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Monday, November 22, 2010

आकर्षण

       राहुल एक सॉफ्टवेयर कम्पनी में  उच्च आधिकारिक पद ( प्रेसिडेन्ट) के पद पर कार्यरत है और उसकी पत्नी  टीना एक फैशन मॉडल । इन दोनों की जोड़ी एक सुखी सम्पन्न विवाहित जोड़ी है। राहुल ने कम उम्र में ही वो  तरक्की ,कामियाबी हासिल कर ली है जिसे पाने के लिए अक्सर लोगों की आधी उम्र बीत जाती है। राहुल ने यह तरक्की अपने बलबूते पर ही हासिल की है। दोनों का वैवाहिक जीवन और व्यवसायिक जीवन बड़े सुख से साथ बीत रहा है। राहुल और  टीना की तस्वीरे अक्सर अखबारों में छपती रहती हैं । असल में राहुल एक मध्यमवर्गीय परिवार से है, आज राहुल के पास वह सब सुख - सुविधाएं  है जिसकी उसने कभी  कल्पना भी न की  थी। राहुल के माता पिता का स्वर्गवास बचपन में ही हो गया था जब वह मात्र दस साल का था । राहुल का पालन पोषण उसके ताऊजी तन्मय ने किया था । तन्मय ने राहुल को कभी भी माता -पिता की कमी महसूस नहीं होने दी । उसे अपने बच्चे के समान ही पाला पोसा और उसकी शिक्षा का पूरा ख्याल रखा उसे कभी भी किसी चीज की कमी नहीं होने दी । राहुल के ताऊजी एक सड़क हादसे में  अपने दो बच्चों को खो चुके थे । इसी लिए उन्होंने राहुल को अपने सगे बच्चों से भी ज्यादा प्यार किया । 

   तन्मय की पत्नी का निधन दो साल पहले ही हो चुका था। आज बूढ़े तन्मय के जीवन मे राहुल ,टीना और उनकी पाँच साल की बेटी कुहुक के अलावा कोई नहीं । राहुल की बेटी कुहुक बड़ी ही प्यारी बच्ची है उसे देखकर ऐसा लगता है जैसे मानो सामने कोई बार्बी गुड़िया खड़ी हो मासूम सा  हँसमुख चेहरा किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। राहुल के ताऊजी गाँव में रहते हैं । ताऊजी अक्सर उनसे मिलने शहर ही आ जाते और कुछ समय बच्चों के साथ हँसी-खुशी बिताकर चले जाते ।  ताऊजी कुहुक से मिलकर सब कुछ भूल जाते  छोटी बच्ची के साथ वे भी बच्चे बन जाते । कुहुक के साथ खेलते कभी घोड़ा बनते कभी बंदर तरह तरह से कुहुक के साथ हँसते -खेलते रहते  एक दिन, दो दिन किस प्रकार से बीत जाते उन्हें पता ही नहीं चलता । कुहुक के साथ बिताया हर एक लम्हा वे जी भर कर जी लेना चाहते थे ।

धीरे - धीरे समय बीतने लगा अब तन्मय और अधिक बूढ़े हो गए हैं । उन्हें टी. बी की बीमारी हो गई है और साथ ही साथ बुढ़ापे के अन्य रोगों  ने भी उन्हें घेर लिया है। तन्मय का इस संसार में राहुल और उसके परिवार के अलावा कोई नहीं है जिसे वह अपना कह सके । टी. बी. की बीमारी और बुढ़ापे की अन्य बिमारियों के कारण तन्मय काफी कमज़ोर हो गए है । इसी लिए राहुल उन्हें गाँव से अपने साथ शहर ले आया हैं ।
 एक दिन राहुल अपने ताऊजी को डॉक्टर के पास चैकप के लिए लेकर गया उसके साथ उसकी पत्नी और बेटी कुहुक भी गए थे । डॉक्टर ने तन्मय का चैकप किया । डॉक्टर ने उन्हें बताया कि तन्मय जी की टी. बी. की बीमारी अब अंतिम स्तर पर है, वे ज्यादा से ज्यादा दो साल तक ही जी सकते हैं । यह सुनकर तन्मय थोड़ी देर के लिए शांत बैठे रहे और फिर हँसते हुए डॉक्टर से बोले – ‘डॉक्टर साहब दो साल तो बहुत होते हैं , उससे ज्यादा जी कर भी मैं क्या करुँगा ।’

