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Saturday, February 20, 2016

मनहूस


कल देर रात तक चली पार्टी के बाद अमन को घर पहुँचते-पहुँचते रात के दो बज गए थे। घर आकर वह उसी हाल में सो गया जिस हाल में पार्टी से घर आया था। सारा दिन ऑफिस में भागा दौड़ी फिर पार्टी ने उसे पूरी तरह थका दिया था। जैसे ही वह बिस्तर पर लेटा उसे नींद आ गई। सुबह-सुबह पड़ौसी के फ्लैट से छोटे बच्चे के तेज़ चीख-चीखकर रोने के कारण उसकी नींद टूट गई। बिस्तर में लेटे लेटे ही उसने अपनी अलसाई पलकें खोलकर दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा, सवा नौ बजे थे। फिर उसे याद आया कि आज उसका मित्र हैदराबाद से आनेवाला है। पर वो तो दोपहर एक बजे आनेवाला है। उसने पैर फैला लिए। सर्दी के दिन थे उसने अपनी रज़ाई अपनी सिर की तरफ खींच ली रज़ाई का नरम स्पर्श महसूस करते हुए पड़ा रहा। नींद की मीठी खुमारी अब भी उस पर छाई हुई थी। कमरे की अधखुली खिड़की से चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ आ रही थी, अब तक वह पूरी तरह से जाग चुका था लेकिन अभी भी रज़ाई में ही लेटा रहा।  चाह रहा था कि फिर से नींद आ जाए लेकिन उस बच्चे के लगातार रोने की आवाज़ ने उसे उठने पर विवश कर दिया। उठकर वह ब्रश करने के लिए गया ही था कि दरवाज़े पर किसी की दस्तक सुनकर वह दरवाजा खोलने के लिए चला गया। दरवाजा खोला तो सामने शांता बाई को देखा। शांता उसके घर में पिछले चार साल से काम करने आती है। साड़े नौ बजे का उसका फिक्स टाइम है। भले सूरज दिखे ना दिखे पर साड़े नौ बजे शांता बाई दिख जाती, लेकिन आज उसे आने में देरी हो गई। शांता उम्र के अंतिम पड़ाव पर है पर उसके आगे जवान से जवान स्त्री भी काम के मामले में हार जाती है। शांता घर में आकर अपने काम में लग गई और अमन अपने ब्रश करने में लग गया। ब्रश करके वह अपने कमरे में टीवी देखने चला गया, थोड़े देर में शांता ने उसे गरमागरम चाय लाकर दे दी। सर्दी के के दिन में अगर गरमागरम चाय मिल जाये तो क्या कहना। उसने चाय ली और चाय की चुस्की लेते –लेते टीवी देखने लगा। टी वी देखेते हुए उसने शांता से आज देरी से आने के कारण पूछा। 
अमन – “आंटी आज आप देरी से आई... क्या बात है सब ठीक तो है”?
शांता – “ भैया आज हमारे गाम में एक बच्चा पैदा हुओ ....वा के पैदा होने के कुछई घंटों में वा की दादी खतम है गई .....घर वालेनने ऊ लड़का मनहूस कहकर पानी में डुबाकर मार दियो। इस की पूरे गाम में चर्चा है रही है कि कैसो मनहूस हो जो आते ही अपनी दादीए खा गयो”......कहकर वह वहाँ से चली गई और अपने झाड़ू –पोछा करने में लग गई।  कुछ देर बाद वह अपना काम खत्म करे चली गई। लेकिन उसकी कही बातें उसके मन में घर कर गई। बार बार उसे एक ही शब्द याद आ रहा था मनहूस ....मनहूस ...यह बात उसे तीर की तरह चुभ रही थी। आज उसे कुछ धुँधला धुँधला सा नजर आने लगा था। इन्हीं शब्दों  को सोचते सोचते उसकी आँखों से आँसू बहने लगे.... अपना सिर बैड के सिरहाने रखी तकिया में गाढ़कर रोने लगा……। कुछ देर रोने के बाद शांत हुआ, फिर न जाने किन ख़यालों में खो गया।
उन शब्दों को सुनकर उसे कुछ को सोचते सोचते उसे नींद आ गई। कुछ देर बाद उसने अपने आप को एक शादी में पाया, यह उसके चाचा के बड़े लड़के की शादी थी। घर मेहमानों से खचाखच भरा हुआ था। माँ के लाख माना करने के बाद भी वह इस शादी में आया था। यहाँ आकार वह अंजान सा एक कोने में बैठा था। तभी उसका  चचेरा भाई उसे घर में अंदर ले जाने के लिए आया। वह उसके साथ चला गया।  घर में जब लोगों को पता चला कि वह अमन है। लोगों ने उससे बात तक न की उसे किसी भी काम से हाथ नहीं लगाने दिया। वहाँ के लोगों के उसके साथ जो व्यवहार किया उससे वह हातात हुआ। वहाँ से वह सीधा अपने घर गया । घर जाकर उसने अपनी माँ से इस विषय में बात की ...उसने इस प्रकार के व्यवहार के बारे में अपनी माँ से पूछा। पहले तो माँ उसे टालती रही। अंत में उसकी ज़िद के आगे उसने उसे वह राज़ बता दिया जिसे उसने पिछले बीस सालों से अपने सीने में दबाकर रखा था। क्यों वह उसे वहाँ या और किसी भी रिश्तेदार के यहाँ जाने से रोकती थी? क्यों आज तक उसने उसका उसका जन्मदिन नहीं मनाया? माँ के उसे बताया –
माँ –“तू जानना चाहता है कि ये सब लोग तुझसे क्यों बात नहीं करते? उन लोगों की नज़रों में तू          मनहूस है ...मनहूस
अमन – मनहूस.....और मैं...पर क्यों मैंने ऐसा क्या कर दिया.....मैं तो कल पहली बार उन लोगों  
       से मिला ?
