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Thursday, October 29, 2009

बूढ़ी हड्डियाँ

सरदी का मौसम था। सरदी भी कैसी ; जिससे हमारी आपकी हड्डियाँ भी जम जाएँ। इसी कड़कड़ाती सरदी में मैं अपने कमरे में गरमागरम  कॉफी  का आनंद ले रहा था कि मेरी नज़र खिड़की के बाहर पड़ी। सड़क पर एक वृद्ध चला जा रहा था। सबेरे के साढे़ सात बजे थे। मुझे याद आया, आज स्कूल की बस आठ बजे आने वाली है और मेरा ध्यान उस वृद्ध से हटकर अपने आपको तैयार करने में चला गया। जल्दी-जल्दी उठा और नहा-धोकर स्कूल जाने के लिए निकल पड़ा। सात-पचपन हो चुके थे। मैं जल्दी-जल्दी बस स्टॉप की तरफ लपका। मगर मेरे, बस स्टॉप तक पहुँचते-पहुँचते स्कूल-बस वहाँ से निकल चुकी थी। मैं हताष सा खड़ा रह गया। तभी मेरी नज़र पुनः उस वृद्ध पर पड़ी जो कुछ देर पहले मेरी खिड़की के सामने से आया था। उस वृद्ध को देखकर न जाने क्यों मेरे मन में उसके बारे में जानने की इच्छा हुई। मैं धीरे-धीरे उसके समीप गया ही था कि बस आ गई और वह उस बस में चढ़ गया। वह बस मेरे स्कूल की दिशा में जाने वाली थी, यो मैं भी उसी में चढ़ गया।
बस के भीतर का नज़ारा किसी भी संवेदनशील प्राणी को भौंचक करने के लिए पर्याप्त था। वैसे तो आजकल सरकार भी वृद्धों को बहुत सी सुविधाएँ प्रदान कर रही है, जैसे रेलगाड़ियों के टिकट पर नियायत, बस में अलग से सीट। और भी बहुत सारी बातें हैं जिनके बारे में अभी यहाँ चर्चा करना आवश्यक नहीं है। हाँ तो, हम बस की बात कर रहे थे। वे वृद्ध सज्जन बस में चढ़े और उस भीड़ में अपने लिए सीट खोजने लगे। बस में वैसे तो साफ-साफ बड़े अक्षरों में लिखा ही रहता है कि अमुक सीट महिलाओं के लिए है, अमुक सीट विकलांगों के लिए है, अमुक सीट वृद्धों के लिए है, लेकिन भीड़ उस सबको पढ़कर भी अनपढ़ बनी रहती है। आज की पीढ़ी अपने आपको सुशिक्षित कहती है, मानती है किंतु उस शिक्षा को मात्र किताबों तक ही सीमित रखती है। इस बस में भी एक सीट पर साफ अक्षरों में लिखा था ‘‘वृद्धों के लिए’’। वृद्ध सज्जन ने देखा और मैंने भी देखा कि उस सीट पर दो नवयुवक बैठे आपस में गपशप  कर रहे हैं। एक ने वृद्ध को देख खड़ा होकर सीट देनी चाही किंतु उसके मित्र ने उसे ऐसा करने से रोकते हुए कहा, ‘‘अरे यार, इस बुड्ढ़े को क्या जरूरत थी इतनी सरदी में घर से बाहर आकर बस चढ़ने की? हम तो ऑफिस  जा रहे हैं। इसे इतनी जल्दी कहाँ जाना है जो सुबह-सुबह बस चढ़कर सीट पाने आ गया? अपनी जवानी में यह बहुत सीटों पर बैठ चुका; अब इसे खड़ा ही रहने दो।’’
पहले वाले की सदाशयता इस तर्कपूर्ण उपदेश से पलभर में जाती रही। मुझे यह स्थिति खल रही थी इसलिए मैंने उन युवकों के एक सीट खाली करने को कहा तो वृद्ध ने मुझे टोकते हुए कहा, ‘‘नहीं, रहने दो, बेटा। मैं खड़ा रहकर भी जा सकता हूँ। अभी इन बूढ़ी हड्डियों में बहुत जान है। इतनी जल्दी नहीं टूटेंगी ।’’
कहते हुए वृद्ध की आवाज नम हो आई थी। मैं विचलित हो गया और उन्हें अपनी सीट पर बिठाते हुए कहा, ‘‘बाबा, आप यहाँ बैठ जाइए।’’
पहले तो उन्होंने मना किया - ‘‘रहने दो, बेटा! यों ही ठीक हूँ।’’ जब मैंने उनसे बार-बार कहा और स्वयं उठकर खड़ा हो गया, तब उन्होंने बैठना स्वीकार किया। सीट पाकर उन्होंने एक चैन की सांस ली और बैठकर अपनी टाँगों को अपने हाथों से दबाना शुरू कर दिया जो अब तक खड़े रहने के कारण शायद दुःख रही थीं।
बस अपनी गति से चलती जा रही थी। हर स्टॉप पर नए लोग चढ़ते, कुछ पुराने उतर जाते। इसी भागादौड़ी में मेरा भी स्टॉप आ गया। मैंने देखा कि मेरे पीछे वे वृद्ध सज्जन उसी स्टॉप पर उतर गए।
हम लोग साथ-साथ चल रहे थे। जिज्ञासावश  मैंने  उनसे पूछ ही लिया, ‘‘बाबा, आप इस उम्र में, इतनी सरदी में कहाँ जा रहे हैं?’’
उन्होंने मेरी तरफ स्नेह से देखा और कहा ‘‘बेटा, पेट की आग को शांत करने के लिए कमाने जा रहा हूँ।’’
सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि लगभग पैंसठ वर्ष की आयु पार कर चुके वृद्ध को भी कमाने जाना पड़ रहा है। मैंने उनसे फिर पूछा ‘‘बाबा, आपके परिवार में कितने लोग हैं।’’ उन्होंने बड़ी भाव-भीनी मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया, ‘‘मैं और मेरी पत्नी दो प्राणी हैं।’’
‘‘और आपके बच्चे ?’’
बच्चों का नाम सुनते, वह भावभीनी मुस्कान एक अनजाने दुःख की दास्तान के पीछे छिप सी गई - ‘‘बच्चे? बच्चे हैं न! मेरे दो बेटे हैं। बड़ा विदेश  में  एक सॉफ्टवेर  कंपनी में मैनेजर है और छोटा बैंक में एकाउंटेंट। बड़ा बेटा और उसका परिवार अमेरिका में रहता है, छोटा बेटा इसी शहर में है।’’
‘‘क्या, बाबा, बेटा आपकी देखभाल नहीं करता? बड़ा बेटा आपकी जरूरतों के लिए पैसे नहीं भेजता?’’
ये प्रश्न सुनकर वृद्ध कुछ चुप से हो गए और शांत भाव में चलने लगे। मैंने भी चलते-चलते उनसे पूछ ही लिया, ‘‘छोटे बेटे के बीबी-बच्चे आपकी देखभाल नहीं करते क्या?’’
सुनकर न जाने क्यों उनकी बूढ़ी आँखों से आँसू छलक आए। यह देख मुझसे रहा न गया। आखिर मैंने पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है, बाबा? आपकी आँखों में आँसू?’’
