Followers

Wednesday, August 30, 2017

यतीम


आज मिस्टर मेहता का घर रोशनी से सराबोर था, हो भी क्यों ना उनके इकलौते बेटे विवेक  का विवाह जो है। सारा घर खुशियों से महक रहा था। विवेक अपना प्रेम विवाह जो कर रहा है।  पहले उसकी माँ सरला  इस बात के लिए राजी नहीं थी। उसे कतई पसंद नहीं था कि कोई और बिरादरी की लड़की उसकी बहू बनकर आए, लेकिन इकलौते  बेटे की खुशी के लिए  उसने  अपनी हामी भर दी। बेटे का ब्याह खूब  धूम धाम से किया। घर में बहू के आने से रौनक और बढ़ गई, बहू के आने से सरला को एक उम्मीद लगी कि अब वह अपनी सांसारिक जिम्मेदारियों को बहू को सोंपकर ईश्वर की भक्ति में लीन हो सकती है। बहू पढ़ी-लिखी थी शादी के कुछ समय बाद  से ही उसने नौकरी पर  जाना शुरू कर दिया।  वैसे तो घर में पैसों की कोई कमी नहीं थी, पिछले साल ही मिस्टर मेहता सरकारी नौकरी से रिटायर  हुए थे, रिटायरमेंट के समय काफी मोटी रकम मिली थी उन्हें। उन पैसों में से कुछ अपनी पत्नी के नाम जमा करवा दिये और बाकी के बेटे के अकाउंट में। रहने के लिए अपना घर, घर में किसी बात की कमी नहीं फिर भी बहू पैसे कमाने के लिए नौकरी पर जाये यह बात सरला को अच्छी नहीं लगती। इस बात का जिक्र उसने कई बार  मेहता जी से किया था लेकिन मेहता जी उसे हर बार समझाते हुए कह देते–“ देखो भाग्यवान अब हमारे तुम्हारे जैसा जमाना तो है नहीं कि पत्नी घर में आई और उसे सिर्फ घर गृहस्थी के चूल्हा- चौकों में झोंक दिया। अब जमाना बादल गया है, तुम भी अपनी सोच को बदलो”। पति की बातें सुनकर उसे भी लगता कि हाँ वे जो कुछ कह रहे हैं सही तो है।   
समय की गति के साथ चलते –चलते  आज बेटे की शादी को हुए पाँच साल गुजर चुके थे। इन बीते पाँच सालों में सरला पत्नी से सास बनी, सास से दादी। पिछले महीने  ही उसके घर में नन्हें कान्हा ने जन्म लिया था। कान्हा को पाकर दोनों पति पत्नी फूले नहीं समा रहे थे। अक्सर दादा दादी में कान्हा को लेकर बहस शुरू हो जाती कभी दादा कहते “इसके नाक नक्श बिलकुल विवेक जैसे हैं ....क्यों है ना? है ना ये  विवेक का दूसरा रूप “ इस पर दादी उन्हें चिढ़ाने के लिए कह देती –“अजी कहाँ हमारा  विवेक कहाँ यह कालू सा,  हमारा विवेक तो एकदम गोरा चिट्टा, गोल मटोल था और इसे देखो.....कहकर वो हंस देती। सरला की हंसी देखकर वे समझ जाते कि वो उन्हें चिढ़ाने के लिए यह सब बातें कह रही है। उनके परिवार को देखकर लगता था कि कितना सुखी परिवार है, छोटा परिवार सुखी परिवार।    
सरला की कमर अब झुक चुकी थी, पहले के समान अब उससे काम नहीं हो पाता। जीवन की इस अवस्था तक आते- आते हाथों की हथेलियाँ भी सख्त हो चुकी थीं।  जोड़ों के दर्द की तकलीफ तो वर्षों से लगी हुई है। आँखों पर मोटे–मोटे चश्में लग चुके थे, दो बार एक आँख के मोतियाबिंद  का  ऑपरेशन भी करवा चुकी थी। आज भले ही उसमें काम करने की वो फुर्ती नहीं जो वर्षों पहले हुआ करती थी किन्तु आज भी वह अपने बनाए नियम कानूनों का उसी तरह से पालन करती है। भले ही कितनी भी रात हो जाये जब तक वह स्वयं किचन में जाकर इस बात की तसल्ली न कर लेती कि  सिंक में कोई झूठा बर्तन तो शेष नहीं है तब तक चैन से नहीं बैठती। ऐसा नहीं था कि घर में काम करने के लिए नौकर नहीं लगा रखे थे । घर में हर काम के लिए एक नौकर लगा रखा था, कपड़े धोने से लेकर किचन में बर्तन साफ करने के लिए अलग नौकर आते थे। नौकर तो शाम तक के  बर्तन साफ करके चला जाता था। रात के खाने के बाद जो झूठे बर्तन बचते बहू उन्हें ऐसे ही छोड़कर अपने कमरे में सोने चली जाती। एक दो दिन तो उन्होने देखा, झूठे बर्तनों के विषय में  बहू से भी बात की  लेकिन हुआ कुछ नहीं।            
