ट करने के लिए कहा| आदित्य की एक सहकर्मी राधिका ने हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म बर्फी देखने का सुझाव दिया, इसी प्रकार शुभांगी का सुझाव था कि इस बरसात के मौसम में कही पिकनिक पर जाया जाए| इन्हीं सुझावों के आदान-प्रदान के बीच आदित्य ने अपने कम्प्यूटर में अपना मेल बॉक्स खोला| वह मेल की सूची देख ही रहा था कि एक मेल को देखकर वह रुका| वह मेल उसकी कंपनी के सोशल सर्विस टीम से आया था| उसने वह मेल पढ़ा उसमें  एक स्कूल के आगामी कार्यक्रम (एक्टिविटी) के बारे में लिखा था| मेल में सूचित की गई एक्टिविटी वे लोग आगामी  शनिवार को आयोजित (ओर्गानायिस) करने जा रहे हैं| यह एक्टिविटी बारामती गाँव में आयोजित होनी है| बारामती जो कि पुणे से लगभग एक घंटे की  दूरी पर है| आदित्य ने उस मेल के बारे में अपने अन्य साथियों को भी बताया| पहले तो उसके साथियों ने दूरी के कारण वहाँ जाने से मना कर दिया लेकिन उसके समझाने के बाद सब लोग वहाँ जाने के लिए तैयार हो गए|

अपने साथियों की हामी से वह बहुत खुश था| अगले दिन सभी लोग सुबह आठ बजे ऑफिस पहुँच गए|  सभी लोगों को ऑफिस में इकट्ठा होने के लिए इस लिए कहा गया था क्योंकि बारामती जाने के लिए कैब ऑफिस से ही जानेवाली थी| सभी लोग समय पर पहुँच गए थे थोड़ी देर बाद गाड़ी बारामती के लिए रवाना हुई| पुणे शहर से बाहर निकलते ही रास्ते में बरसात शुरू हो गई| इस बरसात के मौसम में पहाड़ी इलाका बहुत ही सुन्दर दिखाई दे रहा था| तभी राधिका ने अन्ताक्षरी खेलने का सुझाव दिया| उसका सुझाव सभी लोगों को पसंद आया| रास्ते में सभी लोग अन्ताक्षरी खेलते हुए करीब दो घण्टे के बाद बारामती जा पहुँचे| उन लोगों ने सोचा था कि उस स्कूल में जा कर सभी लोग बच्चो के साथ मौज मस्ती करेंगे| इसी मौज मस्ती में वे लोग भी अपने बीते दिनों को याद कर लेंगे| जैसे ही वे लोग स्कूल में पहुँचकर गाड़ी से उतरे| उन्हें वहाँ देखकर बच्चों के एक झुण्ड ने घेर लिया| बच्चे झुण्ड में जरूर आए थे पर सभी के सभी एक दम शांत खड़े थे| तभी आदित्य ने अपनी टीम के साथियों को छेड़ते हुए कहा – ‘सीखो इन बच्चों से  कैसे डिसिप्लिन में रहते हैं|’

आदित्य और उसके साथियों ने वहाँ पर खड़े सभी बच्चों से हेल्लो कहा पर बच्चों की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न पाकर उन्हें लगा शायद बच्चे उन लोगों से शरमा रहे हैं| उन लोगों ने उनसे हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया तो बच्चों ने भी अपना हाथ आगे बढ़ा दिया पर वे बोले कुछ नहीं| वे लोग उन बच्चों से बात करने की कोशिश कर ही रहे थे कि तभी उस संस्था की संचालिका पल्लवी वहाँ पर आ गई| उन्होंने आदित्य और उसकी टीम के सदस्यों का स्वागत सत्कार किया| पल्लवी से बातें करने के बाद उन्हें पता चला कि वे बच्चे जिनसे वे लोग बातें करने की कोशिश कर रहे थे असल में गूँगे और बहरे हैं| उन बच्चों के गूँगे – बहरे होने की खबर सुनकर वे लोग दंग रह गए| उन लोगों के मन में बच्चों के प्रति दया की भावना जागृत हो गई| यह सब देखकर पल्लवी समझ गई| उन्होंने बताया कि इन बच्चों को दया की नहीं, आप लोगों के प्यार और अपनेपन की जरूरत है| उन्होंने बताया कि वे और उनके कुछ साथी आस-पास के गाँवों में सर्वे करने जाते रहते हैं| आज जो वे लोग संस्था में इतने बच्चे देख रहे हैं यह सभी उनकी अपनी मेहनत और लगन का ही परिणाम कि वे इस प्रकार के बच्चों को एक छत के नीचे ला सकी हैं| 
हमारे समाज में इस प्रकार के बच्चों को परिवार के लोग बोझ समझकर घर के किसी एक कोने में छोड़ देते हैं| उन्हें हीन भावना से देखते हैं| ऐसे बच्चों के बारे में परिवार के लोग यही सोचते हैं कि ये लोग बड़े होकर भी भला क्या कर पायेंगे? ये सदैव उनपर बोझ बनकर ही जियेंगे| इसी सोच के कारण उनके माता-पिता उन्हें पढ़ने लिखने का कोई मौक़ा भी नहीं देते| कुछ देर स्कूल के ऑफिस में समय बिताने के बाद पल्लवी आदित्य और उसकी टीम के सदस्यों को स्कूल दिखाने के लिए ले गई| उस स्कूल में इस प्रकार के करीब तीस–चालीस बच्चे होंगे| रास्ते में जाते समय आदित्य ने कहा –
आदित्य -‘कितने मासूम हैं ये बच्चे देखकर लगता ही नहीं कि ये लोग बोल-सुन नहीं सकते’| आदित्य की इस बात के जवाब में पल्लवी ने कहा-
पल्लवी –‘हाँ ...पर ईश्वर .......कहकर वह रुक गई|’
उन्होंने एक कमरे की तरफ चलने का इशारा किया| उनके इशारे के आधार पर आदित्य और उनकी टीम  उनके साथ उस कमरे में जा पहुँची| उन्होंने देखा कि स्कूल के सभी बच्चे वहाँ पर बैठे आपस में अपने विचारों का आदान-प्रदान करके हँस-खेल रहे थे| जैसे ही उन्होंने आदित्य और उसकी टीम के लोगों को देखा वैसे ही वे लोग अपनी-अपनी जगह पर खड़े हो गए| बच्चों की इस मासूमियत ने आदित्य और उसकी टीम के सभी लोगों का मन मोह लिया| उन्होंने बच्चों को एक-एक करके चॉकलेट देना शुरू कर दिया| बच्चे चॉकलेट पाकर बहुत खुश थे|