 जब वे लोग डॉक्टर के यहाँ से चलने लगे तब डॉक्टर ने राहुल को एकांत में बुलाकर बताया कि – ‘देखिए  मिस्टर राहुल आप तो जानते ही हैं कि आपके ताऊजी को टी. बी. की बीमारी है । आप यह भी जानते हैं कि टी. बी. की बीमारी एक प्रकार से छूत की बीमारी है। इसी लिए मैं आपको सलाह देता हूँ कि आप अपने ताऊजी के संपर्क में ज्यादा न रहें । मैं यह नहीं कह रहा कि आप उनकी देखभाल न करे पर थोड़ी सावधानी बरतने की जरूरत है । आप समझ गए न कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ........।’
‘जी डॉक्टर साहब’ - राहुल ने कहा।
राहुल वहाँ से चला तो बार - बार यही सोच रहा था कि अब वह क्या करे  ताऊजी को कहाँ रखे ? यही सोचते - सोचते घर आ गया वह इसी कश्मकश में था कि अब वह क्या करे  और क्या न करे? राहुल को उदास देखकर उसकी पत्नी ने पूछ ही लिया कि आखिर बात क्या है ? जब से डॉक्टर के पास से आए हैं आप काफी उदास हैं क्या बात है?
राहुल ने बताया कि डॉक्टर ने कहा है कि –‘ताऊजी की देखभाल की ज्यादा आवश्यकता है और वैसे भी उन्हें टी. बी. की बीमारी है सो तुम तो जानती ही हो कि टी. बी. एक प्रकार से छूत की बीमारी है । इसलिए ताऊजी को अलग रखना होगा । वैसे भी हम लोग उन्हें ज्यादा समय नहीं दे पाते ।’
टीना ने राहुल से कहा कि ‘तो अब क्या किया जा सकता है ? पर कुछ न कुछ करना तो होगा ही क्यों न  ताऊ जी को किसी वृद्धाश्रम रूपी केयर सेन्टर में भेज दें।’
राहुल – ‘ख्याल तो अच्छा है पर……..पर ताऊजी मानेंगे क्या ?’
‘अगर ताऊजी नहीं माँनेगे तो क्या तुम ताऊजी को यहीं रखोगे?’ - टीना ने गुस्से से कहा।
राहुल – ‘अच्छा ठीक है ताऊजी से बात करते हैं।’ 
‘अब तुम ताऊजी से बात करो या न करों पर ताऊजी यहाँ नहीं रह सकते ।’ टीना ने कहा।
राहुल –  ‘अच्छा ठीक है ! मैं कल सुबह ताऊजी से बात करुंगा ।’
सुबह का समय था । तन्मय सुबह की सैर करके वापस लौटे टीना ने उन्हें चाय लाकर दी और इशारे से राहुल को उनसे बात करने को कहा।
राहुल ने ताऊजी से  इस विषय में बात करते हुए कहा – ‘ताऊजी हम लोग अपने कामकाज की वजह से आप की बराबर सेवा नहीं कर पाते । हमने अर्थात मैंने और आपकी बहु टीना ने सोचा कि क्यों न आप को वृद्धावस्था रुपी केयर सेन्टर में रखें । वहाँ पर आप की बराबर देखभाल भी हो सकेगी, वहाँ पर देखभाल करने के लिए चौबीसो घंटे कोई न कोई आपके पास रहेगा।’