‘‘क्या बताऊँ, बेटा! यह तो जीवन की कहानी है। जिन्हें हम पाल पोसकर बड़ा करते हैं, जिनके सुख-दुःख का दिन-रात ख्याल रखते हैं ; वे ही बुढ़ापे में छोड़कर चले जाते हैं। बेटा! मैंने अपनी जवानी में खूब धन कमाया और बच्चों को उच्च शिक्षा  दिलाई, उनका जीवन स्तर ऊँचा उठाया। बच्चों को सदैव खुश रखने का प्रयास करता था उनकी हर इच्छा पूरी किया करता था। बड़े बेटे को विदेश भेजने के लिए मुझे अपनी सारी जमा पूँजी लगानी पड़ी। फिर भी यह सोचकर संतोश होता था कि इन पैसों से कम से कम मेरे बेटे का सपना तो पूरा हो गया। बुढ़ापे की चिंता नहीं थी। सोचता था, आखिर बेटा जो भी कमाएगा, उसमें से हमारे लिए कुछ-न-कुछ तो भेजेगा ही। और हुआ भी कुछ ऐसा ही। पर जब बड़ा बेटा वहाँ से कुछ पैसे भेजता तो उन पैसों को मैं अपने छोटे बेटे के भविष्य के निर्माण में लगा देता। बड़े बेटे ने कुछ एक या डेढ़ साल पैसे भेजे होंगे, उसके बाद से आज तक एक फूटी कौड़ी तक नहीं आई।‘‘ क्षण भर रुककर धीमी आवाज में बोले, ‘‘उसने वहीं पर शादी भी कर ली और अपना पारिवारिक जीवन ख़ुशी -ख़ुशी  व्यतीत कर रहा है ... और मैं यहाँ ....!’’
        कुछ क्षण फिर चुप्पी रही। फिर जैसे अपने आपसे बात कर रहे हों, इस तरह उन्होंने कहना शुरू किया, ‘‘मेरा तो सब ठीक है किंतु उसकी वृद्धा माँ दिन रात उसे याद करती है। मरने से पहले एक बार उसे देखना चाहती है। मैं उसकी ममता को कैसे समझाऊँ कि जिस लाल का वह दिन रात इंतजार करती है, अब वह नहीं आएगा। अब वह हमारा लाल नहीं, किसी और का पति और किसी का पिता है। अब उसे हमारे साथ की नहीं, अपने आनेवाले कल के साथ की जरूरत है। .... अब वह एक कंपनी का मैनेजर है। उसको अपने भविष्य की चिंता है। उसके लिए जो बीत गया है वह जरूरी नहीं ; और हम दोनों अब उसका बीता हुआ कल हैं। ‘तुम व्यर्थ ही चिंता करती हो? वह ठीक है।’ मैं अक्सर उसे यही कहकर सांत्वना देता रहता हूँ। इन बूढ़ी हड्डियों का क्या भरोसा कब साथ छोड़ दें ? वह बेचारी तो इसी आस पर जी रही है कि उसका बेटा एक-न-एक दिन उसके पास जरूर आएगा।’’
‘‘बाबा, आपके तो दो बेटे हैं न ?’’
‘‘हाँ, बेटा। बेटे तो भगवान ने दो दिए हैं।’’
‘‘तो क्या छोटा बेटा भी आपकी देखभाल नहीं करता? और आपको इस उम्र में कमाने की क्या जरूरत ? आपकी पेंशन  भी तो आती होगी ?’’
‘‘हाँ, बेटा।पेंशन  तो आती है। वह सब घर के खाने-खर्चे में ही लग जाते हैं। घर का किराया और हमारी दवाइयों का खर्च कहाँ से चले ? उसके लिए मुझे कुछ न कुछ तो करना ही होगा। इस उम्र में दो ही रास्ते हैं। या तो खुद कमाऊँ या फिर दूसरों के आगे भीख मांगूँ। भीख मैं माँग नहीं सकता। सारा जीवन स्वाभिमान के साथ जिया है तो अब क्या किसी के सामने हाथ फैलाऊँ ? अब तो भगवान से एक ही प्रार्थना है कि कभी भी किसी के सामने हाथ फैलाने की नौबत न आने दे।’’
‘‘आपने जवानी में इतना कमाया तो क्या आपके पास आपका मकान नहीं है कि किराए पर मकान लेकर रह रहे हैं ?’’
‘‘अरे, बेटा! तुम एक मकान की बात करते हो, कभी मेरे पास दो-दो मंजिले दो मकान हुआ करते थे। पर आज मेरे पास अपना कहने के लिए कुछ नहीं।’’
‘‘तो क्या आपने अपने मकान बेच दिए ?’’
‘‘एक मकान तो बड़े बेटे को विदेश  भिजवाने के लिए बेचना पड़ा ....।’’
‘‘और दूसरा ?’’
‘‘दूसरे मकान में छोटा बेटा रहता है।’’
‘‘तो आप उसके पास क्यों नहीं रहते ? क्या वह आपको नहीं रखना चाहता ? या आप खुद उससे अलग रहना चाहते हैं ?’’
‘‘अरे, बेटा! कौन कम्बख्त ऐसा होगा जो अपने भरे-पूरे परिवार को छोड़कर अकेला रहना चाहे। जब तक छोटे बेटे का ब्याह नहीं हुआ था तब तक सब ठीक चल रहा था। बस जैसे ही बेटे का ब्याह हुआ, कुछ ही सालों में घर में कलह शुरू हो गई। रोज़-रोज़ की चिख-चिख से तंग आकर मैंने अपने आपको अलग करने का फैसला कर ही लिया। रोज़-रोज़ बहू का यह कहकर ताने देना कि मैं किसी काम का नहीं हूँ, घर पर बैठा-बैठा रोटी तोड़ता रहता हूँ - मुझसे सहा नहीं गया।’’ एक बार फिर उनकी आँखें और आवाज नम हो आई थीं।
‘‘बेटे ने आपको रोका नहीं ?’’
‘‘बेटा तो चाहता था कि हम उसके साथ रहें किंतु.... ?’’
मुझे लगा जैसे वे अपने छोटे बेटे का बचाव कर रहे थे, ‘‘बेटा, घर में बच्चे खुश  रहें, इसी में हमारी खुशी  है। जब जवानी हँस कर काटी है तो बुढ़ापे के लिए क्या रोना। एक न एक दिन बुढ़ापा सभी को आना है। जबसे मैं रिटायर हुआ हूँ और जबसे ये सब परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई हैं, तबसे तो मैं भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि मुझे इस जहान से उठाले तो अच्छा हो। जब तक हाथ पैर चल रहे हैं, तब तक ठीक है। बस घिसट-घिसट कर न जीना पड़े। अब तक शान से जिया हूँ, चाहता हूँ शान से ही मरूँ।’’
वृद्ध की बातें सुनकर मेरा मन उन युवकों के प्रति घृणा से भर गया जो बुढ़ापे में माँ-बाप को बोझ समझते हैं। बातें करते-करते मेरा स्कूल भी आ गया। वे आगे चले गए और मैं स्कूल में उस दिन कक्षाओं में मन नहीं लगा। वृद्ध की कहानी मेरे दिमाग में चलती रही और मन बार-बार पूछता रहा , क्या इसी दिन के लिए माँ-बाप संतान चाहते हैं .............।