बच्चों को चॉकलेट खाता देखकर उन्हें भी बहुत अच्छा लग रहा था| आदित्य बच्चों के बीच बैठा उनके साथ खेल रहा था| खेलते-खेलते उसकी नजर कमरे के बाहर एक पेड़ के नीचे बैठे पंद्रह-सोलह साल के लड़के पर पड़ी| उसने सोचा कि शायद वह इस स्कूल में काम करता होगा| उस लड़के को एकांत में बैठा देखकर वह उस बच्चे के पास गया| उसने उस बच्चे से बात करने और उसे चॉकलेट देने की कोशिश की लेकिन वह लड़का वहाँ से गुस्से में उठकर चला गया| लड़के के इस व्यवहार से आदित्य को बहुत बुरा लगा| वह वहाँ से उठकर फिर से उसी हॉल में जा पहुँचा जहाँ सभी लोग बैठे थे| वहाँ पर कुछ देर बच्चों के साथ समय बिताने के बाद वे लोग पल्लवी के साथ स्कूल देखने के लिए निकल पड़े| जब से आदित्य उस लड़के से मिला था| उस लड़के के इस प्रकार के व्यवहार से  अभी तक दुःखी था| वह दृश्य बार-बार उसकी आँखों के सामने आ रहा था| पल्लवी उस स्कूल की गतिविधियों की जानकारी देती हुई आगे चली जा रही थी| उनके पीछे-पीछे आदित्य और उसकी टीम के सदस्य चले जा रहे थे| चलते-चलते आदित्य की नजर फिर से उस लड़के पर पड़ी| जिसे उसने कुछ देर पहले उस पेड़ के नीचे देखा था| आदित्य उसके बारे में पूछने ही वाला था कि पल्लवी ने स्वयं ही उसके बारे में बताना शुरू कर दिया –
पल्लवी – पेड़ के नीचे बैठे उस लड़के को देख रहे हो| उसका नाम उदय है|
 
आदित्य – वह लड़का......बड़ा बत्तमीज है मैं उसे चॉकलेट देने गया था लेकिन न तो उसने  चॉकलेट ली और न ही मेरी बातों का कोई जवाब दिया ...........|
पल्लवी – नहीं ..नहीं वह तो बड़ा ही भोला-भाला मासूम लड़का है .......जैसे उसकी उम्र         बढ़ी है उस तरह से उसे शिक्षा भी नहीं मिल सकी| वह हमारे इसी स्कूल में कक्षा पाँच में पढता है| 
दस-बाहर साल के लड़के का कक्षा पाँच में पढ़ने की बात सुनकर आदित्य और उसके अन्य साथी चौक गए| उदय के विषय में पल्लवी ने आगे बताया कि -

पल्लवी – आप लोगों को लग रहा होगा कि वह किसी गरीब परिवार या किसी माध्यम वर्गीय परिवार से होगा उसके माँ –बाप उसकी परवरिश नहीं कर सकते होंगे इसी लिए उसे इस स्कूल में भर्ती करवा दिया है| ऐसा नहीं है वह एक अच्छे खासे खाते-पीते परिवार से है| उसके तीन भाई और दो बहनें है| यह सबसे छोटा है| इसके सभी भाई –बहन सामान्य है| इसके गूँगे-बहरे होने के कारण इसके माँ-बाप ने इसे स्कूल ही नहीं भेजा और ना ही कभी इसकी ओर कोई विशेष ध्यान दिया| उन्हें तो यही लगता है किस इसे पढ़ा-लिखाकर क्या करेंगे? कौन सा इसे नौकरी मिलेगी ....? उनके इसी एक विचार ने उदय की किस्मत का फैसला कर दिया|