तन्मय ने राहुल को समझाने की बहुत कोशिश की कि वह उसे वृद्धाश्र न भेजे वह यही रहकर अपनी बाकी के जीवन को जीना चाहता है, वैसे भी उसके जीने के ज्यादा से ज्यादा  दो साल ही तो बचे है ।
किन्तु राहुल और टीना ने तन्मय को यह कहकर मना लिया कि  महिने के पहले रविवार को वे उनके पास आकर पूरा दिन बिता सकते हैं ।
तन्मय का वृद्धाश्रम में जाने का बिल्कुल भी मन नहीं था फिर भी उन्होंने ना चाहते हुए भी वहाँ जाने की हामी भर दी । अगले ही दिन राहुल अपने ताऊजी को एक वृद्धाश्रम में छोड़कर आ गया । तन्मय यहाँ बच्चों की खुशी के लिए आ तो गए किन्तु उनका मन कुहुक में ही लगा था रह -रहकर उन्हे कुहुक की याद आती उसकी वे मीठी-मीठी बातें याद आती जो वह उनसे करती थी । यहाँ आए हुए तन्मय को महिना होने जा रहा था किन्तु राहुल ने एक दिन भी उनकी खैरियत जानने के लिए न तो कोई फोन किया और न ही खुद उन्हें देखने आया । तन्मय अक्सर एकांत में बैठे -बैठे  कुहुक  के विषय में सोचते रहते कि अब वह क्या कर रही होगी? उसने खाना खाया होगा कि नहीं ? अभी स्कूल से आई होगी कि नही ? आदि बातें।
एक दिन तन्मय पेड़ की छाँव में बैठे कुछ कर रहे थे कि उन्हें अचानक ह्रदयाघात (हार्डअटैक) हुआ केयर सेन्टर वालों ने उन्हें अस्पताल भिजवाया उनका पूरा इलाज करवाया लेकिन राहुल और उसका परिवार उन्हें देखने तक नहीं आया । दो दिन के बाद अस्पताल से उन्हें छुट्टी मिल गई वे फिर से वृद्धाश्रम वापस लौट आए ।  एक दिन तन्मय अपने कमरे में लेटे हुए थे उन्होंने दीवार पर टंगे कलैंडर को देखा उन्होने देखा कि कल तो महिने का पहला रविवार है। उन्हें याद आया कि महिने के पहले रविवार को तो उन्हें अपने बेटे - बहू से मिलने जाना है। बहु  -बेटे उसका इंतजार करेगे । कल राहुल से मिलने जाना है यह सोचकर उन्हें रात भर नींद ही नहीं आई उन्हें लग रहा था कि यह रात आज क्यों इतनी लंबी हो गई है? खत्म होने का नाम ही नहीं लेती । आखिरकार  सुबह हुई तन्मय जल्दी -जल्दी वहाँ जाने के लिए तैयार हो गए ।