माँ






माँ तुझे सलाम तेरे जज्बे को सलाम
देकर अपनी साँसें तूने मुझको जीवन दिया  है
तेरी आँखों से ही तो मैने देखी दुनिया सारी
देकर जीवन की साँसे तूने हम पर किया उपकार
माँ तुझे सलाम तेरे जज्बे को सलाम।





    अगर न होती तुम तो मुझको संसार में लाता कौन
    अगर न होती तुम तो मुझको जीवन देता कौन
    अगर न होती तुम तो संसार को बसाता कौन
    ईश्व पहुँच नहीं सकता हर जगह इसलिए उसने बनाया तुमको
 




        माँ तुझे सलाम तेरे जज्बे कोसलाम।                                                                 
खुद भूखी रहकर मेरा पेट सदा ही भरती हो
खुद धूप में नंगे पाँव चलकर मुझे गोद में उठा ले जाती हो
आए कोई संकट मुझपर तुम मेरी ढाल बन जाती हो
मेरी रक्षा की खतिर तुम बडे-बड़ों से लड़ने से भी नहीं घबराती हो
माँ तुझे सलाम तेरे जज्बे को सलाम।





मेरी खुशियों की खातिर तुमने अपनी खुशियों का दिया है बलिदान
माँ तू ममता की है मूरत तुझमें ही बसता है भगवान
तेरे बिना इस जग में जीना नही तुझ बिन जीवन की कोई आस नहीं
हे माँ तुझे सलाम तेरे जज्बे को सलाम ।


Tuesday, October 27, 2009

आत्मविश्वास ही सफलता की प्रथम सीढी है

 आत्मविश्वास ही सफलता की प्रथम सीढी है ।यह इस आधार पर कहा जा सकता है कि जिस व्यक्ति का आत्मविश्वास कमजोर होता है वह अपने जीवन में कभी भी सफलता प्राप्त नहीं कर पाता । सफलता एवं उन्नती के शिखर पर केवल वहीं पहुँच सकता है जिसका मनोबल , आत्मविश्वास सुदृढ़ होगा। आत्मविश्वास का जन्म मन में होता है । मनुष्य का मन समस्त इन्द्रियों का स्वामी और गतिविधियों का केन्द्र माना जाता है । मन के संकेत पर ही एवं उसकी प्रेरणा से ही शरीर का संचालन सुचारु रुप से होता है । यदि मन न होता तो मनुष्य शरीर अपने आप में बड़ा लाचार होता , क्योकि मनुष्य का मन जो कहता है वह वही करता है किन्तु मनुष्य की कुछ सीमाएं भी हैं उन्हें वह पार नहीं कर सकता । मनुष्य का शरीर आग में जल जाता है , पानी में गल जाता है ,वायु-धूप में वह सूख जाता है , शीत धाम वर्षा सभी इसे विचलित कर देती हैं । यह तन थक जाता है , टूट जाता है और हिम्मत हार बैठता है । इस बेचारे शरीर से मनुष्य वह सब कुछ नहीं कर सकता था जो आज उसने कर दिखाया है मात्र शरीर से यह सब संभव नही हो सकता उसके लिए उसे अपने आप को आत्मविश्वासी बनाना होगा तभी वह अपने आप को ऊँचाइयों के शिखर पर पहुँचा सकता है।

    आज वैज्ञानिक,सास्कृतिक और कलात्मक उपलब्धियाँ मनुष्य के शरीर के कारण नहीं अपितु उसके आत्मविश्वास के कारण ही प्राप्त हो सकी हैं । आत्मविश्वास वह है जिसे न तो कोई तोड़ सकता है , न उसे हिला सकता है यदि वह आत्मविश्वास द्रढ़ है तो । मनुष्य का मन भी उस की सफलता में कहीं न कहीं भागीदार अवश्य होता है क्योंकि मन के अंदर ही किसी कार्य को करने की इच्छा का जन्म होता है । मन शरीर का एक ऐसा यंत्र है जिससे शरीर का संचालन सुचारु रुप से होता है। इस लिए हम कह सकते हैं कि जो व्यक्ति अपने मन से हार मान बैठता है उसे संसार की को भी ताकत नहीं जिता सकती और जो व्यक्ति अपने मन से नही हारा है उसे संसार की कोई भी ताकत हरा नहीं सकती । जो व्यक्ति अपने मन मे दृढ संकल्प के साथ कार्य आरंभ करता है वह कभी भी जीवन में हारता नहीं । मन न हारने का अर्थ है हिम्मत न हारना , अपना हौसला बनाए रखना । जब तक मनुष्य में यह हौसला बना रहता है वह शांत नहीं बैठता वह कोई न कोई नए कार्य को करने में निरंतर लगा ही रहता है । जिस व्यक्ति का आत्मविश्वास दृढ है वह बार-बार  असफल होकर भी सफलता की राह पर सदा गतिशील रहता है । सफलता भी उसी के कदम चूमती है जो अपने आप को सफलता पर ले जाना चाहता है । जीवन एक संघर्ष है और जो इस संघर्ष में सफल होता है वही सही अर्थों में मनुष्य है और जो इस संघर्ष से घबराकर विचलित हो जाते हैं उनका जीवन व्यर्थ है । जीना है तो सदैव आत्मविश्वास के साथ ।आत्मविश्वासी व्यक्ति तो  पहाड़ों को भी काटकर नदियाँ बना सकता है, बस जरुरता है दृढ़ संकल्प की  । जीवन एक संघर्ष है इसके लिए अंग्रेजी में एक कहावत है कि - "किसी भी लड़ाई में तब तक हार नहीं माननी चाहिए जब तक कि जीत न ली जाए।" वास्तव में कोई भी संघर्ष या लड़ाई मनुष्य  अपने आत्मबल  ( आत्मविश्वास ) के भरोसे पर ही जीत सकता है। मनुष्य शरीर तो एक साधन मात्र रहता है।
    हमें इतिहास में अनेक ऐसे व्यक्तियो के  उदाहरण मिल जाएंगे जिन्होंने अपने आत्मबल के भरोसे से दुनिया को झुका दिया असंभव को भी संभव कर दिखाया । हमें हमारे इतिहास में अनेक व्यक्तियों के जीवन चरित्र पढ़ने को मिलते हैं जो आजीवन कठिनाइयाँ झेलते रहे किन्तु अन्त में सफल हुए। आज उन व्यक्तियों को असाधारण महापुरुषों की श्रेणी में रखते हैं । इसका क्या कारण है?  इसका कारण यही है कि इन लोगों ने विषम परिस्थितियों के आगे अपने घुटने नहीं टेके और उसका डटकर मुकाबला किया और उन विषम परिस्थितियों पर विजय प्राप्त की इसी कारण आज हम उन्हें असाधारण मनुष्य मानते हैं । जैसा  कि हम उदाहरण  राष्ट्रपिता महात्मागाँधी जी का ले सकते हैं जिन्होने अपने जीवन में अपने आत्मविश्वास के बल पर ब्रिटिश साम्राज्य की नीव हिला कर रख दी थी । ब्रिटिश सरकार उन्हें तोड़ न सकी क्यों ? क्योंकि उनका आत्मविश्वास सुदृढ़ था । यदि उनका मनोबल कमजोर पड़ जाता तो शायद आज हम आजादी की हवा में सांस न ले रहे होते बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के शासकों के अत्याचारों का शिकार हो रहे होते । इस लिए हम कह सकते हैं कि  जिस व्यक्ति का आत्मविश्वास दृढ़ होता है उसे बड़ी से बड़ी बाधा भी नही हरा सकती । यह बात जरूर है कि जो व्यक्ति सच्चाई की राह पर चलता है उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है किन्तु सफलता भी उसी व्यक्ति के कदम चूमती है जो सच्चाई और आत्मविश्वास के साथ अपने लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयास करता है ।
 दूसरा उदाहरण हम स्वामी विवेकानंद का ले सकते हैं जिन्होंने अपनी विदेश यात्रा के दौरान जब अमेरिका में भाषणों के दौरान उन्हें भाषण देने की अनुमति न मिलने  पर वे निराश नहीं हुए ,बल्कि उन्होंने किसी न किसी तरह भाषण देने की अनुमति प्राप्त कर ही ली  उन्होंने अपना आत्मविश्वास नहीं खोया उन्हें केवल कुछ समय की ही अनुमति मिली थी किन्तु जैसे ही उन्होंने अपना भाषण आरंभ किया वहाँ पर बैठे सभी लोग उनके भाषण सुनकर मंत्र मुग्ध हो गए और उन्होंने पाँच मिनट के स्थान पर बीस मिनट का भाषण दिया और अपने देश का नाम उज्ज्वल किया । यह सब कार्य उन्होंने अपने आत्मविश्वास के बल पर ही किया । उन्होंने आशा का दामन नहीं छोड़ा और आज एक महान पुरुष के रुप में याद किए जाते हैं । जो व्यक्ति आत्मविश्वास के साथ अपना कार्य करता उसे सफलता अवश्य मिलती है।