रातभर किचन की सिंक झूठे बर्तनों से भरी रहे  यह बात उन्हें  बहुत कचोटती थी। इसीलिए वह खुद ही इन बर्तनों को देर रात तक साफ करने में लगी रहती।  घर से बर्तनों की आवाज़ देर रात तक आती रहती। रसोई का नल भी चलता रहता। भले तारीख बदल जाए, उन्हें  किचन का सिंक साफ चाहिए।  इसके लिए भले ही कितनी भी देर तक काम क्यों न करना पड़े? बहू तो रात का खाना खाकर, किचन की कुछ औपचारिताएं निभाकर अपने कमरे में सोने चली जाती।  सरला को पता है उसके बेटे विवेक को बचपन से ताजा दही पसंद है। आज भी इन काँपते हाथों से गरम दूध  का पतीला उठा लेती है और उसे ठंडा भी करती है।  इस काम में उसकी उँगलियाँ नहीं जलती... दूध के ठंडे होने तक वह वहीं बैठती...उसे ठंडा होने पर उसमें जामन डालकर ही चैन की साँस लेती....अजी चैन की साँस कहाँ उसके नसीब में घड़ी सुइयां भी थक जाती होंगी लेकिन माँ थकती नहीं....थके भी कैसे वह माँ जो है। अपने परिवार की खुशियों का उसे सबसे ज्यादा ख्याल जो है।  देर रात तक बर्तनों की खटखटाहट से बहू –बेटे ही नींद खारब होती है।  बहू बेटे से कहती है.... “ तुम्हारी माँ को न खुद नींद आती है ना हमें चैन से सोने देती है, इन्हें तो रात मैं भी चैन नहीं पड़ता, प्लीज़ जाकर ये रोज़ –रोज़ के ढोंग बंद करवाओ कि  रात को सिंक खाली ही रहना चाहिए “।  पत्नी की बातें सुनकर बेटा माँ को समझाता है, पर माँ तो माँ है, बेटे की बातें सुनकर  मुस्कुरा देती है और झुकी कमर के सहारे अपने कमरे में सोने के लिए चली जाती है।  
 देर रात तक खड़े रहने के कारण उसकी कमर और घुटनों में दर्द होने लगता है।  इन सब कामों से निबटकर जब सोने अपने कमरे में जाती है तब उसे याद आता है कि  आज की दवाई तो ली ही नहीं .... फिर अपने माथे पर हाथ मारकर तकिये के नीचे रखी दवाई की शीशी से दवाई निकालती है और अपने मुँह में रखकर गटककर  पानी पी लेती है। पास ही मिस्टर मेहता जो कि अब तक एक पूरी नींद ले चुके होते हैं कहते हैं – “आ गई “
अपने दुबले –पतले पैरों को सहलाते, दबाते  हुए सरला जवाब देती है – “ हाँ, आज वैसे भी किचन में कोई ज्यादा काम तो था नहीं ।“       
मिस्टर मेहता को भी पता था कि किचन में काम था कि नहीं । वे भी सरला का उत्तर सुनकर करवट बदलकर फिर से अपने सपनों की दुनियाँ में लौट जाते हैं। उनके करवट बदलकर सो जाने के बाद सरला पलंग पर बैठी –बैठी अपने पैरों की, घुटनों की  तेल से मालिश करने में लग जाती है।  जो इतनी  देर खड़े रहने के कारण थककर चूर– चूर हो चुके थे। कुछ देर पैरों की मालिश करने के बाद बिस्तर पर लेट जाती है। लेटे –लेटे उसे कल सुबह की चिंता होने लगती है।  बेटे को क्या पसंद है ...क्या नहीं वह बखूबी जानती  है।  बेटे और परिवार की खुशियों का ध्यान रखते- रखते ही  जीवन व्यतीत हो गया।
चार साल बाद –