पल्लवी उदय  की कहानी सुना रही थी तो लग रहा था जैसे इसी फिल्म की कोई स्क्रिप्ट पढ़ रही हो पर यह फिल्म नहीं जीवन की यथार्थ स्थिति थी| जिसे हम और आप कभी ना कभी कहीं ना कहीं होते हुए देखते रहते हैं| हमने भी न जाने कितने ही ऐसे बच्चों को देखा होगा पर कभी भी हमने उन बच्चों के साथ उस प्रकार का व्यवहार नहीं किया होगा जैसा कि सामान्य बच्चों के साथ  .......खैर छोडो इन सब बातों को .....हाँ तो हम उदय के बारे में बात कर रहे थे| उदय के गूँगे-बहरे होने के कारण उसके परिवार में उसके साथ दोहरा व्यवहार होता रहता था| हमेशा उसके भाई-बहनों को उससे ज्यादा अहमियत दी जाती थी| हर कोई उसे हीन भावना से देखता| मानों यह उसी की गलती है कि वह इस संसार में गूंगा–बहरा पैदा हुआ है| परिवार के लोगों ने कभी उसे समझने की कोशिश ही नहीं की, वह क्या चाहता है कभी यह जानने की कोशिश नहीं की| परिवार के इन्हीं  कटु अनुभवों के कारण वह इस प्रकार का चिड़चिड़ा सा हो गया है|

एक दिन जब पल्लवी उस गाँव में अपने कुछ साथियों के साथ सर्वे करने के लिए गई तो उन्हें उदय के बारे में जानकारी मिली| उसके माता-पिता पल्लवी के पीछे ही पड़ गए कि वह उदय को अपने साथ लेकर चली जाएँ| लेकिन पल्लवी ने पहले उदय की मर्जी जाननी चाही| उसने उदय से इशारों में बात करना शुरू किया| कुछ देर बात करने के बाद उस मासूम भोले बच्चे की आँखें जवाब देते-देते रो पड़ीं| जैसे उसने इस संसार में आकार कोई भारी गुनाह कर दिया हो| वह इधर-उधर देख लेता कि कहीं परिवार का कोई सदस्य उसे किसी अन्य व्यक्ति के सामने रोते हुए ना देख ले इसी आभास से कि कोई देख न ले उसने अपनी आँखों के आँसुओं को पोंछ लिया| पल्लवी ने उदय के साथ कुल दस मिनिट बात की होगी इन्हीं पाँच मिनिटों में न जाने उदय के मन में क्या जादू पैदा कर दिया कि वह पल्लवी के साथ बात करने लगा | शायद आज किसी ने उसके साथ इतने प्रेम से बातें कीं थीं| दूसरा यह कि पल्लवी को मूक-बधिरों की भाषा आती है| शायद इसी लिए उदय को उसपर विश्वास हो गया हो सकता है कि इतने वर्षों में जो घर-परिवार के लोग न कर सके वह पल्लवी के बातों ने कर दिया| वह उसे बहुत कुछ बताना चाहता था| शायद आज तक किसी ने उसकी चाह जानी ही नहीं और ना ही जानने की कोशिश की कि वह क्या चाहता है ....?पल्लवी उसकी मर्जी जान चुकी थी कि वह उस परिवार के साथ नहीं रहना चाहता| एक सप्ताह के बाद पल्लवी ने उदय को अपने स्कूल में ले आई|

यहाँ आकर वह खुश तो बहुत है पर यहाँ भी उसका कोई साथी नहीं है| जिसके साथ वह खेल सके अपने मन की बात कह सके इसी लिए वह सब बच्चों से अलग रहता है| ऐसा नहीं है कि वह छोटे बच्चों से प्रेम नहीं करता  उसे भी छोटे बच्चों के साथ खेलना-कूदना अच्छा लगता है पर कहीं लोग  उसकी उम्र के कारण उसका मज़ाक न उडाएं इसी लिए वह अलग-अलग रहता है| उदय के विषय में इतना जानकार आदित्य के मन में आत्मग्लानि का भाव.......एक पछताव सा महसूस हुआ| आदित्य ने एक बार उदय से मिलकर माफी मांगनी चाही पर वह मौक़ा न मिल सका .....| 

पल्लवी ने आगे बताया कि उदय को नाचने का बड़ा शौक है| वह बोल सुन तो कुछ सकता नहीं पर हाँ जो कुछ टी.वी. पर देखता है उसे देखकर अकेले में अभ्यास करता है| एक दिन उदय ने पल्लवी को बताया कि वह बड़ा होकर एक डांसर बनना चाहता है| इस प्रकार के बच्चों को कुछ भी सिखाना बहुत ही धैर्य का काम है और फिर इस प्रकार के बच्चों को सिखाने के लिए लोग बहुत ज्यादा फीस माँगते हैं| इतनी फीस हमारी संस्था वहन नहीं कर सकती|