सुबह के आठ बजे होंगे वे राहुल के पास जाने के लिए निकलने ही वाले थे कि तभी  वहाँ पर वह नर्स आ गई जो उनकी देखभाल करती है । उन्होंने नर्स को बताया कि आज वह  अपने बहु - बेटे से मिलने के लिए घर जा रहे हैं।  नर्स को उनके स्वास्थ्य के बारे में पता था उसने उन्हें आज अपने बेटे के पास न जाने की सलाह देते हुए कहा – ‘अंकल जी आप आज न जाए तो अच्छा होगा क्योंकि अभी आप पूरी तरह से ठीक नहीं है।’  नर्स ने उन्हें ह्रदयघात और पिछली रात की तकलीफों को याद करा कराकर रोकने की बहुत कोशिश की पर वह नाकाम रही ।
तन्मय ने यह कहकर नर्स की बातों को टाल दिया कि मेरा बेटा, बहु मेरी राह देख रहे होंगे। फिर कुहुक से मिले उसे देखे हुए आज पूरा एक महिना हो गया है। उन्हें कुहुक से मिलने की बेचैनी होने लगी । आज ऐसा लग रहा था मानो उनमें कोई चमत्कारिक शक्ति आ गई हो। वे सोचने लगे कि अगर आज वह नहीं गया तो बेटा ,बहु को कितना बुरा लगेगा वे जरूर उसकी राह देख रहे होगे..........।
यह कहकर वे वहाँ से चल दिए । बाहर आकर उन्होंने बस पकड़ी और किसी न किसी तरह राहुल के पास जा पहुँचे । उन्हें वहाँ पहुँचते - पहुँचते दोपह हो गयी थी। घर पहुँचकर  देखा कि राहुल अपने काम में व्यस्थ है और बहु अपने कामों में व्यस्त । दोनों ने नमस्ते करने की औपचारिकता निभाई और अपने अपने कामों में लग गए । तन्मय बाहर हॉल में एक सोफा पर जाकर बैठ गए । घर के नौकर ने एक गिलास पानी और एक कप चाय लाकर तन्मय के सामने रख दी ।  उनकी आँखे रह - रहकर कुहुक को खोज रही थी । वे कभी इधर देखते तो कभी उधर लेकिन उन्हें कहुक कहीं नज़र नहीं आ रही थी । वे राहुल से कुहुक के विषय में पूछने ही वाले थे कि अचानक  धड़ की आवाज हुई और बैठक का दरवाजा जो बगीचे की तरफ खुलता है खुला और वहाँ से कुहुक मिट्टी में लथपथ उन्हें नज़र आई । इस एक महिने में तन्मय बीमारी के कारण इतने बदल गए हैं कि कहुक अपने दादा जी को पहचान न सकी । कुहुक के हाथों में फ्राक पहनी एक गुड़िया थी जिसे वह अपने दोनों हाथों में उठाए हुए थी ।  जैसे ही कुहुक ने तन्मय को देखा तो वह वही पर रुक गइ और उस वृद्ध सज्जन को घूर -घूर कर देखने लगी ।  फिर एक छोटी सी मुस्कान दी और घर के अंदर जाने लगी । तन्मय सोफे से उठे और उसे अपनी गोद में उठाकर सीने से लगा लिया । फिर बोले अरें  बेटा पहचाना ….. पहचाना ......?
 कुहुक ने मासुमीयत से अपना सिर हिलाते हुए ना कह दिया । 
‘अरे! बेटा मैं तम्हारा दादा , लो एक ही महिने में भूल गई ।’
तभी राहुल का हॉल में आना हुआ ताऊजी की बातें  सुनकर उसने कहा- ‘ताऊजी आप बीमारी के कारण इतने कमजोर हो गए हो कि पहचान में ही नहीं आते । शायद इसी लिए कुहुक आप को पहचान न सकी ।’ 
राहुल हॉल में रखी अपनी फाइल को लेकर वापस अपने कमरे में चला गया ।
इधर कुहुक अपनी गुड़िया को अपने पीछे छिपाते हुए तन्मय से बोली - दद्दू।
‘आप बूढ़े हैं।’
तन्मय ने कुहुक में मन में उठे हुए भावों को देखते हुए कहा – ‘हाँ बेटा मैं बूढ़ा हूँ।"
कुहुक ने फिर पूछा –‘बहुत - बहुत बूढ़े  ........।’
हाँ बेटा  कहते हुए तन्मय ने हामी भरी।
कुहुक की आँखों में एक उत्साह सा दिख रहा था , उसकी मासूस सी बातेंे सुनकर उन्हें अच्छा लग रहा था। तन्मय मन ही मन सोचने लगे कि कितने मासूम होते है ये बच्चे ..........?
तभी कुहुक ने कहा आपके पास तो सिर्फ दो साल ही बचे हैं  ।