जालिम दुनिया

ये जालिम दुनिया हमें चाहे या न चाहे
हम तो चाहेंगे तुम्हें  हर दिन हर पल
ये दुनिया बड़ी जालिम है दिल तोड़कर हँसती है
मतलब पड़े तो दिल जोड़ लेते हैं लोग
मतलब निकल गया तो साथ छोड़ देते हैं लोग
दिल को एक खिलौना बनाकर खेल लेते हैं लोग।
      दिल की हर धड़कन तेरे लिए धड़कती है
      जीवन के हर मोड़ पर साथ तेरा ढूँढती है
      जब भी तुम दिल से मुझे पुकारोगे,पास सदा मुझे पाओगे
      जीवन की हर राह पर याद मैं तुम्हें आऊँगा
         ये जालिम दुनिया हमें चाहे न चाहे
         हम तो चाहेंगे तुम्हें हर दिन हर पल     ।
तडप उठोगे जब याद हमारी आएगी
ढूँढोगे तुम हमें जब हम दूर चले जाएंगे
तन से भले ही दूर हो जाएं पल दिल तो तुम्हारे पास ही होगा
तेरे दिल की धड़कनों मे बसकर साथ तेरा हम पाएंगे
जब कभी भी ये हाथ दुआ को उठेंगे
तेरी सलामती ,तेरी खुशी के लिए सदा दुआ करेंगे
 ये जालिम दुनिया हमें चाहे न चाहे
 हम तो चाहेंगे तुम्हें हर दिन हर पल।

कर्मवीर बन

कर्मवीर बन ए इन्सान
कर्मभीरु न बन ए इन्सान।

    जो कर्मवीर है वही भाग्यवान है
    जो कर्महीन है वह भाग्यहीन है।

कर्म ही भाग्य का निर्माता है
कर्म के बल से तू पहाड़ों को भी झुका दे
सच्चाई की राह पर तू चलता जा ।

    लाख बाधाएँ आए राह में
    तू अपना लक्ष्य साधे चल
    देख बाधाओं को तू अपना लक्ष्य छोड़ न देना
    सच्चाई की राह तो तू छोड़ न देना।

मंजिल उसे ही मिलती है जो अपनी राह बनाता है
न सोच कि राह में क्या मिलेगा तुझे
मन में अपने मंजिल पाने की ललक जगाले तू
कर्मवीर बनकर अपनी मंजिल को पा ले तू।।

Wednesday, October 21, 2009

तेरा साथ

तुझसे मिलने का मैं हर पल ढूँढू रोज नया बहाना।
हर शाम तेरे साथ गुजारने का मैं नित ढूँढूं नया बहाना।
पास अपने रोकने का मैं नित ढूँढू नया बहाना।
जो शाम मेरी तुझसे मिले बिना गुजर जाए उस रात मुझे नींद भला कैसे आए।
तेरे आने की नित राह यूँ निहारु जैसे प्यासा मयूर बदरा को।
काँटों भरी राह पर भी मैं ढूँढू तुझसे मिलने का नया बहाना
दुनिया को दिखाने को अब मैं हँसने का बहाना ढूँढता हूँ।
तेरी याद भुलाने के लिए अब मैं ढूँढू कोई नया बहाना।।

बेरहम दुनियाँ में अब मैं जीने का सहारा ढूँढता हूँ
अब तो तेरी याद भुलाने को मैं मरने का बहाना ढूँढता हूँ
मरकर भी किसी मोड़ पर अगर तू मिल जाए
तुझे देखकर मैं खुशी-खुशी इस जहान से विदा हो जाऊँ।।

Monday, October 19, 2009

तुम निर्बल हो नहीं

लाज का पर्दा छोड़ दो शर्म का घुंघट छोड़ दो
अपने भाग्य को कर्म पथ पर मोड़ दो
दिखा दो समाज को कि तुम किसी से कम नहीं।
रानी लक्ष्मीबाई की तरह तुम भी अपनी उन्नती की जंग का ऐलान कर दो
समाज में अपना मुकाम अभी भी तुम्हें है पाना ।

लाज शर्म को छोड़ दो चार दिवारी के बंधन को तोड़ दो,
दिखा दो कि तुम निर्बल हो नहीं ।
नारी तेरी महानता इस जग ने है जानी
तुझमें ही है दुर्गा है तुझ में ही काली
तेरे आंचल की छांव में है पलती दुनिया सारी।

Thursday, October 8, 2009

कहानी "जाबो"

गाँव की सुंदरता हर किसी के मन को  अपनी ओर आकर्षित करती है। गाँव की मिट्टी की भीनी -भीनी खुशबू का मजा ही कुछ और है। वहाँ नल का  पानी पीकर  थकान  दूर हो जाती है । शहरों की भीड़-भाड़ भरी ज़िन्दगी ,वहाँ की वयस्तता से परे गाँव का वातावरण बिल्कुल अलग चारो ओर शांति ही शांति। गाँव के लोगों में जो अपनेपन की भावना होती है वह शहरी सभ्याता में बहुत कम देखने को मिलती है। शहरों में लोग पैसा तो खूब कमाते हैं पर अपनापन का भाव न जाने कहाँ छूट जाता है। गाँव के भोले-भाले किसान सादा जीवन उच्च विचार, मधुर व्यवहार ,बड़ा अच्छा लगता है गाँव के वातावरण में।