सूरज ढलान की तरफ था| आदित्य और उसके साथी अब लौटने के लिए तैयार थे| जाने से पहले वे लोग सभी बच्चों से फिर से एक बार मिले| उनके मुस्कुराते चेहरे उन्हें अपनी ओर खीच रहे थे| जीवन में इतना सब कुछ ना होने पर भी ये बच्चे छोटी-छोटी खुशी पाकर कितने खुश हो जाते हैं| बच्चों से मिलने के बाद सभी लोगों ने पल्लवी और बच्चों से विदा ली और घर की ओर लौट चले| सुबह और शाम में बहुत अंतर आ चुका था| उनकी आँखों के सामने उन मूक बधीर बच्चों की छवी थी| जो जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन जीने की एक लौ खोज रहे हैं| सुबह तो सभी लोग हँसी-मज़ाक करते हुए, गाना गाते आये थे| किन्तु लौटे समय उनके मन में तरह-तरह के अनसुलझे प्रश्न थे| न जाने उदय और उदय जैसे लोगों को समाज में अपना अस्तित्व स्थापित करने के लिए और कितना कठिन परिश्रम करना होगा| ऐसा नहीं है कि इन बच्चों में हुनर की कमी है या ये कर नहीं सकते| इन बच्चों में हुनर और हौसलों की कमी नहीं बस इन्हें चाहिए समाज में एक सम्मानजनक स्थान और अपने हुनर को समाज के सामने रखने का समान अवसर|


    