दो साल .......?. तन्मय कुछ समझ नही पाए , उन्होने कुहुक से पूछ लिया कि बेटा किस के दो साल ...?
‘आप के पास सिर्फ दो साल ही तो बचे हैं, फिर आप मर जाओगे ........?’
तन्मय -‘आपसे ऐसा किसने कहा  कि मेरे पास  सिर्फ दो साल बची हैं?’
‘किसी ने नहीं’  …....कुहुक ने कहा।
तन्मय -‘फिर आप को कैसे पता कि आपके दादा जी के पास सिर्फ दो साल ही बची हैं।’
कुहुक -‘मैंने मम्मी के कैलन्डर में देखा है, था मम्मा ने कैलेन्डर में एक जगह मार्क करके रखा है ।’
तन्मय -‘कोई बात नहीं बेटा .......दो साल तो बहुत होते हैं । वैसे भी अब  मैं  बहुत बूढ़ा जो हो चुका हूँ और ज्यादा जीकर क्या करुँगा?’
कुहुक ने बड़ी मासूमियत से अपने दद्दू से पूछा।  ‘अच्छा तो सभी बुढ्ढें लोग दो साल ही जीते हैं ................।’
कुहुक की मासूम बातों को सुनकर तन्मय का गला भर आया और उन्होंने कुहुक को सीने  से लगाते हुए कहा नहीं बेटा सभी बूढ़े दो साल नहीं जीते यह तो भगवान के हाथों में है कि वह पहले किसे बुलाएगा उसे ही पहले इस संसार को छोड़कर भगवान के पास जाना होता है ।
कुहुक -‘अच्छा तो आप भगवान जी के पास जाएंगे.......?’
तन्मय -‘हाँ बेटा पता नही कब भगवान का बुलावा आ जाए ........और मुझे जाना पड़े....।’
तो मैं भी आपके साथ भगवान जी के पास चलुँगी, मुझे भी भगवान जी से मिलना है  -कुहुक ने कहा।
नही ,  नहीं  बेटा तू जिए हजारो साल .......मेरे बच्चे फिर कभी ऐसी बात न करना । कहते हुए उनका गला भर आया ,आँखों से आँसुओं की बूँदे गिरने लगी।
कुहुक –‘पर क्यों दादा जी।’
तन्मय -‘भगवान जी केवल बूढ़े लोगों को ही अपने पास बुलाते है ।...... बच्चों से तो वैसे  भी भगवानजी प्यार करते हैं ।’
इधर दादा - पोती आपस में बातें कर रहे थे ।
वही अंदर राहुल और टीना यह सोच रहे थे कि ताऊजी को किस प्रकार जल्दी से जल्दी वापस वृद्धाश्रम भेजा जाए क्योंकि आज उन्हें एक पार्टी में शामिल जो होना है । उस पार्टी में शहर की नामी  गिरामी हस्तियाँ शामिल होने वाली हैं । वहाँ पर उन दोनों का पहुँचना बहुत ज़रुरी है । 
टीना – ‘अब क्या करे इन्हें भी अभी ही आना था। अगर आज नहीं आते तो क्या हो जाता?’
राहुल – ‘कोई बात नहीं ….. थोड़ी देर रुको वे अपने आप ही चले जाएंगे।’
टीना – ‘अगर नहीं गए तो हमारी तो पार्टी खराब हो जाएगी , तुम्हें पता है ना कि आज  वहाँ पर शहर की नामी गिरामी हस्तियाँ आने वाली हैं। अगर हम वहाँ नहीं गए तो लोग तरह - तरह के सवाल करेंगे  । क्या कहोगे लोगों से कि............?’
राहुल – ‘ओह हो ! डार्लिंग  छोड़ो भी यह सब देखते है क्या कर सकते है । तुम गुस्सा थूक दो । तभी राहुल ने घड़ी की तरफ देखा तो चार बज चुके थे । अरे ! यार ऑलरेडी चार बज चुके हैं अब क्या करे ? क्या कहें इनसे ? क्या बहाना बनाए ? तुम तो जानती ही हो कि ये बड़े -बूढ़े लोग कितनी जल्दी किसी भी बात का बिना सोचे समझे बुरा मान जाते  हैं । ताऊजी आधा सेकेंड में भांप जाएंगे कि हम उन्हें यहाँ से भगाने की फिराक में हैं । इस बात को वे कभी भी माँफ नहीं करेंगे । मैं न तो उन्हें दोष दे सकता हूँ ,और न ही इस वक्त उन्हें यहाँ बर्दास्त कर सकता हूँ।’
टीना – ‘फिल हाल तो किसी न किसी तरह इन्हें यहाँ से जाने के लिए मनाना होगा। पता नहीं हमें वहाँ पर कितनी देर लगेगी हो सकता है रात को ज्यादा देर हो जाए ।’