    एक दिन की बात है मैं गाँव के पीछे खेतों की सैर करने के लिए निकला, बाहर आकर बहुत अच्छा लगा चारों तरफ सरसों के  पीले-पीले फूल खिले हए दिखाई दे रहे थे। कितना सुंदर नज़ारा था ? ऐसा लग रहा था मानो धरती ने पीले रंग के वस्त्र धारण कर रखे हो। प्रकृति के इस नजारे को निहारते हुए मैं अपनी धुन में चला जा रहा था कि  कि अचानक मेरी नज़र एक स्त्री पर पड़ी पुरानी सी,गंदी सी  साड़ी पहने सड़क के किनारे बैठी ज़मीन में कुछ खोज रही थी । दूर से देखने पर लग रहा था कि वह मिट्टी में से कुछ खोज रही है किन्तु पास जाकर देखा तो एक पचास-पचपन साल की वृद्ध स्त्री  अरहर की तूड़ी से एक -एक अरहर का दाना चुन-चुन कर एक तरफ इकट्ठा कर रही थी । अपने कार्य में वह इस प्रकार मग्न थी कि मेरे द्वारा यह पूछे जाने पर कि आप यह क्या कर रही हो ? उसने कोई जवाब नहीं दिया । मैंने भी एक -दो बार से ज्यादा उससे नहीं पूछा और मैं अपने कार्य के लिए आगे निकल गया । जैसे -जैसे मैं आगे बढ़ रहा था वैसे-वैसे दिन ढल रहा था प्रकृति की सुंदरता में और निखार आ रहा था । मैं अपनी सैर पर आगे तो जा रहा था किन्तु मेरा मन बार -बार यही देखना चाह रहा था कि जिस स्त्री को अभी-अभी पीछे छोड़कर आया हूँ आखिर वह वहाँ है या नही ? इसी लिए बार-बार पीछे मुड़कर देख लेता था वह स्त्री किसी  मूर्ती के समान बैठी अपने कार्य में मग्न थी । मैं कुछ और दूर तक गया फिर वापस घर की तरफ हो लिया । रास्ते में फिर वही स्त्री सिर नीचा किए तूड़ी से अरहर के दाने चुनने में लगी हुई थी । इस बार मैंने उससे कुछ नही पूछा सीधा घर आ गया ।

   मेरा मन बार-बार यही सोच रहा था कि आखिर वह स्त्री है कौन ? जो इस प्रकार डूड़ी से अरहर के एक -एक दाने चुन रही है। मुझे कुछ सोचता हुआ देखकर मेरी दादी ने मुझसे पूछ ही लिया कि “क्या बात है ? क्या सोच रहा है ?”
मैने कहा कि “पीछे खेतों के पास सड़क पर एक औरत अरहर की तूड़ी से एक-एक अरहर के दाने इकट्ठे कर रही है , मैंने उससे पूछा भी कि वह क्या कर रही है ? लेकिन उसने मेरी तरफ देखा और बिना कोई जवाब दिए वह फिर अपने काम में लग गई कौन है वह ? क्या वह पागल है? या फिर  भिखारिन, जो एक-एक दाना चुनकर इकट्ठा कर रही है ।

 “बेटा न तो वह पागल है न ही भिखारिन । वह औरत बेचारी अपनी किस्मत की मारी और दुनिया की सताई हुई है। इसी गाँव की लड़की है, उसका नाम जाबो है। अपने पड़ौस में ही तो रहती है ,शायद तुझे याद नही । बेटा जब किसी का बुरा वक्त आता है तो ऐसा ही होता है  बेचारी...............।”  दादी ने कहा

“क्या हुआ उसे ?” --मैंने दादी से पूछा

   अब क्या बताऊँ बेटा  उसके बारे में उस बेचारी का एकाद दुख तकलीफ हो तो बताऊँ । बड़ी अभागिन है जब से जन्म लिया है और अब तक बेचारी दुख ही दुख झेलती आ रही है। सुख के चार दिन नसीब होते नही कि फिर से दुखों का पहाड़ बेचारी पर आ पड़ता है। भगवान ने भी तो इसकी तरफ से आँखे फेर रखी हैं । उसे भी तो इस बेचारी पर दया नहीं आती , कितनी ही बार यह मौत के मुँह से बच-बचकर आ गई किन्तु इसे मौत नहीं आई। एक बार जब यह बहुत छोटी थी कुएँ में गिर गई , कम्बख्त कुएँ में गिरी तो थी लेकिन डूबी नही । संजोग से एक आदमी उस कुएँ से पानी भरने के लिए गया तो उसने देखा और शोर मचाया कि एक बच्चा कुएँ में गिरा पड़ा है । उस समय हम लोग अपने खेतों पर ही काम कर रहे थे हम सब लोग उस कुएँ की तरफ भागे वहाँ जाकर देखा तो यही लड़की जिसे तूने अभी सड़क पर अरहर बीनते हुए देखा था,  सीधे पड़ी पानी में तैर रही थी। खेत के आस-पास काम करनेवाले किसानों ने इसे कुंएँ से बाहर निकाला। उस समय सही सलामत बाहर निकल आई।  एक बार यही लड़की नहर में जा गिरी उसमें डूबकर भी यह नहीं मरी नहर में तो कम्बख्त दो दिन तक रेत में दबी रही थी जब गाँव वालों ने नहर का पानी रोका तो देखा कि पुल के ठीक सामने रेत में दबी हुई पड़ी थी फिर भी नहीं मरी । ईश्वर की लीला ईश्वर ही जाने । बता कोई दो दिन तक रेती में दबा रहे और फिर भी जीवित बच जाए? ईश्वर की माया वो ही जाने । ईश्वर अगर इसे तभी उठा लेता तो बेचारी को ये दिन तो न देखने पड़ते । पता नही क्या लिखाकर लाई है कम्बख्त अपने भाग में ….....?

    जब शादी के लायक हो गई तो माँ-बाप ने इसकी शादी कर दी । शादी के बाद लगा कि चलो अब तो बेचारी का घर बस गया अपने घर में सुखी रहेगी किन्तु ऐसा हुआ नहीं । शादी के कुछ साल बाद से ही इस बेचारी पर फिर से मुसीबतों का कहर शुरु हो गया । इसके दो बच्चे हैं एक लड़का और एक लड़की । असल में इसे दौरे पड़ते है । जब इसे दौरे पड़ते है उस समय इसकी हालत बिल्कुल पागलों की सी हो जाती है , बाद में फिर से सामान्य हो जाती है। कुछ दिनों तक इसके ससुरालवालो ने इसे घर में रखा किन्तु बाद  में वे लोग इसे यहाँ इसके माँ-बाप के पास छोड़ गए। तब से यह बेचारी यही रह रही है। पहले तो इसका पति और बच्चे कभी-कभी इससे मिलने आ जाते थे किन्तु अब तो बच्चों ने और पति ने इसकी तरफ से  मुँह मोड़ लिया है। सुना है इसके पति ने दूसरी शादी कर ली है अब वह अपनी नई दुनिया में खुश है । बस दुख तो भगवान ने इस बेचारी के नसीब में ही लिख दिए हैं। बच्चे … हे ! भगवान बच्चों ने भी अपनी माँ से मुँह फेर लिया । एक तो इसके दौरे पड़ने की बीमरी दूसरा अपने पति -बच्चों की इस बेरुखी ने इसे सचमुच पागल जैसा बना दिया है । अकसर यहाँ घर पर आ जाती है खूब ठीक-ठाक बात चीत करती है सबका हालचाल पूछती है । उसे भी अपने बच्चों से मिलने का मन करता है पर क्या करें .......... । जब यहाँ आई थी तब इसके बच्चे छोटे - छोटे थे तभी एक दो बार इसका पति  बच्चों को इससे मिलाने लाया था। उसके बाद कभी नही आया । तबसे बेचारी इसी तरह जी रही है ।