Friday, June 15, 2012

पुस्तक समीक्षा



कहानी में ढलते मन के ऑटोग्राफ

कहानी वर्णन का विस्तार न होकर एक परिभाषा की तरह चुस्त दुरुस्त और नपी तुली होती है और अपने सीमित कलेवर में मन की गहराइयों को छू जाती है | कहानी का सम्बन्ध समग्र जीवन के विस्तार से न होकर इस विस्तार को नापते हुए कुछ पड़ाव और मील के पत्थरों से है और यह स्पष्ट है कि हर मील का पत्थर दूरी के बीच की  एक कड़ी है और है एक घटना जो हमें पैमाइश के संकेत देती है कहानी स्वतंत्र इकाइयों के रूप में प्रकट होकर सम्पूर्ण जीवन के विस्तार को बांचना सिखाती है |
       हर पल और हर पग पर कथा के लिए सामग्री और पात्र  बिखरे पड़े हैं प्रश्न केवल उसके चयन और फिर निश्चित  सँवारने का है कलाकार उस कथा स्थिति  को एक व्यव्धारा और गतानुगत रुपरेखा में बांधता है
शिव की कलम से ऑटोग्राफकेवल इस लिए नहीं है कि वे एक सौगात  मात्र है बल्कि इसलिए भी है कि जीवन में  उसकी भूमिकाहै | इस भूमिका में एक मुलाक़ात का भी बड़ा महत्व है क्योंकि यह मुलाक़ात ही आपको सखा देती है , मित्र देती है | आज के युग में मित्रता एक आधार भी है और चुनौती भी | चुनौती इस लिए कि मित्रता का आकर्षण” जितना लुभावना है , उससे गुजरते हुए,न होते हुए भी किसी का खडूस जैसा लगना और अपने मूक प्रेम में आदमी से अधिक जानवर को करीब पाना इस समय की सच्चाई भी है और सोच के लिए एक ठोस धरातल भी |
कहानी का घेरा बहुत बड़ा है और इस घेरे में कई पीढियाँ एक साथ काम कर रही है | यहाँ बूढी हड्डियाँ बिखर रही नैतिकता और सामाजिक मूल्यों की तलाशा में हैं तो वहाँ स्वार्थ के अंधेपन में लिपटी इस समाज व्यवस्था में ही अपनत्व और ममत्व तलाशती वो पीढ़ी भी है जिसे एक माँ ऐसी भी चाहिए जो उसके अपने प्रश्नों ना केवल उत्तर दे सके बल्कि उसका संबल बन सके | कोई श्यामा यानी धरती जैसी सब कुछ अपनी संतान के लिए सहने वाली | संयुक्त परिवारों के टूटने से बिखरते रिश्ते नातों की पहचान भी खत्म होती जा रही है न कोई ताऊ है , न ताई , न बुआ ,न काकी , परिवार की छोटी बहू अब मात्र किस्से कहानियों और टी.वी  सीरियलों की महत्वपूर्ण  पात्र हैं | कभी वह लाजो के रूप में दिखाई जाती है तो कभी उसका संबंधों की हत्या करता हत्यारा रूप हमारे सामने आता है आज संबंधों की सड़ांध से जो बास उठ रही है , वो दिखाई भी दे रही है और उसे महसूस भी किया जा सकता है | लेकिन सयाने उसे अधिक महत्व नहीं देते |
आज कहानी ने असीमित और अपरिमित सीमाओं को छुआ  है | क्या नहीं है जो हिंदी कहानी ने नहीं कहा, शोषण,उत्पीडन न्यायअन्याय , अवसरवाद, राजनीति, मूल्यहीनता ,स्वार्थपरता , एकांत  अनेकांत यानी इन बोलती हुई कहानियों में कोई एक केंद्र या विषय नहीं है बल्कि वो हर जगह और हर सवाल के सामने मौजूद है |
शिव का एक अर्थ है कल्याण , शिव की ये कहानियाँ समाज के लिए इसी कल्याण तत्व की वकालत करती है , लगभग प्रत्येक कथा के अंत में कथाकार एक विचारक और चिंतक की भूमिका लेता है और कुछ सवाल करता है , समस्या को रेखांकित करता है लेकिन  हर कथाकार की तरह शिव के पास भी समाधान नहीं हैं, बस प्रश्न हैं, और है अनुत्तरित प्रश्न श्यामा बूढी हड्डियाँ और बास तीनों ही कहानियाँ वृद्धों  के सामजिक स्थिति को रेखांकित करती हैं| ‘बूढी हड्डियाँ’ में एक पिताहै तो बास में नानी’ | क्या इसी दिन के लिए माँ बाप संतान चाहते है- और आज जो वे अपने बूढ़े माँ बाप के साथ कर रहे हैं कल बूढ़े होने का समय उनका है जैसे वाक्य हुबहू बागबान के अमिताभ के संवाद याद  दिला जाते हैं| इसका ये अर्थ कदापि नहीं है कि शिव की कहानियाँ किसी का reproduce है |
सच तो ये है कि आज के संबंधों का विस्तार सिमट कर एक ऐसे घेरे में आ गया है जहाँ माँ का व्यवहार भी  माता कभी कुमाता नहीं हो सकती के सत्य को उद्धारित करती है लेकिन सुमन के किरदार और उसके मुख से कहलवाए गए कुछ वाक्य भाई बहन के संवादों के बीच बहन के स्वाभाव से मेल नहीं खाते से जान पड़ते हैं यथा नहीं भैया  उस बेशरम  को अगर थोड़ी भी शर्म होती तो बोलती अपने बेटे को रोककर कहती ......|एक अन्य जगह यह संवाद भला बुढिया पढ़ नहीं सकती तो उसे इस बात की क्या जानकारी , और  आगे उन कमीनों ने ही यह सब करवाया है
कथाकार की तमाम हमदर्दी के बावजूद पाठक का सुमन के साथ वैसा सदभाव नहीं बन पाता और पाठक कहानी के बीच उन ठोस कारणों को नहीं पाता  जिस कारण माँ का व्यवहार इतना पराया , अपने बेटे के लिए हो गया हो |
शिव की इन कहानियों का आधार मध्यमवर्गीय, लेकिन मध्यमवर्गीय महत्वकांक्षा का चित्रण यहाँ नहीं है |अपने समय की बातें इन कहानियों में आयी हैं | ये कहानियाँ शिवकुमार राजौरिया की रचनात्मक अस्मिता का परिचय देती हैं | अनुभूति की तीव्रता और जीवन के ताप को वास्तविक सन्दर्भों से जोड़कर एक कथा संतुलन और कलात्मक समीकरण की यह प्रक्रिया शिव के एक संवेदनशील कथाकार होने की संभावना का दवा भी करती है  और इन कहानियों के माध्यम से उसकी दलील भी देती है |इस संग्रह की कहानियों में अपना एक विवेक और दायित्व बोध भी है जिसके चलते शिव विचार और मनुष्य के खिलाफ होने वाले षड्यंत्रों पर नजर रखते हैं अपने समय से मुठभेड़ करती इन कहानियों का रचनाकार एक सात्विक क्रोध से भरा है, पर किसी को भला बुरा कहता नहीं है बल्कि हर बार क्षोभ और दुःख से भर जाता है |
सौगातऔर आकर्षण जैसी कहानियाँ एक बार फिर समाज में बुजुर्गों की उपेक्षा की कहानियाँ हैं | ‘सौगात में बूढ़े बाप से सारी जायदाद हड़प कर उसे असहाय भटकने के लिए छोड़ देने वाला बेटा है तो आकर्षण में बूढ़े तन्मय का आकर्षण पोती कुहुकहै  बेटे राहुलऔर बहू टीनाकी उपेक्षा के बावजूद वो अपनी पोती के लिए अपने अपमान को नजरंदाज करते हैं | संग्रह की अधिकांश कहानियों में एक हताशा का भाव है जो समाज में व्याप्त उस वास्तविकता को भी हमारे सामने उपस्थित करता है, जिसमें नाते सम्बन्ध मात्र स्वार्थ की डोर से बंधे हैं |
एक मुलाकातऔर भूमिका’  जैसी कहानियाँ कड़वी स्थितियों  परिस्थितियों के बावजूद आशा को जगाती कहानियाँ हैं जिन में नए रास्तों की तलाश भी है और उनका हासिल भी | कहानी छोटी बहूभी ऐसे ही अपनी राह बनाने के प्रयास की कहानी है जहाँ एक स्त्री एक दिन अत्याचार के खिलाफ तनकर खड़ी हो जाती है, और अपनी सास और पति से लड़ती है किमेहनत यहाँ करती हूँ अगर उतनी मेहनत मैं कहीं भी करूंगी तो इज्जत की रोटी कमा ही सकती हूँ | तुम इसकी चिंता मत करो मैं बच्चों को वापस लेकर तुम्हारी चौखट पर पाँव भी नहीं रखूंगी|
भाषा वो माध्यम है जहाँ से कहानियाँ अपना अस्तित्व खोकर हम में रच बस जाती हैं | इन कहानियों में शैलीगत एकरूपता का आभास तो है ही कथ्य में भी बहुत बिखराव नहीं है | वर्णन और आत्मचिंतन शैली में पिरोई इन कहानियों में एक सुस्पष्टता फिर भी है कि ये कहानियाँ पाठकों से बतियाते हुए उनके भीतर प्रवेश करती हैं | लेखक का मैं पाठक का मैं बनता चला गया | शब्द बारीक धागे हैं , जिनके ताने बाने भी कुशलता से पिरोने होते हैं | शिव प्रयास करते है कि कहानी की बनावट में कोई फंदा न पड़े | सीधी सरल भाषा जिसमें बहुत जगह पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की लोक भाषा के माध्यम से भी उन्होंने अपने कथा चरित्रों को जीवन्त किया है |
शिव का यह कहानी संग्रह ऑटोग्राफहमारे मन पर उनके हस्ताक्षर हैं उनकी वेदना से हमारी संवेदना को मिलने के लिए | यूँ तो ऑटोग्राफ बहुत तकील है, विस्तारित है, संग्रह की सबसे लंबी कहानी है यह और कहानियों से थोड़ी अलग भी है | यह कहानी कॉलेज जीवन की कहानी है जहाँ अमित और उसके दोस्त हैं, निधि है ,माँ और छोटी बहन है , एम.बी.ए और नौकरी की तलाश और प्राप्ती है | बस इतना ही कि यह कहानी संग्रह वैयक्तिक अनुभव का रचनात्मक अनुभव में रूपांतरण है , अभी इसका दायरा और विस्तृत होगा | समय की रगों में बहती घटना ,स्थिति ,परिस्थिति को पकड़ने और पहचानने की क्षमता शिव के पास है और एक ईमानदार कलम भी .