तन्मय बाहर बैठे- बैठे कुहुक के बारे में ही सोच रहे थे कि कितनी मासूम है यह बच्ची , कितना मासूम होता है बच्चों का मन । इसी समय राहुल और टीना की कानाफूंसी बन्द हो गयी और वे दोनों अपने कमरे से बाहर निकलकर बैठक में आ गए जहाँ  ताऊजी बैठे थे।  दोनों के चेहरे पर बनावटी हँसी साफ देखी जा सकती थी । दोनो पास ही रखे अलग सोफो पर बैठ गए । टीना उनके बिना कुछ बोले ही सफाई देने लगी – ‘ताऊजी आज सुबह अचानक इनके एक दोस्त के घर से फोन आया कि वो बहुत बीमार हैं , हम लोग सोच रहे थे कि उन्हें एक बार देख आएं , अब क्या है ना बाबू जी किसी की बीमारी पूछकर तो आती नहीं। आप यहाँ पर ठहरिए हम लोग दो -चार घंटों में वापस आ जाएंगे नहीं तो आप एक काम कीजिए किसी और दिन आ जाइएगा उस दिन सब मिलकर एक साथ भोजन करेगे..........।’

टीना की बातें सुनकर तन्मय ने कहा- ‘नहीं बेटा कोई बात नहीं तुम लोग अपने दोस्त को देखने जाओ , शायद मैं ही जल्दी आ गया हूँ।’
राहुल और टीना ने एक दूसरे की तरफ देखा  उन्हें लगा कि ताऊजी उनके इशारों को समझ नहीं रहे हैं या समझना नहीं चाहते। टीना ने फिर से वहीं वाक्य दोहराए –‘अब क्या है ना बाबू जी किसी की बीमारी पूछकर तो आती नहीं।’
‘कोई बात नहीं बेटा , तुम मेरी चिंता मत करो मैं ठीक हूँ।’ - तन्मय ने कहा।
राहुल और टीना ने फिर से एक दूसरे की तरफ चिंतित होकर देखा टीना ने अपना मुँह टेढा किया ऐसा लग रहा था कि वह राहुल से कहने वाली हो कि मैंने तुम से पहेले ही कहा था कि यह बुड्ढा हमारे सारे बने बनाए  प्रोग्राम को खराब कर देगा।  उन्हें लगा कि ताऊजी अभी  वहाँ से जाने वाले हैं नही, और शाम को उन्हें उस पार्टी में अवश्य शामिल होना है।
तभी कुहुक अपने कमरे से बाहर आई और जोर से बोली -
‘मम्मा दद्दू सिर्फ दो साल ही जीएंगे ना……… ?’
टीना – ‘क्या बक्वास कर रही हो ? तुमसे किसने कहा कि दद्दू सिर्फ दो साल ही जीएंगे।
कुहुक – ‘मम्मा आप ही ने तो कैलेंडर पर लिख रखा है ना वहीं से दखा था मैने। कहते हुए वह तन्मय के पास जा बैठी ।’
यह सुनकर टीना का चेहरा लाल हो उठा
टीना ने कुहुक को आवाज दी कुहुक वहाँ नही यहाँ हमारे पास आकर बैठों । 
कुहुक - नहीं मैं दद्दू के ही पास बैठुँगी।
टीना - क्रोधित स्वर में  ‘तुमने सुना नहीं मैंने क्या कहा?’ कुहुक सहम गई और वहाँ से उठकर अनमने से मन से अपने मम्मी - पापा के पास जा बैठी ।
तन्मय टीना को कुहुक सो डाटने से रोकने वाले थे किन्तु पता नही वे ऐसा नही कर सके ।
राहुल और टीना सोचने लगे कि अब क्या करें ताऊजी तो.........।
तन्मय ने राहुल और टीना के चेहरे देखते हुए कहा- ‘अच्छा तुम अपने बीमार दोस्त से मिल आओ , मैं फिर किसी दिन आ जाऊँगा ।’
जैसे ही तन्मय ने वहाँ से चलने की बात कही राहुल और टीना के चेहरे पर मुस्कुराहट छा गई। उन्हें लगा चलो ताऊजी ने स्वंय ही जाने की बात कह दी नहीं तो हमें ..........।
‘अच्छा बेटा अब मैं चलता हूँ वहाँ तक पहुँचते- पहुँचते देर हो जाएगी’ कहते हुए वे सोफे से उठकर चलने लगे ।
राहुल ने ताऊजी के पैर छूते हुए अपनी असमर्थता जताते हुए माँफी माँगी.........। टीना अभी भी सोफे पर बैठी थी राहुल ने टीना को आँखों से ताऊजी के पैर छूने का संकेत किया तो टीना ने अनमने मन से ताऊजी के पैर छूने का कस्ट किया ।
तन्मय बच्चों को सदा सुखी रहने का आशीर्वाद देते हुए घर से बाहर निकल आए ।  राहुल और टीना ताऊजी को घर के मुख्य द्वार तक छोड़ने नहीं आए। जैसे ही ताऊजी घर से बाहर निकले उन्होंने चैन की सांस ली । तभी टीना ने राहुल से कहा- ‘चलो अच्छा हुआ ताऊजी चले गए , मुझे तो डर लग रहा था कि कहीं वे यहीं न जमकर बैठ जाए  चलो ठीक है जो हुआ ठीक ही हुआ ,अच्छा मैं तैयार होकर आती हूँ तुम लोग भी जल्दी तैयार हो जाओ नहीं तो पार्टी के लिए देर हो जाएगी।’