    जब तक इसके माँ-बाप जीवित थे तब तक तो सब ठीक था किन्तु माँ-बाप के गुजर जाने के बाद तो इसकी हालत और खराब हो गई । एक दिन इसके पिता जी साइकिल से जंगल जा रहे थे एक ट्रकवाले ने उन्हें पीछे से टक्कर मारी बेचारे की मौके पर ही  मौत हो गई , इसकी  माँ की मौत भी बड़ी दर्दनाक हुई थी । शर्दियों के दिन थे सभी लोग अपने -अपने घरों में थे जाबो और उसकी माँ जिस घर में रहती थीं उसकी छत घास -फूंस के बनी थी , घर के अंदर शरदी से बचने के लिए इन लोगों ने अलाप जला रखा था अलाप में से एक चिंगारी उस छप्पर में जा लगी , छप्पर था सूखी घास फूंस का जल्दी ही आग पकड़ गया । आग लगने से कुछ समय पहले ही जाबो पानी लेने के लिए नल के पास गई थी जैसे ही वह पानी लेकर वापस आने लगी तो उसने घर में आग को देखा और चिल्लाई  बेचारी..........। घर के अंदर केवल उसकी बूढ़ी माँ थी । जब तक गाँव वालों ने उन्हें बाहर निकाला तब तक वे काफी जल चुकी थी । उनका इलाज भी करवाया किन्तु वे बेचारी ज्यादा दिन तक न जी सकी और जाबो को इस संसार में अकेले जीने के लिए छोड़ गई। वैसेे तो चार-पाँच भाई हैं इसके लेकिन ............ कोई इसे अपने पास रखना  ही नहीं  चाहता अब यह बेचारी कहाँ जाए इसी लिए बेशर्मों की तरह कभी किसी के घर तो कभी किसी के घर में जा रहती है । पहले तो यह जिसके घर में रहती थी उन लोगों का काम भी खूब करती थी , घर का  हो या जंगल का सब के साथ बराबर काम करवाती थी तो इसके भाई भी इसका ख्याल रखते थे  किन्तु आज -कल यह  ठीक तरह से नहीं  रहती घर में कलेश मचाती है। एक दूसरे से तू -तू मैं -मैं मचाती है किसी काम की कहो तो नहीं करती । अब बेटा बिना काम करे तो कोई भी घर में खाली बिठाकर खिलाएगा नहीं? अपने इसी रवैये के कारण यह किसी भी एक भाई के घर में नहीं टिकती । अब तो स्थिति यह है कि कभी एक के घर में रहती है तो कभी दूसरे के घर । जो कुछ मिल जाता है खा लेती है । जिस के घर रहती है उसी का थोड़ा बहुत काम कर देती है । अगर इसका मन है तो वरना यों ही बाहर भटकती रहेगी। जब इसे दौरे आते है तब तो इस की हालत बिलकुल पागलों की सी हो जाती है ,वैसी ही हरकते करने लगती है।

    हम लोग जाबो की बातें ही कर रहे थे कि मेरी नजर दरवाजे पर गई तो देखा कि जाबो घर के मुख्य द्वार पर आती हुई दिखाई दी । उसे घर में आता देखकर मेरे मन में उससे बात करने की लालसा जगी वैसे वह रिश्ते में वह मेरी बुआ लगती हैं। जैसे ही वह हमारे पास आई दादी ने उसे बैठने के लिए स्थान दे दिया और वह वहाँ पर बैठ गई । दादी ने पूछा कि कहाँ से आ रही हो? तो उसने बताया कि वह अभी बाहर घूमने गई थी सो वहीं से आ रही है । उसने मेरी तरफ देखते हुए दादी से धीरे से  पूछा कि “ गि कौन हैं ?” दादी ने उसे बताया कि तुम्हारे बड़े भाई का बड़ा लड़का । यह सुनकर उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा कि “अरी ! भाभी मेरी तो पेहचान में ही ना आयो” .........यह कहकर उसने मेरा हाल चाल पूछा । मैने भी उन्हें सभी सवालों का जवाब दे दिया । तभी मेरी नज़र उनके पैर पर पड़ी , उनका एक पैर बहुत जला हुआ था । मैने पूछा कि “आपका पैर कैसे जल गया ?

     “अरे! भइया एक दिन गरम -गरम चाय पैर पर गिर गई उसी से जल गया था ।”  उस घाव को देखने से लग रहा था कि वह बहुत  पुराना है। घाव पर मक्खियाँ भी भिनक रही थी । देखने से ही लग रहा था कि उस घाव का उपचार नहीं किया गया है और न ही  किसी भी प्रकार की दवाई ली गई है । पूछने पर पता चला कि उसके पास पैसे न होने के कारण वह डॉ. के पास नहीं जा सकी और न ही कोई दवा ली है । केवल घरेलू उपचार की कर रही है , इसी घाव के कारण वह लंड़ाकर चलती है पर करे क्या ................? वाह ! रे ज़िन्दगी ?

         वह घर पर बैठी अपनी आप बीती बता रही थी , उसकी आप बीती सुनकर मेरी  भी आँखों में आँसू भर आए । वह बता रही थी कि यह जमाना कितना बेरहम है , यहाँ न तो कोई किसी का भाई है ,न ही  कोई किसी का  बेटा सब के सब मतलब के रिश्ते नाते हैं । जब तक तुम ठीक हो तब तक ही सभी रिश्ते नाते होते है यदि तुम्हें किसी की सहायता चाहिए तो इस जमानें में वह आसानी से नहीं मिलती । उसका भी कभी कोई अपना परिवार हुआ करता था , सभी तो थे उस परिवार में पति -पत्नी , दो बच्चे , सास - ससुर  आदि किन्तु आज सभी लोगों के होते हुए भी वह कितनी  अकेली है। जिन बच्चों को जन्म दिया उन्होंने भी उसकी तरफ से मुँह फेर लिया, जिस पति ने अग्नि के सामने सात फेरे लेते समय सात जन्मों तक साथ निभाने का वादा किया था वह भी अपने वादों से इसी जन्म में ही मुकर गया। अपनी नई दुनिया बसाकर खुशी से जी रहा है। अपने बच्चों की याद में यह कितनी ही रातों को जागकर रोती है , रोती है अपनी बेबसी पर , कोसती है अपनी किस्मत को हाय ! भगवान तूने क्यों मुझे ऐसी ज़िन्दगी दी? ऐसी ज़िन्दी से तो तू मुझे मुक्ति क्यों नहीं दे देता । इन लोगों को भी मुझ जैसे बोझ से मुक्ति मिल जाएगी। मुझे मुक्ति मिलते ही इन सभी लोगों को चैन की नींद आएगी ।  हर औरत का सपना होता है कि वह अपने परिवार में रहे , परिवार की मालकिन बनकर उसका अपना हँसता खेलता परिवार हो  लेकिन मैं अभागन परिवार और बच्चों के बारे में भी नहीं सोच सकती । बस दिल के  एक कोने में छोटी सी आस जगाए बैठी है कि एक न एक दिन तो इसके बच्चे इससे मिलने ज़रुर आएंगे । वहा ! रे माँ  की ममता , जिन बच्चों को माँ की फिकर नही उनके लिए भी यह माँ दिन- रात इन्तज़ार करती है। राह पर आने वाले राहगीरों में से अपने बच्चों को खोजती है । एक -एक दिन इसी इंतज़ार में कटता है कि आज न सही  एक न एक दिन तो वो लोग मुझसे मिलने आएंगे । किसी ने सही कहा है कि “जो सम्मान अपने घर में होता है वह बाहर नहीं मिल सकता।” यह दुनिया बड़ी मतलबी है।