शुभकामनाए


डॉ सुनील देवधर 

Tuesday, May 22, 2012

लत


सुनिल अपने जवान बेटे सुरेश की दिन प्रतिदिन बढ़ती माँगों से तंग आ चुका था  आए दिन किसी न किसी चीज के लिए पैसों  की मांग ने उसका जीना दूभर कर दिया था | बेटे के भविष्य को लेकर वह अकसर परेशान रहता था जवान बेटे से ज्यादा कुछ कह भी नहीं सकता था | आय का साधन मात्र दस बीघा ज़मीन थी जिस पर दिन रात मेहनत करके किसी न किसी प्रकार अपने परिवार का पालन पोषण कर रहा था | उसने सुरेश को अच्छे से अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवाया लेकिन सुरेश का मन कभी भी पढ़ने - लिखने में नहीं लगा | सुरेश अकसर पढ़ाई के नाम पर किसी न किसी चीज के लिए पिता से पैसों की मांग करता रहता | पिता भी यह सोचकर कि उसकी पढ़ाई में किसी प्रकार की रूकावट ना हो कहीं न कहीं से पैसों का इंतजाम कर देता था | सुरेश इन पैसों को  अपने दोस्तों के साथ मौज मस्ती में उड़ा देता | इसी तरह उसने पढ़ने –लिखने के बहाने  जीवन के दस साल बर्बाद कर दिए | उसने किसी न किसी  तरह कक्षा दस तक की पढ़ाई खत्म की | कक्षा दस की पढ़ाई के बाद सुनिल उसे आगे पढ़ाने में असमर्थ था इसीलिए उसकी पढ़ाई बंद करवा दी | 

पढ़ाई बंद होने के बाद सुरेश को पढ़ाई के नाम पर मिलने वाले पैसे भी बंद हो गए | सुनिल ने यह सोचकर उसकी पढ़ाई बंद करवाई थी कि अब वह बड़ा हो गया है, वह उसका खेती के कामों  में हाथ बटाएगा लेकिन ऐसा हो न सका.....| सुरेश की  दिन- प्रतिदिन पैसों की मांग के कारण घर में तू –तू मैं मैं  होने लगी |  जब सुरेश की मांग घर में पूरी नहीं होती तो उसने दोस्तों से पैसे उधर लेना शुरू कर दिया | इन पैसों से वह अपने शौक जैसे बीडी-सिगरेट , शराब पीना पूरे किया करता | अपने इन्ही शौकों  के कारण उसकी संगति दिन- प्रतिदिन खराब होती जा रही थी | धीरे –धीरे वह नशे का शौकीन होता जा रहा था | जब माँ –बाप को उसकी इन करतूतों की जानकारी मिली तो उनके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई | उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उनका लाल इस प्रकार ......माँ –बाप ने उसे बहुत समझाया लेकिन सब बेअसर साबित हुआ | उसकी इन आदतों के कारण अकसर घर में कलह होती रहती |