इधर तन्मय धीरे-धीरे चलते -चलते बस स्टैंड जा पहुँचे जहाँ काफी समय तक इंतजार करने के बाद एक बस आई जो पहले से ही काफी भरी हुई थी । भरी बस को देखकर एक बार के लिए तो उन्होंने सोचा कि इस बस को जाने दूँ दूसरी किसी बस से निकल जाऊँगा लेकिन उन्हें लगा कि अगर दूसरी बस भी इसी तरह भरी हुई आई तो .....? जैसे ही बस बस स्टैंड पर पहुँची तन्मय किसी न किसी तरह उस बस में चढ़ने में कामयाब हो गए । बस लोगों से खचाखच भरी हुई थी धक्का-मुक्की के बीच आखिर वे अपने बस स्टैंड तक पहुँच ही गए। बस से उतरकर थोड़ी दूर पैदल चलकर वृद्धाश्रम जा पहुँचे। पैदल चलने के कारण वे काफी थक चुके थे । रह रहकर उनकी सांस भी फूल रही थी , उनका शरीर पसीने से तर बतर हो गया था । अपने कमरें में पहुँचकर उन्होंने एक गिलास पानी पीया और थोड़ा आराम करने के लिए लेट गए । थकान के कारण  बिस्तर पर लेटते ही उन्हें नींद आ गई।
जब आँखें खुली तो देखा कि नर्स  एक हाथ में दवाइयों की गोलियाँ और एक हाथ में पानी का गिलास लिए खड़ी है।
‘तुम कब आई बेटा’ - तन्मय ने कहा.
‘बस अभी -अभी आई , मैं आप को जगाने ही वाली थी कि आप खुद ही जग गए। यह लीजिए आपकी गोलियाँ।’
तन्मय ने गिलियाँ ली और पानी के साथ निगल ली ।
नर्स- ‘तो मिल आए अपने बच्चों से ।’
तन्मय –‘हाँ।’
नर्स – ‘आप तो सुबह कहकर गए थे कि रात को देर से वापस लौटुँगा । आप तो तीन चार घंटों में ही वापस लौट आए ।’
तन्मय – ‘दर असल बेटे और बहु को अपने किसी मित्र को देखने जाना था जो कई दिनो से बीमार है। मैं अकेला घर पर क्या करता सो मैंने सोचा, मैं वापस ही चलता हूँ । इसीलिए जल्दी लौट आया।’
नर्स – ‘बाबूजी एक बात पूछूं ?’
तन्मय – ‘हाँ- हाँ क्यों नहीं ।’
नर्स – ‘आप किस मिट्टी के बने हैं……? आप उनकी गलतियों पर और कितना परदा डालेंगे...... आप को अपने बच्चों में कोई कमी नज़र नहीं आती…….?.....धन्य हैं आप।’
किसी ने सच ही कहा है - बुढ़ापा बचपन का ही दूसरा रूप होता है , अच्छा बुरा सब एक होता है । शायद इसी लिए तन्मय को अपने बेटे बहु में कोई बुराई नज़र नहीं आई । उनका कुहुक के लिए जो आकर्षण था उसे देखकर तो यही लगा कि बुढ़ापा बचपन का ही दूसरा रुप.....।’
        

4 comments:

  1. ज़माने का दस्तूर है ये पुराना :(
    अच्छी कहानी॥

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  2. A very true story..Good Work Shiv Ji

    Regards
    Anuraag Amit

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  3. अच्छी तरह लिखी सच्ची बातें हैं.

    कुछ स्थलों पर वर्तनी दोष किरकिरी पैदा करता है.
    टी वी को टी बी तो कर ही लीजिए.

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  4. आपकी कहानी यथार्थ के धरातल को स्पर्श करती है |समाज के उपेक्षित वर्ग की सच्ची दासतां को आपने एक अलग शैली में प्रस्तुत किया है |बधाई !!!!!भविष्य की शुभकामनाओं के साथ--
    आपका मित्र,
    चंद्रकांत

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