    वह एक माँ होते हुए भी अपने बच्चों को देख नहीं सकती ,एक सुहागन है फिर भी अपने पति से मिल नहीं सकती । यह कैसी ज़िदगी है……हे! भगवान अपनो के होते हुए दूसरों  का सहारा ढूंढना पड़ रहा है । एक रोटी के लिए सौ बार अपमान सहना पड़ रहा है। फिर भी ज़िदा है ........? जीवन की एक आस है।  चेहरे पर दिखावे की खुशी ज्यादा देर तक नहीं रहती । शायद वर्षों बीत जाने के बाद भी उसे अपनों के आने का इंतजार है। उसे इंतजार है उनका जिन्होंने उसे मुशीबतों में अकेले दर-दर भटकने, मरने  के लिए छोड़ दिया था । आज भी उसकी ममता इंतजार करती है अपने लाल के दीदार का , आखिर है तो वह भी एक माँ न ........ वाह माँ ! वाह । अपनों के इंतजार में न जाने कितनी ही बार वह छिप-छिपकर रोइ होगी? किस तरह उसने अपने आप को संभाला होगा ? यह तो वो ही जाने पर उसकी सूनी आँखों मे अपनों के आने का इंतजार आज भी साफ-साफ देखा जा सकता है। 

          जाबो की कहानी सुनते -सुनते शाम हो चुकी थी । ऐसा लग रहा था मानो सूरज भी उस दुखिया के दुख से दुखी होकर आसमान के किसी कोने में छिप जाना चाह रहा हो। पक्षी अपने- अपने घरों को लौट रहे थे । जैसे -जैसे शाम हो रही थी जाबो के मन में एक द्वंद्व चल रहा था कि आज  किसके घर जाकर खाना खाए....। सूरज पूरी तरह आसमान की गोद में समा चुका था । अंधेरे होते ही जाबो एक ठंडी सांस लेते हुए उठी और चल दी । ऐसा लग रहा था मानो वह खुश है यह सोचकर कि चलो और एक दिन ज़िन्दगी का कट गया । रात का अंधेरा धीरे-धीरे बढ़ता गया जैसे- जैसे अंधेरा बढ़ रहा था वैसे-वैसे गाँव में सन्नाटा भी बढ़ रहा था । जाबो जा चुकी थी लेकिन उसकी बातें और कभी न  खत्म होने वाला इंतजार जारी है................... वहा ! रे ज़िदगी ।

Wednesday, October 7, 2009

IB Profiles (रूपरेखा) For IB Students and Teachers

                                Profiles/रूपरेखा

1. जिज्ञासु :( Inquirer) विद्यार्थी में अज्ञात विषय जानने ,समझने तथा पढ़ने की उत्कंठा का
होना आवश्यक है। जिन विद्यार्थियों मे अज्ञात विषय को जानने की
लालसा होती है वे ही उस विषय को सीख पाते हैं।

2. सुविज्ञ :(Knowledgeable)  विद्यार्थी में भाषा सीखने और उसे अपने व्यवहार में लाने की उत्सुकता
का होना अतिआवश्यक है।सीखे हुए ज्ञान को अपने व्यवहारिक जीवन में
लाने से ही विषय का ज्ञान बढ़ता है।


3. विचारक :(Thinkers) विद्यार्थी को यदि भाषा सीखनी है तो उसे दूसरों पर निर्भर न रहकर
स्वयं को स्वावलंबी बनाना होगा। स्वावलंबी विद्यार्थी ही भाषा की
बारीकियों को सीख सकता है।

4. संचारक: (Communicators) भाषा शिक्षण में विचारों के आदान-प्रदान हेतु संप्रेषण कौशल का होना
अनिवार्य है।


5. सिद्धान्तवादी :( Principled) विद्यार्थियों को यदि भाषा सीखनी है तो उन्हें भाषा - शिक्षण
सिद्धान्तों का पालन करना होगा। भाषा शिक्षण के सिद्धान्तों के पालन
से भाषा शिक्षण और निखरता है।

6. उदार ह्रदयी बनें : (Open minded)विद्यार्थियों को यदि भाषा सीखना है तो उन्हें समय -समय पर
एक दूसरे के साथ बिना किसी संकोच के एक दूसरे के साथ
विचार विमर्श करते रहना चाहिए ।


7. स्नेह्रदयी बनें :( Caring)  भाषा सीखने वालों को सदा प्रोत्साहित करें उन की त्रुटियों पर व्यंग
न करें बल्कि उन्हें सुधारने का प्रयास करते रहें । स्नेह और
प्रोत्साहन से कोई भी कठिन से कठिन भाषा भी सीखी जा सकती
है।

8. संकट -संघर्ष : (Risk -Taker)विद्यार्थी को भाषा अध्ययन में आए संकटों का सामना करने पर ही
भाषा का उचित ज्ञान प्राप्त होगा।

9. सुसंतुलित : ( Balanced )विद्यार्थी को भाषा शिक्षण में समस्त कौशलों का संतुलन बनाए रखना
अत्यावश्यक है। सभी प्रकार के कौशलों के प्रयोग से भाषा शिक्षण
निखरता है।

10. आत्मनिरीक्षण : ( Reflective )विद्यार्थियों को समय-समय पर स्वयं ही निष्पक्ष रूप से अपने
ज्ञान का निरीक्षण करते रहना चाहिए। स्वयं निरीक्षण से विद्यार्थी
अपना भाषा कौशल सुधार सकते हैं।

Tuesday, October 6, 2009

"सब मिलकर पेड़ लगाएँ"

आओ साथी सब मिलकर पेड़ लगाएँ, बड़े प्यार से पेड़ लगाएँ

पेड़ों की हरियाली से इस जग को नहलाएँ
आओ साथी सब मिलकर पेड़ लगाएँ।।


पेड़ों की इस हरियाली से प्रदूषण को दूर भगाएंगे

प्रदूषण को दूर भगाकर नया संसार हम बनाएंगे

हरियाली की शोभा चारों दिशाओं में फैलाएंगे

भारत की इस पावन भूमि को हम स्वर्ग बनाएंगे

आओ साथी सब मिलकर पेड़ लगाएँ, बड़े प्यार से पेड़ लगाएँ।।


आनेवाली नई पीढी को तुम हरा -भरा संसार देते जाना

अगर न होंगे पेड़ और पौधे तो सोचो क्या होगा इस धरती का

अगर न होंगे पेड़ इस धरती पर तो हो जाएगी यह शमशान

शमशान न होने देंगे इस धरती को , रहते अपनी जान के

आओ साथी सब मिलकर पेड़ लगाएँ, बड़े प्यार से पेड़ लगाएँ।।


यदि लगाओगे तुम एक-एक पौधा तो धरती पर बढ़जाएगी हरियाली

पेड़ लगाकर ला सकते हैं हम प्रकृति संतुलन को वापस

वैसे तो एक पेड़ भी हरता है प्रकृति का प्रदूषण सारा

लेकिन हिलमिल कर रहने से और भी बढ़ जाएगी हरियाली

आओ हम सब मिलकर यह प्रण ले कि जीवन के इस आधार को मिटने न देंगे।

हरी -भरी धरती पर ही होंगी खुशहाली चारो ओर

कण-कण देगा तुम आशीश ,जीवन की खुशहाली में

पेड़ों की हरियाली से ही जीवन की खुशहाली होगी

आओ हम सब मिलकर यह प्रण ले कि जीवन के इस आधार को मिटने न देंगे।

Monday, October 5, 2009

IB Students Attitudes विद्यार्थी रवैया / (For IB Students and Teachers)