एक दिन वह घर से यह कह कर शहर चला आया  कि वहाँ जाकर नौकरी करेगा| शहर में आकर उसने अपने लिए एक नौकरी तलाश की कुछ ही दिनों में उसे एक किराने की दुकान में काम मिल गया | कुछ दिन तो उसने उस किराने की दुकान में काम किया लेकिन  मासिक वेतन  कम होने के कारण उसकी ज़रूरतें पूरी नहीं हो पाती थी जिसके कारण उसने वह  नौकरी छोड़ दी  और दूसरी नौकरी की तलाश में निकल पड़ा | कुछ ही दिनों में उसे एक दूसरी नौकरी भी मिल गई इस बार उसे नौकरी एक ज्वेलरी शो रूम  में मिली थी और  वेतन भी पिछली नौकरी की तुलना में अधिक था | यहाँ वह मन लगाकर काम करने लगा और अपनी मेहनत से जल्द ही एक कुशल कारीगर बन गया | सुरेश ने कुछ ही वर्षों में उस दुकान के मालिक संजय का विश्वास इस कदर जीत लिया था कि वह उसे अपने बेटे के सामान ही प्रेम करने लगा था और उसके भरोसे सारा शोरूम छोड़ जाता था  | धीरे –धीरे समय गुजरता गया सुरेश की पुरानी आदतें शहर में आकार और बढ़ गई थी | उसका खर्चा दिन –प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था  अपने ख़र्चों को पूरा करने के लिए उसने यहाँ भी अपने दोस्तों से उधर लेना शुरू कर दिया था | एक दिन कुछ कारणों से वह काम छोड़ कर दिल्ली चला गया |  यहाँ आकार उसने एक कपड़े के शोरूम में काम करना शुरू कर दिया |  

    दिल्ली में  काम करते हुए उसे कम से कम पाँच –छह महीने बीत गए | यहाँ भी वह ज्यादा दिन काम पर न टिक सका और एक दिन फिर उसी ज्वेलरी शोरूम  जिसमें वह पहले काम किया करता था के मालिक संजय से जाकर मिला और फिर से उसे काम पर रखने की याचना की | संजय उसके बारे में जानता था इसीलिए  उसने उसे काम पर फिर से रख लिया उसे तो यही लग रहा था कि वह तो उसका विश्वास पात्र व्यक्ति ही है | सुरेश यहाँ पर फिर से मन लगाकर काम करने लगा | संजय को उस पर पहले से ही विश्वास था इसी लिए वह अकसर शोरूम को उसके भरोसे छोड़कर अपने अन्य कामों के लिए चला जाता था | इसी तरह समय बीतता चला गया सुरेश को वापस काम पर आए हुए सात-आठ महीने हो चुके थे |

एक दिन संजय सुबह –सुबह  अपने घर पर सुबह की चाय पी रहे थे कि अचानक उनके साले ने फोन कर कहा कि उनके शोरूम में चोरी हो गई है और चोर सारे गहने और नगदी ले गए हैं |  शोरूम में चोरी की खबर सुनकर संजय के पैरों तले की जमीन खिसक गई वे चाय छोड़ कर सीधे शोरूम गए | शोरूम जाकर देखा तो उनके होश उड़ गए चोरों ने शोरूम ऐसे साफ कर दिया था जैसे किसी नए घर में झाड़ू लगा दी गई हो शोरूम में गहने और नगद रुपयों को मिलकर  कम से कम पचास लाख का सामन था | शोरूम में चोरी की शिकायत पुलिस स्टेशन  में दर्ज कराई | पुलिस ने उनकी शिकायत पर तुरंत कार्यवाही शुरू कर दी | शुरुआती जाँच में पुलिस का शक सुरेश पर ही गया क्योंकि जिस दिन से शोरूम में चोरी हुई थी उसी दिन से सुरेश वहाँ से गायब था और उसका सेल फोन भी बंद था |

इधर सुरेश अपने दोस्तों के साथ चोरी किए रुपयों से मौज –मस्ती में लगा था | उधर कई महीनों से अपने इकलौते जवान बेटे की कोई खबर न पाकर उसकी माँ का स्वास्थ्य खराब रहने लगा और इसी चिंता में एक दिन उसे  दिल का बड़ा दिल का दौरा पड़ा | माँ को पास ही कसबे के अस्पताल में  भर्ती करवाया गया | घरवालों ने उसे ढूंढने की बहुत कोशिशें की, उसके दोस्तों से पूछताछ की लेकिन सब कोशिशें नाकाम रहीं | घरवालों के पास उसका कोई पता ही नहीं था | उन्होंने उसके सेल फोन  पर फोन करने की बहुत कोशिश की लेकिन उसका सेल बंद था | एक तो दिल का दौरा उस पर से इकलौते बेटे की कोई खबर न पाकर  किसी अनहोनी की आशंका की चिंता में  उसकी माँ ने अस्पताल में ही दम तोड़ दिया | सुरेश की माँ का इस प्रकार इस संसार से चले जाना घर परिवार के लोगों के लिए एक ऐसा आघात था जिससे बाहर आने  में उन्हें न जाने कितना समय लग जायेगा  लेकिन जाने वाला तो चला गया पर अब घरवालों को सुरेश की चिंता सताने लगी कि आखिर वह है कहाँ .....|