मिस्टर मेहता एक साल पहले इस संसार को छोड़कर बिदा हो चुके थे। अब सरला इस संसार में अकेली रह गई थी। मिस्टर मेहता के जाने के बाद से ही  घर की परिस्थितियाँ भी बदल चुकी थी। सरला के हाथों से घर की सत्ता उसकी बहू के हाथों में जा चुकी थी। सरला अपनी आँखों के सामने अपने बनाए नियम कानूनों  को टूटते नहीं देख पाती जिसके कारण आए दिन घर में सास बहू का गृह युद्ध होने लगा। सास बहू के इस युद्ध से विवेक भी तंग आ चुका था। उसने अपनी माँ को कई बार समझाया कि अब वो घर गृस्थी के कामों में अपनी टाँग  न अड़ाए। बेटे की बातें सुनकर उसका मन और आहत हो जाता। घर के झगड़ों  का असर उसके पूरे परिवार पर पड़ने लगा। आखिर एक दिन उसने इस समस्या का समाधान खोज ही लिया। क्यों न माँ को वृद्धाश्रम भेज दिया जाए? विवेक का उपाय उसकी पत्नी को भी पसंद आया। अगले ही दिन सरला को वृद्धाश्रम छोड़ने के लिए विवेक उसे लेकर वहाँ पहुँच गया। सरला वृद्धाश्रम देखकर समझ गई कि उसका लाल उसे इस आश्रम में छोड़ने आया है।  वह पढ़ीलिखी तो थी नहीं पर वहाँ के माहौल को देखकर ही समझ गई, उसे वह जगह भी कुछ जानी पहचानी सी  लगी। उसने तब भी विवेक से कुछ नहीं कहा जब वह उसे छोड़कर जाने लगा जाते समय बस उसने इतना ही कहा कि “अपना और बच्चों का ख्याल रखना” कहकर आश्रम के अंदर चली गई।              
विवेक बूढ़ी माँ  को वृद्धाश्रम  में छोड़कर वापस अपने घर खुशी खुशी लौट रहा था कि तभी उसकी पत्नी का फ़ोन आया  उसने कहा “अपनी माँ को ये भी कह दो कि त्योहारों पर भी घर आने की ज़रूरत नहीं । अब वे वहीं सुकून से रहें और हमें यहाँ सुकून से जीने दें”। 
पत्नी की बातें सुनकर विवेक  वापस मुड़ा और उस वृद्धाश्रम  में गया जहाँ अभी- अभी अपनी बूढ़ी माँ को छोड़कर वह खुशी–खुशी लौटा था। यहाँ आकर उसने देखा कि उसकी माँ वृद्धाश्रम के मैनेजर के साथ खुशी–खुशी बातें करने में व्यस्थ थी। वे दोनों ऐसे बैठे बातें कर रहे थे जैसे वर्षों से एक दूसरे को जानते हों।  यह देखकर बेटे ने मैनेजर से पूछा “सर  क्या आप इन्हें जानते हैं ?”।
मैनेजर ने उसकी तरफ एक नज़र देखा और एक ठंडी  साँस के साथ –“हाँ” कहकर वह चुप हो गया ।
हाँ सुनकर बेटे ने फिर एक और सवाल दाग दिया– “आप इन्हें जानते हैं ? पर आप इन्हें किस तरह और कब से जानते हैं” ?
इस बार मैनेजर के चेहरे पर एक अजीब से मुस्कुराहट थी।  उसने जवाब दिया जिसे सुनकर बेटे के पैरों तले की ज़मीन खिसक गई। मैनेजर ने मुस्कुराते हुए  कहा -“ आज से तीस साल पहले इस जगह पर ये वृद्धाश्रम नहीं, एक यतीमखाना हुआ करता था।  तभी मेरी मुलाकात इनसे और इनके पति से हुई थी”। 
यतीमख़ाने का नाम सुनकर विवेक चौक गया – “ यतीमखाना और यहाँ ”?
मैनेजर –“ हाँ ! यहाँ पहले यतीमखाना ही  हुआ करता था। मुझे आज भी वो दिन अच्छी तरह से याद  है  जिस दिन ये अपने पति के साथ  यहाँ से एक यतीम  बच्चे  को गोद लेकर गयी थीं। उस यतीम के सिर पर अपनी ममता का आँचल रखकर उसकी बदकिस्मती दूर की थी, उसे एक नाम और पहचान दी”। इतना कहकर मैनेजर वहाँ से चला गया। इससे पहले कि वह माँ से इस विषय में  कुछ कहता या पूछता माँ भी वहाँ से जा चुकी थी। इस समय उसके दिलो दिमाग में एक ही शब्द गूँज रहा था यतीम....यतीम...। वर्षों पहले जिस दाग को उसकी माँ ने अपने आँचल से पोंछकर साफ कर दिया था, आज उसी माँ को अपने निजी स्वार्थ के कारण  वृद्धाश्रम में छोड़कर  खुद को पुनः यतीम कर लिया ..... 