माँ – पर तू वहाँ गया क्यों ? मैंने तुझे  माना किया था ना .....? तू जानना चाहता है ना कि इस उन लोगों ने तुझसे बात  क्यों नहीं की और क्यों मैंने तुझे अपने से बीस साल दूर रखा....? बीस साल पहले जब तू पैदा हुआ तेरे पैदा होने की खबर सुनकर तेरे पापा बहुत खुश थे।खुश क्यों न होते उनके मन की मुराद जो पूरी हो गई थी और वैसे भी तीन बेटियों के बाद तुझे पाया था। तुझे पाकर वे फूले नहीं समा रहे थे। तेरे पैदा होने की खुशखबरी उन्होने अपने सभी दोस्तों रिश्तेदारों में बता दी थी। उस दिन तेरे पापा और तेरी दादी मेरे साथ अस्पताल में ही थे। डिलेवरी के बाद जब डॉक्टर ने मुझे कमरे में शिफ्ट कर दिया तब तेरे पापा घर से तेरे लिए कपड़े लेने के लिए गए थे। वे गए तो कपड़े लेने के लिए थे लेकिन वापस नहीं लौटे, घर जाते समय एक कार के ब्रेक फेल हो गए थे उसी कार की चपेट में तेरे पापा आ गए उनकी मौके पर ही......कहकर उसकी माँ की आँखों से आंसुओं की धार बहने लगी....माँ रोती जाती और कहती जाती। तेरे पैदा होने के चार-पाँच घंटों के बाद ही तेरे सिर से तेरे बाप का साया छिन गया। तेरे पापा की मौत का कारण तुझे ही समझा, कि तेरे पैदा होते ही उनके घर का चिराग बुझ गया। घरवालों ने तुझे मनहूस समझकर मारने की कोशिश की लेकिन मैंने ऐसा न होने दिया.... पति को तो खो चुकी थी मैं.....लेकिन तुझे पाकर नहीं खोना चाहती थी। मैंने तुझे उन लोगों से कैसे बचाया ये तो मैं ही जानती हूँ .....अगर तेरे सुरेश चाचा न होते तो शायद आज तू मेरे सामने न खड़ा होता”
अमन – “सुरेश चाचा.....”?
माँ – हाँ उस दिन उन्होने ही मेरा साथ दिया। पूरा घर एक तरफ और मैं और तेरे चाचा एक तरफ। मुझ में तो इतनी ताकत भी न थी कि तुझे लेकर बाहर भी जा सकूँ। मैं तो अस्पताल में बिस्तर पर पड़ी थी। तुझे बचाने के लिए मैंने तुझे सुरेश को सौप दिया। वे ही तुझे अपने साथ लेकर यहाँ आए। जब मैं चलने –फिरने की हालत में हुई तो मैं अपनी बच्चियों को लेकर उस घर को छोड़कर यहाँ आ गई”।
माँ की बातें सुनकर अमन के पैरों तले की ज़मीन खिसक गई ......उसे लगा जैसे वही मनहूस है जो अपने पैदा होते ही अपने बाप को खा गया। उसे अपने आप पर गुस्सा आ रहा था।  इसी गुस्से में उसने इतनी बुरी तरह से बाल नौच डाले कि सिर से खून बहने लगा.... जैसे तैसे माँ उसे अस्पताल लेकर गई और उसका इलाज़ करवाया। वह माँ से कुछ कहना चाहता था ..... कि उसके सेल फोन की घंटी बजने लगी। घंटी की आवाज सुनकर उसकी आँखें  खुल गई। अपने आप को बिस्तर पर देखकर वह हक्का – बक्का रह रह गया ....ओह ये सपना था”। उसने फोन उठाकर देखा तो उसके दोस्त का कॉल था जो हैदराबाद से आने वाला था। 
अमन – “हैलो भाई ....हाँ भाई ...कहाँ पहुंचा”
मित्र –“अबे...मैं स्टेशन पर हूँ....कब से तेरा फोन लगा रहा हूँ.....तू है कि फोन उठा ही                           नहीं रहा ....कहाँ है तू....”?
अमन – “ क्या ...तू पहुँच गया...?” कहकर उसने दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा ... घड़ी में     एक बजकर बीस मिनट हो चुके थे। 
मित्र – “ हाँ ....पहले तू ये बता तू है कहाँ....? तू आ रहा है ना मुझे लेने के लिए”?
अमन – “ओह. आइ एम सौरी, भाई....बस आधे घंटे में मैं पहुंचता हूँ ....वेट देयर”। कहकर उसने फोने काट दिया।
अमन बिस्तर से उठकर  सीधा गुसलखाने (बाथरूम ) में गया। नींद पूरी न हो पाने के कारण उसकी आँखें जल रही थीं। ठंडे पानी से मुँह धोया और पास ही टंगी तौलिये से मुँह पोंछते हुए गुसलखाने से बाहर निकल आया। बाहर आकर आईने में अपने आप को देखता रहा, कुछ देर  अपने आपको देखते हुए उसने एक लंबी सांस ली…….. और  तैयार होकर अपने मित्र को लेने रेलवे स्टेशन चला गया .....     
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