इधर पुलिस को उसकी प्रारंभिक जाँच पड़ताल से पता चला कि सुरेश अपने  किसी दोस्त  के पास दिल्ली में रह रहा है | उन्होंने  उसे पकड़ने के लिए  एक योजना योजनाबद्ध तरीके से जाल बिछाया और  संजय से उसकी  तस्वीर लेकर दिल्ली के लिए रवाना हुई |  पुलिस को उसके सूत्रों से पता चला कि सुरेश एक ऐय्यास किस्म का व्यक्ति है और वह  डाँस बार में जाने का बहुत शौकीन है | पुलिस ने उसकी तस्वीर लेकर दिल्ली में बने सभी डाँस बारों, लॉजों  में जाकर पूछताछ की | इसी पूछताछ के दौरान पुलिस को सुरेश के किसी होटल में आने  के पक्के सबूत मिले | पुलिस उस होटल के मैनेजर से मिली और सुरेश के विषय में बताया और कभी भी सुरेश के उस होटल में आगे पर पुलिस को सूचना देने की कहकर वे लोग वहाँ से चले गए | दो- तीन  दिन के बाद होटल  मैनेजर का फोन पुलिस को आया उसने बताया कि सुरेश आज उनके होटल में ठहरा है | मैनेजर के फोन आने के तुरंत बाद उन्होंने होटल पर छापा मारा और सुरेश को गिरफ्तार कर लिया | 

 पुलिस  सुरेश को  गिरफ्तार करके  अपने साथ उसी शहर लेकर आ गई जहाँ उसने चोरी की थी| पुलिस ने जब उससे उस चोरी के विषय में पूछा  पहले तो उसने  शोरूम में चोरी के इल्जाम को सिरे से नकार दिया लेकिन पुलिस की सख्ती के आगे उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया | उसने पुलिस को बताया कि उसने अपने दो मित्रों  के साथ मिलकर चोरी करने का षड्यंत्र रचा था| उसने और उसके मित्रों ने कई महीनों पहले ही शोरूम के ताले की डुप्लीकेट चाबी तैयार करवा ली थी  और एक दिन मौका देखकर उस शोरूम के गहने और नगदी को लेकर चंपत हो गए |  पुलिस के यह पूछने पर कि इतने पैसों का उसने क्या किया इसके जवाब में उसने बताया कि कुछ पैसे तो उसने और उसके मित्रों ने इधर –उधर घूमने शराब पीने और डाँस बारों में लुटा दिए | एक दिन उन तीनों दोस्तों में इन्ही  पैसों को लेकर झगड़ा हो गया | झगड़े को खत्म करने के लिए  उन तीनों दोस्तों ने चोरी के  सामन को बराबर –बराबर तीन हिस्सों में बाँट दिया और सब अपना– अपना हिस्सा लेकर अपने- अपने रस्ते चलते बने | कुछ महीनों बाद  सुरेश अपना हिस्सा लेकर दिल्ली आ गया | वह दिल्ली तो आ गया लेकिन उसके सामने एक सबसे बड़ी समस्या चोरी के उन गहनों को छिपाने की थी जिन्हें अभी तक बेच नहीं पाया था | 

उसने पुलिस को बताया कि जब वह दिल्ली आया था उसके कुछ समय बाद उसकी मुलाकात एक बारबाला (बारगर्ल ) शबनम  से हुई | पहले वह कभी –कभी  बार में जाता था लेकिन जब से उसकी मुलाकात शबनम से हुई थी तब से वह रोज उस बार में जाने लगा | उसे शबनम से प्रेम हो गया था | उसने शबनम पर दिल खोलकर पैसे लुटाए | जब तक उसके पास पैसे थे  तब तक  वह शबनम पर पैसे लुटाता रहा यहाँ तक कि उसने अपने घर के अधिकांश गहने भी चोरी करके उन गहनों को  बेचकर शबनम  पर लुटा दिया  | जब शबनम पर पैसे  लुटाने के सभी रास्ते बंद हो गए तब उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर उस शोरूम में चोरी करने का प्लान बनाया था |  सुरेश की बातें सुनकर वहाँ पर खड़े संजय और उसके साले के तो होश ही उड़ गए कि कोई अपनी  ऐय्याशी के लिए इतना बड़ा धोखा भी कर सकता है | सुरेश ने जिस थाली में खाया उसी में छेद किया| पुलिस ने सुरेश की सहायता से उसके अन्य दोनों दोस्तों को भी पकड़ लिया और चोरी गए माल में से पच्चीस –तीस लाख रुपए का माल वापस लिया और सुरेश और उसके दोस्तों को जेल में भेज दिया ...|

   सुरेश की इस चोरी की खबर जब उसके पिता को चली तो वे भी इस बात से बहुत आहत हुए बेटे के जेल में होने की खबर से उन्हें एक सदमा बैठ गया और वे अपना मानसिक संतुलन खो बैठे| सुरेश के रिश्तेदारों ने उससे मिलने की बहुत कोशिश की लेकिन वे मिल न सके | सुरेश अपने अपराध की तीन साल की सज़ा काटकर जब घर लौटा और उसे घर में घटित घटना की जानकारी मिली तो उसके पैरों तले की जमीन खिसक गई |  पिता को अपने सामने एक मानसिक रोगी की तरह खड़ा देखकर भौचक्का रह गया |  अपने इस अपराध को लेकर वह अपनी ही नजरों में गिर गया | आज उसे अहसास हो रहा था कि उसकी इन बुरी लातों के कारण उसने जीवन में क्या खो दिया है ............