                                                     Attidudes   रवैया


1. आत्मविश्वास: ( Confidence) विद्यार्थियों को सदैव अपने कार्य के प्रति आत्मविश्वासी होना चाहिए। आत्मविश्वास ही सफलता की पहचान है। आत्मविश्वासी विद्यार्थी ही जीवन में अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाता है।



2. सहायक :( Cooperative) विद्यार्थियों को सदैव बिना किसी भेद-भाव के एक दूसरे का सहायक होना चाहिए। एक दूसरे की सहायता से विद्यार्थी कठिन से कठिन कार्य को भी सरल बना सकते हैं ।



3. सम्मान :(Respect)  विद्यार्थियों को सदैव दूसरों का सम्मान करते हुए ज्ञानार्जन करना चाहिए। जो विद्यार्थी सदैव दूसरों का सम्मान करते हैं ,दूसरे भी उनका उतना ही सम्मान करते हैं।



4. सहनशीलता :(Tolerance) विद्यार्थियों को सदैव अपने अंदर सहनशीलता का विकास करना चाहिए। कठिन परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए। किसी भी प्रकार की असफलता से निराश न होते हुए अपने आपको मजबूत और सहनशील बनाना चाहिए।



5. स्वतंत्र :(Independence) विद्यार्थियों को सदैव अपने ज्ञान का आदान प्रदान स्वतंत्र रूप से एक -दूसरे के साथ करते रहना चाहिए। स्वतंत्र रूप से ज्ञान के आदान-प्रदान से ज्ञान में वृद्धि होती है।



6. ईमानदारी :(Integrity) एक आदर्श विद्यार्थी को सदैव ईमानदारी के साथ अपना कार्य करना चाहिए। एक ईमानदार विद्यार्थी ही अपने ज्ञान का सही उपयोग कर सकता है। विद्यार्थियों को सदैव अपने और अपने ज्ञान के प्रति ईमानदार होना चाहिए। जीवन में सदैव सत्यता के मार्ग पर चलते हुए ज्ञानार्जन करना चाहिए।



7. सहानुभूति :(Empathy) विद्यार्थियों में सहानुभूति का गुण होना बहुत ही आवश्यक है, क्योंकि सहानुभूतिपूर्ण विद्यार्थी सदैव अपनी समस्याओं का समाधान एक -दूसरे के सहयोग से पा लेता है।



8. उत्सुकता :(Enthusiasm) विद्यार्थियों में सदैव नए विषय को जानने की उत्सुकता होनी चाहिए। उत्साही विद्यार्थी ही अपने ज्ञान में वृद्धि करता है।



9. रचनात्मकता : (Creativity)विद्यार्थियों को ज्ञान प्राप्ति के लिए नए-नए रचनात्मक तरीकों को निरंतर अपनाते रहना चाहिए और इस प्राप्त ज्ञान कोे रचनात्मकता के आधार पर दूसरों के सम्मुख प्रस्तुत करना चाहिए।



10. जिज्ञासा :(Curiosity) विद्यार्थियों में सदैव अज्ञात विषय को जानने की जिज्ञासा होनी चाहिए। अज्ञात विषय को ज्ञात करने से ही ज्ञान में वृद्धि होती है। विद्यार्थी को सदैव जिज्ञासु बने रहना चाहिए।





11. सराहना : (Appreciation)विद्यार्थियों को सदैव एक - दूसरे के कार्यों को समय -समय पर सराहते रहना चाहिए। सराहना से ही विद्यार्थियों में कार्य करने की क्षमता का विकास होता है, और उनके मनोबल में भी वृद्धि होती है।



12. वचनबद्धता :( Commitment) विद्यार्थियों को सदैव अपने कार्य एवं जिम्मेदारियों के प्रति वचनबद्ध रहना चाहिए। वचनबद्ध विद्यार्थी सदैव अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है।

हिंद देश के निवासियो

हिंद देश के निवासियो सुनो ज़रा


क्या कह रही है माँ वसुंधरा पुकार कर।

देश है बांटा , जात है बांटी

बांट लिया धर्म और ईमान को

मत बांटो अपने आप को धरम और ईमान के नाम पर

कहता नहीं धर्म कोई भी कि बांटो तुम इन्सानों को

सभी धर्मों का एक की सार,मानव का हो मानव से प्यार

मत बांटो इन्सानों को धर्म और ईमान के नाम पर।।


                न रोको जीवन की इस पावन धारा को

                मानव सेवा ही है माधव सेवा समझो इस बात को

                सरिता करती कभी न भेद अपना जल देने में

               सूरज करता कभी न भेद अपनी रोशनी देने में

                न किया कभी चाँद ने भेद चाँदनी देने में

                फिर क्यों करते हो तुम भेद इन्सानों में

               मत बांटो इन्सानों को धर्म और ईमान के नाम पर।।


न रंगो माँ वसुंधरा के तन को उसी के सपूतों के लहु से

बेटे चाहे कितने भी हो सब होते हैं माँ को प्यारे

करती कभी न भेद माता अपने बच्चों में

फिर क्यों करते हो तुम भेद इन्सानों में

मत बांटो इन्सानों को धर्म और ईमान के नाम पर।।


              हिन्दु, हो या मुस्लिम, हो या हो सिख, ईसाई

              लहु-लहु में कोई भेद नहीं सब के सब है भारतवासी

             भारतीयता हो हमारी पहचान भारत माता है हमारी शान

             हिंद देश के निवासियो सुनों जरा

             क्या कह रही है माँ वसुंधरा पुकार कर।।

Thursday, October 1, 2009

भारत देश हमारा

सबका प्यारा सबसे न्यारा भारत देश हमारा
मस्तक हिमराज विराजे इसकी शान निराली है।
कण-कण में है सोना , खेतों में हरियाली है
भारत देश है सबका प्यारा ,इसकी शान निराली है।।
हरा भरा है आँगन इसका,घर-घर में खुशहाली है
जन्में इसकी मिट्टी में गाँधी ,नेहरू और सुभाष हैं।
जन्मी इसी मिट्टी में लक्ष्मीबाई महान हैं
देकर अपनी जान की बाजी , दी हमको आजादी महान है।
सबका प्यारा सबसे न्यारा भारत देश हमारा।।
भिन्न -भिन्न है भाषा इसकी , भिन्न- भिन्न हैं बोली
भिन्न -भिन्न है जाति धरम पर सबकी एक ही अभिलाषा है
भिन्नता में एकता ही जिसकी पहचान है
एक ही माटी एक ही गुलशन क्यारी जुदा -जुदा है
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान महान है,हम इसकी संतान हैं।।
जन्म लिया है इस मिट्टी में ,पले बड़े हुए हैं इसकी गोद में
आंच न आने देंगे इसकी शान पर,रहते अपनी जान के
जान भले ही चली जाए, पर जाने न देंगे इसकी शान को
ऊँच-नीच और जात -पांत का भेद मिटाकर रखेंगे इसकी शान को
सबका प्यारा सबसे न्यारा भारत देश हमारा।।
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