      

7 comments:

  1. नमस्ते डॉ शिवकुमार राजौरीया जी,

    काफी लंबे अरसे बाद आपकी ब्लॉग पर पुनः वापसी हुई है, प्रसन्नता हुई.

    कहानी काफी अच्छी लिखी है आपने, वही हमेशा से चली आ रही माँ बाप को वृद्धाश्रम छोड़ कर आने की दास्तां लेकिन अंत में जो आईना आपने इस बेटे को दिखाया है वह मुझे काफी हद तक पसंद आया. किसी के सच्चे प्यार की कद्र नहीं होती है इंसानो को.

    बधाई.. इस रचना के लिए

    और अच्छी रचनाओं की प्रतीक्षा में....

    अमित अनुराग हर्ष

    ReplyDelete
  2. Hi Sir,

    Good to see you back. Very nice story. Thank you Shubhangi

    ReplyDelete
  3. Dear Shiva sir, I liked this story and written nicely. I hope to read more stories by you.

    Best luck
    Upendraa

    ReplyDelete
  4. Dear sir jee,

    Hope you are doing well. It's good to read this story and telling a fact of life. You have showed the other side of it too which makes this story more impact full.

    Kudos to you.

    Thanks and congrats for this story

    Regards,
    Tanmay Tiwari

    ReplyDelete
  5. Really Touching sir!!

    Keep Going.. :)

    ReplyDelete
  6. अमित जी, शुभांगी जी, उपेंद्र जी, तनमय जी, राधिका जी, और विवेक जी आप सभी ने अपना अमूल्य समय कहानी पढ़ने के लिए दिया, आपके समय और आपके प्रोत्साहन के लिए आप सभी का बहुत -बहुत आभार।
    धन्यवाद

    ReplyDelete

Gadget

This content is not yet available over encrypted connections.

Gadget

This content is not yet available over encrypted connections.